Tuesday, January 24, 2017

गठबन्धन में किसने खोया किसने पाया?

उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच चुनाव-पूर्व गठबंधन के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सामने बड़ी चुनौती अपनी पार्टी में संभावित असंतोष को संभालना है. भले ही समाजवादी पार्टी 298 सीटों पर चुनाव लड़ने की वजह से मजबूत महसूस कर रही हो, लेकिन जिन 268 प्रत्याशियों का नाम पार्टी अभी तक घोषित कर चुकी है, उनके लिए यह अनिश्चितता का दौर है.
यह प्रदेश में एक दशक से भी अधिक समय के बाद किन्हीं दो बड़े राजनीतिक दलों के बीच चुनावी गठबंधन है और ख़ास बात यह है कि इसकी घोषणा होने से पहले कांग्रेस ने प्रदेश की सपा सरकार को ही लपेटते हुए आक्रामक तौर पर अपना जनसंपर्क और सभा कार्यक्रम शुरू कर दिया था. राहुल गांधी द्वारा शुरू किए इस कार्यक्रम को '27 साल यू.पी. बेहाल' का नारा दिया गया था और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को यूपी का मुख्यमंत्री का चेहरा भी घोषित कर दिया गया था. लेकिन कांग्रेस को अब उम्मीद है कि लोगों की याददाश्त लम्बी नहीं होती और इस गठबंधन के बाद लोग किसी न किसी तरह से यह समझ ही जायेंगे कि जिन 27 सालों की बात उनके नारे में की गई थी, उनमें समाजवादी पार्टी के शासनकाल के पांच साल सम्मिलित नहीं थे.
कुछ दिन पहले अपनी ओर से 191 प्रत्याशियों की सूची जारी करके समाजवादी पार्टी इस गठबंधन को टूटने के कगार पर ले गई थी, और उसके बाद ही कोशिश शुरू हुई कि किसी तरह से कोई सम्मानजनक समझौता हो जाए. कहा जाता है कि चुनाव आयोग द्वारा पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न मिल जाने से उत्साहित अखिलेश यादव कांग्रेस को 100 सीटों से भी कम पर राज़ी करवाना चाहते थे, और यदि प्रियंका द्वारा ऐन मौके पर दखल न दिया गया होता तो समझौता लगभग टूट ही चुका था.

अब स्थिति यह है कि समझौते के मुताबिक कांग्रेस को 105 सीटें दी तो गई हैं लेकिन ये कौन सी सीटें होगी, इस पर अभी संशय बरकरार है. इस बीच सपा ने जिन 268 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं, उनमें से कुछ सीटें ऐसी हो सकती हैं जो अंततः कांग्रेस के खाते में जाएं. यानी, जिन सपा प्रत्याशियों का नाम सूची में घोषित भी हो चुका है, हो सकता है उनके नाम कट भी जाएं और उनकी मेहनत और खर्च बेकार हो जाए. यही है वह अगली चुनौती जो अखिलेश को तुरंत, यानी अगले कुछ दिनों में ही संभालनी है. एक ओर तो वो सपा प्रत्याशी हैं, जिनका नाम अखिलेश द्वारा घोषित किया गया, और दूसरी ओर वे सपा प्रत्याशी हैं जिन्हें मुलायम खेमे का होने के बावजूद टिकट दिया गया था. ये दोनों प्रकार के प्रत्याशी अब अपने टिकट कट जाने की आशंका में सशंकित होकर अन्य दलों से संपर्क में हैं. दो दिन पहले ही वरिष्ठ पार्टी नेता और पूर्व मंत्री अम्बिका चौधरी ने सपा छोड़ बहुजन समाज पार्टी का सहारा ले लिया और उन्हें मायावती ने तुरंत ही उनके पसंद के क्षेत्र से बसपा प्रत्याशी घोषित भी कर दिया. उसी दिन तीन अन्य सपा विधायक - रामपाल यादव (बिसवां, सीतापुर), आशीष यादव (एटा) और रामवीर सिंह (जसराना, फिरोजाबाद) ने भी सपा