Wednesday, October 21, 2015

उपवास (वैज्ञानिक परीक्षण)

दोस्तों आज दिनांक 21 अक्तूबर 2015 को  नवरात्रि का अंतिम दिन है. मैने भी यह सोँचकर उपवास रख लिया था क़ि जितने भी 2-4 दिन तक हो पाएगा, करूँगा अन्यथा ख़त्म कर दूँगा. लेकिन माँ दुर्गा ने अंदर से ऐसी शक्ति दी क़ि 13 अक्तूबर से शुरू हुआ उपवास अंतिम चरण तक आ गया. 5 दिन तक तो कुछ भी नहीं लगा, लेकिन उसके बाद एनर्जी में बेहद कमी आ गई, हालाँकि तबतक भूख लगनी कम हो गई थी. पूरा दिन ओफिस में आकर काम करता हूँ क्योंकि घर पर रहकर बर्दास्त करना बहुत मुस्किल होता है. दिन में काम करके थोडी सी थकान होती है तो रात को नींद भी आ जाती है, अन्यथा करवट बदलते बदलते ही रात काट देनी पड़ती है. आज रात को तो बहुत समस्या हुई लेकिन जैसे तैसे नींद आई और सुबह हुई. क्योंकि आज अंतिम दिन था इसलिए डॉक्टर के पास जाकर चेकअप करवाया. बीपी और शुगर तो नॉर्मल से बहुत कम है. होमोग्लोबिन तो नहीं चेक करवाया लेकिन देखकर अंदाज़ा लगाया जा सकता है. जो भी देखता है यही बोलता है क़ि 1-2 महीने से बीमार हो क्या? सच भी है अभी नवरात्रि के 10-12 दिन पहले गणपति फेस्टिवल में टायफायेट और मलेरिया से बाहर आया था तब भी ऐसा ही हो गया था. 
लेकिन इसबार जो भी हुआ ऐसे ही एक ज़िद में हुआ. घर पर किसी को नहीं बताया था जब पता चला तो सब बड़ा ही गुस्सा हुए. खैर माँ के आशीर्वाद से जो भी हुआ अच्छा ही हुआ. ज़्यादातर लोग कुछ ना कुछ मनोकामना लेकर व्रत करते हैं लेकिन मेरी ऐसी कोई भी माँग नहीं थी. केवा कहने के लिए नहीं दिल से कुछ भी नहीं माँगा था, बस यही सोचा था क़ि देश में शांति रहे मेरे अपने दोस्त, परिवार के लोग खुश रहे और रही बात मेरी तो बिना माँगे ही उपवास किया यह सोँचकर क़ि माँ दुर्गा अपने हिसाब से मेरी ज़रूरतें पूरी कर देंगी. 
वैसे उपवास को लेकर मेरा एक अलग नज़रिया है. भक्ति के हिसाब से कभी उपवास करना ही नहीं चाहिए. उपवास का एक सीधा सा अर्थ होता है जो क़ुरान में है क़ि हमें भूख का अहसास करना है, जबतक हम भूख का अहसास नहीं करेगें, तबतक खाने की और भूखे इंसान ई ज़रूरत कैसे समझ पाएँगे. भूख क्या है पता ही नहीं चलेगा? यही मतलब जैन धर्म के पर्यूषण पर्व के दौरान चलने वाले उपवास का भी होता है. मैने इतने दिन अपनी जेब में पर्स तक नहीं रखी एक भी पैसा लेकर नहीं आया क़ि ऐसा ना हो क़ि कहीं पैसे हों और कुछ खाने का मन हो जाए. खुद की क्षमता देखनी चाही थी क़ि मेरे अंदर कितनी क्षमता है. मैं कितना बर्दास्त कर सकता हूँ. मैं खुद को एक बड़े संघर्शकर्ता के रूप में देखता हूँ, और आगे चलकर अगर कभी ऐसी ज़रूरत पड़ी तो पीछे नहीं हटूँगा. मैं बिना किसी संसाधन के रह सकता हूँ, यह मैने जाना. मुझे देखना था क़ि मैं खुद को ग़रीबी या अकाल में भी रख सकता हूँ. मैने यह सीखा कि ज़िद या जुनून कैसा होता है? यह मेरी एक ज़िद ही थी मेरे उसूलों, मेरे संघर्ष, मेरे वादे, मेरे आगे बढ़ने की ज़िद, जिससे मैं समझौता नहीं कर सकता हूँ. 

Monday, October 19, 2015

आख़िर लेखक क्यों चिंतित हैं?

