Tuesday, December 23, 2014

किसान दिवस (भाग-2)

किसान हर देश की प्रगति में विशेष सहायक होते हैं। एक किसान ही है जिसके बल पर देश अपने खाद्यान्नों की खुशहाली को समृद्ध कर सकता है। देश मे राष्ट्रपिता गांधी जी ने भी किसानों को ही देश का सरताज माना था। लेकिन देश की आजादी के बाद ऐसे नेता कम ही देखने में आए जिन्होंने किसानों के विकास के लिए निष्पक्ष रूप में काम किया। ऐसे नेताओं में सबसे अग़्रणी थे, देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह। आज उन्ही की याद में हमारे देश में किसान दिवस मनाया जाता है। किसान ही वो है, जो हमारे देश को जीवित रखता है। लेकिन आज यह विडंबना ही है कि सबसे ज्यादा किसान ही संघर्ष कर रहे हैं. ज्यादा तर किसान खेती छोड़ कर बाहर शहरों की ओर जा रहे हैं। कोई भी किसान अपने बच्चों को किसान नहीं बनाना चाहता है। 
एक नेता ऐसा भी था ,,जो जितनी सम्पति लेकर राजनीती मै आया था ,उतनी लेकर अमर हुआ ! जबकि वह परधानमंत्री भी रहा ! उनकी ईमानदारी से काम करने की वजा से इंद्रा Gandhi जेल भी गयी ! जबकि उन दिनों मै इंद्रा जी के आगे सब झुकते थे ,एसे निडर इंसान थे वो ! आज भी किसान उनके कामो को याद क्र क्र के रोता है.!
चौधरी चरण सिंह (जन्म: 23 दिसम्बर, 1902 मेरठ - मृत्यु- 29 मई, 1987) भारत के पाँचवें प्रधानमंत्री थे। चरण सिंह किसानों की आवाज़ बुलन्द करने वाले प्रखर नेता माने जाते थे। चौधरी चरण सिंह का प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल 28 जुलाई, 1979 से 14 जनवरी, 1980 तक रहा। यह समाजवादी पार्टी तथा कांग्रेस (ओ) के सहयोग से देश के प्रधानमंत्री बने। इन्हें 'काँग्रेस इं' और सी. पी. आई. ने बाहर से समर्थन दिया, लेकिन वे इनकी सरकार में सम्मिलित नहीं हुए। इसके अतिरिक्त चौधरी चरण सिंह भारत के गृहमंत्री (कार्यकाल- 24 मार्च 1977 – 1 जुलाई 1978), उपप्रधानमंत्री (कार्यकाल- 24 मार्च 1977 – 28 जुलाई 1979) और दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे।
इंदिरा गांधी ने 19 अगस्त, 1979 को बिना बताए समर्थन वापस लिए जाने की घोषणा कर दी. अब यह प्रश्न नहीं था कि चौधरी साहब किसी भी प्रकार से विश्वास मत प्राप्त कर लेंगे. वह जानते थे कि विश्वास मत प्राप्त करना असम्भव था. यहाँ पर यह बताना प्रासंगिक होगा कि इंदिरा गांधी ने समर्थन के लिए शर्त लगाई थी. उसके अनुसार जनता पार्टी सरकार ने इंदिरा गांधी के विरुद्ध जो मुक़दमें क़ायम किए हैं, उन्हें वापस ले लिया जाए. लेकिन चौधरी साहब इसके लिए तैयार नहीं हुए थे.
इस प्रकार की गलत सौदेबाज़ी करना चरण सिंह को क़बूल नहीं था. इसीलिए उन्होंने प्रधानमंत्री की कुर्सी गंवाना बर्दाश्त कर लिया. वह जानते थे कि उन्होंने जिस ईमानदार नेता और सिद्धान्तवादी व्यक्ति की छवि बना रखी है, वह सदैव के लिए खण्डित हो जाएगी. अत: संसद का एक बार भी सामना किए बिना चौधरी चरण सिंह ने प्रधानमंत्री पद का त्याग कर दिया.