छोड़ दी, और अब लोक दल से चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं. यही नहीं, वरिष्ठ नेता और कुछ दिन पहले तक मुलायम के प्रबल समर्थक रहे और अखिलेश के पक्षधर राज्यसभा सदस्य नरेश अग्रवाल के अचानक सपा छोड़ भारतीय जनता पार्टी में जाने की खबरें आईं. हालांकि नरेश अग्रवाल ने मीडिया से मुखातिब होकर कहा कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं है. यह बात ध्यान देने वाली है कि नरेश अग्रवाल के बेटे नितिन अग्रवाल को हरदोई से टिकट मिला है. दूसरी ओर कांग्रेस में भी बेचैनी कम नहीं है. पार्टी का गढ़ समझे जाने वाले क्षेत्रों में कई पर सपा अपने प्रत्याशी घोषित कर चुकी है, जैसे अमेठी और राय बरेली. समझौते से कांग्रेस के कई बड़े नेता और कार्यकर्ता मायूस हैं और प्रचार के दौरान अपनी भूमिका को लेकर चिंतित हैं. कांग्रेस के अधिकतर कार्यकर्ताओं ने पिछले कुछ वर्षों में प्रदेश सरकार के खिलाफ ही संघर्ष करके अपनी ज़मीन मजबूत की है, और अब जब उनसे अपेक्षा है कि वे सपा के समर्थन में प्रचार करें तो वे मायूस हैं. उनमें से अधिकतर यह याद करते हैं कि कुछ महीने पहले प्रशांत किशोर की रणनीति के चलते प्रदेश में कई जगह गर्मी और बरसात के बावजूद खाट सभाओं में भी लोग जुटे थे, लेकिन अब उसकी उपयोगता नहीं दिख रही.


क्या यह संयोग कहा जाएगा कि रविवार सवेरे एक भव्य आयोजन में अखिलेश यादव और उनकी पत्नी डिंपल यादव ने सपा के चुनावी घोषणा पत्र को जारी किया, और शाम को गठबंधन की घोषणा हुई? स्पष्ट है कि चुनाव के बाद यदि सपा-कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनती है तो सपा का ही घोषणा पत्र मायने रखेगा, और कांग्रेस के अपने चुनावी वादों के लिए कोई जगह नहीं होगी. यही नहीं, गठबंधन की घोषणा के तुरंत बाद ही सपा ने अपने 77 प्रत्याशियों की एक और सूची जारी कर दी, जबकि कांग्रेस में अभी यह प्रक्रिया शुरू ही नहीं हुई है.
जहां एक ओर सपा का यह मानना है कि यदि गठबंधन की जीत होती है तो वह अखिलेश यादव की छवि के बल पर ही होगी, वहीं कांग्रेस में कई नेता यह महसूस करते हैं कि यदि ऐसा हुआ तो आगे लम्बे समय तक प्रदेश कांग्रेस का कोई नेतृत्व पनप ही नहीं पायेगा. लेकिन सत्ता में भागीदारी के संभावित सुख के आगे बाकी सब मायने नहीं रखता.
देखना यह है कि क्या अल्पसंख्यक और समाज के अन्य वर्गों को अपनी ओर खींचने की यह कवायद बसपा को नुकसान पंहुचा पायेगी, और क्या इस प्रकार संभावित ध्रुवीकरण से भाजपा को लाभ तो नहीं मिलेगा?

कांग्रेस सपा के एक होने के बाद यूपी के चुनाव

समाजवादी पार्टी + कांग्रेस गठबंधन से यह तय हो गया है कि उत्तर प्रदेश में इस बार मतदाताओं के पास जाति और धर्म से अलग जाकर मतदान करने का विकल्प सीमित या समाप्त हो गया है. विकास का नारा सिर्फ़ नारा रहेगा, लेकिन मतदान करने के लिए जाति और धर्म ही सबसे बड़ा इशारा रहेगा.
अब वहां मुख्य रूप से राजनीति के तीन ध्रुव बन गए हैं- 1. समाजवादी+कांग्रेस, 2. भारतीय जनता पार्टी 3. बहुजन समाज पार्टी.
इसी तरह मतदाताओं के छह वर्ग बन गए हैं, जो अपनी-अपनी जातीय और धार्मिक प्रतिबद्धताओं के हिसाब से अपना पाला तय करेंगे.
