Thursday, September 15, 2016

चाचा-भतीजे में महाभारत

यह पहला मौका नहीं है जब समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने अपने भाई शिवपाल यादव का खुलेआम पक्ष लिया हो. इससे पहले इस साल 15 अगस्त के मौके पर पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की उपस्थिति में कहा था कि यदि शिवपाल पार्टी का साथ छोड़ देते हैं तो समाजवादी पार्टी बिखर जाएगी. हम थोड़ा और पीछे जाएं तो नवंबर 2013 में लोकसभा चुनावों से कुछ महीने पहले मुलायम ने शिवपाल को रामगोपाल यादव पर तरजीह देते हुए चुनावों के लिए पार्टी की कमान उनके हाथ में ही सौंपी थी. पार्टी की मंगलवार को हुई बैठक में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से समाजवादी पार्टी के उत्तर प्रदेश इकाई के प्रमुख का पद वापस ले लिया गया और यह फैसला किसी और का नहीं बल्कि पार्टी सुप्रीमो और उनके पिता मुलायम सिंह यादव का ही था. जवाब में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने चाचा और पार्टी के कद्दावर नेता शिवपाल सिंह यादव से सभी मंत्रालयों का प्रभार वापस ले लिया. इस मामले में पार्टी के पुराने नेताओं का कहना है कि कुछ भी हो जाए लेकिन, समाजवादी पार्टी को यदि 2017 में होने वाला विधानसभा चुनाव जीतना है तो मुलायम के पास शिवपाल का बचाव करने और उन पर निर्भर रहने के आलावा और कोई दूसरा आॅप्शन नहीं है.  भले ही अखिलेश यादव पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री पद का चेहरा हैं, पार्टी में अमर सिंह की वापसी हो गई है और आजम खान जैसे बड़े नेता मौजूद हैं लेकिन, पार्टी कार्यकर्ताओं की बड़ी जमात मुलायम सिंह यादव के बाद शिवपाल को ही अपना नेता मानती है. पार्टी से जुड़े कुछ लोग बताते हैं कि शिवपाल यादव कार्यकर्ताओं के साथ हमेशा संपर्क में रहते हैं, राज्य के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा कर जमीनी स्तर पार्टी के लिए काम करते हैं, कार्यकर्ताओं के बीच पार्टी के किसी दूसरे बड़े नेता की इतनी पकड़ नहीं है जितनी शिवपाल की है, ये कुछ ऐसी बाते हैं जो शिवपाल को औरों से अलग खड़ा करती हैं और मुलायम के लिए उनको महत्वपूर्ण बनाती हैं. इस संबंध में समाजवादी पार्टी के एक नेता का कहना है, ‘अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए अखिलेश यादव ही पार्टी के पोस्टर बॅाय होंगे. आगामी 3 अक्टूबर से वह एक बार फिर पार्टी के लिए समर्थन जुटाने के मकसद सेविकास से विजय की ओरयात्रा करने वाले हैं. उन्होंने ट्विटर पर इसकी घोषणा भी कर दी है. यदि समाजवादी पार्टी चुनाव जीतने सफल रहती है तो वही एक बार फिर मुख्यमंत्री भी होंगे. लेकिन, मुलायम सिंह यादव यह बात अच्छे तरीके से जानते हैं कि चुनाव जीतने के लिए एक मजबूत संगठन और निष्ठावान संगठनकर्ता की जरूरत होती है. संगठन के काम के लिए शिवपाल यादव पार्टी के सबसे उपयुक्त चेहरे हैं. उन्होंने