स्वतंत्रता आंदोलन के रास्ते राजनीति में घुसने वाले चौधरी चरण सिंह 1950 के दशक में पहले पीएम जवाहर लाल नेहरू के विरोध के कारण जाने जाते थे. उन्होंने किसानों की लड़ाई को बड़ी मज़बूती के साथ रखा और यही वजह है कि उन्हें किसान नेता के तौर पर जाना जाता है. 1967 तक कांग्रेस में रहने के बाद उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बना ली थी.
चौधरी चरण सिंह ने अपने कार्यकाल के दौरान उर्वरकों और डीजलों के दामों में कमी की और कृषि यंत्रों पर उत्पाद शुल्क घटाया। काम के बदले उन्होंने अनाज योजना को लागू किया। विलासिता की सामग्री पर चौधरी चरण सिंह ने भारी कर लगाए।
वह उत्तर प्रदेश में भूमि सुधार के लिए अग्रणी पुरुष माने जाते थे। 1939 में कृषकों के क़र्ज मुक्ति विधेयक को पारित कराने में चरण सिंह की निर्णायक भूमिका थी। 1960 में उन्होंने भूमि हदबंदी क़ानून को लागू कराने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अगर वे प्रधानमंत्री का एक सत्र भी पूरा करते तो इसमें संदेह नहीं कि आज किसानों की स्थिति कुछ और बयां करती। 29 मई 1987 को जनमानस का यह नेता इस दुनिया को छोड़कर चला गया। चौधरी चरण सिंह तो इस दुनिया को छोड़कर चले गए लेकिन लोगों के जेहन में उनका राजनीतिक प्रभाव पहले ही की तरह बरकरार है।
जब तक दुखी किसान रहेगा, धरती पर तूफान रहेगा...
देश और किसानो को एसे नेताओं की जरुरत है !
जय हिन्द जय भारत
 

Thursday, December 11, 2014

धर्म परिवर्तन या घर वापसी


आगरा में 60 मुस्लिम परिवारों के धर्म परिवर्तन के मामले में नया मोड़ गया है। आरएसएस और बजरंग दल ने सोमवार को 60 मुस्लिम परिवारों का धर्म परिवर्तन कराने का दावा किया था, लेकिन जिन लोगों का धर्म परिवर्तन कराने का दावा किया गया था उन्होंने ही पैसों का लालच देकर फोटो खिंचवाने का आरोप लगाया है। इन लोगों का कहना है कि जबरन धर्म परिवर्तन को लेकर वे नाराज हैं। वहीं, इस मामले में बजरंग दल का कहना है कि उनके ऊपर लगाए गए आरोप बेबुनियाद हैं। उन्होंने किसी को किसी भी तरह का लालच नहीं दिया था। इस मामले में बढ़ते विवाद के बाद पूरे मामले की जांच शुरू हो गई है। मैजिस्ट्रेट ने लोगों के बयान दर्ज करने का निर्देश दिया है।
आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो परिवार कुछ घंटो पहले तक खुशी खुशी हवन में शामिल हुए और एकदम से पलट गए। कुछ तो बदला ही होगा। बदला हो या ना बदला हो लेकिन मामला पूरा उल्टा पड गया। उन लोगों ने पैसे देकर धर्म परिवर्तन का आरोप लगा डाला। ईसाई को 2 लाख और मुस्लिम को 5 लाख रुपए दिए जा रहे थे, हिन्दू बनने के लिए। और यह इतनी बड़ी रकम है, जिससे एक गरीब आदमी की गरीबी कुछ हद तक तो कम हो ही सकती है। गरीब आदमी पैसे के आगे अपने भगवान और विचारधारा को भूलना मुनासिब समझेगा। आप यह कह सकते हैं क़ि ऐसा ही तब भी हो सकता है जब हिन्दू लोग मुस्लिम, बौद्ध और ईसाई धर्म में परिवर्तित हो रहे थे। लेकिन ऐसे कोई प्रमाण तब की परिस्थितियों के बारे में तो नहीं हैं। आज जो हुआ तो तब से बिल्कुल अलग है। आज की राजनीति में यह साम्प्रदायिकता फैलाने के इरादे से उन संगठनों द्वारा किया गया है, जो 2 साल पहले से मोदी सरकार आने पर हिन्दू राष्ट्र की बात करते थे। आज वही हिन्दुत्ववादी संगठन इसमे ज्यादा सक्रिय हैं, जो संघ परिवार से जुड़े हुए हैं। 