मैं आपको आज जर्मनी ले चलता हूँ। सबने ही हिटलर का नाम तो सुना ही होगा। जब तानाशाही की एक हद पार हो गई तो वहाँ की सिविल सोसाइटी ने आवाज़ उठाई, ख़ासकर लेखकों ने। जबकि अधिकतर पत्रकार और मीडिया तो हिटलर के साथ ही थे। लेकिन जब लेखकों ने आवाज़ उठाई तो एक क्रांति ने जन्म लिया। क्योंकि लेखक समाज का आईना होते हैं, हो सकता है क़ि ज़्यादातर लेखक सेकुलर होने के कारण समाजवादी पार्टी, कांग्रेस या लेफ्ट से कुछ जुड़ाव या नज़दीकियाँ रखते हों, लेकिन वो नज़दीकियाँ राजनैतिक नहीं कही जा सकती हैं, वो उनकी पसंद की राजनीतिक विचारधारा या उस विचारधारा के नेता के कारण हो सकता है। आज जो देश में हो रहा है, वो भी नाजीवादी सोंच और माहौलके विरोध में उठाया हुआ एक छोटा सा कदम हो सकता है। और यह कदम आगे चलकर इस घमंडी सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पर मजबूर कर देगा।
कर्नाटक में छह कन्नड़ साहित्यकारों ने तर्कवादी लेखक एमएम कलबुर्गी की हत्या के मामले में जांच की धीमी गति के खिलाफ अपने पुरस्कार कन्नड़ साहित्य परिषद को पिछले हफ्ते लौटा दिए। फिर अंग्रेजी की मशहूर लेखिका नयनतारा सहगल और हिंदी कवि अशोक वाजपेयी ने साहित्य अकादमी पुरस्कारों को लौटाने की घोषणा की। कलबुर्गी हत्या के विरोध में हिंदी साहित्य के एक और जाने-माने नाम उदय प्रकाश ने भी पिछले महीने ऐसा ही कदम उठाया था। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की भांजी सहगल ने हिंदू धर्म को खतरनाक रूप से विकृत करने तथा भारत को नष्ट करने के कथित प्रयासों का विरोध करने के लिए, तो वाजपेयी ने असहमति के अधिकार की रक्षा के लिए संघर्षरत लोगों से एकजुटता जताने के लिए यह कदम उठाया। ये सभी साहित्यकार महसूस करते हैं कि जिन उसूलों ने आधुनिक भारतीय राष्ट्र को स्वरूप दिया और जिनकी अभिव्यक्ति हमारे संविधान में हुई, वे आज खतरे में हैं। संभव है कि ऐसे अहसास के पीछे कारण इन लेखक-कवियों के अपने वैचारिक रुझान हों। इसके बावजूद वे व्यथित महसूस कर रहे हैं, तो यह समय उनसे संवाद स्थापित करने का है। साहित्यकार किसी समाज की उच्चतर चेतना के प्रतिनिधि होते हैं। उनसे अपेक्षा रहती है कि वे सामाजिक मूल्यों के पहरेदार की भूमिका निभाएं। अतः उनकी आलोचनाओं से सत्ता-तंत्र को खफा नहीं होना चाहिए। न ही उनकी बातों को नजरअंदाज करना चाहिए। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की फुुफेरी बहन होने के बावजूद नयनतारा सहगल ने 1975 में लगी इमरजेंसी की आलोचना की थी। तब अनेक दूसरे साहित्यकर्मियों ने भी जोखिम उठाते हुए तत्कालीन इंदिरा सरकार का विरोध किया था। आपातकाल विरोधी माहौल बनाने में उन सबका खास योगदान था। आज देश में इमरजेंसी नहीं है। लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं बदस्तूर जारी हैं। बोलने, शांतिपूर्ण ढंग से विरोध जताने और न्यायपालिका की पनाह लेने के तमाम अवसर उपलब्ध हैं। इसके बावजूद कुछ लेखक कुछ घटनाओं को अनिष्टकारी संकेत मान रहे हैं, तो यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार कहा है कि हमारा एकमात्र राष्ट्रीय ग्रंथ हमारा संविधान है। ऐसे में इस राष्ट्र के बुनियादी स्वरूप को लेकर वर्तमान सरकार और विचारकों के एक तबके में ऐसे मतभेद नहीं हो सकते, जिन्हें पाटना संभव नहीं हो। अतः संवाद की पहल की जानी चाहिए, ताकि वर्तमान कड़वाहट को यथाशीघ्र दूर किया जा सके। अब तक देश में 40 से अधिक लेखकों और साहित्यकारों ने अपने अपने पुरस्कार लौटा दिए हैं। क्या सबके सब राजनैतिक हो सकते हैं। कल मुनव्वर राणा ने लाइव टीवी शो के दौरान अपना पुरस्कार लौटा दिया। 
 मैं खुद एक बड़ा साहित्यकार या लेखक तो नहीं हूँ, जिसने कोई एवार्ड जीता हो लेकिन एक पुराना साहित्यप्रेमी तो रहा ही हूँ। लेकर नामवर, बिहारी, तुलसी और मुंशी प्रेमचंद से मिर्ज़ा ग़ालिब तक को पढ़ा है। आधुनिक लेखकों को किताबों, अख़बारों और पत्रिकाओं में पढ़ता रहा हूँ। पिछले एक- डेड साल से बड़ी ही सक्रियता के साथ ब्लॉगर भी रहा हूँ। हमेशा ही ज़मीन से जुड़ी हुई चीज़ों पर लिखता रहा हूँ। वैसे तो राजनीति पर ही लिखने का शौक है लेकिन साथ ही साथ महिला शशक्तिकरण, किसानों के मुद्दे, ग़रीबी, पिछड़ापन और आरक्षण इसके बाद ख़ासकर सेकूलरिज़्म और बहुसंख्यकवाद के खिलाफ लिखता रहा हूँ। और हमेशा ही वही लिखा है जो देश या समाज में महसूस कर रहा हूँ। पिछले एक साल और उसमें भी ख़ासकर 3-4 महीने से मैने काफ़ी हद तक ब्लॉग लिखने बंद भी कर दिए हैं। उसका सीधा सा कारण है देश में बनाया जा रहा असुरक्षित माहौल।  माहौल क्या बनाया जा रहा है पहले पंसारे और कालबर्गी की हत्या, फिर ना जाने कितने सेकुलर विचारकों पर हमले, बैन की राजनीति, गोडसे के जन्मदिन को महानता के दिन में बताना, दादरी, अखलाख़ और ना जाने क्या क्या गिनाया जाए आपको?

