Friday, September 26, 2014

महाराष्ट्र में दिल नहीं दल टूट रहे हैं

आज महाराष्ट्र की राजनीति में पूरा एक भूचाल सा गया है। पिछले एक महीने से सीटों को लेकर चल रही लड़ाई के चलते दो बड़े गठबंधन टूट गए हैं। एक राजनीतिक छात्र होने के नाते मुझे इसपर कुछ पढ़ना लिखना बहुत अच्छा लगा।  प्रेस कांफ़्रेस के दौरान बीजेपी कह रही है, शिवसेना को 150 सीटें नहीं दी जा सकती हैं। शिवसेना कह रही है, बीजेपी को 135 सीटें नहीं दी जा सकती हैं। यानी, दोनों ही मंडलियां स्वयं को दाता और दूसरी को प्राप्तकर्ता मान रही हैं। वैसे, सच यह भी है कि 25 वर्ष पहले जो समझौता हुआ था, उसमें तय यह हुआ था कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में दाता की भूमिका शिवसेना निभाएगी, जबकि लोकसभा चुनाव में यह भूमिका भाजपा की होगी। ।।।और अभी तीन महीने पहले के लोकसभा चुनाव तक यह समझौता चलता रहा था, मगर इन्हीं चुनाव में दिल्ली वाले दाताओं का लोकसभा में बहुमत गया। सो, अब वे महाराष्ट्र में भी दाता की भूमिका निभाना चाहते हैं। फसाद की जड़ यही है। फिलहाल, दोनों टीमें आमने-सामने हैं। वैसे, इसका परीक्षण होना चाहिए कि महाराष्ट्र में लहर किसकी है, मोदीजी की या शिवसेना की और यह परीक्षण तभी संभव होगा, जब दोनों पहलवान एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोंककर मैंदान में उतरेंगे और अब इसका अखाडा खुल चुका है। अर्थात बीजेपी और शिवसेना का गठबंधन टूट गया है। अपन को लगता है कि महाराष्ट्र की सेहत के लिए इससे बढिय़ा कुछ और हो ही नहीं सकता था। अभी कांग्रेस-एनसीपी का गठबंधन भी टूटना भी एक अच्छा संकेत है। ताकि विधानसभा चुनाव में ये चारों दल अपना-अपना आकलन कर सकें कि कौन कितने गहरे पानी में है। इसमें शिवसेना और भाजपा गठबंधन के टूटने के दो तीन कारण हैं। पहला तो यह क़ि शिवसेना भाजपा की विस्तारवादी नीति से सतर्क हो रही है। उसे लगने लगा है क़ि अगर मोदी की भाजपा को ज्यादा सिर पर चढ़ाया तो महाराष्ट्र से शिवसेना भी खत्म हो जाएगी। उनको पता है कि अमित शाह, मोदी और कुछ नेता हिन्दुत्व के मुद्दे को शिवसेना से छीन कर हासिए पर धकेल सकते हैं। पिछले दिनो आप केन्द्र में मंत्री पद को लेकर हुई लड़ाई को देख सकते हैं। वहीं बीजेपी की बात की जाए तो उसके कुछ नेता खासकर मुम्बई में आशीष शेलार जैसे कुछ युवाओं को लगता है क़ि अब महाराष्ट्र में मोदीजी की लहर काम आएगी। महाराष्ट्र में लोग मराठी के नाम पर शिवसेना को वोट नहीं देने