मैं इस विषय के तीन पक्ष रखना चाहूंगा। पहला कि इसका एक नैतिक पक्ष है जो कानूनी रूप से जायज है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार हमें धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त है। किसी भी व्यक्ति के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता है। फिर तो उन सबको आजादी है, जो अपना धर्म छोड़कर दूसरे धर्म में जाना चाहते हैं। दूसरी बात मेरी इस प्रश्न से जुड़ी हुई है कि क्या इन सबको जबरजस्ती, बहला-फुसलाकर या किसी धमकी के आधार पर ऐसा करने को मजबूर किया गया। और इस मामले में आपको तीनों चीजें देखने को मिल रही हैं। उनको पैसे का लालच दिया गया। उनको राशन कार्ड देने की बात की गई। आखिर राशन कार्ड देने वाले ये संगठन या हिन्दुत्व के ठेकेदार होते कौन हैं? और जो लोग इससे नहीं माने उनको कहा गया कि आने वाले दिनों में यहाँ पर दंगे होंगे, जो हिन्दू हैं वही रहेगे और सब बांग्लादेशी घोषित करके भगा दिये जाएंगे? यह एक धमकी ही नहीं साम्प्रदायिकता की चेतावनी थी जो समाज में घृणा फैलाएगी। अब मैं अपनी सबसे अंतिम और महत्वपूर्ण बात स्वेच्छा से किए गए धर्म परिवर्तन पर आना चाहता हूँ। बहुत सारे धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से होते हैं। बाबा साहब अम्बेडकर भी तो बौद्ध धर्म में हजारों महार जाति के लोगों को लेकर चले गए थे। इसके बाद तो बौध्द धर्म में महाराष्ट्र के दलितों के जाने का सिलसिला ही शुरु हो गया। जिसे कांशीराम सहित बहुत लोगों ने पूरे देश में चलाया। आखिर ये लोग तो अपने सामाजिक पिछड़ेपन के  कारण हिन्दू धर्म छोड़कर चले गए थे। इसी तरह से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और खासकर पूर्वोत्तर के राज्यों में लोग ईसाई बने, उत्तरभारत और दक्षिण भारत में मुस्लिम बने। जिसका एक मात्र कारण था, उनका हिन्दू धर्म में होने वाला अपमान। इस अपमान के स्वरूप उसे क्या मिला? इसी जाति  प्रथा से  मजबूर होकर लोग नास्तिक भी हुए। आपको मैं कम से कम 10 रिसर्च के नतीजे बता रहा हूँ जो कहते हैं क़ि भारत में होने वाले 80% से भी अधिक धर्म परिवर्तन केवल जाति प्रथा से पीड़ित लोग करते हैं। वो ब्राम्हणवाद से जबरजस्त डरे हुए लोग होते हैं। और खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। आखिर क्यों ये हिन्दुत्ववादी अपने ही धर्म और समाज को सुरक्षा और समानता का भरोसा दिला पाते हैं।  दरअसल संघ परिवार के इतिहास को ही देखा जाए तो यह बहुसंख्यक अधिनायकवाद पर टिका हुआ है। पहले महाराष्ट्र के कोंकण और पुणे में दलितों पर अत्याचार संघ की ही प्राथमिक साखाओं के लोगों ने किए थे। संघ में सारे के सारे पदाधिकारी और सदस्य एक ही समाज के लोग होते थे, जो महाराष्ट्र में हमेशा ही दलितों पर अत्यचार करते रहे। आप इसके भी पहले जाएँ तो वीर शिवाजी के मामले में ऐसा कुछ हदतक देख सकते हैं। इसके बाद शाहूजी महाराज के समय भी ऐसी बाते हुई थी। जिनका विस्तृत जिक्र नहीं किया जा सकता है। भीमराव अम्बेडकर को भी पढ़ते समय आप इनकी हकीकत समझ पाएंगे। जब आजादी के बाद यह बहुसंख्यक वाद डॉक्टर अम्बेडकर के संवैधानिक प्रयासों से कम हुआ तो जिंन्ना के बहाने मुस्लिमों को शिकार बनाया जाने लगा। जैसे जैसे ईसाई धर्म यहाँ बढ़ा उनका यह अत्याचार बढ़ता ही गया। इस बहुसंख्यक अधिनायकवाद की जड़ें अभी तक कुछ राज्यों में छिपी हुई थी, उसीका नतीजा है कि अभी भी दलित दूसरे धर्मों में प्रवेश कर रहे हैं। कुछ हिन्दुत्ववादी इसे लालच और जबरजस्ती में कराया गया धर्म परिवर्तन बोलते हैं। मैं मानता हूँ कि कुछ पैसे, मूर्तिपूजा, विचारधारा, भगवान और समानता की बाते करके उनका धर्म परिवर्तन हुआ हो, लेकिन वो अल्पसंख्यक होकर जबरजस्ती तो नहीं कर पाएंगे। रही बात लालच देने की तो मैं इसे पूरी तरह से गलत मानता हूँ। लेकिन हिन्दुत्ववादियों को सोंचना चाहिए कि उनके ही हिन्दू भाई यहाँ से क्यों जा रहे हैं? वो सुरक्षित क्यों नहीं महसूस कर रहे हैं?