1. यादव - 10%
2. ग़ैर यादव पिछड़े - 30%
3. मुस्लिम - 20%
4. जाटव (मायावती की जाति) दलित - 10%
5. ग़ैर-जाटव दलित - 10%
6. सवर्ण - 20%
राज्य में जब चतुष्कोणीय मुक़ाबला होता है, तो जिसे 30% वोट मिलते हैं, उसकी सरकार बन जाती है, लेकिन त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति में जिसे 35% वोट मिलेंगे, उसकी सरकार बनेगी.
सतही तौर पर मुस्लिम-यादव समीकरण में करीब 30% वोट हैं. ये दोनों ही वर्ग उत्तर प्रदेश में सबसे प्रतिबद्ध और प्रभावशाली वर्ग हैं. जैसे, यादवों की प्रतिबद्धता समाजवादी पार्टी के साथ अक्षुण्ण है, उसी तरह मुसलमानों की प्रतिबद्धता बीजेपी के ख़िलाफ़ अटूट है. अगर समाजवादी-कांग्रेस गठबंधन नहीं होता, तो बीजेपी के ख़िलाफ़ उनके वोट तीन जगह जाते, लेकिन अब उनके वोट दो ही जगह जाएंगे और फायदा गठबंधन को ही मिलेगा. यह स्पष्ट है कि जिन सीटों पर समाजवादी-कांग्रेस गठबंधन बीजेपी को हराने की हैसियत में होगा, वहां वे इस गठबंधन के साथ खड़े होंगे. और जिन सीटों पर बीएसपी में बीजेपी को हराने का माद्दा अधिक होगा, वहां वे बीएसपी के साथ जाएंगे. यानी यह तय है कि मुसलमानों के सारे वोट समाजवादी पार्टी - कांग्रेस गठबंधन को नहीं जा रहे और बहुजन समाज पार्टी भी इसमें सेंध लगाने वाली है. इस प्रकार मुस्लिम-यादव समीकरण से समाजवादी-कांग्रेस गठबंधन को 30 में से 20% वोट ही मिलेंगे. बाकी के 15% वोटों का जुगाड़ वह कैसे करेगा? क्या ग़ैर-यादव पिछड़े, ग़ैर-जाटव दलित और सवर्ण वोटर मिलकर उसकी 15% की इस ज़रूरत को पूरा करेंगे?
मतदाताओं के सामने दूसरा विकल्प है भारतीय जनता पार्टी का. जैसे यादव समाजवादी पार्टी के साथ फेविकॉल की तरह चिपके हैं, उस तरह से तो नहीं, लेकिन बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में सवर्णों के लिए भी बीजेपी के साथ जाना मजबूरी है. कांग्रेस समाजवादी के साथ चली गई, इसलिए उसके साथ वे जा नहीं सकते. मायावती ने बड़ी संख्या में ब्राह्मणों को टिकट देकर उन्हें ललचाने का प्रयास किया है, लेकिन आरक्षण के इर्द-गिर्द राजनीति जब ध्रुवीकृत होगी, तो बीएसपी के साथ वे उन्हीं सीटों पर जाएंगे, जहां बीजेपी सीधी फाइट में नहीं होगी. यानी सवर्णों के 75-80% वोट बीजेपी को मिल सकते हैं. यानी बीजेपी के पास यूपी में 15% प्रतिबद्ध वोट हैं. बाकी के 20% वोट वह कहां से लाएगी? मुस्लिम उसे वोट देंगे नहीं और क्या आरक्षण विवाद के बाद गैर-यादव पिछड़ों और ग़ैर-जाटव दलितों से इतने वोटों का इंतज़ाम हो पाएगा? वैसे इन जातियों में अब तक उसकी अच्छी पैठ रही है. लोकसभा चुनाव में भी इन मतदाताओं ने उसका भरपूर साथ दिया था.
