Friday, November 13, 2015

गाँधी से नफ़रत, गोडसे से प्यार?

हिन्दू महासभा ने 15 नवंबर को बलिदान दिवस मनाने का फैसला किया है। इस दिन महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को फांसी हुई थी। पिछले साल हिन्दू महासभा ने देश भर में नाथूराम गोडसे के मंदिरों का निर्माण करने का ऐलान किया था। काफी हो-हल्ला मचने के बाद यह अभियान रुक गया। इस बार केंद्र सरकार हिन्दू महासभा के प्रति क्या रुख अख्तियार करती है, यह देखना दिलचस्प रहेगा। महात्मा गांधी की हत्या को लेकर एक बात अक्सर कही जाती है कि नाथूराम गोडसे गांधीजी से नाराज था, क्योंकि गांधीजी ने देश का बंटवारा होने दिया और वह पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने की बात किया करते थे।                               दरअसल इन दो तथ्यों की आड़ में उस लंबी साजिश पर पर्दा डाला जाता है जो हिन्दूवादी संगठनों ने रची थी। सचाई यह है कि गांधीजी को मारने की कोशिशें विभाजन के काफी पहले से शुरू हो गई थीं। आखिरी ‘सफल’ कोशिश के पहले उन पर चार बार हमले के प्रयास किए गए।  कई बड़े लेखकों के मुताबिक हिन्दूवादी संगठनों ने कुल छह बार उन्हें मारने की कोशिश की, जब न पाकिस्तान अस्तित्व में था और न ही पचपन करोड़ का मसला आया था। पिछले दिनों गांधीजी की हत्या पर ‘बियॉन्ड डाउट: ए डॉशियर ऑन गांधीज असेसिनेशन’ नाम से लेखों का संकलन (संपादन: तीस्ता सीतलवाड) प्रकाशित हुआ है, जो इस मामले की कई पर्ते खोलता है।
 इसमें प्रकाशित लेखों के अनुसार गाँधीजी को मारने के निरंतर प्रयास हुए. गांधीजी को मारने का पहला प्रयास पुणे में 25 जून 1934 को हुआ, जब वह कॉरपोरेशन के सभागार में भाषण देने जा रहे थे। कस्तूरबा गांधी उनके साथ थीं। इत्तेफाक से गांधी जिस कार में जा रहे थे, उसमें कोई खराबी आ गई और उन्हें पहुंचने में विलंब हो गया। उनके काफिले में शामिल अन्य गाड़ियां जब सभास्थल पर पहुंचीं, तब उन पर बम फेंका गया। (देखें, ‘प्रिजर्विंग द ट्रूथ बिहाइंड गांधीज मर्डर, द हिन्दू, 21 जून 2015)। बापू को मारने की दूसरी कोशिश में नाथूराम गोडसे भी शामिल था। मई 1944 की बात है। गांधी उस वक्त पंचगणी की यात्रा कर रहे थे। एक चार्टर्ड बस में सवार 15-20 युवकों का जत्था वहां पहुंचा। उन्होंने गांधी के खिलाफ दिन भर प्रदर्शन किया, मगर जब गांधी ने उन्हें बात करने के लिए बुलाया वे नहीं आए। शाम के वक्त प्रार्थना सभा में हाथ में खंजर लिए नाथूराम गांधीजी की तरफ भागा, जहां उसे पकड़ लिया गया। सितंबर 1944 में जब जिन्ना के साथ गांधीजी की वार्ता शुरू हुई, तब उन्हें मारने की तीसरी कोशिश हुई। सेवाग्राम आश्रम से निकलकर गांधीजी मुंबई जा रहे थे, तब नाथूराम की अगुआई में अतिवादी हिन्दू युवकों ने उन्हें रोकने की कोशिश की। उस वक्त भी नाथूराम के कब्जे से एक खंजर बरामद हुआ था। गांधीजी को मारने की चौथी कोशिश (20 जनवरी 1948) में लगभग वही समूह शामिल था, जिसने अंतत: 30 जनवरी को उनकी हत्या की। इसमें शामिल था मदनलाल पाहवा, शंकर किस्तैया, दिगम्बर