फांसी के विरोध मैं इसके पहले अपने एक लेख में में कई बातें लिख चुका हूँ. जिसका कई लोगों समर्थन व विरोध किया था. आज मैं इसबारे में एक और बात प्रस्तुत करना चाहूंगा. क्योंकि आजकल फांसी को लेकर फिर से अखबारों और न्यूज चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज आ रही हैं.
इन दिनों कुल छह लोगों को फांसी दी जानी है। ये हैं -
निठारी कांड का अभियुक्त सुरेंद्र कोली
13 बच्चों की हत्या करने वाली महाराष्ट्र की दो बहने रेणुका शिंदे और सीमा गावति
नाबालिग से बलात्कार करने वाला राजेंद्र वासनिक,
कई हत्याओं का आरोपी मध्यप्रदेश का जगदीश और
अपने पूरे परिवार को मार डालने वाला असम का होलीराम बारदोलाई।
मैं बिल्कुल भी नहीं कहूँगा क़ि इन सबकी फांसी रोक दी जाए. लेकिन एक बात जरूर कहूँगा कि इनके अपराध की श्रेणी के साथ साथ इनके साथ दया का सिद्धांत भी प्रयोग करके जाए. इनमें से महाराष्ट्र की दो स्त्री अपराधी तो इस वक्त काफी बीमार भी रहती हैं. अबतक ये सभी अपने अपराधों को लेकर बहुत शर्मिन्दा हो चुके हैं. इनको जिंदा रखकर और भी शर्मिन्दा करने की जरूरत है. ताकि ये और लोगों को अपराध ना करने की सलाह देते रहें. उनका अपराध बहुत बड़ा है, लेकिन दया और क्षमा नाम की भी एक चीज होती हैं. इनके मरने के बाद क्या होगा? आखिर 2004 में धनंजय की फांसी के बाद बलात्कार के कितने मामले कम हुए हैं, यह भी तो कोई बताए हमें.
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