बिहार विधान सभा के चुनाव इसबार सबसे नाटकीय रहे हैं। सबसे पहले बड़ी बड़ी रैलियों के साथ शुरुआत फिर विकास के नाम पर दोनो तरस से बड़े बड़े भाषण इसके बाद मुद्दे से हटकर किस तरह से बीफ, शैतान, दानव और ब्रम्हपिशाच जैसे मुद्दों पर राजनीति निकल गई। यही कारण है क़ि यहाँ के हर एक ओपीनीयन पोल में तस्वीर बदलती आई है। कुछ ठप्पा लगे हुए चैनलों को छोड़ दिया जाए तो सबने काँटे की ही टक्कर बताई है। यह बात सही भी है कि इस बार के चुनाव में बड़े बड़े राजनैतिक पंडित मुँह की खाने वाले हैं। सबकी अपनी अपनी सोंच और गणित हो सकती है लेकिन बात यह भी है क़ि राजनीति कभी किसी एक स्थिति पर नहीं टिकती है। ख़ासकर बिहार जैसे प्रदेश में. यहाँ साक्षरता की दर भले ही कम हो, पढ़े लिखे लोग भले ही कम हों, लेकिन राजनैतिक रूप से बहुत समझदार लोग हैं।यही कारण है क़ि जब पूरा देश सांप्रदायिकता में जलने लगा है तब भी बिहार में शांति रही है।
अब मैं आता हूँ यहाँ की राजनीति पर। देश के दूसरे सर्वाधिक आबादी वाले राज्य में जैसे-जैसे राजनीतिक संग्राम अपने नतीजे के ओर बढ़ रहा है वैसे-वैसे ही 38 वर्ष पुराना जेपी आंदोलन जिसे आमतौर पर बिहार आंदोलन के नाम से जाना जाता है, फिर से सुर्खियों में आ रहा है. जयप्रकाश नारायण (जेपी) एक क्रांतिकारी समाजवादी नेता थे, जिन्होंने 1977 में कांग्रेस के खिलाफ एक बड़े आंदोलन का नेतृत्व किया था. 1977 में आपातकाल के बाद हुए आम चुनाव में पहली बार कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी थी और इसका श्रेय जेपी को ही जाता है.
1977 के चुनाव के बाद जनता पार्टी (कांग्रेस विरोधी पार्टी) ने दिल्ली की बागडोर संभाली, लेकिन दो जनता पार्टी केवल दो साल ही सत्ता पर टिक पाई. 1977 में कुल 324 सीटों में से जनता पार्टी ने 214 सीटों पर जीत हासिल किया था.
1980 के दशक तक जनता पार्टी, बिहार में भी कमज़ोर पड़ती नज़र आई. इस समय तक बिहार में कई दूसरे गुट और दल उभर कर सामने आए. मौजूदा तारीख में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और जनता दल (यूनाइटेड) बिहार के दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियां हैं. यह दोनों पार्टियां जनता गठबंधन से अलग हुई गुटों द्वारा बनाई गई थीं एवं 1990 में बिहार की महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों के रुप में उभरी. इस साल तक दोनों पार्टियां को जाति वोट बैंक एवं एक-दूसरे के विपक्षी के रुप में जाना जाता था. इस वर्ष बिहार में हो रहे विधानसभा चुनाव में दोनों ही पार्टियां कांग्रेस के साथ सहयोगी हैं. इसे विडंबना ही कहा जा सकता है क्योंकि 1970 के दशक में कांग्रेस के 'शासक' शासन के विरोध के रुप में ही जनता पार्टी उभरा था.
2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में कुछ बड़े गठबंधन देखने को मिले हैं- जद (यू), राजद और कांग्रेस के एक महागठबंधन. तीन पार्टियों का महागठबंधन बिहार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा), राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) और हिंदुस्तान अवाम मोर्चा (सेक्युलर) सहित राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के विरुद्ध चुनाव में खड़े हैं. अन्य समूह में हैं समाजवादी धर्मनिरपेक्ष मोर्चा जिसमें समाजवादी पार्टी (सपा), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) और जन अधिकार पार्टी (JAP) शामिल हैं, एवं लेफ्ट अलायंस जिसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा), मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा), भाकपा (माले), भारत की सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर (एसयूसीआई) (कम्युनिस्ट), ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक (एफबी) और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) शामिल हैं.