बड़गे, विष्णु करकरे, गोपाल गोडसे, नाथूराम गोडसे और नारायण आपटे। योजना बनी थी कि महात्मा गांधी और हुसैन शहीद सुहरावर्दी पर हमला किया जाए। इस असफल प्रयास में मदनलाल पाहवा ने बिड़ला भवन स्थित मंच के पीछे की दीवार पर कपड़े में लपेट कर बम रखा था, जहां उन दिनों गांधी रुके थे। बम धमाका हुआ, मगर कोई दुर्घटना नहीं हुई, और पाहवा पकड़ा गया। समूह में शामिल अन्य लोग जिन्हें बाद के कोलाहल में गांधी पर गोलियां चलानी थीं, अचानक डर गए और उन्होंने कुछ नहीं किया। 
उन्हें मारने की आखिरी कोशिश 30 जनवरी को शाम पांच बज कर 17 मिनट पर हुई जब नाथूराम गोडसे ने उन्हें सामने से आकर तीन गोलियां मारीं। उनकी हत्या में शामिल सभी लोग पकड़े गए। उन पर मुकदमा चला और उन्हें सजा हुई। नाथूराम गोडसे और नारायण आपटे को सजा-ए-मौत दी गई (15 नवंबर 1949) जबकि अन्य को उम्रकैद की सजा हुई। आरएसएस से नाथूराम गोडसे के संबंध का मसला अभी भी सुलझा नहीं है। दरअसल गांधीजी की हत्या की चर्चा जब भी छिड़ती है, आरएसएस और उसके आनुषंगिक संगठन गोडसे और उसके आतंकी गिरोह को लेकर अगर-मगर करने लगते हैं। एक तरफ वे यह दिखाना चाहते हैं कि गांधीजी की हत्या में शामिल लोगों का संघ से कोई ताल्लुक नहीं था। साथ ही वे इस बात को भी रेखांकित करना नहीं भूलते कि किस तरह गांधीजी के कदमों ने लोगों में निराशा पैदा की थी। यानी वे हत्या को जायज ठहराते हुए उससे पल्ला झाड़ने की भी कोशिश करते हैं।
देश के तत्कालीन गृह मंत्री वल्लभभाई पटेल ने श्यामाप्रसाद मुखर्जी को लिखा: ‘हमारी रिपोर्टें इस बात को पुष्ट करती हैं कि इन दो संगठनों की गतिविधियों के चलते खासकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चलते मुल्क में एक ऐसा वातावरण बना जिसमें ऐसी त्रासदी (गांधीजी की हत्या) मुमकिन हो सकी। मेरे मन में इस बात के प्रति तनिक संदेह नहीं कि इस षडयंत्र में हिन्दू महासभा का अतिवादी हिस्सा शामिल था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियां सरकार एवं राज्य के अस्तित्व के लिए खतरा हैं...।’ (18 जुलाई 1948)
गोडसे से जुड़े लोग, जो खुद गांधीजी की हत्या की साजिश में शामिल थे, इस मुद्दे पर अलग ढंग से सोचते हैं। अपनी किताब ‘मैंने महात्मा गांधी को क्यों मारा’ (1993) में नाथूराम गोडसे के छोटे भाई गोपाल गोडसे ने लिखा है: ‘उसने (नाथूराम) अपने बयान में कहा था कि उसने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को छोड़ा था। उसने यह बात इस वजह से कही क्योंकि गोलवलकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गांधी की हत्या के बाद बहुत परेशानी में थे। मगर यह बात सही है कि उसने संघ नहीं छोड़ा था।’अंग्रेजी पत्रिका फ्रंटलाइन को दिए साक्षात्कार (जनवरी 28, 1994, अरविन्द राजगोपाल) में गोपाल गोडसे ने वही बात दोहराई थी। संघ के लोग शायद ही इस बात को स्वीकार करेंगे। देश विभाजन के काफी पहले ही गांधीजी को मारने की साजिश रची गई थी।

Thursday, November 12, 2015

टीपू सुल्तान के बारे में आप यह जानते हो?

