Sunday, November 8, 2015

मोदी जी को कमलेश कुमार का पत्र



प्रिय प्रधानमंत्री जी,
प्रधानमन्त्री जी कैसे हैं आप? उम्मीद है अच्छी सेहत होगी, और मानसिक रूप से परेशानी, जो हार के बाद आई है, 4-5 दिन में ख़त्म हो जाएगी। वैसे तो मेरी कोई औकात नहीं है, आप जैसे महान अंतरराष्ट्रीय नेता को कोई सलाह देने की। लेकिन जिस तरह का राजनैतिक माहौल आपने 2014 से बनाया था, उससे आप एक बार तो जीत सकते हैं, लेकिन बार बार जीतना या फिर यूँ कहें, जनता को उल्लू बनाना इतना आसान नहीं होता है।
आप विकास का एजेंडा लेकर निकले थे। कितने सुहाने थे वो अच्छे दिन के वादे, वो हर खाते में 15 लाख देने की बातें लेकिन बिहार पहुंचते-पहुंचते Reservation पर गए। एक तरफ तो लालू और नीतीश को जातिवादी कहते रहे, दूसरी तरफ पहली बार ऐसा हुआ जब देश के प्रधानमंत्री की जाति खूब और बदल बदल कर बताई गई।  आपकी भाषण शैली को मैं काफ़ी पसंद करता हूँ लेकिन जब आपने 5% अल्पसंख्यक आरक्षण की बात की तो मुझे लगा क़ि आप फिर से गुजरात की फिजाओं में पहुँच गए हैं। वही मियाँ मुशर्रफ और सहज़ादा वाली भाषा पर। आपको राहुल गाँधी और नीतीश में कुछ फ़र्क ही नहीं दिखा? राहुल पप्पू हो सकते हैं, लेकिन आपको याद होगा क़ि आपको पहली बार फेंकू नीतीश कुमार ने ही साबित किया था।
आप ही बताइए कि आपके पार्टी अध्यक्ष ने बिहारियों को क्या समझकर ये कहा था कि अगर आप वहां हारे तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे? पाकिस्तान में पाटखे वाले बयान का तुक क्या था, अब शायद आपको भी पता चल गया होगा कि आखिर वो बयान कितना बेतुका था?
सर, गिरिराज सिंह जी लोगों को जब मन तब पाकिस्तान भेजते रहते हैं। हैं कौन वो? एक जिले से सांसद और आपके मंत्री। पांच साल बाद होंगे कि नहीं उनको भी नहीं पता लेकिन देशभक्ती का सर्टिफिकेट बांटते फिरते हैं। सर, जब पूरी पार्टी आपके कंट्रोल में है तो ऐसे फ्रिंज एलिमेंट इस तरह की बयानबाजी कैसे कर लेते हैं।
एक बात और सर, हिंदुओं के लिए गाय का धार्मिक महत्व बहुत ज़्यादा है लेकिन बिहार को राज्य के तौर पर अभी भी रोटी, कपड़ा और मकान मयस्सर नहीं है। गाय पर राजनीति करते समय शायद आपलोग भूल गए कि लोगों के ज़ेहन में अभी तक अयोध्या वाले राम कौतूहल करते हैं, कई बार सवाल भी करते हैं कि मंदिर बना दिया क्या।।।अगर नहीं तो इतना बवाल क्यों हुआ था भाई!? वही हाल आपने गाय का भी कर दिया, राम की तरह गाय पर भी लोगों की आस्था ख़तरे में है। सर, सवाल है कि गाय को आगे करके डिजिटल इंडिया और मेक इंन इंडिया कैसे होगा?
शायद आप और आपकी पार्टी बार-बार भूल जाते हैं कि भले अंदर-अंदर और सोशल मीडिया पर आपका एजेंडा हिंदुत्वा था लेकिन आम चुनाव में भी आपको 31% वोट मिला है। उसमें एक बड़ा तबका वो भी होगा सर जो अच्छे दिन के जुमले में फंस गया होगा। सर, आपके लोगों ने धर्मनिरपेक्षता को जेहाद जैसा शब्द बना दिया है। खुद को सेक्यूलर बताने में लोग अब डरते हैं। लेकिन प्रोपगैंडा स्थाई नहीं होता सर, संघ द्वारा जर्मनी से उधार ली गई  एक थ्यौरी (एक झूठ को सौ बार बोलो ताकि वो सच हो जाए) फौरी तौर पर चलने के बाद फुस हो गई।
