प्रिय प्रधानमंत्री जी,
प्रधानमन्त्री
जी कैसे हैं
आप? उम्मीद है
अच्छी सेहत होगी,
और मानसिक रूप
से परेशानी, जो
हार के बाद
आई है, 4-5 दिन
में ख़त्म हो
जाएगी। वैसे तो
मेरी कोई औकात
नहीं है, आप
जैसे महान अंतरराष्ट्रीय
नेता को कोई
सलाह देने की।
लेकिन जिस तरह
का राजनैतिक माहौल
आपने 2014 से बनाया
था, उससे आप
एक बार तो
जीत सकते हैं,
लेकिन बार बार
जीतना या फिर
यूँ कहें, जनता
को उल्लू बनाना
इतना आसान नहीं
होता है।
आप विकास का एजेंडा
लेकर निकले थे।
कितने सुहाने थे
वो अच्छे दिन
के वादे, वो
हर खाते में
15 लाख देने की
बातें लेकिन बिहार
पहुंचते-पहुंचते Reservation पर आ
गए। एक तरफ
तो लालू और
नीतीश को जातिवादी
कहते रहे, दूसरी
तरफ पहली बार
ऐसा हुआ जब
देश के प्रधानमंत्री
की जाति खूब
और बदल बदल
कर बताई गई। आपकी
भाषण शैली को
मैं काफ़ी पसंद
करता हूँ लेकिन
जब आपने 5% अल्पसंख्यक
आरक्षण की बात
की तो मुझे
लगा क़ि आप
फिर से गुजरात
की फिजाओं में
पहुँच गए हैं।
वही मियाँ मुशर्रफ
और सहज़ादा वाली
भाषा पर। आपको
राहुल गाँधी और
नीतीश में कुछ
फ़र्क ही नहीं
दिखा? राहुल पप्पू
हो सकते हैं,
लेकिन आपको याद
होगा क़ि आपको
पहली बार फेंकू
नीतीश कुमार ने
ही साबित किया
था।
आप ही बताइए
कि आपके पार्टी
अध्यक्ष ने बिहारियों
को क्या समझकर
ये कहा था
कि अगर आप
वहां हारे तो
पाकिस्तान में पटाखे
फूटेंगे? पाकिस्तान में पाटखे
वाले बयान का
तुक क्या था,
अब शायद आपको
भी पता चल
गया होगा कि
आखिर वो बयान
कितना बेतुका था?
सर, गिरिराज सिंह जी
लोगों को जब
मन तब पाकिस्तान
भेजते रहते हैं।
हैं कौन वो?
एक जिले से
सांसद और आपके
मंत्री। पांच साल
बाद होंगे कि
नहीं उनको भी
नहीं पता लेकिन
देशभक्ती का सर्टिफिकेट
बांटते फिरते हैं। सर,
जब पूरी पार्टी
आपके कंट्रोल में
है तो ऐसे
फ्रिंज एलिमेंट इस तरह
की बयानबाजी कैसे
कर लेते हैं।
एक बात और
सर, हिंदुओं के
लिए गाय का
धार्मिक महत्व बहुत ज़्यादा
है लेकिन बिहार
को राज्य के
तौर पर अभी
भी रोटी, कपड़ा
और मकान मयस्सर
नहीं है। गाय
पर राजनीति करते
समय शायद आपलोग
भूल गए कि
लोगों के ज़ेहन
में अभी तक
अयोध्या वाले राम
कौतूहल करते हैं,
कई बार सवाल
भी करते हैं
कि मंदिर बना
दिया क्या।।।अगर नहीं
तो इतना बवाल
क्यों हुआ था
भाई!? वही हाल
आपने गाय का
भी कर दिया,
राम की तरह
गाय पर भी
लोगों की आस्था
ख़तरे में है।
सर, सवाल है
कि गाय को
आगे करके डिजिटल
इंडिया और मेक
इंन इंडिया कैसे
होगा?