बहुजन समाज पार्टी भी उत्तर प्रदेश की राजनीति की एक महत्वपूर्ण धुरी है. मायावती की जाति के दलित यानी जाटव पूरी तरह से बीएसपी के साथ हैं. गैर-जाटव दलितों से भी कम से कम 50% वोट उसे ज़रूर मिलेंगे. इसके अलावा मुसलमान वोटर उन सीटों पर उसका साथ देने से पीछे नहीं हटेंगे, जिन सीटों पर वह बीजेपी से सीधी फाइट में होगी. इनके अलावा ब्राह्मण वोटरों को भी उसने ललचाने का दांव चला है, और ये वोटर भी उसे उन सीटों पर वोट दे सकते हैं, जहां बीजेपी सीधी फाइट में नहीं होगी. कुल मिलाकर, बहुजन समाज पार्टी के पास भी 25% तक प्रतिबद्ध/स्पष्ट वोट दिखाई दे रहे हैं. बाकी के 10% वोटों का जुगाड़ वह कैसे करेगी? क्या मुसलमानों, सवर्णों, गैर-जाटव दलितों और ग़ैर-यादव पिछड़ों में वह थोड़ी-थोड़ी सेंधमारी और कर पाएगी?
ज़ाहिर है कि मौजूदा समीकरणों के हिसाब से प्रतिबद्ध/स्पष्ट वोटों के मामले में बीएसपी 25% पर, सपा-कांग्रेस गठबंधन 20% पर और बीजेपी 15% पर खड़ी दिखाई दे रही है. ऐसे में बड़ा खेल बाकी बचे वे 40% मतदाता करेंगे, जो किसी की कठपुतली नही हैं, लेकिन इस गणित के कारण मुमकिन है कि त्रिशंकु विधानसभा की भी स्थिति बने और सरकार बनाने के लिए चुनाव बाद नए गठबंधनों की ज़रूरत पड़े. पर चुनाव बाद गठबंधन की उस ज़रूरत में भी बीजेपी और बीएसपी तो समाजवादी-कांग्रेस गठबंधन में जुड़ नहीं सकती. इसलिए इस गठबंधन के विस्तार की संभावना अब राष्ट्रीय लोक दल, अन्य छोटी पार्टियों और निर्दलीय तक ही सीमित है.
दूसरी तरफ़, अगर बहुजन समाज पार्टी पूर्ण बहुमत से कुछ दूर रह जाए, तो उसे सरकार बनाने के लिए ज़रूरत अनुसार बीजेपी या कांग्रेस- दोनों पार्टियों का साथ मिल सकता है, लेकिन दोनों पार्टियों का साथ एक साथ नहीं मिल सकता. या तो उसे बीजेपी का समर्थन लेना होगा या कांग्रेस का. ऐसे में स्पष्ट है कि चुनाव बाद कांग्रेस का समर्थन लेना बहुजन समाज पार्टी के लिए तभी फलदायी होगी, जब वह बहुत थोड़े सीट से बहुमत से दूर रह जाएंगी. अगर अधिक सीटों से बहुमत से पीछे रहती हैं, तो उसे बीजेपी के साथ की ज़रूरत पड़ेगी. इसलिए बहुजन समाज पार्टी के लिए सही रणनीति यह हो सकती है कि चूंकि कांग्रेस समाजवादी पार्टी के साथ चुनाव-पूर्व गठबंधन बना चुकी है, इसलिए वह भी बीजेपी के साथ एक चुनाव-पूर्व स्ट्रैटेजिक हिडेन एलायंस कायम करे.
वैसे भी, बीएसपी और बीजेपी के मतदाता जानते हैं कि इन दोनों पार्टियों को कभी भी एक-दूसरे के साथ की ज़रूरत पड़ सकती है और ना-ना करते इन दोनों के बीच इकरार और प्यार भी हो ही जाता है. इसलिए इन दोनों के बीच चुनाव-पूर्व गठबंधन न होते हुए भी एक ऑटोमेटिक हिडेन एलायंस तो काम करेगा ही. यानी जिन सीटों पर बीएसपी कमज़ोर होगी, उन सीटों पर उसके ग़ैर-मुस्लिम मतदाता भारतीय जनता पार्टी को वोट करेंगे और जिन सीटों पर भारतीय जनता पार्टी कमज़ोर होगी, उन सीटों पर उसके मतदाता बहुजन समाज पार्टी को वोट करेंगे. पर इस बात को दोहराना ज़रूरी है कि अगर इस ऑटोमेटिक हिडेन एलायंस को दोनों पार्टियां स्ट्रैटेजिक हिडेन एलायंस की शक्ल दे सकें, तो समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन की पराजय सुनिश्चित हो सकती है.