Saturday, October 17, 2015

राजनीति बदलने को मजबूर हुए नेता

बिहार विधान सभा के चुनाव इसबार सबसे नाटकीय रहे हैं। सबसे पहले बड़ी बड़ी रैलियों के साथ शुरुआत फिर विकास के नाम पर दोनो तरस से बड़े बड़े भाषण इसके बाद मुद्दे से हटकर किस तरह से बीफ, शैतान, दानव और ब्रम्‍हपिशाच जैसे मुद्दों पर राजनीति निकल गई। यही कारण है क़ि यहाँ के हर एक ओपीनीयन पोल में तस्वीर बदलती आई है। कुछ ठप्पा लगे  हुए चैनलों को छोड़ दिया जाए तो सबने काँटे की ही टक्कर बताई है। यह बात सही भी है कि इस बार के चुनाव में बड़े बड़े राजनैतिक पंडित मुँह की खाने वाले हैं। सबकी अपनी अपनी सोंच और गणित हो सकती है लेकिन बात यह भी है क़ि राजनीति कभी किसी एक स्थिति पर नहीं टिकती है। ख़ासकर बिहार जैसे प्रदेश में. यहाँ साक्षरता की दर भले ही कम हो, पढ़े लिखे लोग भले ही कम हों, लेकिन राजनैतिक रूप से बहुत समझदार लोग हैं।यही कारण है क़ि जब पूरा देश सांप्रदायिकता में जलने लगा है तब भी बिहार में शांति रही है। 

अब मैं आता हूँ यहाँ की राजनीति पर। देश के दूसरे सर्वाधिक आबादी वाले राज्य में जैसे-जैसे राजनीतिक संग्राम अपने नतीजे के ओर बढ़ रहा है वैसे-वैसे ही 38 वर्ष पुराना जेपी आंदोलन जिसे आमतौर पर बिहार आंदोलन के नाम से जाना जाता है, फिर से सुर्खियों में आ रहा है. जयप्रकाश नारायण (जेपी) एक क्रांतिकारी समाजवादी नेता थे, जिन्होंने 1977 में कांग्रेस के खिलाफ एक बड़े आंदोलन का नेतृत्व किया था. 1977 में आपातकाल के बाद हुए आम चुनाव में पहली बार कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी थी और इसका श्रेय जेपी को ही जाता है.
1977 के चुनाव के बाद जनता पार्टी (कांग्रेस विरोधी पार्टी) ने दिल्ली की बागडोर संभाली, लेकिन दो जनता पार्टी केवल दो साल ही सत्ता पर टिक पाई. 1977 में कुल 324 सीटों में से जनता पार्टी ने 214 सीटों पर जीत हासिल किया था.
1980 के दशक तक जनता पार्टी, बिहार में भी कमज़ोर पड़ती नज़र आई. इस समय तक बिहार में कई दूसरे गुट और दल उभर कर सामने आए. मौजूदा तारीख में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और जनता दल (यूनाइटेड) बिहार के दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियां हैं. यह दोनों पार्टियां जनता गठबंधन से अलग हुई गुटों द्वारा बनाई गई थीं एवं 1990 में बिहार की महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों के रुप में उभरी. इस साल तक दोनों पार्टियां को जाति वोट बैंक एवं एक-दूसरे के विपक्षी के रुप में जाना जाता था. इस वर्ष बिहार में हो रहे विधानसभा चुनाव में दोनों ही पार्टियां कांग्रेस के साथ सहयोगी हैं. इसे विडंबना ही कहा जा सकता है क्योंकि 1970 के दशक में कांग्रेस के 'शासक' शासन के विरोध के रुप में ही जनता पार्टी उभरा था.

