Friday, September 5, 2014

जस्टिस सदाशिवम् की नियुक्ति पर प्रश्नचिन्ह?

पहली बार मुझे इस सरकार का कोई निर्णय सही लगा है. जस्टिस सदाशिवम को राज्यपाल बनाना एक महत्वपूर्ण फैसला है. यह होना चाहिए. हर राज्य के राज्यपाल के पद पर एक संविंधान का जानकार बिठाया जाए. इसके लिए रिटायर्ड जज अच्छा विकल्प हो सकते हैं. कांग्रेस और अन्य दलों के आरोपों से में इत्तेफाक नहीं रखता हूँ. लेकिन अब यह कहना चाहता हूँ कि ऐसा कोई भी फैसला सरकार के हाथ में ना हो. इसके लिए एक अलग से एक आयोग हो, जो राज्यपालों की नियुक्ति करे. अन्यथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आघात होगा. आप अगर ऐसा नहीं करते हैं, तो हो सकता है क़ि कोई जज अपने कार्यकाल में यह सोचकर कार्य करे क़ि उसे भी रिटायर होने के बाद सरकार से कोई पद चाहिए.
इस सवाल का जवाब तो बीजेपी को भी देना चाहिए. अरुण जेटली जी बड़े वक़ील हैं. क़ानून के बड़े दिग्गज जानकार. दो साल पहले अपनी ही पार्टी के एक मंच पर उन्होंने कहा था कि न्यायाधीशों में रिटायर होने के बाद पद लेने की होड़ मची रहती है, इससे न्यायपालिका की निष्पक्षता पर असर पड़ता है! तब नितिन गडकरी बीजेपी अध्यक्ष हुआ करते थे. उनका कहना था कि रिटायरमेंट के बाद जजों के लिए दो साल का कूलिंग पीरियड होना चाहिए. बताइए, आज आपका क्या कहना है गडकरी और जेटली जी? वैसे तो राजनेता हमेशा सुविधा की याद्दाश्त रखते हैं. इसलिए हो सकता है यह बात अब याद ही न हो! लेकिन अगर याद भी हो तो कर ही क्या सकते हैं? संकट एक ग़लत परम्परा की शुरुआत का है. क्या यह सिलसिला यहीं थम सकेगा? क्या आगे और ढलान नहीं है? अगर न्यायपालिका अपने भीतर ऐसे मानक, ऐसे तंत्र नहीं विकसित कर सकी कि उसकी स्वतंत्रता और गरिमा बनी रहे तो देखते ही देखते हमारे सामने बस न्याय का एक नक़ली महल होगा. चीज़ें अकसर देखते ही देखते रेत की तरह मुट्ठी से फिसल जाती हैं. देखते ही देखते मीडिया मुखौटा बन गया! अब चुनौती न्यायपालिका के सामने है. इसके साथ साथ मोदी सरकार ने अपनी पार्टी के जिन नेताओं को राज्यपाल बनाया है, उन्हें हटाकर फिलहाल के लिए एक शॉर्ट टर्मप्लान फॉर संविधानिक पदों की रक्षा के तहत उनकी जगह हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों को बनाया जाए.

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