Thursday, November 12, 2015

टीपू सुल्तान के बारे में आप यह जानते हो?

औरंगजेब के बाद अब टीपू सुल्तान के नाम पर विवाद खड़ा हो गया है। इसकी वजह है टीपू सुल्तान की जयंती मनाने का कर्नाटक सरकार का फैसला। कर्नाटक की कांग्रेस सरकार पहली बार टीपू सुल्तान की जयंती मना रही है। बीजेपी के अलावा वीएचपी और बजरंग दल जैसे हिंदू संगठन इसके खिलाफ है। टीपू सुल्तान के इतिहास को खराब करने के लिए जानबूझकर ये प्रदर्शन किए जा रहे हैं। गौरतलब है कि टीपू मैसूर राज्य के शासक थे। उन्हें ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का कट्टर शत्रु माना जाता था। मई 1799 में ब्रिटिश सैनिकों से श्रीरंगपटनम के अपने किले को बचाते हुए वह मारे गए थे। टीपू सुल्तान देश के सबसे पहले अँग्रेज़ों से  लड़ने वाले योद्धा थे।
हैदर अली की मृत्यु के बाद टीपू सुल्तान ने मैसूर सेना की कमान को संभाला था, जो अपनी पिता की ही भांति योग्य एवं पराक्रमी था। टीपू को अपनी वीरता के कारण ही 'शेर-ए-मैसूर' नाम से भी जाना जाता है। टीपू ने मराठों और निज़ाम को कई युद्धों में हराया था। टीपू सुल्तान काफ़ी बहादुर होने के साथ ही दिमागी सूझबूझ से रणनीति बनाने में भी बेहद माहिर थे। टीपू सुल्तान ईस्ट इंडिया कंपनी के साम्राज्य के सामने कभी नहीं झुके और अंग्रेज़ों का जमकर सामना किया। मैसूर की दूसरी लड़ाई में अंग्रेज़ों को खदेड़ने में उसने अपने पिता हैदर अली की काफ़ी मदद की। टीपू सुल्तान ने फ्रांसीसियों के सहयोग से अत्याधुनिक और सुसंगठिन सेना खड़ी की थी, जो अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए थी। मैसूर की तीसरी लड़ाई में भी जब अंग्रेज़ टीपू को नहीं हरा पाए तो टीपू सुल्तान से अंग्रेज़ों को संधि करनी पड़ी थी। दोनों पक्षों के बीच 'मंगलौर की संधि' हुई थी। संधि के मुताबिक दोनों पक्षों ने एक दूसरे के जीते हुए प्रदेशों को वापस कर दिया। टीपू ने अंग्रेज़ बंदियों को भी रिहा कर दिया।लंदन के ब्रिटिश म्यूज़ियम में मैसूर के राजा टीपू सुल्तान की तमाम चीज़ें सजी हुई हैं। ख़ास कारीगरी वाली टीपू सुल्तान की एक भारी-भरकम तलवार इनमें से एक है। इस तलवार की मूठ पर रत्नजड़ित बाघ बना हुआ है। 'टाइगर ऑफ मैसूर' कहे जाने वाली टीपू सुल्तान का प्रतीक चिन्ह बाघ था जो उनसे जुड़ी चीजों पर प्रमुख रूप से अंकित मिलता है।कई बार अंग्रेज़ों के छक्के छुड़ा देने वाले टीपू सुल्तान को भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं महान वैज्ञानिक डॉ। ए।पी।जे। अब्दुल कलाम ने विश्व का सबसे पहला रॉकेट अविष्कारक बताया था। आज भी टीपू सुल्तान के रॉकेटों को दुनिया के सबसे पहले रॉकेटों में गिना जाता है।
टीपू के सांप्रदायिक होने या न होने पर बहस छिड़ी है। लेकिन उसके एक कारनामे को लेकर बहस की कोई गुंजाइश नहीं है। टीपू सुल्तान के बगल में रखी गई है टीपू की एक खूबसूरत सी अँगूठी जिसे श्रीरंगपट्टनम में हुई जंग में टीपू सुल्तान की मौत के बाद ब्रितानी फौजें इंग्लैंड ले गई थीं। माना जाता है कि अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान की मौत के बाद उनकी उंगली काटकर ये अंगूठी निकाल ली थी।। वहाँ के म्यूज़ियम में दो रॉकेट भी रखे हुए हैं। ये उन रॉकेट में से थे जिन्हें अंग्रेज़ अपने साथ 18वीं सदी के अंत में ले गए थे।