औरंगजेब के बाद अब टीपू सुल्तान के नाम पर विवाद खड़ा हो गया है। इसकी वजह है टीपू सुल्तान की जयंती मनाने का कर्नाटक सरकार का फैसला। कर्नाटक की कांग्रेस सरकार पहली बार टीपू सुल्तान की जयंती मना रही है। बीजेपी के अलावा वीएचपी और बजरंग दल जैसे हिंदू संगठन इसके खिलाफ है। टीपू सुल्तान के इतिहास को खराब करने के लिए जानबूझकर ये प्रदर्शन किए जा रहे हैं। गौरतलब है कि टीपू मैसूर राज्य के शासक थे। उन्हें ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का कट्टर शत्रु माना जाता था। मई 1799 में ब्रिटिश सैनिकों से श्रीरंगपटनम के अपने किले को बचाते हुए वह मारे गए थे। टीपू सुल्तान देश के सबसे पहले अँग्रेज़ों से  लड़ने वाले योद्धा थे।
हैदर अली की मृत्यु के बाद टीपू सुल्तान ने मैसूर सेना की कमान को संभाला था, जो अपनी पिता की ही भांति योग्य एवं पराक्रमी था। टीपू को अपनी वीरता के कारण ही 'शेर-ए-मैसूर' नाम से भी जाना जाता है। टीपू ने मराठों और निज़ाम को कई युद्धों में हराया था। टीपू सुल्तान काफ़ी बहादुर होने के साथ ही दिमागी सूझबूझ से रणनीति बनाने में भी बेहद माहिर थे। टीपू सुल्तान ईस्ट इंडिया कंपनी के साम्राज्य के सामने कभी नहीं झुके और अंग्रेज़ों का जमकर सामना किया। मैसूर की दूसरी लड़ाई में अंग्रेज़ों को खदेड़ने में उसने अपने पिता हैदर अली की काफ़ी मदद की। टीपू सुल्तान ने फ्रांसीसियों के सहयोग से अत्याधुनिक और सुसंगठिन सेना खड़ी की थी, जो अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए थी। मैसूर की तीसरी लड़ाई में भी जब अंग्रेज़ टीपू को नहीं हरा पाए तो टीपू सुल्तान से अंग्रेज़ों को संधि करनी पड़ी थी। दोनों पक्षों के बीच 'मंगलौर की संधि' हुई थी। संधि के मुताबिक दोनों पक्षों ने एक दूसरे के जीते हुए प्रदेशों को वापस कर दिया। टीपू ने अंग्रेज़ बंदियों को भी रिहा कर दिया।लंदन के ब्रिटिश म्यूज़ियम में मैसूर के राजा टीपू सुल्तान की तमाम चीज़ें सजी हुई हैं। ख़ास कारीगरी वाली टीपू सुल्तान की एक भारी-भरकम तलवार इनमें से एक है। इस तलवार की मूठ पर रत्नजड़ित बाघ बना हुआ है। 'टाइगर ऑफ मैसूर' कहे जाने वाली टीपू सुल्तान का प्रतीक चिन्ह बाघ था जो उनसे जुड़ी चीजों पर प्रमुख रूप से अंकित मिलता है।कई बार अंग्रेज़ों के छक्के छुड़ा देने वाले टीपू सुल्तान को भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं महान वैज्ञानिक डॉ। ए।पी।जे। अब्दुल कलाम ने विश्व का सबसे पहला रॉकेट अविष्कारक बताया था। आज भी टीपू सुल्तान के रॉकेटों को दुनिया के सबसे पहले रॉकेटों में गिना जाता है।
टीपू के सांप्रदायिक होने या न होने पर बहस छिड़ी है। लेकिन उसके एक कारनामे को लेकर बहस की कोई गुंजाइश नहीं है। टीपू सुल्तान के बगल में रखी गई है टीपू की एक खूबसूरत सी अँगूठी जिसे श्रीरंगपट्टनम में हुई जंग में टीपू सुल्तान की मौत के बाद ब्रितानी फौजें इंग्लैंड ले गई थीं। माना जाता है कि अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान की मौत के बाद उनकी उंगली काटकर ये अंगूठी निकाल ली थी।। वहाँ के म्यूज़ियम में दो रॉकेट भी रखे हुए हैं। ये उन रॉकेट में से थे जिन्हें अंग्रेज़ अपने साथ 18वीं सदी के अंत में ले गए थे।