नेता जी के साथ दशकों तक पार्टी संगठन में काम किया है और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच उनकी बहुत ही गहरी पैठ है. समाजवादी पार्टी के एक अन्य नेता कहते हैं, ‘मुस्लिम और यादव समुदाय पार्टी का सबसे बड़ा वोट बैंक है. मुलायम सिंह के बाद शिवपाल इन दोनों ही समुदायों के बीच पार्टी के सबसे स्वीकार्य नेता हैं. पार्टी के लिए आगामी चुनाव में इन दोनों समुदायों का अधिकटम वोट पाने के लिए मुलायम को शिवपाल के सहयोग की जरूरत पड़ेगी. वहीं, शिवपाल की पार्टी कार्यकर्ताओं के आलावा आम लोगों में भी अच्छी पकड़ है. अखिलेश इस मामले में अपने चाचा शिवपाल से पीछे ही हैं. मुख्यमंत्री जहां हर सप्ताह लखनऊ स्थित अपने आवास पर आम लोगों के समस्याओं के समाधान के लिए जनता दरबार का आयोजन करते हैं वहीं, शिवपाल ऐसी बैठक हर रोज करते हैं. वो लोगों की परेशानियों सुनते हैं और उनके सामने ही संबंधित अधिकारियों को फोन लगाकर इस संबंध में कार्रवाई करने का निर्देश देते हैं, इससे आम लोग के बीच शिवपाल को लेकर एक विश्वास की भावना है.इटावा के जसवंतनगर विधानसभा सीट से चौथी बार चुनाव जीतने वाले शिवपाल यादव की पार्टी में अन्य पक्षों से बातचीत करने और किसी भी तरह के विवाद में संकट मोचन की भूमिका निभाने वाले नेता की छवि है. विधानसभा चुनावा के मद्देनजर कौमी एकता दल के साथ हुए हालिया समझौते में शिवपाल ही पार्टी की तरफ से पहल करने वाले नेता थे. समाजवदी पार्टी में अमर सिंह की वापसी में भी शिवपाल ही मुख्य भूमिका में रहे. पार्टी के एक अन्य वरिष्ठ नेता बेनी प्रसाद वर्मा को पार्टी में फिर से वापस लाने का श्रेय शिवपाल को ही जाता है. हाल फिलहाल समाजवादी पार्टी में चाचा भतीजे के बीच चल रहे घमासान से कार्यकर्ताओं में निराशा है और वे इस विवाद के जल्द से जल्द शांत होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. शिवपाल और अखिलेश को नेता जी का दोनों हाथ बताते हुए एक पार्टी नेता का कहना है, ‘मुलायम चाहते हैं कि अखिलेश आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अपनी बेदाग छवि के साथ प्रचार पर अपना ध्यान केंद्रीत करें और पार्टी और संगठन की जिम्मेदारी शिवपाल पर छोड़ दें. शिवपाल संगठन के काम से भली भांति परिचति हैं और पार्टी के लिए समर्थन जुटाने में अखिलेश से ज्यादा महत्वपूर्ण भी हैं.शायद यही वजह है कि मुलायम किसी भी कीमत पर शिवपाल के साथ खड़े रहना चाहते हैं और इसके लिए यदि अखिलेश की इच्छा के विरुद्व भी जाना पड़े तो उसके लिए भी तैयार हैं. 