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में कुछ बड़े गठबंधन देखने को मिले हैं- जद (यू), राजद और कांग्रेस के एक महागठबंधन. तीन पार्टियों का महागठबंधन बिहार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा), राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) और हिंदुस्तान अवाम मोर्चा (सेक्युलर) सहित राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के विरुद्ध चुनाव में खड़े हैं. अन्य समूह में हैं समाजवादी धर्मनिरपेक्ष मोर्चा जिसमें समाजवादी पार्टी (सपा), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) और जन अधिकार पार्टी (JAP) शामिल हैं, एवं लेफ्ट अलायंस जिसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा), मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा), भाकपा (माले), भारत की सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर (एसयूसीआई) (कम्युनिस्ट), ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक (एफबी) और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) शामिल हैं.
लोकसभा- सदस्य के मामले में बिहार चौथे स्थान पर है. 80 सदस्यों के साथ उत्तर प्रदेश पहले, 48 की संख्या के साथ महाराष्ट्र दूसरे एवं 43 सदस्यों के साथ पश्चिम बंगाल तीसरे स्थान पर है. लोकसभा सदस्यों की संख्या के कारण भी बिहार को राष्ट्रीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण समझा जाता है.

जनता पार्टी से टूट कर बनी हुई दूसरी पार्टियां, नए दल और नए गठबंधन बना रही हैं. राष्ट्रीय एवं राज्य चुनावों में प्रदर्शन के आधार पर उनकी स्थिति राष्ट्रीय या राज्य पक्षों के बीच बदलती रहती है. जद (यू) और राजद का अधिक तीव्रता से बिहार में सीट केंद्रित करने का एक मुख्य कारण वर्ष 2000 में बिहार और झारखंड का अलग होना है. 
अगर बात अब BJP की जाए तो बिहार की राजनीति जिस तरह करवट ले रही है ऐसे में सुशील मोदी के लिए मुख्यमंत्री बनना मुश्किल ही है। सुशील मोदी को शाहनवाज हुसैन और नंदकिशोर यादव नेतृत्व के मामले में कड़ी टक्कर दे रहे हैं. शाहनवाज हुसैन ने भी इस मामले पर दो टूक कह दिया है कि भला किसे नेता बनना अच्छा नहीं लगता है? नंदकिशोर यादव बीजेपी में एकलौते यादव जाति के बड़े नेता हैं. उनकी छवि सुशील मोदी की तरह नीतीश के वफादर की नहीं है.. यादवों का बिहार की राजनीति में अच्छा-खासा प्रभाव है। नीतीश सरकार में नंदकिशोर यादव को बढ़िया काम करने वाले मंत्री का खिताब भी मिल चुका है। ऐसे में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी नंदकिशोर यादव को आजमा सकती है.. नंदकिशोर यादव बिहार बीजेपी को लीड करने के मामले में सुशील कुमार मोदी को कड़ी टक्कर दे रहे हैं.. दरअसल, नंदकिशोर यादव बिहार में उस जाति से ताल्लुक रखते हैं जो पिछड़ी जातियों में सबसे दबंग और सबसे ज्यादा मतदाता संख्या वाली है.. बिहार में यादवों का 21 फीसदी वोट है।