लोकसभा- सदस्य के मामले में बिहार चौथे स्थान पर है. 80 सदस्यों के साथ उत्तर प्रदेश पहले, 48 की संख्या के साथ महाराष्ट्र दूसरे एवं 43 सदस्यों के साथ पश्चिम बंगाल तीसरे स्थान पर है. लोकसभा सदस्यों की संख्या के कारण भी बिहार को राष्ट्रीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण समझा जाता है.
जनता पार्टी से टूट कर बनी हुई दूसरी पार्टियां, नए दल और नए गठबंधन बना रही हैं. राष्ट्रीय एवं राज्य चुनावों में प्रदर्शन के आधार पर उनकी स्थिति राष्ट्रीय या राज्य पक्षों के बीच बदलती रहती है. जद (यू) और राजद का अधिक तीव्रता से बिहार में सीट केंद्रित करने का एक मुख्य कारण वर्ष 2000 में बिहार और झारखंड का अलग होना है.
अगर बात अब BJP की जाए तो बिहार की राजनीति जिस तरह करवट ले रही है ऐसे में सुशील मोदी के लिए मुख्यमंत्री बनना मुश्किल ही है। सुशील मोदी को शाहनवाज हुसैन और नंदकिशोर यादव नेतृत्व के मामले में कड़ी टक्कर दे रहे हैं. शाहनवाज हुसैन ने भी इस मामले पर दो टूक कह दिया है कि भला किसे नेता बनना अच्छा नहीं लगता है? नंदकिशोर यादव बीजेपी में एकलौते यादव जाति के बड़े नेता हैं. उनकी छवि सुशील मोदी की तरह नीतीश के वफादर की नहीं है.. यादवों का बिहार की राजनीति में अच्छा-खासा प्रभाव है। नीतीश सरकार में नंदकिशोर यादव को बढ़िया काम करने वाले मंत्री का खिताब भी मिल चुका है। ऐसे में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी नंदकिशोर यादव को आजमा सकती है.. नंदकिशोर यादव बिहार बीजेपी को लीड करने के मामले में सुशील कुमार मोदी को कड़ी टक्कर दे रहे हैं.. दरअसल, नंदकिशोर यादव बिहार में उस जाति से ताल्लुक रखते हैं जो पिछड़ी जातियों में सबसे दबंग और सबसे ज्यादा मतदाता संख्या वाली है.. बिहार में यादवों का 21 फीसदी वोट है।
अब मैं आता हूँ यहाँ की राजनीति पर। देश के दूसरे सर्वाधिक आबादी वाले राज्य में जैसे-जैसे राजनीतिक संग्राम अपने नतीजे के ओर बढ़ रहा है वैसे-वैसे ही 38 वर्ष पुराना जेपी आंदोलन जिसे आमतौर पर बिहार आंदोलन के नाम से जाना जाता है, फिर से सुर्खियों में आ रहा है. जयप्रकाश नारायण (जेपी) एक क्रांतिकारी समाजवादी नेता थे, जिन्होंने 1977 में कांग्रेस के खिलाफ एक बड़े आंदोलन का नेतृत्व किया था. 1977 में आपातकाल के बाद हुए आम चुनाव में पहली बार कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी थी और इसका श्रेय जेपी को ही जाता है.
1977 के चुनाव के बाद जनता पार्टी (कांग्रेस विरोधी पार्टी) ने दिल्ली की बागडोर संभाली, लेकिन दो जनता पार्टी केवल दो साल ही सत्ता पर टिक पाई. 1977 में कुल 324 सीटों में से जनता पार्टी ने 214 सीटों पर जीत हासिल किया था.