अब मैं इस मुद्दे के मूल पर लौटकर केन्द्र राज्य दोनो सरकारों को इसके लिए जिम्मेदार मानता हूँ। आखिर क्यों अखिलेश सरकार ऐसे लोगों को रोकने में नाकाम है? आखिर क्यों मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से प्रवीण तोगडिया जैसे लोगो के हाथ खुल गए हैं? आखिर क्यों योगी आदित्यनाथ, गिरिराज सिंह और साध्वी निरंजन ज्योति जैसे भाजपा सांसद अपने असली रूप को दिखाने लगे हैं? आखिर क्यों साक्षी महाराज जैसे लोग संघ के पुराने विचार (नाथूराम ने गांधीजी को मारकर राष्ट्रहित का काम किया था) को दोहराने लगे हैं? इसके कुछ जवाब हम इस तरह से भी निकल सकते हैं कि जब जनता से जुड़े मुद्दों को हल करने में सरकार असफल रहती है तो घटिया राजनीतिक हिसाब से ऐसे ही जनता की भावनाओं से जुड़े मुद्दों पर ध्यान ले जाती है।  यह जरूरी है की सरकार इन असामाजिक तत्वो से कठोरता से पेश आये। चाहे धरम परिवर्तन कराने वाले किसी भी धरम के क्यों हो सिर्फ मीडिया संसद मे बहस करने से कुछ नही होगा। आम आदमी को अपने अधिकार भारत के नागरिक होने के नाते मिलनी चाहिये इसके लिये धरम परिवर्तन कराना गलत है जिसके दुष्परिणाम हो रहे है और भयानक होंगे। सविधान पर बहस करने वाले कितने नेता सविधान की शपथ के प्रति ईमानदार है और अपना काम देश जनता के हित मे करते है ?