पर क्या, नोटबंदी के बाद की परिस्थितियों में मायावती बीजेपी के साथ स्ट्रैटेजिक हिडेन एलायंस बनाएंगी? इसकी संभावना सतही तौर पर तो कम लगती है, क्योंकि माना जा रहा है कि नोटबंदी से सबसे ज़्यादा नुकसान उन्हें ही हुआ है, लेकिन और नुकसान न हो और सत्ता वापस हाथ में आ जाए, इसके लिए सब कुछ होने के बावजूद बीजेपी के साथ रणनीतिक छिपा गठबंधन कायम करने में उन्हे अधिक हिचक नहीं होनी चाहिए. ऐसा करने से उन्हें अपने दुश्मन नंबर वन समाजवादी पार्टी को धूल चटाने में मदद मिलेगी और त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में सत्ता में लौटने की संभावना भी प्रबल हो जाएगी. पर अगर वह ऐसा नहीं करती हैं, तो यह समाजवादी-कांग्रेस गठबंधन को मज़बूत करने जैसा ही होगा, जो शायद वे न चाहें.

Saturday, January 7, 2017

कागजों पर बीजेपी सबपर भारी



उत्तर प्रदेश का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां हमेशा चतुष्कोणीय मुकाबला रहा है और जीत के लिए किसी दल को महज 25 से 30 पर्सेंट वोट की जरूरत रहती है। आम चुनाव में बीजेपी ने 324 सीटों पर 30 पर्सेंट से अधिक वोट हासिल किए थे। 253 सीटों पर यह आंकड़ा 40 पर्सेंट से अधिक था और 94 सीटों पर तो बीजेपी को 50 पर्सेंट से भी अधिक वोट मिले थे। 2012 में समाजवादी पार्टी को महज 15 सीटों पर ही 50 पर्सेंट से अधिक वोट मिले थे। 2014 में बीएसपी और एसपी को संयुक्त रूप से मिले वोटों से अधिक वोट बीजेपी को मिले थे। ऐसे में यह अनुमान निकाला जा सकता है कि 2014 के तीन साल बाद भी बीजेपी कम से कम जीत की राह तो तय कर ही सकती है। हालांकि इस विश्लेषण के खिलाफ एक तर्क यह है कि राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर वोटर अलग ट्रेंड के साथ वोटिंग करते हैं। यह एक ऐसा मिथक है, जिसे चुनावों में हमेशा इस्तेमाल किया जाता रहा है। आमतौर पर लोग राज्य और देश के चुनावों में मतदान के वक्त दोनों सरकारों के कामकाज का भी आकलन करते हैं। इसका अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि यदि आम चुनाव के साथ किसी राज्य के विधानसभा चुनाव होते हैं तो करीब 77 पर्सेंट वोटर एक ही पार्टी को दोनों जगह वोट करते हैं। इसके बाद भी यदि कोई कहता है कि मतदाता आम चुनाव से अलग ट्रेंड पर चलकर विधानसभा चुनाव में वोट करेंगे, तब भी सिर्फ यही एक वजह बीजेपी की हार का कारण नहीं बन सकती है। यदि बीजेपी को इन विधानसभा चुनावों में 200 से कम सीटें मिलती है और वह राज्य की सत्ता से दूर रहती है तो इसका सीधा अर्थ होगा कि उसके 15 पर्सेंट वोटर्स ने दूसरी पार्टी पर भरोसा जताया। यदि कोई दो विपक्षी पार्टियां एक साथ आती हैं तो बीजेपी को 2014 में मिले वोटों में 10 पर्सेंट का नुकसान झेलना पड़ेगा। यदि ऐसा होता है तो बीजेपी को 200 से कम सीटों पर ही संतोष करना पड़ सकता है। 2015 में बिहार में बीजेपी को 2014 के मुकाबले 4 पर्सेंट कम वोट मिले थे और करारी हार झेलनी पड़ गई थी। इस तरह यदि यूपी में बीजेपी बिहार की तुलना में 4 गुना खराब प्रदर्शन करे, तभी हार का सामना करना पड़ेगा।

उत्तर प्रदेश में गठबंधन की संभावनाएँ