ये दिवाली वाले रॉकेट से थोड़े ही लंबे होते थे। टीपू के ये रॉकेट इस मायने में क्रांतिकारी कहे जा सकते हैं कि इन्होंने भविष्य में रॉकेट बनाने की नींव रखी। भारत के मिसाइल कार्यक्रम के जनक एपीजे अब्दुल कलाम ने अपनी किताब 'विंग्स ऑफ़ फ़ायर' में लिखा है कि उन्होंने नासा के एक सेंटर में टीपू की सेना की रॉकेट वाली पेंटिग देखी थी। कलाम लिखते हैं, "मुझे ये लगा कि धरती के दूसरे सिरे पर युद्ध में सबसे पहले इस्तेमाल हुए रॉकेट और उनका इस्तेमाल करने वाले सुल्तान की दूरदृष्टि का जश्न मनाया जा रहा था। वहीं हमारे देश में लोग ये बात या तो जानते नहीं या उसको तवज्जो नहीं देते।"
टीपू सुल्तान काफ़ी बहादुर होने के साथ ही दिमागी सूझबूझ से रणनीति बनाने में भी बेहद माहिर था। अपने शासनकाल में भारत में बढ़ते ईस्ट इंडिया कंपनी के साम्राज्य के सामने वह कभी नहीं झुका और उसने अंग्रेज़ों से जमकर लोहा लिया। मैसूर की दूसरी लड़ाई में अंग्रेज़ों को खदेड़ने में उसने अपने पिता हैदर अली की काफ़ी मदद की। उसने अपनी बहादुरी से जहाँ कई बार अंग्रेज़ों को पटखनी दी, वहीं निज़ामों को भी कई मौकों पर धूल चटाई। अपनी हार से बौखलाए हैदराबाद के निज़ाम ने टीपू सुल्तान से गद्दारी की और अंग्रेज़ों से मिल गया।
ट डालो, शासन करो' की नीति चलाने वाले अंग्रेज़ों ने संधि करने के बाद टीपू से गद्दारी कर डाली। ईस्ट इंडिया कंपनी ने हैदराबाद के साथ मिलकर चौथी बार टीपू पर ज़बर्दस्त हमला किया और आख़िरकार 4 मई सन् 1799 ई। को मैसूर का शेर श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए शहीद हो गया। 1799 ई। में उसकी पराजय तथा मृत्यु पर अंग्रेज़ों ने मैसूर राज्य के एक हिस्से में उसके पुराने हिन्दू राजा के जिस नाबालिग पौत्र को गद्दी पर बैठाया, उसका दीवान पुरनिया को नियुक्त कर दिया।
 टीपू सुल्तान की असफलता के दो महत्त्वपूर्ण कारण थे-फ़्राँसीसी मित्रता और देशी राज्यों को मिलाकर संयुक्त मोर्चा बनाने में टीपू असफल रहा। दूसरा यह कि वह अपने पिता हैदर अली की भांति कूटनीतिज्ञ और दूरदर्शिता का पक्का नहीं था।
टीपू की शहादत के बाद अंग्रेज़ श्रीरंगपट्टनम से दो रॉकेट ब्रिटेन के 'वूलविच संग्रहालय' की आर्टिलरी गैलरी में प्रदर्शनी के लिए ले गए। सुल्तान ने 1782 में अपने पिता के निधन के बादमैसूर की कमान संभाली थी और अपने अल्प समय के शासनकाल में ही विकास कार्यों की झड़ी लगा दी थी। उसने जल भंडारण के लिए कावेरी नदी के उस स्थान पर एक बाँध की नींव रखी, जहाँ आज 'कृष्णराज सागर बाँध' मौजूद है। टीपू ने अपने पिता द्वारा शुरू की गई 'लाल बाग़ परियोजना' को सफलतापूर्वक पूरा किया। टीपू निःसन्देह एक कुशल प्रशासक एवं योग्य सेनापति था। उसने 'आधुनिक कैलेण्डर' की शुरुआत की और सिक्का ढुलाई तथा नाप-तोप की नई प्रणाली का प्रयोग किया। उसने अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम में 'स्वतन्त्रता का वृक्ष' लगवाया और साथ ही 'जैकोबिन क्लब' का सदस्य भी बना। उसने अपने को नागरिक टीपू पुकारा। टॉमस मुनरो ने टीपू के बारें में लिखा है कि-
"नवीनता की अविभ्रांत भावना तथा प्रत्येक वस्तु के स्वयं ही प्रसूत होने की रक्षा उसके चरित्र की मुख्य विशेषता थीं।"
मेरे हिसाब से टीपू सुल्तान धर्मनिरपेक्ष था या इस्लाम का रखवाला, इस नुक्ते पर बहस फंसाने का कोई मतलब नहीं है। उसके जमाने में सेक्युलर या एंटीसेक्युलर जैसी कोई चीज ही नहीं थी। यह तो वैसी ही बात हो गई जैसे कि लोग द्रोपदी के पांच पतियों या भगवान राम द्वारा सीता जी को वन में छोड़ आने का हिसाब मांगा करते हैं। टीपू भारत के लिए कोई स्वतंत्रता संग्राम नहीं कर रहा था। उस समय राष्ट्र की वैसी कल्पना ही नहीं थी जैसी कि आज है। अन्य राजाओं और सुल्तानों की तरह वह भी अपने राज्य की रक्षा और उसके विस्तार के लिए पड़ोसी हिंदू-मुसलमान शासकों और अंग्रेजों से युद्ध कर रहा था। टीपू के इतिहास को हिंदू-मुस्लिम कोण से देखने वालों को किताबी मोतियाबिंद की शिकायत है। वे यह नहीं देख पाते कि टीपू ने अपनी ताकत बढ़ाने और पिता हैदर अली की मौत का बदला चुकाने के लिए मुस्लिम और निजाम शासकों का कितना खून बहाया था।
