Tuesday, December 23, 2014

क्या PK पर हो रहे हमले धर्म के पीछे छुपा डर है?


मैने पीके फिल्म का नंगा वाला पोस्टर देखकर आमिर को पहली बार कोसा था। लेकिन जब फिल्म देखी तो कुछ और ही निकला। मैं कोई फिल्म समीक्षक तो नहीं हूँ, लेकिन एक दर्शक के तौर पर कुछ बातें जरूर कह सकता हूँ। कॉमेडी, स्टोरी और म्यूजिक के आधार पर फिल्म काफी अच्छी थी। एक ऐसा संदेश हमें दे जाती है
 हम लोगों ने दुनिया को उलझा लिया है इसे सुलझाने के लिए हमें फिर से एलियन बनकर ही धरती को देखना होगा। जैसे देखने के लिए पीके किसी अनजान ग्रह से धरती पर आता है। वो धरती को गोला कहता है। अंतरिक्ष में तैरते अनगिनत गोलों में से एक छोटा सा गोला। एक छोटा सा गोला ताकि मज़हब और मुल्क की सीमाओं के बीच घिरे हम और आप अपने नज़रिये का विस्तार कर सकें। हम एक बार बाहर से धरती को देख सकें कि हमने इसके बाशिंदों को किस कदर बांट दिया है। विधू विनोद चोपड़ा और राजकुमार हिरानी की फिल्म पी के अपने रीलिज होने के समय के संदर्भ के कारण भी एक रोचक और साहसिक फिल्म बन जाती है।
जो समाज को अपने उपर सोंचने पर मजबूर करता है। कुछ लोग इसे हिन्दुत्व के खिलाफ मान रहे हैं, लेकिन उसमें हिन्दू, मुस्लिम, शिख, ईसाई सबपर सवाल खड़े किए गए। भगवान का विरोध नहीं हुआ बल्कि यह बताया कि एक भोला भाला इंसान इस धरती पर आता है, और कैसे भगवान के नाम पर उसको ठगा जाता है। वो तो उस भागवान को मानने की बात करता है, जिसने हमे बनाया है। जिसको हमने बनाया है उसका विरोध। 
इसमें क्या बुरा हुआ? आमिर ने सही किया जो पहले से किसी को स्टोरी नहीं बताई नहीं तो लोग उसकी फिल्म के पोस्टर जलाते, मुकदमा करते। अच्छा हुआ जो इस सबसे बचकर एक अच्छी फिल्म दिखाई। वैसे आमिर की फिल्मों में हीरोइन के लिए बहुत कम काम बचता है। लेकिन इसमें बहुत अच्छा रहा कि अनुष्का शर्मा ने अपनी पहली फिल्म रब ने बना दी जोड़ी के बाद पहली बार अच्छी एक्टिंग की। फिल्म में भोजपुरी भाषा का होना मेरे लिए कुछ एक्स्ट्रा एडवांटेज था। उसमें केवल बार बार हिलती हुई कार को दिखाना थोड़ा सा ओवर एक्टिंग लगा। एक बार होता तो ठीक है, अगर उसे कपड़े और पैसे ही चुराते हुए दिखाना था तो दिल्ली में चोरी के लिए कहाँ जगह की कमी है। लालकिला, जामा मस्जिद, यमुना के किनारे, मेट्रो में कहीं पर भी। यह हरकत बार बार दिखाते समय थोड़ा सा बचकाना लगा। इसके बाद जो नंगे पोस्टर के माध्यम से जाति-धर्म और बंटे हुए समाज पर हमला हुआ, वो काफी मजेदार था। मेरे हिसाब से तो सबको एक बार फिर से नंगा होकर देखने की जरूरत है कि उनके कौन सा ठप्पा लगाकर भगवान ने भेजा था। यह फिल्म उनसबको जरूर देखनी चाहिए जो आजकल बहुत धर्म परिवर्तन, घर वापसी और हिन्दुत्व के ठेकेदार बने हुए हैं। ताकि सिर्फ जूता ना रह जाए (अगर फिल्म से सीखकर यह दंगे बंद होंगे तो ही हम बचेगे नहीं तो एक दिन सिर्फ जूता ही हाथ में रह जाएगा। जैसे पाकिस्तान के एक बच्चे के जूते को बहुत शेयर किया जा रहा है ट्विटर पर)।.............सही कहा रवीश