दिल्ली और बिहार की हार में एक बात समान है कि दोनों जगह आपकी पार्टी ने निगेटिव कैंपेन किया। आपको तो याद ही होगा कि 2014 के आम चुनावों से पहले कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर ने आपको चाय वाला बताकर मजाक उड़ाया। कैसे हवा हो गए वे। आप पीएम बन गए, मणिशकर अय्यर के भी पीएम। खैर! दिल्ली विधानसभा चुनाव 2015 में आपने वही किया जो अय्यर ने आपके साथ किया था। आप दिल्ली के पूर्व CM केजरीवाल को नक्सली बता गए और तब से लेकर अंत तक निगेटिव कैंपेन के जाल में फंस गए। ये सिलसिला बिहार में भी जारी रहा वरना अपने लोगों को कौन पाकिस्तानी करार देता है। नतीजे आपके सामने हैं।
किसी भी सूरत में बिहार को अगले पांच साल तक ठीक शासन नहीं मिलने वाला, नहीं लगता कि राज्य को जो सरकार मिलने वाली है वो बहुत बेहतर सरकार है। लेकिन एक बात तय है कि बिहार की तरह आने वाले चुनावों में बीजेपी की भी दुर्गती तय है। सोचिए जब दिल्ली में रहकर आपसे दिल्ली नहीं बची और बिहार में सालों तक सरकार में रहकर बिहार नहीं बचा तो असम, बंगाल, केरल, तमिलनाडू में तो आप कहीं थे और ना कहीं हैं। राज्यसभा में बहुमत का सपना तो सपना ही रह जाएगा।
एक बात तय है कि आपकी पार्टी अब 1992 या 2014 के पहले वाली बीजेपी नहीं रही। कांग्रेस के बाद आप देश की एकमात्र दूसरी पार्टी हैं जिसने अपने बूते सरकार बना ली। लेकिन उसके लिए आपको इंदिरा गांधी का गरीबी हाटाओ के तर्ज पर अच्छे दिन का जुमला उछालना पड़ा। इस देश में ऐसे ही जुमले चलते हैं। इन्हीं जुमलों पर बहुमत की सरकारें बनती हैं। आपकी सरकार उसका सुबूत है। वरना आपको याद होगा कि 1992 के आपकी स्थिति सुधरी ज़रूर लेकिन आप सरकार बनाने की स्थिति में आधे सेक्यूलर वाजपयी जी के नेतृत्व में आए, सांप्रदायिक अडवाणी के नेतृत्व में नहीं। वहीं 2004 के आम चुनाव में हार के कारण पर बात करते हुए वाजपयी जी ने गोधरा दंगों को भी बड़ा कारण बताया था। सर, काठ की हांड़ी एक बार चढ़ती है, बार बार नहीं। वैसे मेरे आज के पत्र में आपको कई बातें बहुत कड़वी लग सकती हैं, लेकिन मैं तो आपकी ही बात (प्रधानमंत्री बनने के बाद आपने कहा था क़ि अच्छे दिनों के लिए कड़वी दवाई पीनी पड़ती है। पर चल रहा हूँ, शायद आज आपको भी उस दवाई की ज़रूरत है। आप फिर से विदेश जा रहे हैं, उसके पहले आप एक बार गुजरात घूम कर आइए ना। क्योंकि हो सकता है कि आपको कभी भी गुजरात ही वापस आना पड़ जाए, वैसे भी आनंदी बेन पटेल से गुजरात नहीं संभल रहा है, कहीं केशुभाई गेम ना खेल जाएँ? और जाते जाते जाशोदा आंटी से भी मिल लीजिएगा। शायद दीवाली में आपको घर में देखकर बहुत खुश हो जाएँगी। फिर रही बात विदेश की तो संसद के शीतकालीन सत्र के पहले फ्रेश होकर जाइए। उम्मीद करता हूँ कम से कम एक विदेश मंत्री के तौर पर तो आप अच्छा काम करेंगे। बाकी बातें किसी खुशी भरे पत्र में लिखूंगा, जब भी आप देश को खुशी का मौका तो दें।

धन्यवाद!

