आज जब महिलाओं के सम्मान और पुरुषवादी नज़रिए पर बात होती है, तो लोग धर्म, से लेकर पहनावे और शिक्षा पर ना जाने कैसे कैसे तर्क देते हैं. कुछ लोग इतिहास को भी ग़लत तरीके से पेश करते हैं. क्योंकि मैं मुंबई में रहता हूँ इसलिए महाराष्ट्र की शान, वीर शिवाजी महाराज के जीवन से जुड़ी एक घटना का ज़िक्र करना चाहता हूँ, जो हाल ही के दिनों में मैने एक किताब में पढ़ी थी.
और इस घटना का ज़िक्र मेरे लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि शिवाजी महाराज के नाम पर यहाँ राजनीति चमकाने वाले कुछ तथाकथित राष्ट्रवादी लोग मुस्लिम धर्म और क़ुरान को बड़ा ही निचले क्रम या कहें क़ि शक की नज़र से देखते हैं. मुझे ऐसा लगता है क़ि उन लोगों को शिवाजी महाराज के जीवन पर ही अभी बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है.
शिवाजी अपने तंबू में बैठे माधव भामलेकर के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। इसी बीच हाथ में एक ग्रंथ लिए सेनानी पहुंचे। उनके पीछे एक डोला लिए दो सैनिक थे। डोला रखकर वे चले गए। सेनानी ने प्रसन्न मुद्रा में कहा-‘छत्रपते! आज मुगल सेना दूर तक खदेड़ दी गई। बहलोल खां जान बचाकर भागा। अब उसकी ताकत नहीं कि वह इधर मुंह भी करे। शिवाजी ने डोले की ओर देखते हुए पूछा, ′यह क्या है?’ सेनानी ने कहा-इसमें बहलोल की बेगम है, जो महाराज को भेंट करने के लिए लाई गई है।
तभी डोले से आवाज आई, यह मेरे हाथ से कुरान लीजिए। शिवाजी ने कुरान लेकर चूम लिया और डोले के पास आकर पर्दा हटाया तथा बहलोल खां की बेगम को बाहर आने को कहा। उसको ऊपर से नीचे तक निहारकर उन्होंने कहा,‘सचमुच आप बड़ी सुंदर हैं। अफसोस है कि मैं आपके गर्भ से नहीं जन्मा। अगर ऐसा होता, तो मैं भी कुछ सुंदरता पा जाता।’
शिवाजी ने अपने एक अधिकारी को आदेश दिया कि सम्मान और क्षमा प्रार्थना के साथ बेगम तथा कुरान-शरीफ को बहलोल खां को जाकर सौंप आइए। सेनापति को अपने कृत्य पर लज्जा आई। इधर पत्नी और कुरान को लौटाया देख बहलोल खां भी पिघल गया। अंत में उसने यही निश्चय किया कि इस फरिश्ते को देखकर मैं दिल्ली लौटूंगा।
हलोल ने सैनिक भेजकर शिवाजी से मिलने की इच्छा प्रकट की। नियत तिथि और समय पर शिवाजी बहलोल खां की प्रतीक्षा करते खड़े थे। इसी बीच बहलोल खां आ पहुंचा और ‘फरिश्ते’ कहकर शिवाजी से लिपट गया। फिर शिवाजी के पैरों पर गिरकर कहने लगा-माफ कर दो मुझे। बेगुनाहों का खून मेरे सिर चढ़कर बोलेगा। मुझे माफ कर दो।
यह घटना वीर शिवाजी के केवल स्त्री सम्मान की दृष्टि से ना देखी जाए. आज एक ऐसा दौर है, जब बड़े बड़े लोग सांप्रदायिकता की आग से बच नहीं पाए, और खुद को उसमें झोंक दिया. और हम जैसे लोग संघर्ष कर रहे हैं, आपसी भाई चारे को बढ़ाने के लिए. तो क्यों ना मैं आज उन लोगों पर ताना मारु, जो खुद को राष्ट्रवादी कहकर सांप्रदायिकता फैला रहे हैं, तो उनके ही नायक के जीवन की घटना को बताया जाए. यह शिवाजी महाराज के चरित्र के सेकुलर चेहरे को भी बताता है. शायद तभी वो आज याद किए जाते हैं, और उनके नाम पर राजनीति करने वाले फर्जी लोग अपने ही पूरे राज्य में कभी स्वीकार नहीं किए जाते हैं.
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