ये दिवाली वाले रॉकेट से थोड़े ही लंबे होते थे। टीपू के ये रॉकेट इस मायने में क्रांतिकारी कहे जा सकते हैं कि इन्होंने भविष्य में रॉकेट बनाने की नींव रखी। भारत के मिसाइल कार्यक्रम के जनक एपीजे अब्दुल कलाम ने अपनी किताब 'विंग्स ऑफ़ फ़ायर' में लिखा है कि उन्होंने नासा के एक सेंटर में टीपू की सेना की रॉकेट वाली पेंटिग देखी थी। कलाम लिखते हैं, "मुझे ये लगा कि धरती के दूसरे सिरे पर युद्ध में सबसे पहले इस्तेमाल हुए रॉकेट और उनका इस्तेमाल करने वाले सुल्तान की दूरदृष्टि का जश्न मनाया जा रहा था। वहीं हमारे देश में लोग ये बात या तो जानते नहीं या उसको तवज्जो नहीं देते।"
टीपू सुल्तान काफ़ी बहादुर होने के साथ ही दिमागी सूझबूझ से रणनीति बनाने में भी बेहद माहिर था। अपने शासनकाल में भारत में बढ़ते ईस्ट इंडिया कंपनी के साम्राज्य के सामने वह कभी नहीं झुका और उसने अंग्रेज़ों से जमकर लोहा लिया। मैसूर की दूसरी लड़ाई में अंग्रेज़ों को खदेड़ने में उसने अपने पिता हैदर अली की काफ़ी मदद की। उसने अपनी बहादुरी से जहाँ कई बार अंग्रेज़ों को पटखनी दी, वहीं निज़ामों को भी कई मौकों पर धूल चटाई। अपनी हार से बौखलाए हैदराबाद के निज़ाम ने टीपू सुल्तान से गद्दारी की और अंग्रेज़ों से मिल गया।
ट डालो, शासन करो' की नीति चलाने वाले अंग्रेज़ों ने संधि करने के बाद टीपू से गद्दारी कर डाली। ईस्ट इंडिया कंपनी ने हैदराबाद के साथ मिलकर चौथी बार टीपू पर ज़बर्दस्त हमला किया और आख़िरकार 4 मई सन् 1799 ई। को मैसूर का शेर श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए शहीद हो गया। 1799 ई। में उसकी पराजय तथा मृत्यु पर अंग्रेज़ों ने मैसूर राज्य के एक हिस्से में उसके पुराने हिन्दू राजा के जिस नाबालिग पौत्र को गद्दी पर बैठाया, उसका दीवान पुरनिया को नियुक्त कर दिया।
 टीपू सुल्तान की असफलता के दो महत्त्वपूर्ण कारण थे-फ़्राँसीसी मित्रता और देशी राज्यों को मिलाकर संयुक्त मोर्चा बनाने में टीपू असफल रहा। दूसरा यह कि वह अपने पिता हैदर अली की भांति कूटनीतिज्ञ और दूरदर्शिता का पक्का नहीं था।
टीपू की शहादत के बाद अंग्रेज़ श्रीरंगपट्टनम से दो रॉकेट ब्रिटेन के 'वूलविच संग्रहालय' की आर्टिलरी गैलरी में प्रदर्शनी के लिए ले गए। सुल्तान ने 1782 में अपने पिता के निधन के बादमैसूर की कमान संभाली थी और अपने अल्प समय के शासनकाल में ही विकास कार्यों की झड़ी लगा दी थी। उसने जल भंडारण के लिए कावेरी नदी के उस स्थान पर एक बाँध की नींव रखी, जहाँ आज 'कृष्णराज सागर बाँध' मौजूद है। टीपू ने अपने पिता द्वारा शुरू की गई 'लाल बाग़ परियोजना' को सफलतापूर्वक पूरा किया। टीपू निःसन्देह एक कुशल प्रशासक एवं योग्य सेनापति था। उसने 'आधुनिक कैलेण्डर' की शुरुआत की और सिक्का ढुलाई तथा नाप-तोप की नई प्रणाली का प्रयोग किया। उसने अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम में 'स्वतन्त्रता का वृक्ष' लगवाया और साथ ही 'जैकोबिन क्लब' का सदस्य भी बना। उसने अपने को नागरिक टीपू पुकारा। टॉमस मुनरो ने टीपू के बारें में लिखा है कि-
"नवीनता की अविभ्रांत भावना तथा प्रत्येक वस्तु के स्वयं ही प्रसूत होने की रक्षा उसके चरित्र की मुख्य विशेषता थीं।"