आपका शुभेच्छु,
कमलेश कुमार राठौड़
(राजनीति शास्त्र और क़ानून का युवा छात्र)
  

संघ की राजनीतिक चाल

साहित्यकारों, कलाकारों और वैज्ञानिक के पुरस्कार वापसी से लड़ने में जब मोदी सरकार के मंत्री फेल हो गये तो संघ के बड़े रणनीतिकार कई चरणों में रणनीति बनाए। जहर से जहर को मारने की रणनीति। मतलब विरोधियों का विरोध करने की रणनीति। जब तक पुरस्कार वापसी की संख्या ईकाई तक थी तो सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।। लेकिन जब संख्या दहाई की संख्या तक पहुंच गई तब सरकार जागी। मंत्री पहले इसे सहेजने की कोशिश किये, इसके बाद शुरू हुआ मोदी सरकार के मंत्री से लेकर सांसदों तक का बड़बोला बयान। इन बयानों ने कोढ़ में खाज का काम किया। और मुद्दा जब धधकने लगा तब संघ को अप्रत्यक्ष रूप से सामने आना पड़ा। और संघ ने विरोधियों का विरोध करने की खास रणनीति बनाई।
उसी रणनीति का असर है कि जब शाहरूख खान का मुद्दा गरमाने लगा तो संघ और बीजेपी के संगठन के बड़े पदाधिकारी अनुपम खेर समेत अपने राष्ट्रवादी समर्थक कलाकारों को सामने लाये। आज दिल्ली में नेशनल म्यूजियम से राष्ट्रपति भवन तक अनुपम खेर की अगुवाई में मार्च हुआ है। अनुपम खेर ने राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से भी मुलाकात की है।
 देश में बढ़ती असहिष्णुता के ख़िलाफ़ साहित्यकारों और फ़िल्मकारों के सम्मान लौटाने के विरोध में अभिनेता अनुपम खेर की अगुवाई में फिल्मकारों का दल प्रधानमंत्री से मिलने पहुंचा। इससे पहले इस बॉलीवुड अभिनेता ने राष्ट्रपति भवन तक मार्च का नेतृत्व किया, जिसमें पुरस्कार वापसी से देश की छवि को हो रहे नुकसान पर चिंता जताई गई। राष्ट्रपति के सामने पत्र पढ़ते हुए खेर ने कहा 'किसी की भी नृशंस हत्या निंदनीय है। हम लोग इसकी कड़ी निंदा करते हैं और त्वरित न्याय की उम्मीद करते हैं। लेकिन अगर इसका इस्तेमाल कुछ लोगों द्वारा भारत को वैश्विक स्तर पर बदनाम करने की कोशिश के तौर पर किया जा रहा है तो हम लोगों को चिंता करनी चाहिए।'
पूर्व विदेशमंत्री सलमान खुर्शीद ने अनुपम खेर की रैली पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें राष्ट्रपति भवन की बजाय दादरी तक रैली निकालनी चाहिए थी। खुर्शीद ने कहा, 'इसका निर्णय कौन करेगा कि देश में असहिष्णुता है या नहीं? यहां तक कि इसका निर्णय राष्ट्रपति भी नहीं कर सकते। जो भी इस विचार से अपने अवार्ड लौटा रहा है कि देश में असहिष्णुता का माहौल है, तो उनके निर्णय का सम्मान किया जाना चाहिए। अगर कुछ-एक लोग कह रहे हैं कि असहिष्णुता नहीं है, तो उनके विचार का भी सम्मान किया जाना चाहिए।'
आपको बता दें कि 'बढ़ती असहिष्णुता' का कई लेखक, इतिहासकार, वैज्ञानिक और फिल्म निर्माता विरोध कर रहे हैं और कम-से-कम 75 लोगों ने अपने पुरस्कार वापस किए हैं। वहीं बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पहले ही विरोध को कृत्रिम आक्रोश और राजनीति से प्रेरित बताकर खारिज कर चुकी है।
सहनशीलता के इस मार्च में कुछ लोगों द्वारा दिखाई गई असहनशीलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भीड़ ने हमारे संवाददाता हृदयेश जोशी से सवाल करने पर असभ् तरीके से बात की। वहीं, हमारी संवाददाता भैरवी सिंह को तो कुछ लोगों ने बकायदा घेर लिया और उनके साथ काफी बदसलूकी की। मामला बढ़ता देख दिल्ली पुलिस को बीच में आना पड़ा और संवाददाताओं को भीड़ से अलग ले जाया गया। मार्च में पत्रकारों से हुई बदसलूकी पर कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा कि ये 'परेशान करने वाली चीजें' हैं पार्टी ने इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ 'सख्त से सख्त कार्रवाई' की मांग भी की।