Friday, October 2, 2015

इंसान से बड़ी जानवर की जान

बीफ खाने की आशंका पर एक बुजुर्ग की हत्या कर दी जाती है और हम अपने आपको लोकतांत्र कहते हैं, शर्मनाक है! यूपी के दादरी में गोमांस खाने की आशंका के चलते एक बुजुर्ग की पीट पीट कर हत्या कर दी गई जब की उसका बेटा जख्मी है. मृतक की बेटी का कहना है कि फ्रीज से मिला मांस अगर बीफ नहीं निकला तो क्या उसके कतल कर दिए गए पिता लोटाए जाएंगे. गंगा जमुनी तहजीब की कसमें खाने वाले मुलक में मजहबी लकीर खींच कर लोगों को मोत के घाट उतारा जा रहा है.
मेक इन इंडिया हो या डिजिटल इंडिया इस विकास का फायदा तब है जब हम पहले इंसानी जान सिखे और मिल कर रहे...फेसबुक पर जो गाय की फोटो डालकर देश में गाय की घटती आबादी को लेकर ढेर सारा घडियाली आंसू बहाते हैं और मुसलमानो को इसके लिए दोषी ठहराते हैं और जरा सी अफवाह पर कानून को अपने हाथ में लेकर एक मुसलमान को मौत के घाट उतार देते हैं. ऐसी पोस्ट और अफवाह सुनकर एक इंसान को मौत देने वालों से मैं पूछना चाहता हूँ की जब सड़क पर आवारा, छूटे हुए गाय या बैल दिख जाते हैं तो वो क्या करते है, उन्हे अपने घर ले जाकर पालते है...दंगाइयों के लिए गाय आस्था की खाल में छुपाया हुआ एक घातक हथियार है. रांची से लेकर दिल्ली तक यह घातक हथियार लेकर लोग सड़कों पर उतर रहे हैं. वे किसी की भी हत्या कर सकते हैं. गाय एक अदृश्य हथियार है जो बंदूक, कटार, कट्टे, चाकू, चापड़ में छुपा है. गाय के बहाने नरपिशाचों की टोली किसी का भी कत्ल कर सकती है. कश्मीर में गोमांस पार्टी का आयोजन करने की घोषणा करने वाले भक्त को मारने कोई नहीं पहुंचा. क्योंकि वह अपने खेमे का था. जैन मंदिरों के सामने बूचड़खाना खोलकर मुर्गा हलाल करने वालों को किसी ने कुछ नहीं कहा. गाय सिर्फ उनको निपटाने का एक घिनौना हथियार है जिन्हें हम नापसंद करते हैं. भक्तों को आदमी का मांस खाने वालों से कोई दिक्कत नहीं है. आस्थाएं इतनी क्रूर हैं कि वहशियों के लिए अपने भीतर के वहशीपन को हवा दे रही हैं. कुछ लोग गायें पालते हैं, उन्हें प्यार करते हैं, उनका दूध खाते हैं, कुछ लोग गाय की आड़ में धर्म के भीतर भरी घृणा पालते हैं. मेरे घर में भी गायें थीं. मेरे गांव में हिंदू मुसलमान सबके घर में गायें थीं. वहां गाय या बकरी कोई मसला नहीं था. जो गायें नहीं पालते, गाय उनके लिए अस्मिता का सवाल है जिसके लिए पूरे हिंदुस्तान को आग की लपटों में झोंक सकते हैं.
समाजवादी पार्टी सरकार की तारीफ करते करते आज सब्र जवाब दे रहा है. माना की कोई भी सरकार खुद दंगे नहीं करवा सकती कभी, लेकिन इस तरह के हालात के बाद सख्त कार्रवाई तो करना ही चाहिए. अगर आपसे ये भी नहीं होता, तो आने वाले चुनाव मे इसका परिणाम आप खुद देखेंगे.

जो लोग गाय के लिए हो-हल्ला मचाते हैं उन्हें उन दसियों हज़ार गायों की पीड़ा से कोई मतलब नहीं है जो सही देखभाल न मिलने के कारण सड़कों पर दम तोड़ रही हैं. जब गायें बूढ़ी हो जाती हैं या किसी और वजह से दूध देने लायक नहीं रहती तो उन्हें घर से बाहर खदेड़ दिया जाता है, दर-दर भटकने के लिए. भारतीय सड़कों पर गायें दिखना आम बात है. मैंने सड़कों के किनारों गायों को गंदगी खाते हुए देखा है. मैंने इतनी बीमार गायें देखी हैं कि उनकी हड्डियां खाल से बाहर निकलती दिखाई देती हैं. क्या गायों को भुखमरी के लिए मजबूर करना गोहत्या के बराबर नहीं है. लेकिन किसी को इसकी परवाह नहीं है. मुझे ये कहते हुए दुख हो रहा है कि ऐसे प्रतिबंध आजकल राजनीतिक कारणों से ज़्यादा लगाए जाते हैं. उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र में पहले से ही महाराष्ट्र पशु परिरक्षण अधिनियम 1976 था जिसके तहत गोहत्या प्रतिबंधित थी (इसमें बछिया और बछड़ा भी पहले से ही शामिल थे) लेकिन इसके तहत प्रमाण पत्र लेने के बाद बैलों और भैंसों के वध की अनुमति थी.
दुनियाभर के देशों में गाय का मांस खाया जाता है. लेकिन अब 2 मार्च 2015 के बाद से जो नया क़ानून प्रभावी है उसके तहत बीफ़ की बिक्री और निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है जिसकी वजह से बहुत से लोगों को नौकरी गंवानी पड़ी है. ऐसे भी लोग हैं जो कहते हैं कि गोहत्या मानवहत्या के बराबर है. मैं इसे एक बेवकूफ़ी भरा तर्क मानता हूँ. कोई एक जानवर की तुलना एक इंसान से कैसे कर सकता है. ऐसे प्रतिबंधों के पीछे वोट बैंक की राजनीति करने वाले प्रतिक्रियावादी दक्षिणपंथी तत्व हैं. हम समझ नहीं रहे हैं। हम समझा नहीं पा रहे हैं। देश के गांवों में चिंगारी फैल चुकी है। इतिहास की अधकचरी समझ लिये नौजवान मेरे साथ सेल्फी तो खींचा ले रहे हैं लेकिन मेरी इतनी सी बात मानने के लिए तैयार नहीं है कि वो हिंसक विचारों को छोड़ दें। हमारी राजनीति मौकापरस्तों और बुज़दिलों की जमात है।
वैसे एक खूनी खेल सोशल मीडिया में भी चलता है... भूमिकाएं ऐसी ही होती हैं... कोई छिप कर, कोई खुल कर हमले करता है आवाज़ दबाने के लिए। जानते हैं आप। कहने की भी ज़रूरत नहीं।

पूछिए न खुद से कौन हैं आप इनमें से?