पूरे देश की नज़रें इस समय देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश पर लगी हुई हैं, क्योंकि यहाँ पर जो हो रहा है वो इतिहास में पहली बार हुआ है. एक तरफ एक दल है जो लोकसभा में 80 में से 73 सीटों के साथ और विधानसभा में 48 सीटें लेकर आ रहा है, दूसरी तरफ सत्ताधारी दल वर्तमने के सबसे असफल दल के साथ गठंधन तो कभी पिता पुत्र या चाचा की अलग अलग पार्टी के साथ लड़ने की बात करता आयी. तीसरी तरफ एक ऐसा दल जो पिछले विधानसभा में सत्ताधारी दल से मात्र 3% कम वोटों के साथ है, उसके पहले सत्ता में था और लोकसभा में शून्य पर सिमट गया. चौथा दल है जो एक युवा ह्रदय के भविष्य की लड़ाई लड़ रहा है लेकिन दिल्ली से हारी हुई एक बृद्ध महिला को आगे करके. अब इस उठापठक में वोटर भी बहुत असमंजस में है, क्योंकि यूपी और बिहार की जनता लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में अलग अलग मूड से वोट करती है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबन्धन को लेकर भी संभावनाएँ बन रही हैं लेकिन गठंदन्धन सफल होगा या नहीं ये तो जनता के भरोसे पर निर्भर करता है.
राजनीति में चुनावी गठबंधन होने का मतलब है उन पार्टियों का वोट बैंक एक दूसरे में ट्रांसफर या सिफ्ट होना। बिहार में ये फार्मूला बेहतर तरीके से सफल हुआ, कारण था दोनों समाजवादी दलों का पूर्व में एक होना। उत्तर प्रदेश में अगर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच में गठबंधन होता है तो मुझे आशंका है क़ि समाजवादी पार्टी का वोटबैंक कांग्रेस के प्रत्याशियों के लिए सिफ्ट नहीं होगा। समाजवादी पार्टी का 2012 का 70% वोटबैंक 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी में सिफ्ट हो गया था, अभी तक ऐसी कोई उम्मीद नहीं है जो वो बीजेपी से पीछे हटे। उसका बचा हुआ पक्का वोट यादव और गैर यादव पिछड़ावर्ग है, जो अखिलेश यादव की छवि के साथ है।अगर बीएसपी और बीजेपी की लड़ाई होती है तो वो बीजेपी को वोट देगा, क्योंकि वो कभी बीएसपी की सरकार नहीं चाहता है। और अगर कांग्रेस के साथ गठबंधन हुआ तो हो सकता है ये मानसिकता बदल जाए क़ि समाजवादी पार्टी 3 नंबर पर है, तो वो यादव वोट वोट तो कांग्रेस को वोट दे सकता है लेकिन गैर यादव पिछड़ा वर्ग भाजपा या कुछ बहुत सेकुलर वोट बसपा में जाएगा। क्योंकि कांग्रेस की छवि इतनी भ्रष्ट बन चुकी है क़ि उसको वोट देना लोगों को ख़तरे से खाली नहीं दिखता है। रही बात कांग्रेस के वोटों क़ि तो हाँ उसके पास अभी भी 10% वो है जो हर सीट पर मिलता है जिसमें कुछ दलित, मुस्लिम और ठाकुर वोट हैं। मुस्लिम और ठाकुर तो आसानी से समाजवादी पार्टी में सिफ्ट करेंगे गठबंधन की स्थिति में लेकिन दलित वोट मायावती को ही प्रथम दर्जा देगा। इसलिए दोनों तरफ से ऐसी कोई उम्मीद नज़र नहीं आती है जो एक दूसरे के वोट पाकर वो जीत दर्ज कर लेंगे। जनता से आप वोट ले सकते हैं लेकिन दिलवा नहीं सकते हैं।
हाँ ये बात तो है कि जो सपा कांग्रेस के गठबंधन में वोट सिफ्टिंग पर जो मेरी आशंका थी वो बसपा कांग्रेस के साथ आने से नहीं होगी। दलित मुस्लिम दोनों को स्वीकार करेंगे, कांग्रेस के कुछ उच्च जातियों के वोट भी अबतक उसके हैं मतलब कट्टर हैं। लेकिन गठबंधन की संभावना नहीं है, मायावती खुद को जीता हुआ मान चूकी हैं।

Thursday, January 5, 2017

नेताजी बनाम बेटा जी

2017 में उत्तर प्रदेश की चुनावी जंग का फ़ैसला क्या होगा, यह तो बाद की बात है. फ़िलहाल तो सबकी निगाहें इस पर लगी हैं कि समाजवादी पार्टी के भीतर चल रही टिकटों की लड़ाई का फ़ैसला क्या होगा, कौन जीतेगा? पिता या पुत्र? पार्टी पर किसका वर्चस्व होगा? कोई सुलह होगी? मुलायम झुकेंगे या अखिलेश यादव? या पार्टी दोफाड़ हो जायेगी?