1980 के दशक तक जनता पार्टी, बिहार में भी कमज़ोर पड़ती नज़र आई. इस समय तक बिहार में कई दूसरे गुट और दल उभर कर सामने आए. मौजूदा तारीख में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और जनता दल (यूनाइटेड) बिहार के दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियां हैं. यह दोनों पार्टियां जनता गठबंधन से अलग हुई गुटों द्वारा बनाई गई थीं एवं 1990 में बिहार की महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों के रुप में उभरी. इस साल तक दोनों पार्टियां को जाति वोट बैंक एवं एक-दूसरे के विपक्षी के रुप में जाना जाता था. इस वर्ष बिहार में हो रहे विधानसभा चुनाव में दोनों ही पार्टियां कांग्रेस के साथ सहयोगी हैं. इसे विडंबना ही कहा जा सकता है क्योंकि 1970 के दशक में कांग्रेस के 'शासक' शासन के विरोध के रुप में ही जनता पार्टी उभरा था.
2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में कुछ बड़े गठबंधन देखने को मिले हैं- जद (यू), राजद और कांग्रेस के एक महागठबंधन. तीन पार्टियों का महागठबंधन बिहार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा), राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) और हिंदुस्तान अवाम मोर्चा (सेक्युलर) सहित राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के विरुद्ध चुनाव में खड़े हैं. अन्य समूह में हैं समाजवादी धर्मनिरपेक्ष मोर्चा जिसमें समाजवादी पार्टी (सपा), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) और जन अधिकार पार्टी (JAP) शामिल हैं, एवं लेफ्ट अलायंस जिसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा), मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा), भाकपा (माले), भारत की सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर (एसयूसीआई) (कम्युनिस्ट), ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक (एफबी) और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) शामिल हैं.
लोकसभा- सदस्य के मामले में बिहार चौथे स्थान पर है. 80 सदस्यों के साथ उत्तर प्रदेश पहले, 48 की संख्या के साथ महाराष्ट्र दूसरे एवं 43 सदस्यों के साथ पश्चिम बंगाल तीसरे स्थान पर है. लोकसभा सदस्यों की संख्या के कारण भी बिहार को राष्ट्रीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण समझा जाता है.
जनता पार्टी से टूट कर बनी हुई दूसरी पार्टियां, नए दल और नए गठबंधन बना रही हैं. राष्ट्रीय एवं राज्य चुनावों में प्रदर्शन के आधार पर उनकी स्थिति राष्ट्रीय या राज्य पक्षों के बीच बदलती रहती है. जद (यू) और राजद का अधिक तीव्रता से बिहार में सीट केंद्रित करने का एक मुख्य कारण वर्ष 2000 में बिहार और झारखंड का अलग होना है.
अगर बात अब BJP की जाए तो बिहार की राजनीति जिस तरह करवट ले रही है ऐसे में सुशील मोदी के लिए मुख्यमंत्री बनना मुश्किल ही है। सुशील मोदी को शाहनवाज हुसैन और नंदकिशोर यादव नेतृत्व के मामले में कड़ी टक्कर दे रहे हैं. शाहनवाज हुसैन ने भी इस मामले पर दो टूक कह दिया है कि भला किसे नेता बनना अच्छा नहीं लगता है? नंदकिशोर यादव बीजेपी में एकलौते यादव जाति के बड़े नेता हैं. उनकी छवि सुशील मोदी की तरह नीतीश के वफादर की नहीं है.. यादवों का बिहार की राजनीति में अच्छा-खासा प्रभाव है। नीतीश सरकार में नंदकिशोर यादव को बढ़िया काम करने वाले मंत्री का खिताब भी मिल चुका है। ऐसे में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी नंदकिशोर यादव को आजमा सकती है.. नंदकिशोर यादव बिहार बीजेपी को लीड करने के मामले में सुशील कुमार मोदी को कड़ी टक्कर दे रहे हैं.. दरअसल, नंदकिशोर यादव बिहार में उस जाति से ताल्लुक रखते हैं जो पिछड़ी जातियों में सबसे दबंग और सबसे ज्यादा मतदाता संख्या वाली है.. बिहार में यादवों का 21 फीसदी वोट है।
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