शायद आप और
आपकी पार्टी बार-बार भूल
जाते हैं कि
भले अंदर-अंदर
और सोशल मीडिया
पर आपका एजेंडा
हिंदुत्वा था लेकिन
आम चुनाव में
भी आपको 31% वोट
मिला है। उसमें
एक बड़ा तबका
वो भी होगा
सर जो अच्छे
दिन के जुमले
में फंस गया
होगा। सर, आपके
लोगों ने धर्मनिरपेक्षता
को जेहाद जैसा
शब्द बना दिया
है। खुद को
सेक्यूलर बताने में लोग
अब डरते हैं।
लेकिन प्रोपगैंडा स्थाई
नहीं होता सर,
संघ द्वारा जर्मनी
से उधार ली
गई एक
थ्यौरी (एक झूठ
को सौ बार
बोलो ताकि वो
सच हो जाए)
फौरी तौर पर
चलने के बाद
फुस हो गई।
दिल्ली और बिहार
की हार में
एक बात समान
है कि दोनों
जगह आपकी पार्टी
ने निगेटिव कैंपेन
किया। आपको तो
याद ही होगा
कि 2014 के आम
चुनावों से पहले
कांग्रेस के मणिशंकर
अय्यर ने आपको
चाय वाला बताकर
मजाक उड़ाया। कैसे
हवा हो गए
वे। आप पीएम
बन गए, मणिशकर
अय्यर के भी
पीएम। खैर! दिल्ली
विधानसभा चुनाव 2015 में आपने
वही किया जो
अय्यर ने आपके
साथ किया था।
आप दिल्ली के
पूर्व C।M।
केजरीवाल को नक्सली
बता गए और
तब से लेकर
अंत तक निगेटिव
कैंपेन के जाल
में फंस गए।
ये सिलसिला बिहार
में भी जारी
रहा वरना अपने
लोगों को कौन
पाकिस्तानी करार देता
है। नतीजे आपके
सामने हैं।
किसी भी सूरत
में बिहार को
अगले पांच साल
तक ठीक शासन
नहीं मिलने वाला,
नहीं लगता कि
राज्य को जो
सरकार मिलने वाली
है वो बहुत
बेहतर सरकार है।
लेकिन एक बात
तय है कि
बिहार की तरह
आने वाले चुनावों
में बीजेपी की
भी दुर्गती तय
है। सोचिए जब
दिल्ली में रहकर
आपसे दिल्ली नहीं
बची और बिहार
में सालों तक
सरकार में रहकर
बिहार नहीं बचा
तो असम, बंगाल,
केरल, तमिलनाडू में
तो आप न
कहीं थे और
ना कहीं हैं।
राज्यसभा में बहुमत
का सपना तो
सपना ही रह
जाएगा।
एक बात तय
है कि आपकी
पार्टी अब 1992 या 2014 के
पहले वाली बीजेपी
नहीं रही। कांग्रेस
के बाद आप
देश की एकमात्र
दूसरी पार्टी हैं
जिसने अपने बूते
सरकार बना ली।
लेकिन उसके लिए
आपको इंदिरा गांधी
का गरीबी हाटाओ
के तर्ज पर
अच्छे दिन का
जुमला उछालना पड़ा।
इस देश में
ऐसे ही जुमले
चलते हैं। इन्हीं
जुमलों पर बहुमत
की सरकारें बनती
हैं। आपकी सरकार
उसका सुबूत है।
वरना आपको याद
होगा कि 1992 के
आपकी स्थिति सुधरी
ज़रूर लेकिन आप
सरकार बनाने की
स्थिति में आधे
सेक्यूलर वाजपयी जी के
नेतृत्व में आए,
सांप्रदायिक अडवाणी के नेतृत्व
में नहीं। वहीं
2004 के आम चुनाव
में हार के
कारण पर बात
करते हुए वाजपयी
जी ने गोधरा
दंगों को भी
बड़ा कारण बताया
था। सर, काठ
की हांड़ी एक
बार चढ़ती है,
बार बार नहीं।
वैसे मेरे आज
के पत्र में
आपको कई बातें
बहुत कड़वी लग
सकती हैं, लेकिन
मैं तो आपकी
ही बात (प्रधानमंत्री
बनने के बाद
आपने कहा था
क़ि अच्छे दिनों
के लिए कड़वी
दवाई पीनी पड़ती
है। पर चल
रहा हूँ, शायद
आज आपको भी
उस दवाई की
ज़रूरत है। आप
फिर से विदेश
जा रहे हैं,
उसके पहले आप
एक बार गुजरात
घूम कर आइए
ना। क्योंकि हो
सकता है कि
आपको कभी भी
गुजरात ही वापस
आना पड़ जाए,
वैसे भी आनंदी
बेन पटेल से
गुजरात नहीं संभल
रहा है, कहीं
केशुभाई गेम ना
खेल जाएँ? और
जाते जाते जाशोदा
आंटी से भी
मिल लीजिएगा। शायद
दीवाली में आपको
घर में देखकर
बहुत खुश हो
जाएँगी। फिर रही
बात विदेश की
तो संसद के
शीतकालीन सत्र के
पहले फ्रेश होकर
आ जाइए। उम्मीद
करता हूँ कम
से कम एक
विदेश मंत्री के
तौर पर तो
आप अच्छा काम
करेंगे। बाकी बातें
किसी खुशी भरे
पत्र में लिखूंगा,
जब भी आप
देश को खुशी
का मौका तो
दें।
धन्यवाद!
आपका शुभेच्छु,
कमलेश कुमार राठौड़
(राजनीति शास्त्र और क़ानून
का युवा छात्र)
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