किसान दिवस (भाग-2)

किसान हर देश की प्रगति में विशेष सहायक होते हैं। एक किसान ही है जिसके बल पर देश अपने खाद्यान्नों की खुशहाली को समृद्ध कर सकता है। देश मे राष्ट्रपिता गांधी जी ने भी किसानों को ही देश का सरताज माना था। लेकिन देश की आजादी के बाद ऐसे नेता कम ही देखने में आए जिन्होंने किसानों के विकास के लिए निष्पक्ष रूप में काम किया। ऐसे नेताओं में सबसे अग़्रणी थे, देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह। आज उन्ही की याद में हमारे देश में किसान दिवस मनाया जाता है। किसान ही वो है, जो हमारे देश को जीवित रखता है। लेकिन आज यह विडंबना ही है कि सबसे ज्यादा किसान ही संघर्ष कर रहे हैं. ज्यादा तर किसान खेती छोड़ कर बाहर शहरों की ओर जा रहे हैं। कोई भी किसान अपने बच्चों को किसान नहीं बनाना चाहता है। 
एक नेता ऐसा भी था ,,जो जितनी सम्पति लेकर राजनीती मै आया था ,उतनी लेकर अमर हुआ ! जबकि वह परधानमंत्री भी रहा ! उनकी ईमानदारी से काम करने की वजा से इंद्रा Gandhi जेल भी गयी ! जबकि उन दिनों मै इंद्रा जी के आगे सब झुकते थे ,एसे निडर इंसान थे वो ! आज भी किसान उनके कामो को याद क्र क्र के रोता है.!
चौधरी चरण सिंह (जन्म: 23 दिसम्बर, 1902 मेरठ - मृत्यु- 29 मई, 1987) भारत के पाँचवें प्रधानमंत्री थे। चरण सिंह किसानों की आवाज़ बुलन्द करने वाले प्रखर नेता माने जाते थे। चौधरी चरण सिंह का प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल 28 जुलाई, 1979 से 14 जनवरी, 1980 तक रहा। यह समाजवादी पार्टी तथा कांग्रेस (ओ) के सहयोग से देश के प्रधानमंत्री बने। इन्हें 'काँग्रेस इं' और सी. पी. आई. ने बाहर से समर्थन दिया, लेकिन वे इनकी सरकार में सम्मिलित नहीं हुए। इसके अतिरिक्त चौधरी चरण सिंह भारत के गृहमंत्री (कार्यकाल- 24 मार्च 1977 – 1 जुलाई 1978), उपप्रधानमंत्री (कार्यकाल- 24 मार्च 1977 – 28 जुलाई 1979) और दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे।
इंदिरा गांधी ने 19 अगस्त, 1979 को बिना बताए समर्थन वापस लिए जाने की घोषणा कर दी. अब यह प्रश्न नहीं था कि चौधरी साहब किसी भी प्रकार से विश्वास मत प्राप्त कर लेंगे. वह जानते थे कि विश्वास मत प्राप्त करना असम्भव था. यहाँ पर यह बताना प्रासंगिक होगा कि इंदिरा गांधी ने समर्थन के लिए शर्त लगाई थी. उसके अनुसार जनता पार्टी सरकार ने इंदिरा गांधी के विरुद्ध जो मुक़दमें क़ायम किए हैं, उन्हें वापस ले लिया जाए. लेकिन चौधरी साहब इसके लिए तैयार नहीं हुए थे.