समाजवादी पार्टी में अगर अखिलेश को यही शख्त कदम उठाने थे तो 4.5 साल से क्या कर रहे थे? उनके घर के साढ़े पाँच मुख्यमंत्री मीडिया में कहे जाते थे, अखिलेश उसमें से आधे थे. तब तो कभी अखिलेश ने ध्यान नहीं दिया, अगर 2014 में इतनी ईमानदारी कार्यकर्ताओं के प्रति अखिलेश दिखाते तो लोकसभा में और सीटें मिल जातीं. मैं अखिलेश यादव को बहुत जमाने से देखता आया हूँ. मेरे गाँव के कई लोगों के निजी संबंध थे, तो आते जाते देखा था. अखिलेश के प्रति उत्तर प्रदेश में युवा बेहद प्रभावित हैं. ख़ासकर यादव और ओबीसी में तो क्रेज़ है. आप कन्नौज की तरफ जाएँगे तो दिखता है, कि मुलायम को 40 साल तक के लोग दददा, और अखिलेश को युवा अखिलेश भाईया कहते हैं, डिंपल को भाभी. मैं ये संबंध इसलिए गिना रहा हूँ क्योंकि इससे उनके परिवार के प्रति राजनीतिक रिश्ते दिखते हैं. 2007 में समाजवादी पार्टी की हार शिवपाल चाचा के गुडों के कारण ही हुई थी. फिर 2012 में सबने अखिलेश को ही वोट दिया था, ना क़ि शिवपाल और आज़म ख़ान को. फिर आज़म का मुस्लिम प्रेम और शिवपाल चाचा के चेलों की गुंडागर्दी 2014 में पार्टी को ले डूबी. अब यह बात अखिलेश को फिर से समझ में आई है, इसलिए वो फिर से खुद के हाथ में कमान लेकर आगे आए हैं. वैसे उनके शासन में कोई बड़ा घोटाला नहीं हुआ इसबार. विकास कार्य के जो वादे किए थे मेनीफेस्टो में वो 70% तो पूरे किए हैं. अगर जनता तक वो पहुँचा पाए तो सर्वे कहते हैं कि जनता अभी भी उनको बेहतर मुख्यमंत्री के तौर पर देखती है

बीएसपी का रैला स्टाइल

उत्तर प्रदेश में बीएसपी ने आज चौथी रैली की। सहारनपुर में हुई रैली में आज 15 लाख लो शामिल हुए। आप इसे झूठ मान सकते हैं। लेकिन सच में इसे कह सकते हैं कि रैली नहीं रैला था। वो भी वन वूमेन आर्मी मायावती। ये उनका पुराना राजनीतिक रैली करने का अंदाज है। इसबार उनके साथ 19% दलित और 20% मुस्लिम वोट जो आ रहा है। यह मुस्लिम वोटों की बात मैं जमीनी स्तर पर बसपा के अपने मित्र कार्यकताओं Ashish Mishra Mohsin Khan Amar Singh  के माध्यम से बहुत दिनों से देख रहा हूँ। 2014 चुनाव में बुरी हार, फिर पार्टी की सभी इकाइयों को भंग कर नए सिरे से खडा करना बेहद मुश्किल होता है। दो साल अज्ञातवास के जैसे रहकर कार्यकर्ता इकट्ठा किए। जेएनयू प्रोफेसर विवेक कुमार जैसे लोगों के साथ मिलकर सोसल इंजीनियरिंग की। अपनी ऑफिस के ऑपरेटर को महासचिव बना दिया। पुराने लोगों को बुलाया तब जाकर पार्टी में जान आई। यह सब करते हुए वो मीडिया से दूर थीं, फायदा ये हुआ कि न अच्छी खबर दिखाई न उनकी गलती गिनाई। फिर भी सर्वे में नंबर एक।
मायावती ने इसबार जमीनी स्तर पर इसबार कमान युवा वर्ग के हाथों में दी है। दलित युवा मोबाइल फोन में उनके भाषण,  गाने सुनते हुए मिल जाते हैं। पढे लिखे दलित सोसल मीडिया में बहुत एक्टिव हैं, अब तो वे दूसरों से बहस भी करते हैं। मायावती ने हर मुद्दे को सही तरीके से भुनाया है, कोई कसर नहीं छोड रही हैं। दयाशंकर के मामले में नसीमुद्दीन से गलती हुई कि खुद कमान संभाली। 
बचपन से उनकी बडी रैली खासकर 15 जनवरी को उनके जन्मदिन पर देखता रहा हूँ, जिसमें 10-12 लाख लोग शामिल होते थे। तो इस रैली में भी कुछ अजीब नहीं लगा। बस चुनाव अब कांग्रेस कितना मजबूत लडेगी, इसपर निर्भर है। जितना कांग्रेस मजबूत उतना बसपा के वोट कटे। फिलहाल यूपी में ओवैसी को कोई नहीं पूछेगा। ज्यादा मेहनत करके बीजेपी की मदद कर सकते हैं।