अब भी इंसान पाते हैं खुद को?

Friday, September 18, 2015

गणेश चतुर्थी विशेष

मुंबई में एक उत्तरभारतीय प्रवासी होने के नाते पहले पहले तो गणेश चतुर्थी मेरे लिए एक छोटे से फेस्टिवल के रूप में था, लेकिन जब 5 साल यहाँ निकाल लिए तो मराठी समाज के जैसा ही हर्षोल्लास रहने लगा. हर साल सिद्धिविनायक मंदिर, और लाल बाग गणपति बप्पा के दर्शन के लिए जाता हूँ. पिछले साल भी गणपति बप्पा के इतिहास पर लिखने के लिए बहुत पढ़ा, और रिसर्च किया था. बहुत जगह के गणपति पंडालों में गया था. इसबार भी वो सिलसिला जारी है, और इस त्यौहार के कुछ अनकहे तथ्यों को बताने का प्रयास करूँगा. 
एक वक्त गणेश चतुर्थी एक दिन का पर्व हुआ करता था लेकिन अब 11 दिन तक चलने वाले गणेशोत्सव की रौनक अब सिर्फ महाराष्ट्र तक ही सीमित नही रह गई है। आंध्र प्रदेश समेत देश भर में इसे मनाया जाने लगा है, महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में अंग्रेज़ों के खिलाफ हिन्दुओ को एकजुट करने के लिए गणेश के इस पर्व को यह रूप दिया था। अंग्रेज तो चले गये लेकिन यह पर्व एक उत्सव के तौर पर लोगो के जहन में समा गया, मुम्बई में जीवन 11 दिन तक गणेशमय रहता है। लोग इसके रंग और रौनक में विलीन हो जाते हैं, ख़ासकर वो तबका जो रोजमर्रा की परेशानियो से दबा रहता है।
गणेश की मूर्ति खरीद कर स्थापित करना और फिर इसका विसर्जन, यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। बाजार में गणेश की सुन्दर छोटी-बड़ी प्रतिमाऐं, ज्यादातर प्लास्टर ऑफ पैरिस (pop)से बनी हुई मिल रही है। इनमें  आभूषण प्लासटिक से बने हुए और पेन्ट से रंगे होते है जिनमें घातक केमिकल्स मिले होते है। मूर्तियों की चमक और सुन्दरता इस कदर लुभावनी होती है कि उनका बाजार लगातार बढ़ता जा रहा है। विघ्नहर्ता को घर ला कर मनुष्य अपनी परेशानियो का अंत करने की कोशिश में लग जाता है लेकिन इस रौनक में पर्यावरण की खासी अनदेखी हो रही है।
हमारे देश में नदियों का खासा महत्व है, गंगा जैसी नदियों को मां माना जाता है लेकिन विसर्जन की वजह से इन्हें काफी नुकसान हो रहा है। ग्लोबल वार्मिग के खतरों के बीच बड़ी मात्रा में मिट्टी की जगह प्लास्टर ऑफ पैरिस, कैमिकल्स, धातू से बनी मूर्तियां पानी में जहर सा घोल देती है। National green tribunal ने भी यमुना में पीओपी से बनी मूर्तियों के विसर्जन पर रोक लगा दी है लेकिन क्या बिना सख्ती के इस पर अमल हो पाएगा। सरकार क्यों सख्त कानून बनाने से बचती हैं? पूजा की शुद्धता और पर्यावरण को सहेजने के लिए क्या आम नागरिक भी बाध्य नही है?
हमारा धर्म एक सतत चलने वाले जीवन्त प्रवाह की तरह है जो सदियों से बदलाव को अपने अंदर समाहिता किए जा रहा है। दुर्गापूजा, नवरात्री, कावड़ियों से हमारे त्यौहारों की रौनक हमेशा बनी रहे लेकिन क्या हम अपने नज़रिये में बदलाव ला कर विसर्जन की परम्परा में कुछ सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं?

