Monday, October 19, 2015

आख़िर लेखक क्यों चिंतित हैं?

मैं आपको आज जर्मनी ले चलता हूँ। सबने ही हिटलर का नाम तो सुना ही होगा। जब तानाशाही की एक हद पार हो गई तो वहाँ की सिविल सोसाइटी ने आवाज़ उठाई, ख़ासकर लेखकों ने। जबकि अधिकतर पत्रकार और मीडिया तो हिटलर के साथ ही थे। लेकिन जब लेखकों ने आवाज़ उठाई तो एक क्रांति ने जन्म लिया। क्योंकि लेखक समाज का आईना होते हैं, हो सकता है क़ि ज़्यादातर लेखक सेकुलर होने के कारण समाजवादी पार्टी, कांग्रेस या लेफ्ट से कुछ जुड़ाव या नज़दीकियाँ रखते हों, लेकिन वो नज़दीकियाँ राजनैतिक नहीं कही जा सकती हैं, वो उनकी पसंद की राजनीतिक विचारधारा या उस विचारधारा के नेता के कारण हो सकता है। आज जो देश में हो रहा है, वो भी नाजीवादी सोंच और माहौलके विरोध में उठाया हुआ एक छोटा सा कदम हो सकता है। और यह कदम आगे चलकर इस घमंडी सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पर मजबूर कर देगा।
कर्नाटक में छह कन्नड़ साहित्यकारों ने तर्कवादी लेखक एमएम कलबुर्गी की हत्या के मामले में जांच की धीमी गति के खिलाफ अपने पुरस्कार कन्नड़ साहित्य परिषद को पिछले हफ्ते लौटा दिए। फिर अंग्रेजी की मशहूर लेखिका नयनतारा सहगल और हिंदी कवि अशोक वाजपेयी ने साहित्य अकादमी पुरस्कारों को लौटाने की घोषणा की। कलबुर्गी हत्या के विरोध में हिंदी साहित्य के एक और जाने-माने नाम उदय प्रकाश ने भी पिछले महीने ऐसा ही कदम उठाया था। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की भांजी सहगल ने हिंदू धर्म को खतरनाक रूप से विकृत करने तथा भारत को नष्ट करने के कथित प्रयासों का विरोध करने के लिए, तो वाजपेयी ने असहमति के अधिकार की रक्षा के लिए संघर्षरत लोगों से एकजुटता जताने के लिए यह कदम उठाया। ये सभी साहित्यकार महसूस करते हैं कि जिन उसूलों ने आधुनिक भारतीय राष्ट्र को स्वरूप दिया और जिनकी अभिव्यक्ति हमारे संविधान में हुई, वे आज खतरे में हैं। संभव है कि ऐसे अहसास के पीछे कारण इन लेखक-कवियों के अपने वैचारिक रुझान हों। इसके बावजूद वे व्यथित महसूस कर रहे हैं, तो यह समय उनसे संवाद स्थापित करने का है। साहित्यकार किसी समाज की उच्चतर चेतना के प्रतिनिधि होते हैं। उनसे अपेक्षा रहती है कि वे सामाजिक मूल्यों के पहरेदार की भूमिका निभाएं। अतः उनकी आलोचनाओं से सत्ता-तंत्र को खफा नहीं होना चाहिए। न ही उनकी बातों को नजरअंदाज करना चाहिए। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की फुुफेरी बहन होने के बावजूद नयनतारा सहगल ने 1975 में लगी इमरजेंसी की आलोचना की थी। तब अनेक दूसरे साहित्यकर्मियों ने भी जोखिम उठाते हुए तत्कालीन इंदिरा सरकार का विरोध किया था। आपातकाल विरोधी माहौल बनाने में उन सबका खास योगदान था। आज देश में इमरजेंसी नहीं है। लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं बदस्तूर जारी हैं। बोलने, शांतिपूर्ण ढंग से विरोध जताने और न्यायपालिका की पनाह लेने के तमाम अवसर उपलब्ध हैं। इसके बावजूद कुछ लेखक कुछ घटनाओं को अनिष्टकारी संकेत मान रहे हैं, तो यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार कहा है कि हमारा एकमात्र राष्ट्रीय ग्रंथ हमारा संविधान है। ऐसे में इस राष्ट्र के बुनियादी स्वरूप को लेकर वर्तमान सरकार और विचारकों के एक तबके में ऐसे मतभेद नहीं हो सकते, जिन्हें पाटना संभव नहीं हो। अतः संवाद की पहल की जानी चाहिए, ताकि वर्तमान कड़वाहट को यथाशीघ्र दूर किया जा सके। अब तक देश में 40 से अधिक लेखकों और साहित्यकारों ने अपने अपने पुरस्कार लौटा दिए हैं। क्या सबके सब राजनैतिक हो सकते हैं। कल मुनव्वर राणा ने लाइव टीवी शो के दौरान अपना पुरस्कार लौटा दिया। 
 मैं खुद एक बड़ा साहित्यकार या लेखक तो नहीं हूँ, जिसने कोई एवार्ड जीता हो लेकिन एक पुराना साहित्यप्रेमी तो रहा ही हूँ। लेकर नामवर, बिहारी, तुलसी और मुंशी प्रेमचंद से मिर्ज़ा ग़ालिब तक को पढ़ा है। आधुनिक लेखकों को किताबों, अख़बारों और पत्रिकाओं में पढ़ता रहा हूँ। पिछले एक- डेड साल से बड़ी ही सक्रियता के साथ ब्लॉगर भी रहा हूँ। हमेशा ही ज़मीन से जुड़ी हुई चीज़ों पर लिखता रहा हूँ। वैसे तो राजनीति पर ही लिखने का शौक है लेकिन साथ ही साथ महिला शशक्तिकरण, किसानों के मुद्दे, ग़रीबी, पिछड़ापन और आरक्षण इसके बाद ख़ासकर सेकूलरिज़्म और बहुसंख्यकवाद के खिलाफ लिखता रहा हूँ। और हमेशा ही वही लिखा है जो देश या समाज में महसूस कर रहा हूँ। पिछले एक साल और उसमें भी ख़ासकर 3-4 महीने से मैने काफ़ी हद तक ब्लॉग लिखने बंद भी कर दिए हैं। उसका सीधा सा कारण है देश में बनाया जा रहा असुरक्षित माहौल।  माहौल क्या बनाया जा रहा है पहले पंसारे और कालबर्गी की हत्या, फिर ना जाने कितने सेकुलर विचारकों पर हमले, बैन की राजनीति, गोडसे के जन्मदिन को महानता के दिन में बताना, दादरी, अखलाख़ और ना जाने क्या क्या गिनाया जाए आपको?

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