मायावती 10-15 लाख की रैलियाँ कर रही हैं, लेकिन मीडिया कभी उसे नहीं दिखा रहा है? यह क्यों कि 10-20 हज़ार लोगों की रैली पर पूरा मीडिया चर्चा और एनालिसिस चालू कर देता है, लेकिन इसमें नहीं। कुछ लोग इसे मनुवादी मीडिया कह रहे है, लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूँ. गुजरात में या महाराष्ट्र में कुछ रैली या आंदोलनों को मीडिया में जगह मिली है. इसमें मुझे कॉरपोरेट मीडिया का एक मिला जुला संदेश दिखाई देता है. इतिहास बताता है क़ि मायावती कभी कॉरपोरेट से संबंध नहीं रखती हैं, या हो सकता है पहले(काशीराम के समय से) मीडिया से दूरी रखने के कारण आज मीडिया उनमें कुछ ध्यान नहीं देना चाहती है।
पिछले संडे को बीएसपी की सहारनपुर रैली के समय मायावती विश्व में 4 नंबर और भारत में पहले नंबर पर पर ट्रेंड कर रही थी। यह अपने आप में बड़ा बदलाव और  चेतावनी संदेश था बाकी दलों के लिए जो पार्टी मीडिया से इतना दूर रहती थी, आज वो सोसल मीडिया पर आगे. कुछ तो बदलाव हुए हैं उसमें।

हिंदी दिवस विशेष

जब मैं मुंबई आया था तो बहुत शर्म आती थी क़ि इंग्लिश नहीं आती है, कैसे लॉ पढ़ पाउँगा. काफ़ी कोशिश की  लेकिन इंग्लिश उतनी ही सीख  पाया  जितने में पेपर देकर पास हो जाउ. क्लासेज में गया, कॉलेज गया. सभी के बाप बड़े बड़े जज या वकील, मैं अकेला गाँव का आदमी वो भी यूपी का. तो लोगों ने मज़ाक भी उड़ाने की कोशिश की. मैं हर जगह केवल अपने नॉलेज और फैक्ट्स की मजबूत तैयारी करके जाता था, पहले इंग्लिश में स्पीच या डिबेट चालू करके थोड़ी देर में हिन्दी बोलने लगता. जैसे ही हिन्दी में आया, फिर तो रुकने का नाम नहीं लेता. हो सकता है, आप यह सोचे क़ि अपने मुँह मिया मिट्ठू बन रहा है, लेकिन सच में मैं अपने जोन में किसी से  हार नहीं मान सकता था, इसीलिए क्लास में बनते ग्रुप में हमेशा सबका दोस्त बनता रहा. कई लोग कहते हैं कि कमलेश दो हैं, एक वो जो सबके सामने बहुत शर्मिला सा डरने वाला लड़का है, दूसरा जो राजनीति और क़ानून की बात होते ही ऐसी ज़ोर की बहस करता है, जो सबकी वाट लगा देता है. लोग समझ नहीं पाते हैं, कि मैं किस तरफ जाने वाला हूँ, एक मुद्दे पर किसी को सही कहा तो ग़लत मुद्दे पर उसके विरोध में खड़ा रहता हूँ. यह सब मैने हिन्दी के अपने दो वर्तमान सबसे बड़े पुरोधाओं कुमार विश्वास और रवीश कुमार से सीखा है. इसके बाद हिन्दी बोलने के मामले में एक और कुमार हैं, जिनका नाम लूँगा तो एंटी नेशनल कह दिया जाउँगा. अजब बात है कि इन तीन में से दो को तो इंग्लिश आती ही नहीं है. ठीक वैसा ही मैं भी हूँ, मेरे ब्लॉग में लिखा है, क़ि "इंग्लिश नहीं आती है, इसलिए हिन्दी में लिखता हूँ." मतलब शर्म नहीं करता हूँ किसी को बताने में कि इंग्लिश कम आती है. 
