बीफ खाने की आशंका पर एक बुजुर्ग की हत्या कर दी जाती है और हम अपने आपको लोकतांत्र कहते हैं, शर्मनाक है! यूपी के दादरी में गोमांस खाने की आशंका के चलते एक बुजुर्ग की पीट पीट कर हत्या कर दी गई जब की उसका बेटा जख्मी है. मृतक की बेटी का कहना है कि फ्रीज से मिला मांस अगर बीफ नहीं निकला तो क्या उसके कतल कर दिए गए पिता लोटाए जाएंगे. गंगा जमुनी तहजीब की कसमें खाने वाले मुलक में मजहबी लकीर खींच कर लोगों को मोत के घाट उतारा जा रहा है.
मेक इन इंडिया हो या डिजिटल इंडिया इस विकास का फायदा तब है जब हम पहले इंसानी जान सिखे और मिल कर रहे...फेसबुक पर जो गाय की फोटो डालकर देश में गाय की घटती आबादी को लेकर ढेर सारा घडियाली आंसू बहाते हैं और मुसलमानो को इसके लिए दोषी ठहराते हैं और जरा सी अफवाह पर कानून को अपने हाथ में लेकर एक मुसलमान को मौत के घाट उतार देते हैं. ऐसी पोस्ट और अफवाह सुनकर एक इंसान को मौत देने वालों से मैं पूछना चाहता हूँ की जब सड़क पर आवारा, छूटे हुए गाय या बैल दिख जाते हैं तो वो क्या करते है, उन्हे अपने घर ले जाकर पालते है...दंगाइयों के लिए गाय आस्था की खाल में छुपाया हुआ एक घातक हथियार है. रांची से लेकर दिल्ली तक यह घातक हथियार लेकर लोग सड़कों पर उतर रहे हैं. वे किसी की भी हत्या कर सकते हैं. गाय एक अदृश्य हथियार है जो बंदूक, कटार, कट्टे, चाकू, चापड़ में छुपा है. गाय के बहाने नरपिशाचों की टोली किसी का भी कत्ल कर सकती है. कश्मीर में गोमांस पार्टी का आयोजन करने की घोषणा करने वाले भक्त को मारने कोई नहीं पहुंचा. क्योंकि वह अपने खेमे का था. जैन मंदिरों के सामने बूचड़खाना खोलकर मुर्गा हलाल करने वालों को किसी ने कुछ नहीं कहा. गाय सिर्फ उनको निपटाने का एक घिनौना हथियार है जिन्हें हम नापसंद करते हैं. भक्तों को आदमी का मांस खाने वालों से कोई दिक्कत नहीं है. आस्थाएं इतनी क्रूर हैं कि वहशियों के लिए अपने भीतर के वहशीपन को हवा दे रही हैं. कुछ लोग गायें पालते हैं, उन्हें प्यार करते हैं, उनका दूध खाते हैं, कुछ लोग गाय की आड़ में धर्म के भीतर भरी घृणा पालते हैं. मेरे घर में भी गायें थीं. मेरे गांव में हिंदू मुसलमान सबके घर में गायें थीं. वहां गाय या बकरी कोई मसला नहीं था. जो गायें नहीं पालते, गाय उनके लिए अस्मिता का सवाल है जिसके लिए पूरे हिंदुस्तान को आग की लपटों में झोंक सकते हैं.
समाजवादी पार्टी सरकार की तारीफ करते करते आज सब्र जवाब दे रहा है. माना की कोई भी सरकार खुद दंगे नहीं करवा सकती कभी, लेकिन इस तरह के हालात के बाद सख्त कार्रवाई तो करना ही चाहिए. अगर आपसे ये भी नहीं होता, तो आने वाले चुनाव मे इसका परिणाम आप खुद देखेंगे.