Friday, November 6, 2015

एक्जिट पोल्स का विश्लेषण

बिहार चुनाव के एक्सिट पोल्स के नतीजे बड़े ही दिलचस्प तरीके से आ रहे हैं. इनपर अगर नज़र डाली जाए तो काफ़ी असमानता देखने को मिलती है. पांचवें फेज में 59.64% वोटिंग हुई है। नतीजे 8 नवंबर को आएंगे। लेकिन 7 में से पांच चैनलों के एग्जिट पोल में आरजेडी-जेडीयू-कांग्रेस का महागठबंधन आगे रहा। वहीं, 2 चैनलों ने एनडीए को आगे बताया। लोकसभा चुनाव के एग्जिट पोल में नतीजों के करीब आंकड़े देने वाले न्यूज 24/चाणक्य के एग्जिट पोल ने एनडीए को 155 और महागठबंधन को 83 सीटें दी हैं।  चाणक्य के एक्सिट पोल्स के नतीजे हमेशा से ही काफ़ी सटीक बैठते रहे है, ऐसा मानकर ही भाजपा के नेता काफ़ी खुश नज़र आ रहे हैं 
वहीं दूसरी तरफ कई चैनलों ने जैसे ही जेडीयू+ को जीता हुआ बताया, वैसे ही  महागठबंधन के कार्यकर्ताओं ने अभी से जीत का जश्न मनाना शुरू कर दिया है। 
 आइए हम एक नज़र डालते हैं, एग्जिट पोल के नतीजों पर:

  चैनल/सर्वे एजेंसी                    एनडीए                            महागठबंधन                                     अन्य
न्यूज-24 / चाणक्य                       155                                    83                                               5
आज तक / सिसेरो                     113-127                         111-123                                           4-8
इंडिया टीवी / सी वोटर्स               101-121                         112-132                                          6-14
टाइम्स नाउ / सी वोटर्स                111                                122                                                 10
एबीपी / नील्सन                           108                                130                                                  5
न्यूज एक्स / सीएनएक्स            90-100                         130-140                                          13-23
न्यूज नेशन                               115-119                       120-124                                             3-5
एबीपी-नील्सन का सर्वे:
एबीपी ने फेज वाइज़ सर्वे किया है। सर्वे के अनुसार एनडीए को 108, महागठबधंन को 130 और अन्य को 5 सीटें मिलने का अनुमान है।

फेज 1:  एनडीए 22, महागठबंधन 25 , अन्य 2
फेज 2 :  एनडीए 16, महागठबंधन 16, अन्य 0
फेज 3:  एनडीए 13,  महागठबंधन 37, अन्य: 0
फेज 4: एनडीए 33, महागठबंधन 20,  अन्य 2
फेज 5: एनडीए 24, महागठबंधन 32, अन्य 1