मुलायम सिंह पुराने पहलवान हैं. अखाड़े की कुश्ती में माहिर. राजनीति की कुश्ती में उनके 'चरख़ा दाँव' से बड़े-बड़े खुर्राट राजनेता भी कई बार चरका खा चुके हैं. मुलायम बस एक ही बार दाँव चूके हैं, जब वह राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गये थे. कहा जाता है कि तब एक और यादव नेता लालू प्रसाद ने ऐन मौक़े पर औचक लँगड़ी मार दी थी. अब मुलायम सिंह को दूसरी बार चुनौती बेटे से मिली है. वैसे समाजवादी पार्टी में तीन महीने से चल रही कुश्ती के हर राउंड में अब तक तो हर बार मुलायम सिंह यादव ही जीतते दिखायी दिये, लेकिन शायद लड़ाई अब निर्णायक राउंड में है. जो यह राउंड जीता, वही पार्टी को चलायेगा. अखिलेश कैम्प की तरफ़ से 235 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी गयी है. कहा जा रहा है कि ज़रूरत पड़ी तो उनके समर्थक अलग चुनाव-चिह्न पर चुनाव लड़ेंगे. माना जा रहा है कि यह अखिलेश का आख़िरी दाँव है. पिता मुलायम और चाचा शिवपाल को अल्टीमेटम कि अब भी वक़्त है, अखिलेश की लिस्ट के उम्मीदवारों को टिकट दे दिये जायें, अखिलेश को चुनाव की पूरी कमान दी जाय, वरना वह पार्टी को तोड़ने तक का जोखिम उठाने को तैयार हैं! अखिलेश इशारों-इशारों में कह ही चुके हैं कि 'मुहब्बत में जुदाई का हक़' भी होता है. कहने की बात अलग है, लेकिन चुनाव से ठीक पहले ऐसी 'जुदाई' आसान है क्या? अखिलेश भी जानते हैं और मुलायम-शिवपाल भी इतने नासमझ नहीं हैं कि चुनाव के ठीक पहले पार्टी तोड़ने से होनेवाले नुक़सान को न समझते हों. और मुलायम-शिवपाल इतने नासमझ भी नहीं हैं कि वह यह न समझते हों कि वोट किसके चेहरे पर मिलेंगे? मुलायम-शिवपाल के चेहरे पर या अखिलेश के? 
ज़ाहिर है कि आज चुनाव में समाजवादी पार्टी जो कुछ भी उम्मीद कर सकती है, वह अखिलेश के चेहरे से ही कर सकती है. यह बात समाजवादी पार्टी के ज़्यादातर नेता, ख़ास कर युवा नेता और कार्यकर्ता भी जानते और समझते हैं.  तो पार्टी का चेहरा तो अखिलेश ही हैं. बाज़ार में चलनेवाली करेन्सी अखिलेश ही हैं, यह मुलायम और शिवपाल बख़ूबी जानते हैं. बस पेंच एक है. वह यह कि अखिलेश को 'अरदब' में कैसे रखा जाय कि वह बस दुधारू गाय की तरह बने रहें. जो सारा झगड़ा अभी चल रहा है, उसकी जड़ यही है कि अखिलेश 'आज्ञाकारी' पुत्र और भतीजे बने रहें, और मुलायम-शिवपाल जैसे चाहते हैं, वैसे सरकार चलाते रहें.