वाले हैं। भाजपा ने एक दो और भी निशाने साध रखे हैं। भाजपा का एक पूरा धडा चाहता है कि राज ठाकरे की पार्टी के साथ उनका गठबंधन हो जाए। लेकिन यूपी बिहार में इस मुद्दे के डर की वजह से केन्द्रिय नेतृत्व उसे यह करने से रोक रहा है। भाजपा तो एनसीपी के साथ भी जाना चाहती है, पहले ऐसा लगा भी कि एनसीपी भी ऐसा ही चाहती है, लेकिन प्रफुल पटेल जैसे बड़े नेता के सेकुलर साथी के साथ की बात कहने पर भाजपा या मनसे से गठबंधन का कोई भविष्य नहीं रह जाता है। राज ठाकरे को शिवसेना की तरफ से एक निमंत्रण मिल सकता है, जो दोनो दलों को मजबूत करेगा, ऐसा होने पर शिवसेना का बहुमत के पास आना तय मान सकते हैं। लेकिन मनसे की समस्या एक और है, जो 2009 के बाद से शिवसेना ने खुद आरोप लगाए थे, कि उन्हें चुनाव लड़ने के लिए पैसा कांग्रेस ने दिया था। अब ऐसा करने पर भी उन्हें चुनाव में फंडिंग समस्या आएगी। हो सकता है कि कांग्रेस और एनसीपी दोनों में से ही कोई एक दल अपने को शिवसेना से लड़ने के लिए मनसे को अकेले चुनाव लड़ा सकते हैं।  अब छोटे दलों के भाव बढ रहे हैं। कांग्रेस बसपा को अपने पाले में लाना चाहती है। कांग्रेस और एनसीपी दोनों दल ही सपा को भी साथ लेना चाहते हैं। भले ही सपा बसपा का महाराष्ट्र में कुछ भी आधार ना हो लेकिन कुछ जगहों पर दलित बसपा के भरोसे और मुस्लिम अबू आज़मी के साथ हैं। बसपा कांग्रेस और एनसीपी सपा का मेल हो सकता है। ऐसा मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ। आर पी आई के नेता रामदास अठावले कल से बहुत परेशान नजर रहे हैं। उनकी समस्या है कि वो भाजपा के कॉटे से ही राज्य सभा गए हैं, और शिवसेना के खिलाफ उनका कोई भविष्य नहीं है। तभी हो गठबंधन को बरकरार रखने की बात कर रहे हैं। अगर उन्हें किसी एक को चुनना पड़ा तो वो शिवसेना के साथ जाना पसंद करेगे। अब यह लड़ाई बहुत रोचक हो गई है। बहरहाल, बात बीजेपी-शिवसेना गठबंधन की ही, तो इसका टूटना महाराष्ट्र के हित में है। अभी ये सीटों और मुख्यमंत्री पद के लिए लड़ रहे थे। यहां सहमति बन जाती और मान लो कि इनकी सरकार महाराष्ट्र में जाती, तो फिर ये मंत्री पद के लिए झगड़ते और जाने किस-किस के लिए। आखिर, झगडऩे वालों को तो कोई बहाना चाहिए और वह आराम से मिल ही जाता है। तब इनकी सरकार काम कब करती?