इस प्रकार की गलत सौदेबाज़ी करना चरण सिंह को क़बूल नहीं था. इसीलिए उन्होंने प्रधानमंत्री की कुर्सी गंवाना बर्दाश्त कर लिया. वह जानते थे कि उन्होंने जिस ईमानदार नेता और सिद्धान्तवादी व्यक्ति की छवि बना रखी है, वह सदैव के लिए खण्डित हो जाएगी. अत: संसद का एक बार भी सामना किए बिना चौधरी चरण सिंह ने प्रधानमंत्री पद का त्याग कर दिया.
स्वतंत्रता आंदोलन के रास्ते राजनीति में घुसने वाले चौधरी चरण सिंह 1950 के दशक में पहले पीएम जवाहर लाल नेहरू के विरोध के कारण जाने जाते थे. उन्होंने किसानों की लड़ाई को बड़ी मज़बूती के साथ रखा और यही वजह है कि उन्हें किसान नेता के तौर पर जाना जाता है. 1967 तक कांग्रेस में रहने के बाद उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बना ली थी.
चौधरी चरण सिंह ने अपने कार्यकाल के दौरान उर्वरकों और डीजलों के दामों में कमी की और कृषि यंत्रों पर उत्पाद शुल्क घटाया। काम के बदले उन्होंने अनाज योजना को लागू किया। विलासिता की सामग्री पर चौधरी चरण सिंह ने भारी कर लगाए।
वह उत्तर प्रदेश में भूमि सुधार के लिए अग्रणी पुरुष माने जाते थे। 1939 में कृषकों के क़र्ज मुक्ति विधेयक को पारित कराने में चरण सिंह की निर्णायक भूमिका थी। 1960 में उन्होंने भूमि हदबंदी क़ानून को लागू कराने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अगर वे प्रधानमंत्री का एक सत्र भी पूरा करते तो इसमें संदेह नहीं कि आज किसानों की स्थिति कुछ और बयां करती। 29 मई 1987 को जनमानस का यह नेता इस दुनिया को छोड़कर चला गया। चौधरी चरण सिंह तो इस दुनिया को छोड़कर चले गए लेकिन लोगों के जेहन में उनका राजनीतिक प्रभाव पहले ही की तरह बरकरार है।
जब तक दुखी किसान रहेगा, धरती पर तूफान रहेगा...
देश और किसानो को एसे नेताओं की जरुरत है !
जय हिन्द जय भारत
 

Thursday, December 11, 2014

धर्म परिवर्तन या घर वापसी


आगरा में 60 मुस्लिम परिवारों के धर्म परिवर्तन के मामले में नया मोड़ गया है। आरएसएस और बजरंग दल ने सोमवार को 60 मुस्लिम परिवारों का धर्म परिवर्तन कराने का दावा किया था, लेकिन जिन लोगों का धर्म परिवर्तन कराने का दावा किया गया था उन्होंने ही पैसों का लालच देकर फोटो खिंचवाने का आरोप लगाया है। इन लोगों का कहना है कि जबरन धर्म परिवर्तन को लेकर वे नाराज हैं। वहीं, इस मामले में बजरंग दल का कहना है कि उनके ऊपर लगाए गए आरोप बेबुनियाद हैं। उन्होंने किसी को किसी भी तरह का लालच नहीं दिया था। इस मामले में बढ़ते विवाद के बाद पूरे मामले की जांच शुरू हो गई है। मैजिस्ट्रेट ने लोगों के बयान दर्ज करने का निर्देश दिया है।
आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो परिवार कुछ घंटो पहले तक खुशी खुशी हवन में शामिल हुए और एकदम से पलट गए। कुछ तो बदला ही होगा। बदला हो या ना बदला हो लेकिन मामला पूरा उल्टा पड गया। उन लोगों ने पैसे देकर धर्म परिवर्तन का आरोप लगा डाला। ईसाई को 2 लाख और मुस्लिम को 5 लाख रुपए दिए जा रहे थे, हिन्दू बनने के लिए। और यह इतनी बड़ी रकम है, जिससे एक गरीब आदमी की गरीबी कुछ हद तक तो कम हो ही सकती है। गरीब आदमी पैसे के आगे अपने भगवान और विचारधारा को भूलना मुनासिब समझेगा। आप यह कह सकते हैं क़ि ऐसा ही तब भी हो सकता है जब हिन्दू लोग मुस्लिम, बौद्ध और ईसाई धर्म में परिवर्तित हो रहे थे। लेकिन ऐसे कोई प्रमाण तब की परिस्थितियों के बारे में तो नहीं हैं। आज जो हुआ तो तब से बिल्कुल अलग है। आज की राजनीति में यह साम्प्रदायिकता फैलाने के इरादे से उन संगठनों द्वारा किया गया है, जो 2 साल पहले से मोदी सरकार आने पर हिन्दू राष्ट्र की बात करते थे। आज वही हिन्दुत्ववादी संगठन इसमे ज्यादा सक्रिय हैं, जो संघ परिवार से जुड़े हुए हैं। 
मैं इस विषय के तीन पक्ष रखना चाहूंगा। पहला कि इसका एक नैतिक पक्ष है जो कानूनी रूप से जायज है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार हमें धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त है। किसी भी व्यक्ति के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता है। फिर तो उन सबको आजादी है, जो अपना धर्म छोड़कर दूसरे धर्म में जाना चाहते हैं। दूसरी बात मेरी इस प्रश्न से जुड़ी हुई है कि क्या इन सबको जबरजस्ती, बहला-फुसलाकर या किसी धमकी के आधार पर ऐसा करने को मजबूर किया गया। और इस मामले में आपको तीनों चीजें देखने को मिल रही हैं। उनको पैसे का लालच दिया गया। उनको राशन कार्ड देने की बात की गई। आखिर राशन कार्ड देने वाले ये संगठन या हिन्दुत्व के ठेकेदार होते कौन हैं? और जो लोग इससे नहीं माने उनको कहा गया कि आने वाले दिनों में यहाँ पर दंगे होंगे, जो हिन्दू हैं वही रहेगे और सब बांग्लादेशी घोषित करके भगा दिये जाएंगे? यह एक धमकी ही नहीं साम्प्रदायिकता की चेतावनी थी जो समाज में घृणा फैलाएगी। अब मैं अपनी सबसे अंतिम और महत्वपूर्ण बात स्वेच्छा से किए गए धर्म परिवर्तन पर आना चाहता हूँ। बहुत सारे धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से होते हैं। बाबा साहब अम्बेडकर भी तो बौद्ध धर्म में हजारों महार जाति के लोगों को लेकर चले गए थे। इसके बाद तो बौध्द धर्म में महाराष्ट्र के दलितों के जाने का सिलसिला ही शुरु हो गया। जिसे कांशीराम सहित बहुत लोगों ने पूरे देश में चलाया। आखिर ये लोग तो अपने सामाजिक पिछड़ेपन के  कारण हिन्दू धर्म छोड़कर चले गए थे। इसी तरह से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और खासकर पूर्वोत्तर के राज्यों में लोग ईसाई बने, उत्तरभारत और दक्षिण भारत में मुस्लिम बने। जिसका एक मात्र कारण था, उनका हिन्दू धर्म में होने वाला अपमान। इस अपमान के स्वरूप उसे क्या मिला? इसी जाति  प्रथा से  मजबूर होकर लोग नास्तिक भी हुए। आपको मैं कम से कम 10 रिसर्च के नतीजे बता रहा हूँ जो कहते हैं क़ि भारत में होने वाले 80% से भी अधिक धर्म परिवर्तन केवल जाति प्रथा से पीड़ित लोग करते हैं। वो ब्राम्हणवाद से जबरजस्त डरे हुए लोग होते हैं। और खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। आखिर क्यों ये हिन्दुत्ववादी अपने ही धर्म और समाज को सुरक्षा और समानता का भरोसा दिला पाते हैं।  