Thursday, November 27, 2014

कानून मे भी बदलाव की जरूरत है।


 हमारा देश 21वीं शदी में आ गया है, पूरा समाज बदल रहा है लेकिन समाज को न्याय दिलाने वाले कुछ कानून ऐसे हैं, जो ब्रिटिश विरासत की देन हैं, और आज भी हमारे यहाँ मौजूद हैं हमारे देश में कम से कम 3000 ऐसे एक्ट और कानून हैं। हम कानून के छात्रों को राजनीति से अलग हटकर चलना खतरे भरा है, पता नहीं कब कौन सा कानून पास हो जाए और कब किस कानून में बदलाव हो जाए। अगर बिना जानकारी के पहले पढ़ा हुआ कानून ही पढ़कर अदालत पहुंच गए तो जज की डांट सुनकर भागना पड़ेगा 
इनमें से बहुत सारे कानून ऐसे हैं, जो अंग्रेज़ों के समय से चल रहे हैं, और उनका प्रयोग बिल्कुल खत्म हो गया है। प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की ओर से जारी बयान में कहा गया है, ‘प्रधानमंत्री ने पुराने पड़ चुके कानूनों की समीक्षा के लिए समिति के गठन को मंजूरी दी है।यह नई समिति उन सभी कानूनों की समीक्षा करेगी जिन्हें अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा 1998 में गठित प्रशासनिक कानूनों की समीक्षा समिति ने रद्द करने की सिफारिश की थी। पीएमओ ने कहा कि मोदी ने इस बात पर चिंता जताई है कि उस समिति ने जिन 1,382 कानूनों को रद्द करने की सिफारिश की थी उनमें से सिर्फ 415 ही अभी तक समाप्त किए गए हैं।
आगे ऐसे ही कुछ कानूनों के बारे में मैं भी आपको बताना चाहूंगा। दिल्ली में किराया नियंत्रण कानून भी इसी तरह के कानूनों की श्रेणी में आता हैमैने पढ़ा कि किराएदार की शुरूआती जांच करने की सलाह तो हर राज्य की पुलिस सुरक्षा कारणों से देती है। लेकिन इसके बाद भी मकान मालिक क्यों किराएदार को हमेशा संदेह से ही देखते हैं? क्यों किराया चुकाने में एक दिन की भी देरी मकान मालिकों को बैचैन कर देती है? क्यों मकान मालिक अपने किराएदार के साथ कानूनी एग्रीमेंट करने के बावजूद भी आश्वस्त नहीं हो पाते? इन सभी सवालों के जवाब तलाशने के लिए उन अनुभवों को समझना जरूरी है जो पिछले 60-70 साल में देशभर के मकान मालिकों को हुए हैं। इन्हें समझने की शुरुआत दिल्ली से ही करते हैं। इसको लेकर तहलका में एक रिपोर्ट आई थी। किराएदारों कोकिराया नियंत्रण कानूनके अंतर्गत संरक्षण प्राप्त है। यह कानून देश की आजादी के बाद लगभग सभी राज्यों में लागू किया गया था। उस वक्त विभाजन के कारण बड़ी सख्या में लोगों का पलायन हुआ था। ऐसे में लाखों लोग अपना बसा-बसाया घर और कारोबार छोड़कर देश में शरणार्थी बनकर पहुंचे थे। इन्हीं लोगों की मदद के लिए किराया नियंत्रण कानून बनाया गया था। हालांकि हर राज्य के किराया नियंत्रण कानून का स्वरूप अलग था लेकिन इसका मूल उद्देश्य किराएदारों के हितों की रक्षा करना था। 
दिल्ली में यह कानून 1958 में लाया गया। इसका नाम थादिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम 1958′ शुरुआती दौर में यह कानून किराएदारों का शोषण रोकने में तो सफल साबित हुआ लेकिन धीरे-धीरे मकान मालिकों के शोषण का सबसे बड़ा कारण भी बन गया। इस कानून की सबसे बड़ी कमी यह रही कि इसमें वक्त के साथ संशोधन नहीं किए गए। इसमें मुख्य संशोधन इसके लागू होने के लगभग 30 साल बाद हुआ। 1988 में इस कानून में दो मुख्य बदलाव किए गए। एक, 3500 रुपये प्रतिमाह से ज्यादा किराया चुकाने वाले किराएदारों को इस कानून के दायरे से बाहर कर दिया गया और दूसरा हर तीन साल में 10 प्रतिशत तक किराया बढ़ाए जाने की व्यवस्था की गई। यह कानून मकान मालिकों को ज्यादा किराया वसूलने और किराएदार को जबरन निकालने से प्रतिबंधित करता था। विश्व के लगभग 40 देशों में किराया नियंत्रण कानून मौजूद हैं। हालांकि इनका स्वरुप सभी देशों में अलग है लेकिन इसके दुष्परिणाम लगभग सभी जगह देखे गए हैं। स्वीडन के प्रख्यात अर्थशास्त्री असर लिंडबेक ने इसीलिए किराया नियंत्रण के बारे में कहा है किकिसी शहर को बर्बाद करने के लिए बमबारी के अलावा यदि कोई दूसरा काबिल तरीका है तो वह किराये का नियंत्रण है।’ 