अगर हम हिंदू-मुस्लिम चश्मे से इतिहास को देखेंगे तो फिर इसका क्या जवाब होगा कि मुसलमानों, मराठों और राजपूतों ने आपस में ही कितना खून बहाया है। बूंदी के राजा बंडू जी (राव भांडा) को उसके ही दो भाइयों राव समर और राव अमर ने किस तरह खुद इस्लाम कबूल करके स्थानीय मुसलमान शासक की मदद से सन 1491 में कत्ल किया था। राज्य बचाने के लिए अपनी बहन बेटियों को किस तरह डोली में बिठाकर दिल्ली भेज दिया जाता था। यहां तक कि सम्राट अशोक भी कोई भजन गाकर मगध की गद्दी पर नहीं बैठा था। सन 1791 में श्रृंगेरी मठ को उजाड़ने वाला मराठा सरदार रघुनाथ राव पटवर्द्धन कोई मुसलमान हमलावर नहीं था। अनगिनत उदाहरण हैं।
टीपू सुल्तान मुसलमान था और इसमें कोई शक नहीं कि उसने हजारों हिंदुओं को जबरन इस्लाम कबूल करवाया, जो उसने अपनी चिठ्ठियों में खुद कबूल किया है। कुर्गों पर एक रणनीतिक हमले की सफलता के बाद कुरनूल के नवाब रनमस्त खान को उसने लिखा था- ”हमारी सेना देख कर वे पहाड़ियों में ऐसी जगहों पर जा छिपे जहां चिड़िया भी नहीं जा सकती थी लेकिन हमने 40000 कुर्गों को पकड़ कर इस्लाम कबूल करवाया और अपने अहमदी दल में शामिल कर लिया”। लेकिन कोई यह कहे कि वह ऐसा करके खलीफा बनना चाहता था तो मैं मानने को तैयार नहीं। यह विद्रोह को कुचलने का उसका अपना तरीका था। उसके विरुद्ध अंग्रेजों का साथ देने वाले मैंगलोरियन ईसाइयों की तरफ भी टीपू ने यही रुख अख्तियार किया था।
यह बात भी सही है कि टीपू सुल्तान का खजांची और कमांडर इन चीफ कृष्णा राव था, उसके डाक एवं पुलिस विभाग का मंत्री शामैय्या आयंगार था, पूर्णैय्या ‘मीर आसफ’ यानी प्रधानमंत्री के बेहद महत्वपूर्ण पद पर था, बादशाह शाह आलम द्वितीय के मुगल दरबार में उसके मुख्य प्रतिनिधि थे मूलचंद और सुजन राय तथा उसका प्रधान पेशकार भी एक हिंदू ही था- सुब्बा राव। मराठा सरदार द्वारा श्रृंगेरी मठ उजाड़ने के बाद टीपू ने वहां के शंकराचार्य को सुरक्षा प्रदान की थी और भगवती शारदा अम्मनवरु को सजाने के लिए सोने के काम से जड़ा साड़ी-ब्लाउज भेजा था। मैसूर गजेटियर में उल्लेख है कि वह 156 मंदिरों को वार्षिक दान देता था। ऐसे ढेरों उदाहरण हैं लेकिन इनसे कैसे साबित हो जाता है कि टीपू मैसूर में सेक्युलरिज्म को बढ़ावा देने के लिए यह सब कर रहा था। इन उदाहरणों को उसकी राजकीय सूझबूझ के तौर पर ही देखा जाना चाहिए जैसा कि मुगल बादशाह भी किया करते थे।

Sunday, November 8, 2015

नितीश जीते या मोदी हारे?

जब बिहार विधानसभा के चुनावों के नतीजे गए हैं, ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है क़ि ये हार किसकी है नरेंद्र मोदी या अमित शाह? बिहार की जंग जीतने के लिए बीजेपी ने करीब 850 चुनावी सभाएं की थीं, जबकि उनके मुकाबले में महागठबंधन की ओर से करीब 500 चुनावी सभाएं ही हुई थीं। बीजेपी की 850 चुनावी सभाओं में प्रधानमंत्री से लेकर अमित शाह, सुशील मोदी तक की सभा शामिल है। प्रधानमंत्री ने कुल 26 सभाएं चुनाव की तारीख के एलान के बाद की। इनमें से 17 सभाएं आखिरी तीन दौर में हुई, तो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने प्रचार की पूरी कमान अपने हाथ में ले रखी थी। अमित शाह ने 85 सभाएं की। दिलचस्प बात ये है कि चुनाव प्रचार के दौरान ये चर्चा जोरों पर रही है कि कोई प्रधानमंत्री किसी विधानसभा चुनाव के प्रचार को लेकर इतनी रैलियां नहीं करते। लेकिन मोदी ने धुआंधार रैलियां की और उनमें रिकार्ड तोड़ लोग भी जुटे। मोदी ऐसा दावा करते भी देखे गए। मोदी ने चुनाव में उन मुद्दों को भी उकेरा जिससे सांप्रदायिक वोटों के ध्रुवीकरण के आरोरप लगे, लेकिन नतीजे पार्टी के लिए अच्छे नहीं रहे।  जहां-जहां मोदी ने रैलियां की उन इलाकों से भी नतीजे बीजेपी के लिए अच्छे नहीं रहे।