उधर, अभी सत्ता को नजदीक देखकर एनसीपी कांग्रेस वाले भी इसी कद्र लड रहे थे। कहीं से नही लगा कि यही दो दल पिछले 15 साल से महाराष्ट्र की सत्ता को संभाल रहे हैं। इन दोनों दलों में कांग्रेस की गलती ज्यादा मानी जा सकती है। क्योंकि लोकसभा में हार को देखने के बाद भी एनसीपी नें कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ा था। उसके पास भाजपा के साथ जाने का विकल्प उपलब्ध भी था। चुनाव के बाद एनसीपी ने कांग्रेस से अधिक सीटों पर जीत हासिल की इसलिए उसे अधिकार था विधानसभा में अधिक सीटें मांगने का। लेकिन कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया। मुझे कल लगा कि हो सकता है कि यह गठबंधन बरकरार रहेगा, ऐसा होने पर इन दोनो दलों को फायदा था। क्योकि एनडीए टूटने के बाद इनका 15 साल का एन्टी-इनकमबैंसी फैक्टर कम हो जाता। इनकी हार तो तय थी, अब एक उम्मीद निकली थी। लेकिन अब एनसीपी ने अपने को साबित करने के लिए अपना दांव चल दिया। इसका प्रमुख कारण रहा कांगेस का 117 सीटों पर नामों का ऐलान जिनपर एनसीपी से बात जारी थी। अब भी मुझे उम्मीद है कि यह दोनों दल कुछ सीटों पर अंदर से समझौता करके सीटों के हिसाब से पोस्टपोल एलायंस करेंगे।
आने वाले दिनों में कुछ हिंसा भी हो सकती है। यह हिंसा भाजपा और शिवसेना के बीच ही होगी। क्योंकि शिवसेना कल से बहुत आक्रमक है, और हिन्दुत्व को प्रॅंटफुट पर रखकर मराठी अस्मिता से भाजपा को बैकफुट पर करने की सोंची है। कल से ही शिवसैनिक बाल ठाकरे के सामने मोदी को झुकने वाले पोस्टर, और अमित शाह विरोधी नारे लेकर सडको पर घूम रहे हैं। भाजपा भी इसपर चुप नहीं है, और कुछ हमले छोटे नेताओं से करवा रही है। एक दो नेताओं के भाषण सुनकर लगा कि महाराष्ट्र मे आने वाले 10-15 दिनों में गुजराती बनाम मराठी के नाम पर ये नेता अपने मतलब के लिए गरीब जनता को लड़ा देंगे। इससे उनका फायदा तो हो जाएगा, लेकिन आम आदमी को ही नुकसान होगा। अभी यह राजनैतिक भाषा और भी गिरेगी। चुनावी भाषण में सभी एक दूसरे की पोल खोलते नजर आएंगे। शिवसेना हिन्दुत्व के मुद्दे पर बीजेपी को और एनसीपी विकास और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कैसे कांग्रेस को घेरेगी यह एक रोचक विषय होगा। लोकतंत्र और महाराष्ट के लिए यह बहुत दर्दनाक होगा। अब महाराष्ट्र के हित में यही है कि ये चारों दल अलग-अलग चुनाव लड़ें। जनता भी समझदारी दिखाए और वह किसी एक दल को सत्ता सौंपे। यदि यह बात उसकी समझ में अब नहीं आई, तो कभी नहीं आएगी कि दोनों गठबंधनों में फसाद इसलिए नहीं हो रहा है कि इनके नेता लोग जनता की सेवा करने के लिए मरे जा रहे हैं, बल्कि फसाद की जड़ सत्ता का लोभ है।

