अनेक वीरांगनाएं इस देश की माटी पर जन्मी हैं,
उनकी प्रेरणा और संकल्पों से परिवार और समाज को समय-समय पर ऊर्जा प्राप्त
हुई है। आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनीतिक सभी स्तरों पर नारी शक्ति द्वारा आज
भी शंखनाद किया जा रहा है। बड़े-बड़े पदों पर नारियां अपनी विद्वता से देश को दिशा दे रही हैं।
आज नवरात्र के पावन अवसर पर मैं अपने देश की प्रथाओं के बारे मे कुछ बात
करना चाहूंगा। हमारे देश में कन्या को देवी का स्वरूप माना जाता है। यहाँ
महाराष्ट्र और गुजरात के लोगों को मैं इस बारे में अपने उत्तर भारत की एक
बड़ी बात बताता हूँ। हमारे उत्तर भारत मे लड़कियों के पैर छुए जाते हैं, उस
कन्या की उम्र से मतलब नहीं है। आज भी जो बच्ची का जन्म हुआ है, उसके पैर
पूरा परिवार छूता है। केवल एक स्त्री अपने पति और सास-ससुर के पैर छू सकती
है। अन्यथा एक बेटी के पैर उसके माँ-बाप बड़े और छोटे भाई
छूते हैं। दो बहनों में लड़की अपनी छोटी बहन के पैर छूती है। देश के बहुत
सारे हिस्सों में ऐसा नहीं है। उत्तर भारत की इस बात को हमें सकारात्मक
रूप से देखना चाहिए। हो सकता है कि आप उत्तर भारत में महिला विरोधी कई
अपराधों को सामने रख दें। मैं भी मानता हूँ क़ि केवल पैर छूने से ही हमारी
बेटियों को वो अधिकार नहीं मिलेंगे, जो उन्हें मिलने चाहिए। उसके लिए इस
देवी वाले आडंबर से बाहर निकल कर अपने लड़कों के हिस्से के अधिकार कम करके
(असल में यह अधिकार लड़कियों के हिस्से के ही हैं, लेकिन सामाजिक कारणों
से उनकी जगह लड़कों को दे दिए गए हैं।) लड़कियों पर विश्वाश करके उन्हें
सौंपने होंगे।
यह नवरात्रि पर्व उनके सम्मान का पर्व है, शक्ति ही हमें मुक्ति, भक्ति दोनों प्रदान करती है, हम उपासना के साथ नारियों के सम्मान का संकल्प लें।
यह नवरात्रि पर्व उनके सम्मान का पर्व है, शक्ति ही हमें मुक्ति, भक्ति दोनों प्रदान करती है, हम उपासना के साथ नारियों के सम्मान का संकल्प लें।
(नोट: मैं इस शुभ अवसर पर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश,
हरियाणा, राजस्थान या अन्य स्थानों के कुछ कन्शों के नाम लेना उचित नहीं
समझता हूँ)
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