अगर बात वोटिंग प्रतिशत पर की जाए तो इसमें भी एक दिलचस्प आँकड़ा सामने आता है. बिहार इलेक्शन 2015 में इस बार सभी फेज में 56.47%  वोटिंग हुई। 2010 के इलेक्शन में मतदान का पर्सेंटेज 52.67% रहा था। इस बार लगभग 4% वोटिंग ज्यादा हुआ है। राजनीति शस्त्र तो यही कहता है क़ि जब जब वोटिंग प्रतिशत बढ़ता है तब सत्ताधारी पार्टी को नुकसान होता है. लेकिन मीडिया, अख़बारों और वहाँ के स्थानीय लोगों की बातों या माहौल से तो नीतीश कुमार के खिलाफ एंटी इनकांबंसी बिल्कुल भी नज़र नहीं आ रही थी. 
फेज                                                       वोटिंग %
पहला                                   57% - 2010 की तुलना में 6.15% ज्यादा
दूसरा                                   55%- 2010 की तुलना में 3% ज्यादा
तीसरा                                  53% - 2010 की तुलना में 3.25% ज्यादा
चौथा                                   58%- 2010 की तुलना में 3% ज्यादा
पांचवां                                 59.64%

एक्सिट पोल्स के नतीजे आने के बाद से ही लालू प्रसाद यादव बड़े जोश में आ गए, और के प्रेस कांफ्रेंस भी कर डाली.  लालू प्रसाद यादव ने वोटिंग खत्म होते ही ट्वीट किया और कहा है कि महागठबंधन को 190 सीटें मिलेंगी। वहीं दूसरी तरफ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि वे अभी कुछ नहीं बोलेंगे। अब 8 नवंबर को ही बात करेंगे। बीजेपी सांसद कीर्ति आजाद ने कहा कि बीजेपी का प्रदर्शन बेहतर रहेगा। बीजेपी नेता अनंत कुमार ने कहा कि एनडीए को दो-तिहाई बहुमत मिलेगा। सीएम नीतीश कुमार ने ट्वीट कर शानदार मतदान के लिए बिहार के वोटर्स को धन्यवाद दिया है। मैनें इन नेताओं की प्रतिक्रिया इसलिए आपको बताई क्योंकि मेरा अनुमान इसी से सटीक बैठेगा क़ि उनका जोश कैसा है?
 अगर बात की जाए क़ि इन नतीजों के आने के बाद देश या राज्य की राजनीति में क्या परिवर्तन होगा तो सबसे अधिक इसका मनोवैज्ञानिक फायदा विपक्ष, ख़ासकर कांग्रेस को मिलेगा. हर चुनाव में बुरी तरह हार रही कांग्रेस को ऑक्सीजन मिल सकती है। बिहार में खो चुके जनाधार को कुछ हद तक वापस पाने में मदद मिलेगी। बंगाल में ममता बनर्जी, और उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव का जोश बढ़ेगा, और अपने अपने राज्यों में वो मोदी कर डटकर सामना करेंगे.  केंद्र सरकार और बीजेपी के लिए इन चुनावों से पीएम मोदी की साख भी दांव पर है। हाल ही में उन्हें फोर्ब्स मैगजीन ने दुनिया के 10 ताकतवर नेताओं में शामिल किया है।  केंद्र सरकार और बीजेपी पर इन्टॉलरेंस को बढ़ाने और देश का माहौल खराब करने का आरोप लग रहे हैं। अगर जीत मिलती है तो पार्टी इन आरोपों का काउंटर कर पाएगी।  लोकसभा और राज्यसभा में जीएसटी और लैंड बिल जैसे पेंडिंग पड़े बिलों को पास कराने में मदद मिलेगी। राज्य में स्ट्रेंथ बढ़ेगी। इसमें मैं एक बात और जोड़ना चाहूँगा क़ि  अगर ये नतीजे महागठबंधन के फेवर में रहे तो नीतीश कुमार का कद बढ़ेगा। अगर वे सरकार बना पाते हैं तो 2019 तक अगले लोकसभा चुनाव के वक्त पीएम मोदी को टक्कर देने वाले वे अकेले मजबूत नेता के रूप में उभर सकते हैं। 