राजनयिकों के लिए महिलाओं की बलि

हमारे देश में नेपाल की दो औरतें जिनके साथ बेहिसाब नाइंसाफी हुई है, जो दो देशों के बीच संबंधों की बेड़ियों में बंधी हैं। उन दो औरतों पर जो बीती है, जो कुछ उनके बीच चल रहा होगा वो निश्चित रूप से मुल्कों के बीच नहीं चल रहा होगा। उनको इंसाफ की उम्मीद थी  है लेकिन भारतीय सरकार सउदी अरब से अपने संबंधों की चिंता में है।
गुड़गांव की इस सोसायटी का नाम है एंबिएंश कैत्रियोना। इस हाउसिंस सोसायटी को सेवेन स्टार का दर्जा हासिल है। इसके टावर के फ्लैट नंबर 502 में आरोप है कि दो नेपाली ओरतों के साथ सामूहिक बलात्कार और शोषण की घटना होती है। अप्रैल के महीने में नेपाल में आए भूकंप के बाद वहां से दो औरतें एक एजेंट के ज़रिये सऊदी अरब के दूतावास में प्रथम सचिव के रूप में कार्यरत राजनियक के घर पहुंचती हैं। एक बेहतर ज़िंदगी की तलाश में इनका सपना भारत में काम करने के बाद सऊदी अरब भी जाना था। राजनयिक के घर में दो तीन महीनों के दौरान इनके साथ बडा ही घिनौना काम हुआ। इनका आरोप है कि इन्हें भूखा रखा गया। बुखार और बीमार होने के बाद भी काम कराया गया। इनके साथ बलात्कार हुआ और राजनयिक के साथ साथ कथित रूप से उनके दोस्त भी इस करतूत में शामिल रहे। एक दिन में सात आठ लोगों ने बलात्कार किये हैं। दो दो बार मेडिकल जांच में यही बात आई है कि शरीर के अलग अलग हिस्सों में चोट के निशान हैं और बलात्कार हुआ है। किसी तरह ये दोनों जान बचाकर भागने में सफल रही। इनके साथ जो अब हो रहा है उस पर तो किसी विएना कंवेशन का बस चल रहा है किसी कानून का। इनका जो परिवार और समाज है वो हर तरह के कंवेंशन से आज़ाद है। उसे भी वैसी ही छूट हासिल है जैसी राजनयिक को।
दोनों में एक 50 साल की महिला है। नेपाल में इनका कोई नहीं है। सिर्फ एक बेटी है जिसकी शादी हो चुकी है। 50 साल की पीड़िता नेपाल जाना चाहती हैं। दूसरी पीड़िता तीस साल की हैं। इनकी एक चार साल की बेटी है और दो साल का बेटा है। 
अब आते हैं दो मुल्कों के संबंधों पर। वियना कंवेंशन के अनुसार राजनयिको पर स्थानीय कानून लागू नहीं होते हैं। पराये मुल्क में उन पर तभी मामला चलता है जब उनके मायके से इस संरक्षण को हटा लिया जाता है। आप जानते हैं कि भारत और सऊदी अरब के बीच दोस्ताना संबंध हैं। सऊदी अरब में तीस लाख भारतीय काम करते हैं।
इसलिए इतना आसान नहीं है कि भारत झट से कोई कार्रवाई कर दे। उल्टा सऊदी अरब दूतावास ने पहले कहा कि हमारा राजनयिक निर्दोष है। फिर भी भारत ने कहा कि हरियाणा पुलिस को जांच में सहयोग करे। मेडिकल रिपोर्ट में यातना और बलात्कार की पुष्टि होने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि भारत सऊदी अरब से कहेगा कि राजनयिक संरक्षण हटाये और और भारतीय कानून का सामना करने के लिए कहे। दोनों ही औरतों ने आरोप लगाया है कि राजनयिक के अलावा उसके दोस्त भी उनके साथ बलात्कार करते थे। अलग अलग कमरों में ले जाकर यातना देते थे। सवाल उठा कि मुख्य आरोपी अगर राजनयिक है तो क्या इसके बहाने उन लोगों को भी छूट मिल रही है जो इस अपराध में शामिल थे। वे कौन लोग हैं। इसकी कोई सार्वजनिक जानकारी नहीं है।
बुधवार को खबर आई कि सऊदी अरब ने अपने इस राजनयिक को वापस बुला लिया है। हरियाणा पुलिस के पास केस तो है लेकिन मुख्य आरोपी नहीं है। हम अपने मेहमानों से पूछेंगे कि इन औरतों को इंसाफ कैसे मिलेगा। भारत में अपराध हुआ, मुख्य आरोपी सऊदी अरब चला गया, औरतों नेपाल की हैं। क्या भारत को राजनयिक मर्यादाओं के तहत कुछ और सख्त कार्रवाई नहीं करनी चाहिए थी। मसलन उसे निकाला जा सकता था जिससे कड़ा संदेश जा सकता था। उसे पर्सोनो नान ग्राटा घोषित किया जा सकता था, क्योंकि वियना कंवेंशन के मुताबिक भारत अगर यह घोषित करता तो सऊदी को मजबूर होना पड़ता वापस बुलाने के लिए।
इतिहास में कई देशों ने भी अपने राजनयिकों से संरक्षण हटाए हैं लेकिन सऊदी अरब ने हमेशा ही अपने राजनयिकों का बचाव किया है। जबकि उसके राजनयिकों के ख़िलाफ गंभीर आरोपों के मामले सामने आते रहे हैं। अमरीका और इंग्लैंड में भी औरतों को दासी बनाकर रखने के आरोप लगे हैं। 2004 में इंग्लैंड में सऊदी अधिकारी पर 11 साल की एक लड़की को प्रताड़ित करने का आरोप लगा मगर कुछ नहीं हुआ। भारत सऊदी अरब सरकार को जवाबदेही के लिए बाध्य करे। भारत की ज़िम्मेदारी ज़्यादा बनती है क्योंकि नेपाल उसके भरोसे का साथी है।