आज हिन्दी दिवस पर मैं यही कह सकता हूँ कि  किसी दूसरी भाषा को नीचा दिखा कर आगे नहीं बढ़ा सकते हैं. आप इतिहास उठाकर देख लीजिए 80 के दशक में तमिल लोगों ने हिन्दी किताबें इसलिए जलाईं और बड़ी मात्रा में विरोध आंदोलन किए क्योंकि उनपर हिन्दी थोपी जा रही थी, लेकिन अब वो खुद सीख रहे हैं. ऐसे ही हम लोग मराठी सीखते हैं, लेकिन जब राज ठाकरे कहते हैं, कि सीखना ही पड़ेगा नहीं तो वापस जाओ तो नहीं सीखते हैं. यही हिन्दी के साथ भी है, सभी भाषाए प्यार की भाषा है, ज़रूरत है उनको प्यार से एक दूसरे के साथ जोड़ने की. मुंबई में गुजराती, तमिल, मराठी आपस में हिन्दी में बात करते हैं. बेंगलोर में तमिल और कन्नड़ हिन्दी में बात करते हैं. कलकत्ता में बंगाली और मलयाली लोग हिन्दी में बात करते हैं.  भाषा दो लोगों को जोड़ती है, इसलिए किसी पर यह मत थोपो क़ि शुद्ध हिन्दी ही बोलो, या फिर रोमन में हिन्दी मत लिखो, उनकी भावना देखो कि हिन्दी में लोग आ रहे हैं, फिर किसी पर प्रेसर मत करो. मैने जानबूझ कर आज हिन्दी में इंग्लिश के शब्द मिलाए हैं क्योंकि हिन्दी समंदर है, और बाकी सब नदियाँ, तो वो नदियाँ समंदर में ही आकर मिलेंगी. बाकी सब भाषाएं हमारी मौसी हैं, हिन्दी माँ है. किसी के साथ सौतेला व्यवहार करने की ज़रूरत नहीं है.

Thursday, September 1, 2016

सातवें वेतन आयोग की नई सेलरी

केंद्र सरकार के 48 लाख कर्मचारियों के खातों में बुधवार को यानी आज बढ़ी हुई सैलरी आ गई होगी. 7वें वेतन आयोग के तहत बढ़ी हुई सैलरी के साथ 7 महीने का एरियर भी जुड़कर आएगा. हालांकि सरकारी अधिकारियों के मुताबिक एचआरए के साथ सैलरी में 30 फीसदी इजाफा हुआ है और जो लोग सरकारी आवास में रहते हैं और उनका एचआरए कटता है उनकी सैलरी 10-15 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ आई है. हालांकि, अभी भी श्रमिक संगठन शुक्रवार की हड़ताल करने पर अड़े हुए हैं और ये न्यूनतम सैलरी 18 हजार रुपये करने की मांग कर रहे हैं. वहीं 52 लाख पेंशनर्स को भी बढ़ी हुई पेंशन और एरियर्स गुरुवार तक देने का सरकार ने भरोसा दिलाया है. सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद आज बढ़ी हुई सैलरी आने के बाद देश के करीब 47 लाख केंद्रीय कर्मचारियों और करीब 53 लाख पेंशनधारियों का इंतजार आखिरकार खत्म हुआ. 1 जनवरी 2016 से दिए जाने वाले नए वेतन में 125 फीसदी मंहगाई भत्ता शामिल हैं. हालांकि एरियर से जीपीएफ, नेशनल पेंशन स्कीम (एनपीएस) और इनकम टैक्स (टीडीएस) कटेंगे. इससे सरकार के पास भी करीब 30 हजार करोड़ रुपये की कमाई इकट्ठी होगी. 7वें वेतन आयोग का फैसला जून में आया था जबकि कर्मचारियों को इसका फायदा 1 जनवरी 2016 से मिलेगा. अब अगस्त की सैलरी आज यानी 31 अगस्त को आ चुकी होगी या 1 सितंबर को आएगी. इसके तहत सभी श्रेणियों में बेसिक सैलरी में 2.5 गुना इजाफा होगा वहीं सेना में ब्रिगेडियर के पद के लिए इजाफा 2.67 गुना होगा. हालांकि बेसिक तो 2.5 गुना बढ़ जाएगा. लेकिन अगले 4 महीनों तक मौजूदा अलाउंस ही मिलेगा. अलाउंसेस में फिलहाल बढ़ोत्तरी नहीं लागू हुई है लेकिन ये आगे जाकर मिल जाएंगे. सरकार ने 7वें वेतन आयोग की भत्तों (अलाउंस) से जुड़ी सिफारिशों की समीक्षा के लिए एक कमिटी बनाई है. एक्सपर्ट ग्रुप की राय पर कमिटी 4 महीने में सुझाव देने वाली है. कमिटी के इन सुझावों के आधार पर ही अलाउंसेस पर फैसला होगा. अभी 196 तरह के भत्ते मिलते हैं. वेतन आयोग ने 53 को खत्म करने और 37 को दूसरे भत्तों के साथ मिलाने की सिफारिश की थी. कमेटी इसी पर सुझाव देगी और उसके बाद ही अलाउंस में बढ़ोत्तरी होगी. तब तक मौजूदा रेट से ही अलाउंस मिलता रहेगा.