मेरे हिसाब से टीपू सुल्तान धर्मनिरपेक्ष था या इस्लाम का रखवाला, इस नुक्ते पर बहस फंसाने का कोई मतलब नहीं है। उसके जमाने में सेक्युलर या एंटीसेक्युलर जैसी कोई चीज ही नहीं थी। यह तो वैसी ही बात हो गई जैसे कि लोग द्रोपदी के पांच पतियों या भगवान राम द्वारा सीता जी को वन में छोड़ आने का हिसाब मांगा करते हैं। टीपू भारत के लिए कोई स्वतंत्रता संग्राम नहीं कर रहा था। उस समय राष्ट्र की वैसी कल्पना ही नहीं थी जैसी कि आज है। अन्य राजाओं और सुल्तानों की तरह वह भी अपने राज्य की रक्षा और उसके विस्तार के लिए पड़ोसी हिंदू-मुसलमान शासकों और अंग्रेजों से युद्ध कर रहा था। टीपू के इतिहास को हिंदू-मुस्लिम कोण से देखने वालों को किताबी मोतियाबिंद की शिकायत है। वे यह नहीं देख पाते कि टीपू ने अपनी ताकत बढ़ाने और पिता हैदर अली की मौत का बदला चुकाने के लिए मुस्लिम और निजाम शासकों का कितना खून बहाया था।
अगर हम हिंदू-मुस्लिम चश्मे से इतिहास को देखेंगे तो फिर इसका क्या जवाब होगा कि मुसलमानों, मराठों और राजपूतों ने आपस में ही कितना खून बहाया है। बूंदी के राजा बंडू जी (राव भांडा) को उसके ही दो भाइयों राव समर और राव अमर ने किस तरह खुद इस्लाम कबूल करके स्थानीय मुसलमान शासक की मदद से सन 1491 में कत्ल किया था। राज्य बचाने के लिए अपनी बहन बेटियों को किस तरह डोली में बिठाकर दिल्ली भेज दिया जाता था। यहां तक कि सम्राट अशोक भी कोई भजन गाकर मगध की गद्दी पर नहीं बैठा था। सन 1791 में श्रृंगेरी मठ को उजाड़ने वाला मराठा सरदार रघुनाथ राव पटवर्द्धन कोई मुसलमान हमलावर नहीं था। अनगिनत उदाहरण हैं।
टीपू सुल्तान मुसलमान था और इसमें कोई शक नहीं कि उसने हजारों हिंदुओं को जबरन इस्लाम कबूल करवाया, जो उसने अपनी चिठ्ठियों में खुद कबूल किया है। कुर्गों पर एक रणनीतिक हमले की सफलता के बाद कुरनूल के नवाब रनमस्त खान को उसने लिखा था- ”हमारी सेना देख कर वे पहाड़ियों में ऐसी जगहों पर जा छिपे जहां चिड़िया भी नहीं जा सकती थी लेकिन हमने 40000 कुर्गों को पकड़ कर इस्लाम कबूल करवाया और अपने अहमदी दल में शामिल कर लिया”। लेकिन कोई यह कहे कि वह ऐसा करके खलीफा बनना चाहता था तो मैं मानने को तैयार नहीं। यह विद्रोह को कुचलने का उसका अपना तरीका था। उसके विरुद्ध अंग्रेजों का साथ देने वाले मैंगलोरियन ईसाइयों की तरफ भी टीपू ने यही रुख अख्तियार किया था।
यह बात भी सही है कि टीपू सुल्तान का खजांची और कमांडर इन चीफ कृष्णा राव था, उसके डाक एवं पुलिस विभाग का मंत्री शामैय्या आयंगार था, पूर्णैय्या ‘मीर आसफ’ यानी प्रधानमंत्री के बेहद महत्वपूर्ण पद पर था, बादशाह शाह आलम द्वितीय के मुगल दरबार में उसके मुख्य प्रतिनिधि थे मूलचंद और सुजन राय तथा उसका प्रधान पेशकार भी एक हिंदू ही था- सुब्बा राव। मराठा सरदार द्वारा श्रृंगेरी मठ उजाड़ने के बाद टीपू ने वहां के शंकराचार्य को सुरक्षा प्रदान की थी और भगवती शारदा अम्मनवरु को सजाने के लिए सोने के काम से जड़ा साड़ी-ब्लाउज भेजा था। मैसूर गजेटियर में उल्लेख है कि वह 156 मंदिरों को वार्षिक दान देता था। ऐसे ढेरों उदाहरण हैं लेकिन इनसे कैसे साबित हो जाता है कि टीपू मैसूर में सेक्युलरिज्म को बढ़ावा देने के लिए यह सब कर रहा था। इन उदाहरणों को उसकी राजकीय सूझबूझ के तौर पर ही देखा जाना चाहिए जैसा कि मुगल बादशाह भी किया करते थे।

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