2013 का साल याद कीजिए। न्यूयार्क में भारतीय विदेश सेवा की अधिकारी देव्यानी खोब्रागडे की एक मामले में पूछताछ होती है और सर्च किया जाता है, गिरफ्तार होती हैं। अमरीका कहता है कि उन्हें राजनयिक संरक्षण हासिल नहीं था इसलिए ऐसा किया गया क्योंकि वे दूतावास में नहीं काउंसलेट में तैनात थीं। देवयानी ने कहा था कि उनके साथ अपराधियों जैसा सलूक किया गया। बस क्या सरकार क्या विपक्ष सब अपमान से बदला लो राजनीतिक उद्योग में बदल गए थे।
सबको देवयानी खोब्रागढे के ज़रिये भारतीय राष्ट्र के पुरुषार्थ को चमकाने का मौका मिल गया। दिल्ली में अमरीकन सेंटर से कहा गया कि बिना लाइसेंस के फिल्म नहीं दिखा सकते हैं। अमरीकी दूतावास से बाहर से शराब मंगाने की अनुमति वापस ले ली गई। बीजेपी नेता और पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने कहा कि भारत को भी इसका बदला लेना चाहिए जितने भी समलैंगिग राजनियक हैं उन सबको जेल में डाल देना चाहिए।
तब के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने अमरीकी राजदूत को बुलाकार अपना विरोध जताया कि ये तो अपमान हुआ है। तब गुजरात से नरेंद्र मोदी ने भी ट्वीट कर दिया कि वे भी अपने देश के साथ खड़े हैं और हमारी महिला राजनयिक के साथ जो अपमान हुआ है उसके विरोध में अमरीकी प्रतिनिधिमंडल से मिलने से इंकार कर दिया है। वैसे अब भारतीय विदेश मंत्रालय ने यहां की अदालत से कहा है कि उन्हें देवयानी खोब्रागडे की निष्ठा पर संदेह है। 2013 से 2015 गया है। औरत तो तब भी थी, औरत ही अब भी है। फर्क सिर्फ इतना है कि चुनाव नहीं है। मगर आरोप तो लग ही रहे हैं कि भारत सरकार ने सऊदी अरब के राजनयिक को जाने कैसे दे दिया।
वियना कंवेंशन के अनुसार राजनयिको पर स्थानीय कानून लागू नहीं होते हैं। ऐसा होने पर 2013 में हमारे देश में देवयानी खोब्रागडे के लिए अमेरिका के खिलाफ एक लहर दौड गई थी। संसद में मुलायम सिंह यादव से लेकर सुषमा स्वराज तक ने खूब भाषण दिये थे। मोदी जी के बडे ट्वीट आए थे।
नेपाल की दो महिलाओं के साथ सऊदी अरब के राजनयिक ने गुडगांव स्थित अपने घर में महीनों तक बलात्कार और शोषण किया। अब मामला बडा ही जटिल है क्योंकि इसी वियना कंवेंशन के अनुसार सऊदी अरब अपने बलात्कारी डिप्लोमैट को बचा रहा है क्या प्रधानमंत्री नेपाल से देश के और स्वयं के घनिष्ठ संबंध भूल गए जो अपराधी को चोर की तरह भगा दिया। ऊपर से थोडी बहुत कार्यवाही करने वाली पुलिस को फटकार लगाई और सऊदी अरब से संबंधों का हवाला देकर जानकारी छुपाने को कहा। 
अब देखना यह होगा कि क्या सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी जी (हिन्दू ह्रदय सम्राट) हमारे पडोसी (हिंदू)राष्ट्र की दो (हिंदू) महिलाओं को न्याय दिलाने की कोशिश करेंगे
वैसे अगर यही किसी और सरकार में होता तो शायद अब तक सेकुलर कुत्ते, मुल्ला और ना जाने क्या क्या बातें सोसल मीडिया में फैलाई जाती।



राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

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