बिहार के जनादेश में बहुत सारे सन्देश समाहित हैं। इसकी ख़ूब समीक्षाएँ तो होंगी ही। लेकिन जनादेश की सबसे बड़ी ख़ासियत यही मानी जाएगी कि नीतीश का मोदी-विरोध सच्चा है। जनादेश ने इसी सच्चाई पर अपनी मोहर लगायी है। जनादेश से ये भी साफ़ हो गया कि अब राष्ट्रीय स्तर पर भी मोदी-विरोध की क़मान नीतीश के हाथों में ही होगी। केजरीवाल और ममता इस विरोध के प्रादेशिक क्षत्रप के रूप में और मुखर होकर दिखायी देंगे। नया जोश तो काँग्रेस में भी दिखेगा। बशर्ते, राहुल गाँधी कुछ ज़्यादा परिपक्वता से पेश आएँ और अपने सलाहकारों में अनुभवी नेताओं को प्राथमिकता दें। मोदी ख़ेमा ठीक से आत्म-विश्लेषण करे। अमित शाह और नरेन्द्र मोदी के अलावा मोहन भागवत भी अपने गिरेबान में झाँकें और हिन्दुस्तान की समावेशी राजनीति को आत्मसात करने का गुर सीखें।
हालाँकि, लोकसभा के जनादेश के अहंकार के आग़ोश में बैठी बीजेपी के लिए ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल होगा। लेकिन यदि वो ऐसा कर सके तो भारतीय राजनीति में उसके दमखम को बहाल होने से कोई रोक भी नहीं पाएगा। बिहार का जनादेश बाक़ायदा मोदी-शाह की जोड़ी के लिए हार का सर्टिफ़िकेट है। अब मोदी-शाह को हिम्मत दिखानी चाहिए कि हार को पूरी विनम्रता से स्वीकार करें। यहाँ अख़लाक़ मामले जैसी हरक़त करें। ये सयानापन दिखाएँ कि उनकी पराजय इसलिए हुई कि बिहार ने कथित रूप से जातिवादी जनादेश दिया है। ये आत्मघाती विश्लेषण होगा। जात की बात ख़ुद मोदी और बीजेपी ने भी ख़ूब की। अपने सहयोगियों के जातिगत चरित्र को भी ख़ूब उभारा। लेकिन उन्हें भारी पड़ाअपना बड़बोलापन, अपनी बदहवासी, अपनी ख़िसियाहट और असली मुद्दों को दरक़िनार करने की अपनी फ़ितरत। जबकि नीतीश ख़ेमे को फ़ायदा मिला अपनी समावेशी सोच का। ये ऐसा अद्भुत चुनाव था जिसमें सत्ता पक्ष की पूरी ताक़त विपक्ष को सत्ता में आने से रोकने पर लगी थी। यानी उन्हें रोकना है इसलिए हमें बनाये रखिए। विपक्ष से जुड़े ख़तरों के बारे में बिहार में जो-जो बातें हुईं, जनादेश उसी की पुष्टि है।
नीतीश-लालू की एक-दूसरे के प्रति दशकों से चली रही कटुता से तौबा करना भी इस चुनाव का बहुत बड़ा आकर्षण माना जाएगा। जनता ने मोदी से पहले नीतीश-लालू को अपनी एकता साबित करने का मौक़ा दिया। ताकि वो बिहार में क़ारगर सरकार चलाकर उन वादों और इरादों को साबित करके दिखाएँ जिसके लिए वो जन्म-जन्मातर की मुख़ालफ़त को दरकिनार करके एकजुट हुए हैं। इस चुनाव से काँग्रेस को जो नवजीवन मिला है। साम्प्रदायिकता की उसकी परिभाषा पर बिहार की जनता ने अपनी मोहर लगायी है। इस चुनाव ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषणों के ख़ोखलेपन को भी उजागर किया। जनता ने उनके तमाम बयानों को नकार दिया। वर्ना, बीजेपी और एनडीए ने अपने चुनाव प्रबन्धन में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। चुनाव प्रबन्धन के लिहाज़ से बीजेपी की व्यवस्थाएँ लोकसभा और उसके बाद हुए तमाम चुनावों से बेहतर थी। ये टीम मोदी के वादों और उसके नज़रिये की विश्वनीयता की पराजय का चुनाव रहा।