जो लोग गाय के लिए हो-हल्ला मचाते हैं उन्हें उन दसियों हज़ार गायों की पीड़ा से कोई मतलब नहीं है जो सही देखभाल न मिलने के कारण सड़कों पर दम तोड़ रही हैं. जब गायें बूढ़ी हो जाती हैं या किसी और वजह से दूध देने लायक नहीं रहती तो उन्हें घर से बाहर खदेड़ दिया जाता है, दर-दर भटकने के लिए. भारतीय सड़कों पर गायें दिखना आम बात है. मैंने सड़कों के किनारों गायों को गंदगी खाते हुए देखा है. मैंने इतनी बीमार गायें देखी हैं कि उनकी हड्डियां खाल से बाहर निकलती दिखाई देती हैं. क्या गायों को भुखमरी के लिए मजबूर करना गोहत्या के बराबर नहीं है. लेकिन किसी को इसकी परवाह नहीं है. मुझे ये कहते हुए दुख हो रहा है कि ऐसे प्रतिबंध आजकल राजनीतिक कारणों से ज़्यादा लगाए जाते हैं. उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र में पहले से ही महाराष्ट्र पशु परिरक्षण अधिनियम 1976 था जिसके तहत गोहत्या प्रतिबंधित थी (इसमें बछिया और बछड़ा भी पहले से ही शामिल थे) लेकिन इसके तहत प्रमाण पत्र लेने के बाद बैलों और भैंसों के वध की अनुमति थी.
दुनियाभर के देशों में गाय का मांस खाया जाता है. लेकिन अब 2 मार्च 2015 के बाद से जो नया क़ानून प्रभावी है उसके तहत बीफ़ की बिक्री और निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है जिसकी वजह से बहुत से लोगों को नौकरी गंवानी पड़ी है. ऐसे भी लोग हैं जो कहते हैं कि गोहत्या मानवहत्या के बराबर है. मैं इसे एक बेवकूफ़ी भरा तर्क मानता हूँ. कोई एक जानवर की तुलना एक इंसान से कैसे कर सकता है. ऐसे प्रतिबंधों के पीछे वोट बैंक की राजनीति करने वाले प्रतिक्रियावादी दक्षिणपंथी तत्व हैं. हम समझ नहीं रहे हैं। हम समझा नहीं पा रहे हैं। देश के गांवों में चिंगारी फैल चुकी है। इतिहास की अधकचरी समझ लिये नौजवान मेरे साथ सेल्फी तो खींचा ले रहे हैं लेकिन मेरी इतनी सी बात मानने के लिए तैयार नहीं है कि वो हिंसक विचारों को छोड़ दें। हमारी राजनीति मौकापरस्तों और बुज़दिलों की जमात है।
वैसे एक खूनी खेल सोशल मीडिया में भी चलता है... भूमिकाएं ऐसी ही होती हैं... कोई छिप कर, कोई खुल कर हमले करता है आवाज़ दबाने के लिए। जानते हैं आप। कहने की भी ज़रूरत नहीं।
पूछिए न खुद से कौन हैं आप इनमें से?
अब भी इंसान पाते हैं खुद को?
मेक इन इंडिया हो या डिजिटल इंडिया इस विकास का फायदा तब है जब हम पहले इंसानी जान सिखे और मिल कर रहे...फेसबुक पर जो गाय की फोटो डालकर देश में गाय की घटती आबादी को लेकर ढेर सारा घडियाली आंसू बहाते हैं और मुसलमानो को इसके लिए दोषी ठहराते हैं और जरा सी अफवाह पर कानून को अपने हाथ में लेकर एक मुसलमान को मौत के घाट उतार देते हैं. ऐसी पोस्ट और अफवाह सुनकर एक इंसान को मौत देने वालों से मैं पूछना चाहता हूँ की जब सड़क पर आवारा, छूटे हुए गाय या बैल दिख जाते हैं तो वो क्या करते है, उन्हे अपने घर ले जाकर पालते है...दंगाइयों के लिए गाय आस्था की खाल में छुपाया हुआ एक घातक हथियार है. रांची से लेकर दिल्ली तक यह घातक हथियार लेकर लोग सड़कों पर उतर रहे हैं. वे किसी की भी हत्या कर सकते हैं. गाय एक अदृश्य हथियार है जो बंदूक, कटार, कट्टे, चाकू, चापड़ में छुपा है. गाय के बहाने नरपिशाचों की टोली किसी का भी कत्ल कर सकती है. कश्मीर में गोमांस पार्टी का आयोजन करने की घोषणा करने वाले भक्त को मारने कोई नहीं पहुंचा. क्योंकि वह अपने खेमे का था. जैन मंदिरों के सामने बूचड़खाना खोलकर मुर्गा हलाल करने वालों को किसी ने कुछ नहीं कहा. गाय सिर्फ उनको निपटाने का एक घिनौना हथियार है जिन्हें हम नापसंद करते हैं. भक्तों को आदमी का मांस खाने वालों से कोई दिक्कत नहीं है. आस्थाएं इतनी क्रूर हैं कि वहशियों के लिए अपने भीतर के वहशीपन को हवा दे रही हैं. कुछ लोग गायें पालते हैं, उन्हें प्यार करते हैं, उनका दूध खाते हैं, कुछ लोग गाय की आड़ में धर्म के भीतर भरी घृणा पालते हैं. मेरे घर में भी गायें थीं. मेरे गांव में हिंदू मुसलमान सबके घर में गायें थीं. वहां गाय या बकरी कोई मसला नहीं था. जो गायें नहीं पालते, गाय उनके लिए अस्मिता का सवाल है जिसके लिए पूरे हिंदुस्तान को आग की लपटों में झोंक सकते हैं.