अबकी बार, मोदी की हार

एग्जिट पोल ने इशारा कर दिया है. बिहार में महागठबंधन सरकार बनाने जा रही है. बीजेपी बहुमत से दूर है. अंतिम फैसला 8 नवंबर को आएगा लेकिन संकेत बीजेपी के लिए शुभ नहीं हैं.
अगर बीजेपी चुनाव हारती है तो सबसे ज्यादा नुकसान नरेंद्र मोदी का होगा. बिहार में बीजेपी की ओर से चुनाव का चेहरा ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे. एनडीए ने पूरा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लड़ा है. किसी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित नहीं किया गया था. क्योंकि पार्टी ने किसी को नीतीश के बराबर के कद का माना ही नहीं था. चुनाव प्रचार में खुद प्रधानमंत्री ने 30 रैलियां की. प्रधानमंत्री ने ही चुनाव का पूरा एजेंडा सेट किया था. चाहे डीएनए वाला बयान हो या फिर शैतान और साधु वाला प्रधानमंत्री के भाषणों के बाद ही ये बातें गांव की गलियों से निकलकर राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय फलक पर आया. ऐसे में जीत-हार का सारा श्रेय प्रधानमंत्री के खाते में जाना है. बीजेपी के हारते ही देश में कांग्रेस फिर से जिंदा हो जाएगी. मोदी के खिलाफ माहौल को भुनाने के लिए तमाम विरोधी एक हो जाएंगे. आने वाले सालों में यूपी और बंगाल जैसे बड़े राज्यों की लड़ाई है. यहां बीजेपी की हालत विधानसभा में पहले से खराब है. ऐसे में इस हार की मार से उबर पाना बहुत मुश्किल हो सकता है. बीजेपी की हार के बाद एनडीए में तकरार बढ़ेगी. नीतियों को लेकर सवाल उठेंगे. शिवसेना-अकाली जैसे सहयोगी मुखर हो जाएंगे. आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया प्रभावित होगी. बहुत संभावना है कि बिहार से आने वाले तीन-चार मंत्रियों की कुर्सी चली जाए. कुछ लोगों को पार्टी से बाहर भी किया जा सकता है. अगर एग्जिट पोल के नतीजे असली नतीजों में नहीं बदलते और बीजेपी चुनाव जीतती है तो फिर नरेंद्र मोदी की लहर बरकरार मानी जाएगी. अगले चुनावों के लिए पार्टी के हौसले बुलंद रहेंगे. प्रधानमंत्री अपनी नीतियों को उसी दिशा में आगे बढ़ाएंगे. असहनशीलता को लेकर जो देश में माहौल बनाया जा रहा है उसको जनमत के दम पर गलत साबित कर पाने की कोशिश करेंगे. अगर यह हार होती है तो सीधे तौर पर नरेंद्र मोदी जी की ही हार मानी जाएगी क्योंकि ऐसा चुनाव का पूरा कैंपेन उनके सारथी अमित शाह जी के उपर था. अमित शाह ने कई चुनाव भाजपा को जिताए हैं, लेकिन दिल्ली की हार के बाद उनके मैनेजमेंट पर सवाल उठने शुरू हो गए थे. इसलिए यह हार मोदी जी विचारधारा और नीतियों और अमित शाह के संगठन की होगी. 