Thursday, September 25, 2014

नारी शक्ति पर दो शब्द

अनेक वीरांगनाएं इस देश की माटी पर जन्मी हैं, उनकी प्रेरणा और संकल्पों से परिवार और समाज को समय-समय पर ऊर्जा प्राप्त हुई है। आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनीतिक सभी स्तरों पर नारी शक्ति द्वारा आज भी शंखनाद किया जा रहा है। बड़े-बड़े पदों पर नारियां अपनी विद्वता से देश को दिशा दे रही हैं।
आज नवरात्र के पावन अवसर पर मैं अपने देश की प्रथाओं के बारे मे कुछ बात करना चाहूंगा हमारे देश में कन्या को देवी का स्वरूप माना जाता है यहाँ महाराष्ट्र और गुजरात के लोगों को मैं इस बारे में अपने उत्तर भारत की एक बड़ी बात बताता हूँ हमारे उत्तर भारत मे लड़कियों के पैर छुए जाते हैं, उस कन्या की उम्र से मतलब नहीं है आज भी जो बच्ची का जन्म हुआ है, उसके पैर पूरा परिवार छूता है केवल एक स्त्री अपने पति और सास-ससुर के पैर छू सकती है अन्यथा एक बेटी के पैर उसके माँ-बाप बड़े और छोटे भाई छूते हैं दो बहनों में लड़की अपनी छोटी बहन के पैर छूती है देश के बहुत सारे हिस्सों में ऐसा नहीं है उत्तर भारत की इस बात को हमें सकारात्मक रूप से देखना चाहिए हो सकता है कि आप उत्तर भारत में महिला विरोधी कई अपराधों को सामने रख दें मैं भी मानता हूँ क़ि केवल पैर छूने से ही हमारी बेटियों को वो अधिकार नहीं मिलेंगे, जो उन्हें मिलने चाहिए उसके लिए इस देवी वाले आडंबर से बाहर निकल कर अपने लड़कों के हिस्से के अधिकार कम करके (असल में यह अधिकार लड़कियों के हिस्से के ही हैं, लेकिन सामाजिक कारणों से उनकी जगह लड़कों को दे दिए गए हैं) लड़कियों पर विश्वाश करके उन्हें सौंपने होंगे
यह नवरात्रि पर्व उनके सम्मान का पर्व है, शक्ति ही हमें मुक्ति, भक्ति दोनों प्रदान करती है, हम उपासना के साथ नारियों के सम्मान का संकल्प लें।
(नोट: मैं इस शुभ अवसर पर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान या अन्य स्थानों के कुछ कन्शों के नाम लेना उचित नहीं समझता हूँ)