समाजवादी पार्टी सरकार की तारीफ करते करते आज सब्र जवाब दे रहा है. माना की कोई भी सरकार खुद दंगे नहीं करवा सकती कभी, लेकिन इस तरह के हालात के बाद सख्त कार्रवाई तो करना ही चाहिए. अगर आपसे ये भी नहीं होता, तो आने वाले चुनाव मे इसका परिणाम आप खुद देखेंगे.
जो लोग गाय के लिए हो-हल्ला मचाते हैं उन्हें उन दसियों हज़ार गायों की पीड़ा से कोई मतलब नहीं है जो सही देखभाल न मिलने के कारण सड़कों पर दम तोड़ रही हैं. जब गायें बूढ़ी हो जाती हैं या किसी और वजह से दूध देने लायक नहीं रहती तो उन्हें घर से बाहर खदेड़ दिया जाता है, दर-दर भटकने के लिए. भारतीय सड़कों पर गायें दिखना आम बात है. मैंने सड़कों के किनारों गायों को गंदगी खाते हुए देखा है. मैंने इतनी बीमार गायें देखी हैं कि उनकी हड्डियां खाल से बाहर निकलती दिखाई देती हैं. क्या गायों को भुखमरी के लिए मजबूर करना गोहत्या के बराबर नहीं है. लेकिन किसी को इसकी परवाह नहीं है. मुझे ये कहते हुए दुख हो रहा है कि ऐसे प्रतिबंध आजकल राजनीतिक कारणों से ज़्यादा लगाए जाते हैं. उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र में पहले से ही महाराष्ट्र पशु परिरक्षण अधिनियम 1976 था जिसके तहत गोहत्या प्रतिबंधित थी (इसमें बछिया और बछड़ा भी पहले से ही शामिल थे) लेकिन इसके तहत प्रमाण पत्र लेने के बाद बैलों और भैंसों के वध की अनुमति थी.
दुनियाभर के देशों में गाय का मांस खाया जाता है. लेकिन अब 2 मार्च 2015 के बाद से जो नया क़ानून प्रभावी है उसके तहत बीफ़ की बिक्री और निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है जिसकी वजह से बहुत से लोगों को नौकरी गंवानी पड़ी है. ऐसे भी लोग हैं जो कहते हैं कि गोहत्या मानवहत्या के बराबर है. मैं इसे एक बेवकूफ़ी भरा तर्क मानता हूँ. कोई एक जानवर की तुलना एक इंसान से कैसे कर सकता है. ऐसे प्रतिबंधों के पीछे वोट बैंक की राजनीति करने वाले प्रतिक्रियावादी दक्षिणपंथी तत्व हैं. हम समझ नहीं रहे हैं। हम समझा नहीं पा रहे हैं। देश के गांवों में चिंगारी फैल चुकी है। इतिहास की अधकचरी समझ लिये नौजवान मेरे साथ सेल्फी तो खींचा ले रहे हैं लेकिन मेरी इतनी सी बात मानने के लिए तैयार नहीं है कि वो हिंसक विचारों को छोड़ दें। हमारी राजनीति मौकापरस्तों और बुज़दिलों की जमात है।
वैसे एक खूनी खेल सोशल मीडिया में भी चलता है... भूमिकाएं ऐसी ही होती हैं... कोई छिप कर, कोई खुल कर हमले करता है आवाज़ दबाने के लिए। जानते हैं आप। कहने की भी ज़रूरत नहीं।
पूछिए न खुद से कौन हैं आप इनमें से?
अब भी इंसान पाते हैं खुद को?
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