जब बिहार विधानसभा के
चुनावों के नतीजे
आ गए हैं,
ऐसे में सबसे
बड़ा सवाल यह
उठता है क़ि
ये हार किसकी
है नरेंद्र मोदी
या अमित शाह?
बिहार की जंग
जीतने के लिए
बीजेपी ने करीब
850 चुनावी सभाएं की थीं,
जबकि उनके मुकाबले
में महागठबंधन की
ओर से करीब
500 चुनावी सभाएं ही हुई
थीं। बीजेपी की
850 चुनावी सभाओं में प्रधानमंत्री
से लेकर अमित
शाह, सुशील मोदी
तक की सभा
शामिल है। प्रधानमंत्री
ने कुल 26 सभाएं
चुनाव की तारीख
के एलान के
बाद की। इनमें
से 17 सभाएं आखिरी
तीन दौर में
हुई, तो बीजेपी
अध्यक्ष अमित शाह
ने प्रचार की
पूरी कमान अपने
हाथ में ले
रखी थी। अमित
शाह ने 85 सभाएं
की। दिलचस्प बात
ये है कि
चुनाव प्रचार के
दौरान ये चर्चा
जोरों पर रही
है कि कोई
प्रधानमंत्री किसी विधानसभा
चुनाव के प्रचार
को लेकर इतनी
रैलियां नहीं करते।
लेकिन मोदी ने
धुआंधार रैलियां की और
उनमें रिकार्ड तोड़
लोग भी जुटे।
मोदी ऐसा दावा
करते भी देखे
गए। मोदी ने
चुनाव में उन
मुद्दों को भी
उकेरा जिससे सांप्रदायिक
वोटों के ध्रुवीकरण
के आरोरप लगे,
लेकिन नतीजे पार्टी
के लिए अच्छे
नहीं रहे। जहां-जहां
मोदी ने रैलियां
की उन इलाकों
से भी नतीजे
बीजेपी के लिए
अच्छे नहीं रहे।
बिहार के जनादेश
में बहुत सारे
सन्देश समाहित हैं। इसकी
ख़ूब समीक्षाएँ तो
होंगी ही। लेकिन
जनादेश की सबसे
बड़ी ख़ासियत यही
मानी जाएगी कि
नीतीश का मोदी-विरोध सच्चा है।
जनादेश ने इसी
सच्चाई पर अपनी
मोहर लगायी है।
जनादेश से ये
भी साफ़ हो
गया कि अब
राष्ट्रीय स्तर पर
भी मोदी-विरोध
की क़मान नीतीश
के हाथों में
ही होगी। केजरीवाल
और ममता इस
विरोध के प्रादेशिक
क्षत्रप के रूप
में और मुखर
होकर दिखायी देंगे।
नया जोश तो
काँग्रेस में भी
दिखेगा। बशर्ते, राहुल गाँधी
कुछ ज़्यादा परिपक्वता
से पेश आएँ
और अपने सलाहकारों
में अनुभवी नेताओं
को प्राथमिकता दें।
मोदी ख़ेमा ठीक
से आत्म-विश्लेषण
करे। अमित शाह
और नरेन्द्र मोदी
के अलावा मोहन
भागवत भी अपने
गिरेबान में झाँकें
और हिन्दुस्तान की
समावेशी राजनीति को आत्मसात
करने का गुर
सीखें।
हालाँकि, लोकसभा के जनादेश
के अहंकार के
आग़ोश में बैठी
बीजेपी के लिए
ऐसा कर पाना
बहुत मुश्किल होगा।
लेकिन यदि वो
ऐसा कर सके
तो भारतीय राजनीति
में उसके दमखम
को बहाल होने
से कोई रोक
भी नहीं पाएगा।
बिहार का जनादेश
बाक़ायदा मोदी-शाह
की जोड़ी के
लिए हार का
सर्टिफ़िकेट है। अब
मोदी-शाह को
हिम्मत दिखानी चाहिए कि
हार को पूरी
विनम्रता से स्वीकार
करें। यहाँ अख़लाक़
मामले जैसी हरक़त
न करें। ये
सयानापन न दिखाएँ
कि उनकी पराजय
इसलिए हुई कि
बिहार ने कथित
रूप से जातिवादी
जनादेश दिया है।