Sunday, September 14, 2014

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव

एक राजनैतिक छात्र होने के कारण, मुझे बहुत अच्छा लगेगा अगर महाराष्ट्र में भाजपा और शिव सेना अकेले अकेले चुनाव लड़ेगी. लेकिन अगर ऐसा हुआ तो भाजपा के पास राज ठाकरे के विकल्प खुले रहेंगे. लेकिन भाजपा के बड़े नेता यूपी और बिहार के अपने भविष्य को देखते हुए ऐसा नहीं कर सकते हैं. इसलिए भाजपा को शिवसेना की सभी शर्ते माननी पड़ेगी.
महाराष्ट्र को इंतजार है, अपनी पहली महिला मुख्य मंत्री का. अगर सभी पार्टियों के उपर नजर डालकर देखें तो किसी के पास भी कोई बड़ी महिला नेता ही नहीं है, जो महाराष्ट्र की सीएम बनाई जा सके. आम आदमी पार्टी का भले ही कुछ ना हो महाराष्ट्र की राजनीति में अभी, लेकिन उसके पास अंजली दामानिया और प्रीति शर्मा जैसी दो बड़ी नेता हैं. ऐसे में अरविन्द का यहाँ चुनाव ना लड़ना अपने आप में एक गलत फैसला हो सकता है. जिसके पास योगेन्द्र जैसा राजनीतिक प्राणी हो. वो ऐसी गलती कैसे कर सकता है. यहाँ लोकसभा चुनाव के दौरान मैने लोगों में आम आदमी पार्टी को लेकर एक बड़ा क्रेज देखा था. लोग चाहते थे इसके साथ जुड़ना. युवा लड़के लड़कियां जो अपने कॉलेज, और नौकरी छोड़कर अरविन्द के लिए प्रचार कर रहे थे. लोग आम आदमी पार्टी को ईमानदार विकल्प मानते थे, लेकिन पता था क़ि कॉंग्रेस को हराने के लिए मोदी ही आगे है, इसलिए भाजपा को वो दिया था. यहाँ पर अब लोग मोदी के रेल किराए मे बढ़ोत्तरी, अच्छे दिनों के झूठे वादों और मंहगाई से गुस्से में हैं, नहीं पूरे महाराष्ट्र तो कम से कम मुम्बई, ठाने, नागपुर, पुणे और अन्य छोटे छोटे शहरों में अच्छा प्रदर्शन करेगी पार्टी. मुझे उम्मीद है कि अरविन्द लोगों की भावनाओं को समझेंगे और कुछ साहसिक कदम उठाएंगे.
माफ करिएगा दोस्तों मैं इस पंक्ति में मेधा ताई को भूल गया. अगर महिला और समाज कल्याण की बात हो और मेधा पाटकर का नाम ना लिया जाए तो यह बहुत गलत होगा. आम आदमी पार्टी में यह नेत्री भी बड़ी काबिल, ईमानदार और साहसी है. इनका संघर्ष किसी से छिपा नहीं है.आप कह सकते हैं क़ि मैं अरविन्द केजरीवाल का समर्थक हूँ. लेकिन यह बिल्कुल भी नही हो सकता है. मैं हर समय एक नई राजनीति कर समर्थक रहा हूँ. 2012 के चुनाव में मैं अखिलेश यादव का फैन था. आज जब कोई नया विकल्प दिखा तो उसे प्रस्तुत होने को कहा है, उसके साथ जुड़ा नहीं हूँ.
फिर से मैं भगवा गठबंधन को लेकर कुछ बात करना चाहता हूँ. इनके बीच में एक बड़ी जुबानी जंग चल रही है. एक तरफ शिवसेना अपने मुखपत्र सामना में कुछ लिखती है, तो दूसरी तरफ भाजपा के नेता जवाब देते हैं.
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर शिवसेना-बीजेपी के ढाई दशक पुराने गठबंधन में पैदा हुआ विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। शनिवार को सामना में छपे लेख पर बीजेपी ने पलटवार करते हुए कहा है कि नपुंसकता भी तलाक की वजह बन सकती है। शिवसेना के मुख्यपत्र 'सामना' में संपादकीय में कहा गया था कि ज्यादा हवस तलाक का कारण होती है। हाल ही में आए कोर्ट के एक फैसले से पंक्ति उठाते हुए कहा गया था, 'गठबंधन के सहयोगियों को जीत का सपना देखना चाहिए। इसके लिए सभी पार्टियों को ज्यादा सीटों की हवस छोड़नी चाहिए। यह कहना ठीक नहीं है कि उतनी सीटें मिलेंगी, तभी गठबंधन में रहेंगे।'
लोकसभा चुनाव में अपनी अप्रत्याशित जीत के बाद बीजेपी सहयोगी शिवसेना को अधिक सीटें देना नहीं चाहती है। दूसरा फॉर्म्युला जो पेश किया जा रहा है, उसके मुताबिक बीजेपी ने अपने लिए 126, छोटी सहयोगी पार्टियों के लिए 18 और शिवसेना को 144 सीटें देने की पेशकश कर रही है। हालांकि, शिव सेना से सांसद संजय राउत ने कहा, 'हमने यह स्पष्ट कर दिया है कि हम 150 सीटों से कम सीटों पर नहीं मानेंगे।' 