Tuesday, November 3, 2015

इतिहास को सकारात्मक नज़रिए से देखो

आज जब महिलाओं के सम्मान और पुरुषवादी नज़रिए पर बात होती है, तो लोग धर्म, से लेकर पहनावे और शिक्षा पर ना जाने कैसे कैसे तर्क देते हैं. कुछ लोग इतिहास को भी ग़लत तरीके से पेश करते हैं. क्योंकि मैं मुंबई में रहता हूँ इसलिए महाराष्ट्र की शान, वीर शिवाजी महाराज के जीवन से जुड़ी एक घटना का ज़िक्र करना चाहता हूँ, जो हाल ही के दिनों में मैने एक किताब में पढ़ी थी.
और इस घटना का ज़िक्र मेरे लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि शिवाजी महाराज के नाम पर यहाँ राजनीति चमकाने वाले कुछ तथाकथित राष्ट्रवादी लोग मुस्लिम धर्म और क़ुरान को बड़ा ही निचले क्रम या कहें क़ि शक की नज़र से देखते हैं. मुझे ऐसा लगता है क़ि उन लोगों को शिवाजी महाराज के जीवन पर ही अभी बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है.
शिवाजी अपने तंबू में बैठे माधव भामलेकर के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। इसी बीच हाथ में एक ग्रंथ लिए सेनानी पहुंचे। उनके पीछे एक डोला लिए दो सैनिक थे। डोला रखकर वे चले गए। सेनानी ने प्रसन्न मुद्रा में कहा-‘छत्रपते! आज मुगल सेना दूर तक खदेड़ दी गई। बहलोल खां जान बचाकर भागा। अब उसकी ताकत नहीं कि वह इधर मुंह भी करे। शिवाजी ने डोले की ओर देखते हुए पूछा, ′यह क्या है?’ सेनानी ने कहा-इसमें बहलोल की बेगम है, जो महाराज को भेंट करने के लिए लाई गई है।
तभी डोले से आवाज आई, यह मेरे हाथ से कुरान लीजिए। शिवाजी ने कुरान लेकर चूम लिया और डोले के पास आकर पर्दा हटाया तथा बहलोल खां की बेगम को बाहर आने को कहा। उसको ऊपर से नीचे तक निहारकर उन्होंने कहा,‘सचमुच आप बड़ी सुंदर हैं। अफसोस है कि मैं आपके गर्भ से नहीं जन्मा। अगर ऐसा होता, तो मैं भी कुछ सुंदरता पा जाता।’
श‌िवाजी ने अपने एक अधिकारी को आदेश दिया कि सम्मान और क्षमा प्रार्थना के साथ बेगम तथा कुरान-शरीफ को बहलोल खां को जाकर सौंप आइए। सेनापति को अपने कृत्य पर लज्जा आई। इधर पत्नी और कुरान को लौटाया देख बहलोल खां भी पिघल गया। अंत में उसने यही निश्चय किया कि इस फरिश्ते को देखकर मैं दिल्ली लौटूंगा।
हलोल ने सैनिक भेजकर शिवाजी से मिलने की इच्छा प्रकट की। नियत तिथि और समय पर शिवाजी बहलोल खां की प्रतीक्षा करते खड़े थे। इसी बीच बहलोल खां आ पहुंचा और ‘फरिश्ते’ कहकर शिवाजी से लिपट गया। फिर शिवाजी के पैरों पर गिरकर कहने लगा-माफ कर दो मुझे। बेगुनाहों का खून मेरे सिर चढ़कर बोलेगा। मुझे माफ कर दो।
यह घटना वीर शिवाजी के केवल स्त्री सम्मान की दृष्टि से ना देखी जाए. आज एक ऐसा दौर है, जब बड़े बड़े लोग सांप्रदायिकता की आग से बच नहीं पाए, और खुद को उसमें झोंक दिया. और हम जैसे लोग संघर्ष कर रहे हैं, आपसी भाई चारे को बढ़ाने के लिए. तो क्यों ना मैं आज उन लोगों पर ताना मारु, जो खुद को राष्ट्रवादी कहकर सांप्रदायिकता फैला रहे हैं, तो उनके ही नायक के जीवन की घटना को बताया जाए. यह शिवाजी महाराज के चरित्र के सेकुलर चेहरे को भी बताता है. शायद तभी वो आज याद किए जाते हैं, और उनके नाम पर राजनीति करने वाले फर्जी लोग अपने ही पूरे राज्य में कभी स्वीकार नहीं किए जाते हैं. 

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...