बिहार का जनादेश नीतीश बाबू और लालू जी के लिए भारी चुनौती लेकर आया है। अगले पाँच साल में यदि ये जनता-दली परिवार अपने लिए नये ज़माने का एक ऐसा नेतृत्व विकसित कर सके, जो नीतीश और लालू दोनों का स्थान ले तभी ये जनादेश इन दोनों के लिए सोने पर सुहाग़ा बन पाएगा। आगे चलकर दोनों पार्टियों को विलय की राह बनानी होगी। अपने संगम को स्थायित्व देना होगा। वर्ना, अगली परीक्षा में इनका पास हो पाना मुश्किल होगा। क्योंकि तब इन्हें सत्ता विरोधी (Anti incumbency) भावनाओं से भी जूझना होगा। उधर, काँग्रेस को भी ऐसे ही सम्भावित नेतृत्व में नये क्षत्रप का स्वरूप देखना होगा। काँग्रेस को अपने राष्ट्रीय पार्टी होने का फ़ायदा तभी मिल पाएगा, जब वो नीतीश-लालू-ममता-पवार जैसे बीजेपी विरोधी नेताओं और विचारधाराओं का एकीकरण कर सके। ये काम बहुत मुश्किल है। लेकिन इससे पार पाये बग़ैर काँग्रेस का उद्धार भी नहीं हो सकता।

मोदी जी को कमलेश कुमार का पत्र



प्रिय प्रधानमंत्री जी,
प्रधानमन्त्री जी कैसे हैं आप? उम्मीद है अच्छी सेहत होगी, और मानसिक रूप से परेशानी, जो हार के बाद आई है, 4-5 दिन में ख़त्म हो जाएगी। वैसे तो मेरी कोई औकात नहीं है, आप जैसे महान अंतरराष्ट्रीय नेता को कोई सलाह देने की। लेकिन जिस तरह का राजनैतिक माहौल आपने 2014 से बनाया था, उससे आप एक बार तो जीत सकते हैं, लेकिन बार बार जीतना या फिर यूँ कहें, जनता को उल्लू बनाना इतना आसान नहीं होता है।
आप विकास का एजेंडा लेकर निकले थे। कितने सुहाने थे वो अच्छे दिन के वादे, वो हर खाते में 15 लाख देने की बातें लेकिन बिहार पहुंचते-पहुंचते Reservation पर गए। एक तरफ तो लालू और नीतीश को जातिवादी कहते रहे, दूसरी तरफ पहली बार ऐसा हुआ जब देश के प्रधानमंत्री की जाति खूब और बदल बदल कर बताई गई।  आपकी भाषण शैली को मैं काफ़ी पसंद करता हूँ लेकिन जब आपने 5% अल्पसंख्यक आरक्षण की बात की तो मुझे लगा क़ि आप फिर से गुजरात की फिजाओं में पहुँच गए हैं। वही मियाँ मुशर्रफ और सहज़ादा वाली भाषा पर। आपको राहुल गाँधी और नीतीश में कुछ फ़र्क ही नहीं दिखा? राहुल पप्पू हो सकते हैं, लेकिन आपको याद होगा क़ि आपको पहली बार फेंकू नीतीश कुमार ने ही साबित किया था।
आप ही बताइए कि आपके पार्टी अध्यक्ष ने बिहारियों को क्या समझकर ये कहा था कि अगर आप वहां हारे तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे? पाकिस्तान में पाटखे वाले बयान का तुक क्या था, अब शायद आपको भी पता चल गया होगा कि आखिर वो बयान कितना बेतुका था?
सर, गिरिराज सिंह जी लोगों को जब मन तब पाकिस्तान भेजते रहते हैं। हैं कौन वो? एक जिले से सांसद और आपके मंत्री। पांच साल बाद होंगे कि नहीं उनको भी नहीं पता लेकिन देशभक्ती का सर्टिफिकेट बांटते फिरते हैं। सर, जब पूरी पार्टी आपके कंट्रोल में है तो ऐसे फ्रिंज एलिमेंट इस तरह की बयानबाजी कैसे कर लेते हैं।
एक बात और सर, हिंदुओं के लिए गाय का धार्मिक महत्व बहुत ज़्यादा है लेकिन बिहार को राज्य के तौर पर अभी भी रोटी, कपड़ा और मकान मयस्सर नहीं है। गाय पर राजनीति करते समय शायद आपलोग भूल गए कि लोगों के ज़ेहन में अभी तक अयोध्या वाले राम कौतूहल करते हैं, कई बार सवाल भी करते हैं कि मंदिर बना दिया क्या।।।अगर नहीं तो इतना बवाल क्यों हुआ था भाई!? वही हाल आपने गाय का भी कर दिया, राम की तरह गाय पर भी लोगों की आस्था ख़तरे में है। सर, सवाल है कि गाय को आगे करके डिजिटल इंडिया और मेक इंन इंडिया कैसे होगा?