दरअसल संघ परिवार के इतिहास को ही देखा जाए तो यह बहुसंख्यक अधिनायकवाद पर टिका हुआ है। पहले महाराष्ट्र के कोंकण और पुणे में दलितों पर अत्याचार संघ की ही प्राथमिक साखाओं के लोगों ने किए थे। संघ में सारे के सारे पदाधिकारी और सदस्य एक ही समाज के लोग होते थे, जो महाराष्ट्र में हमेशा ही दलितों पर अत्यचार करते रहे। आप इसके भी पहले जाएँ तो वीर शिवाजी के मामले में ऐसा कुछ हदतक देख सकते हैं। इसके बाद शाहूजी महाराज के समय भी ऐसी बाते हुई थी। जिनका विस्तृत जिक्र नहीं किया जा सकता है। भीमराव अम्बेडकर को भी पढ़ते समय आप इनकी हकीकत समझ पाएंगे। जब आजादी के बाद यह बहुसंख्यक वाद डॉक्टर अम्बेडकर के संवैधानिक प्रयासों से कम हुआ तो जिंन्ना के बहाने मुस्लिमों को शिकार बनाया जाने लगा। जैसे जैसे ईसाई धर्म यहाँ बढ़ा उनका यह अत्याचार बढ़ता ही गया। इस बहुसंख्यक अधिनायकवाद की जड़ें अभी तक कुछ राज्यों में छिपी हुई थी, उसीका नतीजा है कि अभी भी दलित दूसरे धर्मों में प्रवेश कर रहे हैं। कुछ हिन्दुत्ववादी इसे लालच और जबरजस्ती में कराया गया धर्म परिवर्तन बोलते हैं। मैं मानता हूँ कि कुछ पैसे, मूर्तिपूजा, विचारधारा, भगवान और समानता की बाते करके उनका धर्म परिवर्तन हुआ हो, लेकिन वो अल्पसंख्यक होकर जबरजस्ती तो नहीं कर पाएंगे। रही बात लालच देने की तो मैं इसे पूरी तरह से गलत मानता हूँ। लेकिन हिन्दुत्ववादियों को सोंचना चाहिए कि उनके ही हिन्दू भाई यहाँ से क्यों जा रहे हैं? वो सुरक्षित क्यों नहीं महसूस कर रहे हैं?
अब मैं इस मुद्दे के मूल पर लौटकर केन्द्र राज्य दोनो सरकारों को इसके लिए जिम्मेदार मानता हूँ। आखिर क्यों अखिलेश सरकार ऐसे लोगों को रोकने में नाकाम है? आखिर क्यों मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से प्रवीण तोगडिया जैसे लोगो के हाथ खुल गए हैं? आखिर क्यों योगी आदित्यनाथ, गिरिराज सिंह और साध्वी निरंजन ज्योति जैसे भाजपा सांसद अपने असली रूप को दिखाने लगे हैं? आखिर क्यों साक्षी महाराज जैसे लोग संघ के पुराने विचार (नाथूराम ने गांधीजी को मारकर राष्ट्रहित का काम किया था) को दोहराने लगे हैं? इसके कुछ जवाब हम इस तरह से भी निकल सकते हैं कि जब जनता से जुड़े मुद्दों को हल करने में सरकार असफल रहती है तो घटिया राजनीतिक हिसाब से ऐसे ही जनता की भावनाओं से जुड़े मुद्दों पर ध्यान ले जाती है।  यह जरूरी है की सरकार इन असामाजिक तत्वो से कठोरता से पेश आये। चाहे धरम परिवर्तन कराने वाले किसी भी धरम के क्यों हो सिर्फ मीडिया संसद मे बहस करने से कुछ नही होगा। आम आदमी को अपने अधिकार भारत के नागरिक होने के नाते मिलनी चाहिये इसके लिये धरम परिवर्तन कराना गलत है जिसके दुष्परिणाम हो रहे है और भयानक होंगे। सविधान पर बहस करने वाले कितने नेता सविधान की शपथ के प्रति ईमानदार है और अपना काम देश जनता के हित मे करते है ?

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...