आखिर देश में पुराने और निष्क्रिय कानूनों को निरस्त करने में इतनी दिक्कत क्यों हो रही है? आजादी के 68 साल बाद भी हमारे देश में अंग्रेज़ों के जमाने के बहुत सारे कानून जिंदा हैं। भारतीय रेलवे के 38 पुराने नियम 2012 में खत्म किए गए। लगभग 200 ऐसे कानून हैं, जो सौ साल से मौजूद हैं, और उनमें ईस्ट इंडिया कम्पनी, ब्रिटिश ताज, गर्वनर जनरल, या प्रिवी कौंसिल का जिक्र किया गया है। जबकि ईस्ट इंडिया कम्पनी और यह सब तो अंग्रेजो के साथ 1947 में ही वापस चला गया था 1836 का बंगाल डिस्ट्रिक एक्ट और इंडिगो कॉन्ट्रेक्ट  आज भी चालू है, जो नील की खेती और नए ज़िले बनाने के लिए बनाया गया था। 
इडियन एयरक्राफ्ट एक्ट 1934, जिसमें कहा गया है कि पतंग उड़ाने के लिए भी आपको परमिट की जरूरत होती है, नहीं तो 50 रुपए का जुर्माना हो सकता है। इसमें गुब्बारे को भी एक तरह का विमान ही माना गया है। Indian Motor Vehicle Act में एक नियम है कि गाड़ी चलने के लिए आपके अच्छे और शुन्दर दातों का होना आवश्यक है। हालांकि यह अभी केवल आंध्रप्रदेश में ही मौजूद है, बाकी सब जगह इसको समाप्त कर दिया गया है अगर आप कहीं जा रहे हैं, और शहर पर टिड्डी दल का हमला हो जाए तो East Punjab Agriculture Pets Act 1949 के तहत आपको भी ड्रम बजाने के लिए बुलाया जा सकता हैं। अगर आप ड्रम बजाने नहीं गए तो 50 रुपए का जुर्माना या दो महीने की सजा हो सकती है। Indian सराय एक्ट 1887 में नियम है क़ि आप किसी भी होटल में मुफ्त में पानी और शौंचलय का प्रयोग कर सकते  हैं। अगर होटल ऐसा करने से माना करे तो उसपर 20 रुपए का जुर्माना होगा। Indian Post Office Act 1898 निजी कुरियर सेवा गैर कानूनी है, लेकिन सबके सब चिट्ठियों को दस्तावेज बताकर काम चला रहे हैं। आजादी की लड़ाई के समय जब क्रांतिकारी जेलों में गाँधी टोपी पहनने लगे तो अंग्रेज़ों ने टोपी को जेल में बैन कर दिया था जो नियम  आज भी चालू है। Licensing and Controlling Places of Amusement (Other than Cinema)1960  के तहत एक डांस फ्लोर पर 10 से अधिक जोड़े डांस नहीं कर सकते हैं। पुलिस एक्ट 1861 के तहत आज भी शाही खानदानो के सामने पुलिस को टोपी उतार कर सलाम करना पड़ेगा, मजे की बात है कि शाही शब्द पर बहुत पहले ही रोक लगा दी गई थी। The Indian Treasurer Trove Act 1878 के तहत अगर आप 10 रुपए भी कही पर पड़े हुए पा जाएँ और इसकी खबर ना दें तो आपको जेल हो सकती है। Indian Majority Act 1875 के तहत आपको 18 साल की उम्र के बाद बच्चा गोद लेने कि छूट है, लेकिन शादी करने की उम्र 21 वर्ष है। अर्थात आप शादी करके तो बाप 21 वर्ष की उम्र के बाद बन सकते हैं, लेकिन बच्‍चा गोद लेनेकर 18 साल की उम्र मे ही अगर बच्चा गोद लेने के कानून पर भी बहुत ध्यान नए नियम देखे जाएँ तो इसपर संदेह खड़ा होता है और कई सवाल उठाए जा सकते हैं इससे बड़ा विरोधाभाष क्या होगा? यहाँ तक की आई पी सी की धारा 497 (विवाहेतर सम्बंध) में कहा गया है कि कोई भी विवाहित व्यक्ति अगर किसी विवाहित महिला से सम्बंध रखता है, तो महिला दोषी नहीं है, पुरुष को सजा होगी. इसी जगह शर्त है कि अगर वो पुरुष अविवाहित स्त्री से सम्बंध रखता है तो उस स्त्री के साथ साथ वो भी दोष मुक्त आखिर ऐसा क्यों? पुरुष ट वही है केवल सामने वाली महिला का विवाह होने ना होने से परिस्थिति में क्या बदल जाता है क़ि वो दोषी ही नहीं होगा?