Sunday, September 7, 2014

फांसी पर होती बहस (भाग 2)


फांसी के विरोध मैं इसके पहले अपने एक लेख में में कई बातें लिख चुका हूँ. जिसका कई लोगों समर्थन व विरोध किया था. आज मैं इसबारे में एक और बात प्रस्तुत करना चाहूंगा. क्योंकि आजकल फांसी को लेकर फिर से अखबारों और न्यूज चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज आ रही हैं.
इन दिनों कुल छह लोगों को फांसी दी जानी है। ये हैं -
निठारी कांड का अभियुक्त सुरेंद्र कोली
13 बच्चों की हत्या करने वाली महाराष्ट्र की दो बहने रेणुका शिंदे और सीमा गावति
नाबालिग से बलात्कार करने वाला राजेंद्र वासनिक,
कई हत्याओं का आरोपी मध्यप्रदेश का जगदीश और
अपने पूरे परिवार को मार डालने वाला असम का होलीराम बारदोलाई।

मैं बिल्कुल भी नहीं कहूँगा क़ि इन सबकी फांसी रोक दी जाए. लेकिन एक बात जरूर कहूँगा कि इनके अपराध की श्रेणी के साथ साथ इनके साथ दया का सिद्धांत भी प्रयोग करके जाए. इनमें से महाराष्ट्र की दो स्त्री अपराधी तो इस वक्त काफी बीमार भी रहती हैं. अबतक ये सभी अपने अपराधों को लेकर बहुत शर्मिन्दा हो चुके हैं. इनको जिंदा रखकर और भी शर्मिन्दा करने की जरूरत है. ताकि ये और लोगों को अपराध ना करने की सलाह देते रहें. उनका अपराध बहुत बड़ा है, लेकिन दया और क्षमा नाम की भी एक चीज होती हैं. इनके मरने के बाद क्या होगा? आखिर 2004 में धनंजय की फांसी के बाद बलात्कार के कितने मामले कम हुए हैं, यह भी तो कोई बताए हमें.

Friday, September 5, 2014

जस्टिस सदाशिवम् की नियुक्ति पर प्रश्नचिन्ह?

पहली बार मुझे इस सरकार का कोई निर्णय सही लगा है. जस्टिस सदाशिवम को राज्यपाल बनाना एक महत्वपूर्ण फैसला है. यह होना चाहिए. हर राज्य के राज्यपाल के पद पर एक संविंधान का जानकार बिठाया जाए. इसके लिए रिटायर्ड जज अच्छा विकल्प हो सकते हैं. कांग्रेस और अन्य दलों के आरोपों से में इत्तेफाक नहीं रखता हूँ. लेकिन अब यह कहना चाहता हूँ कि ऐसा कोई भी फैसला सरकार के हाथ में ना हो. इसके लिए एक अलग से एक आयोग हो, जो राज्यपालों की नियुक्ति करे. अन्यथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आघात होगा. आप अगर ऐसा नहीं करते हैं, तो हो सकता है क़ि कोई जज अपने कार्यकाल में यह सोचकर कार्य करे क़ि उसे भी रिटायर होने के बाद सरकार से कोई पद चाहिए.
इस सवाल का जवाब तो बीजेपी को भी देना चाहिए. अरुण जेटली जी बड़े वक़ील हैं. क़ानून के बड़े दिग्गज जानकार. दो साल पहले अपनी ही पार्टी के एक मंच पर उन्होंने कहा था कि न्यायाधीशों में रिटायर होने के बाद पद लेने की होड़ मची रहती है, इससे न्यायपालिका की निष्पक्षता पर असर पड़ता है! तब नितिन गडकरी बीजेपी अध्यक्ष हुआ करते थे. उनका कहना था कि रिटायरमेंट के बाद जजों के लिए दो साल का कूलिंग पीरियड होना चाहिए. बताइए, आज आपका क्या कहना है गडकरी और जेटली जी? वैसे तो राजनेता हमेशा सुविधा की याद्दाश्त रखते हैं. इसलिए हो सकता है यह बात अब याद ही न हो! लेकिन अगर याद भी हो तो कर ही क्या सकते हैं? संकट एक ग़लत परम्परा की शुरुआत का है. क्या यह सिलसिला यहीं थम सकेगा? क्या आगे और ढलान नहीं है? अगर न्यायपालिका अपने भीतर ऐसे मानक, ऐसे तंत्र नहीं विकसित कर सकी कि उसकी स्वतंत्रता और गरिमा बनी रहे तो देखते ही देखते हमारे सामने बस न्याय का एक नक़ली महल होगा. चीज़ें अकसर देखते ही देखते रेत की तरह मुट्ठी से फिसल जाती हैं. देखते ही देखते मीडिया मुखौटा बन गया! अब चुनौती न्यायपालिका के सामने है. इसके साथ साथ मोदी सरकार ने अपनी पार्टी के जिन नेताओं को राज्यपाल बनाया है, उन्हें हटाकर फिलहाल के लिए एक शॉर्ट टर्मप्लान फॉर संविधानिक पदों की रक्षा के तहत उनकी जगह हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों को बनाया जाए.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...