दोस्तों आज दिनांक 21 अक्तूबर 2015 को नवरात्रि का अंतिम दिन है. मैने भी यह सोँचकर उपवास रख लिया था क़ि जितने भी 2-4 दिन तक हो पाएगा, करूँगा अन्यथा ख़त्म कर दूँगा. लेकिन माँ दुर्गा ने अंदर से ऐसी शक्ति दी क़ि 13 अक्तूबर से शुरू हुआ उपवास अंतिम चरण तक आ गया. 5 दिन तक तो कुछ भी नहीं लगा, लेकिन उसके बाद एनर्जी में बेहद कमी आ गई, हालाँकि तबतक भूख लगनी कम हो गई थी. पूरा दिन ओफिस में आकर काम करता हूँ क्योंकि घर पर रहकर बर्दास्त करना बहुत मुस्किल होता है. दिन में काम करके थोडी सी थकान होती है तो रात को नींद भी आ जाती है, अन्यथा करवट बदलते बदलते ही रात काट देनी पड़ती है. आज रात को तो बहुत समस्या हुई लेकिन जैसे तैसे नींद आई और सुबह हुई. क्योंकि आज अंतिम दिन था इसलिए डॉक्टर के पास जाकर चेकअप करवाया. बीपी और शुगर तो नॉर्मल से बहुत कम है. होमोग्लोबिन तो नहीं चेक करवाया लेकिन देखकर अंदाज़ा लगाया जा सकता है. जो भी देखता है यही बोलता है क़ि 1-2 महीने से बीमार हो क्या? सच भी है अभी नवरात्रि के 10-12 दिन पहले गणपति फेस्टिवल में टायफायेट और मलेरिया से बाहर आया था तब भी ऐसा ही हो गया था.
लेकिन इसबार जो भी हुआ ऐसे ही एक ज़िद में हुआ. घर पर किसी को नहीं बताया था जब पता चला तो सब बड़ा ही गुस्सा हुए. खैर माँ के आशीर्वाद से जो भी हुआ अच्छा ही हुआ. ज़्यादातर लोग कुछ ना कुछ मनोकामना लेकर व्रत करते हैं लेकिन मेरी ऐसी कोई भी माँग नहीं थी. केवा कहने के लिए नहीं दिल से कुछ भी नहीं माँगा था, बस यही सोचा था क़ि देश में शांति रहे मेरे अपने दोस्त, परिवार के लोग खुश रहे और रही बात मेरी तो बिना माँगे ही उपवास किया यह सोँचकर क़ि माँ दुर्गा अपने हिसाब से मेरी ज़रूरतें पूरी कर देंगी.
वैसे उपवास को लेकर मेरा एक अलग नज़रिया है. भक्ति के हिसाब से कभी उपवास करना ही नहीं चाहिए. उपवास का एक सीधा सा अर्थ होता है जो क़ुरान में है क़ि हमें भूख का अहसास करना है, जबतक हम भूख का अहसास नहीं करेगें, तबतक खाने की और भूखे इंसान ई ज़रूरत कैसे समझ पाएँगे. भूख क्या है पता ही नहीं चलेगा? यही मतलब जैन धर्म के पर्यूषण पर्व के दौरान चलने वाले उपवास का भी होता है. मैने इतने दिन अपनी जेब में पर्स तक नहीं रखी एक भी पैसा लेकर नहीं आया क़ि ऐसा ना हो क़ि कहीं पैसे हों और कुछ खाने का मन हो जाए. खुद की क्षमता देखनी चाही थी क़ि मेरे अंदर कितनी क्षमता है. मैं कितना बर्दास्त कर सकता हूँ. मैं खुद को एक बड़े संघर्शकर्ता के रूप में देखता हूँ, और आगे चलकर अगर कभी ऐसी ज़रूरत पड़ी तो पीछे नहीं हटूँगा. मैं बिना किसी संसाधन के रह सकता हूँ, यह मैने जाना. मुझे देखना था क़ि मैं खुद को ग़रीबी या अकाल में भी रख सकता हूँ. मैने यह सीखा कि ज़िद या जुनून कैसा होता है? यह मेरी एक ज़िद ही थी मेरे उसूलों, मेरे संघर्ष, मेरे वादे, मेरे आगे बढ़ने की ज़िद, जिससे मैं समझौता नहीं कर सकता हूँ.
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