पुराने और प्रचलन में नहीं रहे कानूनों को खत्म करने की मंजूरी के लिए केंद्र सरकार संसद में नया बिल लाने की तैयारी कर रही है। इस बीच विधि आयोग ने 72 पुराने कानूनों को खत्म करने की सिफारिश की है। आयोग का कहना है कि यह तत्काल सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि कानूनी ढांचा बदलते वक्त की चुनौतियों के हिसाब से हो। आयोग ने 1836 में अस्तित्व में आए बंगाल जिला एक्ट को खत्म करने की सिफारिश की है। इसके अलावा जिन कानूनों को समाप्त करने को आयोग ने कहा है, वे ज्यादातर 1838 से 1898 के बीच बनाए गए हैं। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को सौंपी अंतरिम रिपोर्ट में आयोग ने कहा है कि वह 261 अन्य कानूनों का भी अध्ययन कर रही है। आयोग यह जानने की कोशिश कर रही है कि ये कानून मौजूदा वक्त में अपनी प्रासंगिकता रखते हैं या नहीं। आयोग का कहना है कि वह अपना काम किश्तों में करेगा और सरकार को आवश्यक कार्रवाई के लिए अपनी रिपोर्ट वक्त पर सौंपती रहेगी। आयोग से रिपोर्ट मिलने के बाद कानून मंत्री ने कहा कि मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार अप्रचलित और बहुत पुराने कानूनों को खत्म करना चाहती है। पहले से ही 32 ऐसे कानूनों को खत्म करने संबंधी एक बिल संसद में लंबित है। संसद के अगले सत्र में सरकार पुराने कानूनों को खत्म करने संबंधी बिल का मुद्दा उठाएगी। इसमें कैबिनेट सचिव अजित सेठ, कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद और प्रधानमंत्री ने कुछ सराहनीय कदम उठाए हैं
इतिहास में संविधान के निर्माताओं ने जब अनुच्छेद 47 की रचना की तो महात्मा गाँधी के विचार मद्य निषेध (There will be no space for Alcoholism in India) राज्य का बहुत ख्याल रखा। लेकिन कभी भी काला बाजारी और राजस्व की कमी का बहाना देखर इसे लागू नहीं किया गया। इसके लिए मोरारजी देसाई ने कुछ असफल कोशिशें जरूर की थी। विधि आयोग तो इसपर कई बार अपनी रिपोर्टें पेश करता रहा है, लेकिन राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण कुछ भी संभव नहीं हो सका। यही कारण है कि आज Super Sonic युग में भी बैल गाड़ी के जमाने के कानूनों से न्याय देने का प्रयास किया जाता है। मैं यह नहीं कहता हूँ कि अंग्रेज़ों के बनाए हुए सारे के सारे कानून बेकार हैं। जैसे आईपीसी (Indian Penal Code)1860, सी.आर.पी.सी. (Civil Producer Code) जो पहले बनाया गया और 1973 में कुछ बदलाव ही किए गए, CPC जैसे कई कानून अंग्रेज़ों ने ही बनाए थे, लेकिन आज भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। इसके उपर मैने सोली सोराब का एक लेख इंडीयन् एक्सप्रेस में पढ़ा था। कुछ ऐसे कानून प्रक्रियाएं हैं जो कि आज की तारीख से मेल नहीं खाते। ये कानून कामकाज को सुगम बनाने के बजाय इसके रास्ते की अड़चन बनते हैं और ऐसी असमंजस की स्थिति पैदा करते हैं जिनसे बचा जा सकता है।
(इस लेख के लिए मैने इंडिया टुडे में दमयंती दत्ता की रिपोर्ट "कठघरे में कानून", सोली सोराब का इंडीयन् एक्सप्रेस में एक लेख, और कुछ कानून की किताबों को पढ़ा साथ-साथ गूगल से भी बहुत मदद मिली)

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...