इसके तहत 7 हजार रुपये की न्यूनतम बेसिक सैलरी बढ़कर 18,000 रुपये हो गई है जबकि अधिकतम सैलरी जो 90 हजार रुपये थी. वो अब 2.5 लाख रुपये हो गई है. गौरतलब है कि ये एक सांसद की मौजूदा सैलरी से ज्यादा है. बता दें, सांसद की मौजूदा सैलरी सभी भत्ते मिलाकर 1.40 लाख रुपये हर महीना है. नए सैलरी ढांचे के मुताबिक क्लास-1 अफसर की कम से कम सैलरी 56,100 रुपये होगी. वहीं पेंशनर्स के लिए कम से कम पेंशन अब 3500 की जगह 9000 रुपये हो गई है. सरकारी कर्मचारियों को जनवरी से जून 2016 के दौरान के 6 महीनों के एरियर्स मिले हैं और सरकार ने इन्हें मार्च 2017 से पहले देने का वादा किया गया था जो पूरा किया है. 6ठें वेतन आयोग की तुलना में इस बार एरियर काफी कम हैं. अलग-अलग श्रेणी में सैलरी और एरियर अलग-अलग तय किए गए हैं और अलग-अलग सैलरी-एरियर्स दिए जाएंगे. कर्मचारियों को औसतन 15000 रुपये से 3 लाख रुपये तक के एरियर्स मिलेंगे. सैलरी में सातवें वेतन आयोग कमिशन में बढ़ी सैलरी के साथ 7 महीने का एरियर भी जुड़कर इकट्ठा आएगा. कर्मचारियों को पूरा एरियर एक ही किस्त में मिलेगा जिससे इस बार अगस्त में लोगों को भारी-भरकम सैलरी के साथ आएगी.
बदले हुए नियमों में 21 हजार रुपये तक सैलरी पाने वाले कर्मचारी बोनस लेने के सक्षम हैं और इस मानक के तहत करीब 33 लाख कर्मचारी आते हैं. इन्हें वेतन का 8.33 फीसदी तक बोनस मिलेगा. सरकार ने 7वें वेतन आयोग के साथ इंक्रीमेंट पॉलिसी में जो बदलाव किया है उसके तहत अब से एक बार की जगह साल में दो अलग-अलग तारीखों यानी 1 जनवरी और 1 जुलाई को इन्क्रीमेंट किया जाएगा. हालांकि एक कर्मचारी को साल में 2 बार इंक्रीमेंट नहीं मिलेगा बल्कि एक बार ही इन्क्रीमेंट मिलेगा. 7.5 की जगह अब घर बनाने के लिए एडवांस (एचबीए) 25 लाख रुपये ले सकेंगे. ग्रैच्युटी 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख रुपये कर दी गई है और बड़ी बात ये है कि डीए के साथ इसकी सीमा भी बढ़ेगी. इसके अलावा सरकारी कर्मचारियों को एक्स-ग्रेशिया 10-20 लाख की जगह 25 से 45 लाख रुपये मिला करेगा. केंद्र ने न्यूनतम दैनिक मजदूरी 246 से बढ़ाकर 350 रुपये करने का फैसला किया है. इससे गैर-कृषि मजदूरों को लाभ होगा. लेकिन केंद्रीय यूनियन अभी भी 2 सितंबर की हड़ताल पर कायम हैं.


राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...