ये आत्मघाती विश्लेषण
होगा। जात की
बात ख़ुद मोदी
और बीजेपी ने
भी ख़ूब की।
अपने सहयोगियों के
जातिगत चरित्र को भी
ख़ूब उभारा। लेकिन
उन्हें भारी पड़ा
– अपना बड़बोलापन, अपनी बदहवासी,
अपनी ख़िसियाहट और
असली मुद्दों को
दरक़िनार करने की
अपनी फ़ितरत। जबकि
नीतीश ख़ेमे को
फ़ायदा मिला अपनी
समावेशी सोच का।
ये ऐसा अद्भुत
चुनाव था जिसमें
सत्ता पक्ष की
पूरी ताक़त विपक्ष
को सत्ता में
आने से रोकने
पर लगी थी।
यानी उन्हें रोकना
है इसलिए हमें
बनाये रखिए। विपक्ष
से जुड़े ख़तरों
के बारे में
बिहार में जो-जो बातें
हुईं, जनादेश उसी
की पुष्टि है।
नीतीश-लालू की
एक-दूसरे के
प्रति दशकों से
चली आ रही
कटुता से तौबा
करना भी इस
चुनाव का बहुत
बड़ा आकर्षण माना
जाएगा। जनता ने
मोदी से पहले
नीतीश-लालू को
अपनी एकता साबित
करने का मौक़ा
दिया। ताकि वो
बिहार में क़ारगर
सरकार चलाकर उन
वादों और इरादों
को साबित करके
दिखाएँ जिसके लिए वो
जन्म-जन्मातर की
मुख़ालफ़त को दरकिनार
करके एकजुट हुए
हैं। इस चुनाव
से काँग्रेस को
जो नवजीवन मिला
है। साम्प्रदायिकता की
उसकी परिभाषा पर
बिहार की जनता
ने अपनी मोहर
लगायी है। इस
चुनाव ने प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी के
भाषणों के ख़ोखलेपन
को भी उजागर
किया। जनता ने
उनके तमाम बयानों
को नकार दिया।
वर्ना, बीजेपी और एनडीए
ने अपने चुनाव
प्रबन्धन में कोई
कसर नहीं छोड़ी
थी। चुनाव प्रबन्धन
के लिहाज़ से
बीजेपी की व्यवस्थाएँ
लोकसभा और उसके
बाद हुए तमाम
चुनावों से बेहतर
थी। ये टीम
मोदी के वादों
और उसके नज़रिये
की विश्वनीयता की
पराजय का चुनाव
रहा।
बिहार का जनादेश
नीतीश बाबू और
लालू जी के
लिए भारी चुनौती
लेकर आया है।
अगले पाँच साल
में यदि ये
जनता-दली परिवार
अपने लिए नये
ज़माने का एक
ऐसा नेतृत्व विकसित
कर सके, जो
नीतीश और लालू
दोनों का स्थान
ले तभी ये
जनादेश इन दोनों
के लिए सोने
पर सुहाग़ा बन
पाएगा। आगे चलकर
दोनों पार्टियों को
विलय की राह
बनानी होगी। अपने
संगम को स्थायित्व
देना होगा। वर्ना,
अगली परीक्षा में
इनका पास हो
पाना मुश्किल होगा।
क्योंकि तब इन्हें
सत्ता विरोधी (Anti incumbency) भावनाओं से
भी जूझना होगा।
उधर, काँग्रेस को
भी ऐसे ही
सम्भावित नेतृत्व में नये
क्षत्रप का स्वरूप
देखना होगा। काँग्रेस
को अपने राष्ट्रीय
पार्टी होने का
फ़ायदा तभी मिल
पाएगा, जब वो
नीतीश-लालू-ममता-पवार जैसे
बीजेपी विरोधी नेताओं और
विचारधाराओं का एकीकरण
कर सके। ये
काम बहुत मुश्किल
है। लेकिन इससे
पार पाये बग़ैर
काँग्रेस का उद्धार
भी नहीं हो
सकता।
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