शायद आप और आपकी पार्टी बार-बार भूल जाते हैं कि भले अंदर-अंदर और सोशल मीडिया पर आपका एजेंडा हिंदुत्वा था लेकिन आम चुनाव में भी आपको 31% वोट मिला है। उसमें एक बड़ा तबका वो भी होगा सर जो अच्छे दिन के जुमले में फंस गया होगा। सर, आपके लोगों ने धर्मनिरपेक्षता को जेहाद जैसा शब्द बना दिया है। खुद को सेक्यूलर बताने में लोग अब डरते हैं। लेकिन प्रोपगैंडा स्थाई नहीं होता सर, संघ द्वारा जर्मनी से उधार ली गई  एक थ्यौरी (एक झूठ को सौ बार बोलो ताकि वो सच हो जाए) फौरी तौर पर चलने के बाद फुस हो गई।
दिल्ली और बिहार की हार में एक बात समान है कि दोनों जगह आपकी पार्टी ने निगेटिव कैंपेन किया। आपको तो याद ही होगा कि 2014 के आम चुनावों से पहले कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर ने आपको चाय वाला बताकर मजाक उड़ाया। कैसे हवा हो गए वे। आप पीएम बन गए, मणिशकर अय्यर के भी पीएम। खैर! दिल्ली विधानसभा चुनाव 2015 में आपने वही किया जो अय्यर ने आपके साथ किया था। आप दिल्ली के पूर्व CM केजरीवाल को नक्सली बता गए और तब से लेकर अंत तक निगेटिव कैंपेन के जाल में फंस गए। ये सिलसिला बिहार में भी जारी रहा वरना अपने लोगों को कौन पाकिस्तानी करार देता है। नतीजे आपके सामने हैं।
किसी भी सूरत में बिहार को अगले पांच साल तक ठीक शासन नहीं मिलने वाला, नहीं लगता कि राज्य को जो सरकार मिलने वाली है वो बहुत बेहतर सरकार है। लेकिन एक बात तय है कि बिहार की तरह आने वाले चुनावों में बीजेपी की भी दुर्गती तय है। सोचिए जब दिल्ली में रहकर आपसे दिल्ली नहीं बची और बिहार में सालों तक सरकार में रहकर बिहार नहीं बचा तो असम, बंगाल, केरल, तमिलनाडू में तो आप कहीं थे और ना कहीं हैं। राज्यसभा में बहुमत का सपना तो सपना ही रह जाएगा।
एक बात तय है कि आपकी पार्टी अब 1992 या 2014 के पहले वाली बीजेपी नहीं रही। कांग्रेस के बाद आप देश की एकमात्र दूसरी पार्टी हैं जिसने अपने बूते सरकार बना ली। लेकिन उसके लिए आपको इंदिरा गांधी का गरीबी हाटाओ के तर्ज पर अच्छे दिन का जुमला उछालना पड़ा। इस देश में ऐसे ही जुमले चलते हैं। इन्हीं जुमलों पर बहुमत की सरकारें बनती हैं। आपकी सरकार उसका सुबूत है। वरना आपको याद होगा कि 1992 के आपकी स्थिति सुधरी ज़रूर लेकिन आप सरकार बनाने की स्थिति में आधे सेक्यूलर वाजपयी जी के नेतृत्व में आए, सांप्रदायिक अडवाणी के नेतृत्व में नहीं। वहीं 2004 के आम चुनाव में हार के कारण पर बात करते हुए वाजपयी जी ने गोधरा दंगों को भी बड़ा कारण बताया था। सर, काठ की हांड़ी एक बार चढ़ती है, बार बार नहीं। वैसे मेरे आज के पत्र में आपको कई बातें बहुत कड़वी लग सकती हैं, लेकिन मैं तो आपकी ही बात (प्रधानमंत्री बनने के बाद आपने कहा था क़ि अच्छे दिनों के लिए कड़वी दवाई पीनी पड़ती है। पर चल रहा हूँ, शायद आज आपको भी उस दवाई की ज़रूरत है। आप फिर से विदेश जा रहे हैं, उसके पहले आप एक बार गुजरात घूम कर आइए ना। क्योंकि हो सकता है कि आपको कभी भी गुजरात ही वापस आना पड़ जाए, वैसे भी आनंदी बेन पटेल से गुजरात नहीं संभल रहा है, कहीं केशुभाई गेम ना खेल जाएँ? और जाते जाते जाशोदा आंटी से भी मिल लीजिएगा। शायद दीवाली में आपको घर में देखकर बहुत खुश हो जाएँगी। फिर रही बात विदेश की तो संसद के शीतकालीन सत्र के पहले फ्रेश होकर जाइए। उम्मीद करता हूँ कम से कम एक विदेश मंत्री के तौर पर तो आप अच्छा काम करेंगे। बाकी बातें किसी खुशी भरे पत्र में लिखूंगा, जब भी आप देश को खुशी का मौका तो दें।

धन्यवाद!

आपका शुभेच्छु,
कमलेश कुमार राठौड़
(राजनीति शास्त्र और क़ानून का युवा छात्र)
  

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

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