दरअसल, पाँच साल पहले जब अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाया गया था, तब यही सोचा गया था कि वह 'बबुआ' मुख्यमंत्री की तरह कुर्सी पर बैठे रहेंगे. और अकसर मीडिया में यह कहा भी जाता रहा कि उत्तर प्रदेश में 'साढ़े चार मुख्यमंत्री' हैं. अखिलेश, मुलायम, शिवपाल, रामगोपाल ये चार और आधे आज़म ख़ान. लेकिन धीरे-धीरे अखिलेश ने अपने को इन शिकंजों से बाहर निकालने की कोशिश शुरू की. यही वजह है कि पिछले पाँच सालों में कई बार मुलायम सिंह सार्वजनिक मंचों पर अखिलेश को लताड़ लगाते रहे, सरकार के काम से अपनी नाराज़गी जताते रहे. लेकिन अखिलेश इन आलोचनाओं को इस कान से सुन कर उस कान से निकालते रहे. और अब पाँच साल बाद अखिलेश ने साफ़ जता दिया है कि वह 'बबुआ' नहीं, मुखिया हैं. पार्टी उनके साथ उनकी मर्ज़ी पर चले, परिवार के लिए थोड़ा-बहुत वह 'एडजस्ट' करने को तैयार हैं, लेकिन 'बबुआ' बन कर वह नहीं रहेंगे. इसीलिए मुख़्तार अन्सारी की पार्टी के विलय और अतीक़ अहमद जैसों को टिकट दिये जाने के शिवपाल के चिढ़ानेवाले पैंतरों पर भी वह समझौता करने को तैयार हैं. लेकिन इससे ज़्यादा और कुछ नहीं. अखिलेश ने अपने उम्मीदवारों की जो सूची मुलायम सिंह को सौंपी थी, उसमें कुछ सीटें शिवपाल की 'पसन्द' के लिए छोड़ कर अखिलेश ने यही संकेत दिया था.  अखिलेश को मालूम है कि समय उनके साथ है, जनता में उनकी छवि अच्छी है. समाजवादी पार्टी क़ानून-व्यवस्था को लेकर हमेशा ही बदनाम रही है, लेकिन मुख़्तार और अतीक़ जैसों का खुला विरोध करके अखिलेश ने जता दिया है कि वह समाजवादी पार्टी की राह बदलना चाहते हैं. राजनीति में वर्तमान का महत्त्व तो बहुत है, लेकिन कभी-कभी भविष्य वर्तमान से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाता है. समाजवादी पार्टी आज ऐसे ही मोड़ पर खड़ी है. पार्टी में एक बड़े वर्ग को मालूम है कि भविष्य में वह अखिलेश की राजनीति से तो उम्मीद रख सकता है, मुलायम और शिवपाल मार्का राजनीति से नहीं. इसलिए पार्टी के बहुत-से विधायक इस चुनाव को दाँव पर लगा कर भी अखिलेश के साथ जाने को तैयार हैं. 
मुलायम-शिवपाल के लिए सन्देश साफ़ है. अखिलेश को 'बबुआ' बनाने का खेल महँगा पड़ेगा. पार्टी अगर टूटी तो इस चुनाव में तो भट्ठा बैठेगा ही, लेकिन पाँच साल बाद फिर क्या होगा? 
तो कुल मिला कर लगता तो नहीं कि मुलायम सिंह चाहेंगे कि ऐसी नौबत आये. लेकिन अगर आ गयी तो क्या होगा? तरह-तरह की अटकलें लग रही हैं. एक अटकल तो यही है कि अखिलेश काँग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़ सकते हैं. हालाँकि समाजवादी पार्टी के परम्परागत वोट अगर दो धड़ों में बँटते हैं, तो काँग्रेस का साथ अखिलेश के कुछ ख़ास काम नहीं आयेगा. लड़ाई तब बीजेपी और बीएसपी में होगी और फ़ायदे में बीजेपी रहेगी. एक अटकल और भी उछाली जा रही है कि बीजेपी भी अखिलेश पर दाना डाल सकती है. बड़ी दूर की कौड़ी लगती है. लेकिन भारत की राजनीति में कुछ भी हो सकता है. आख़िर मुलायम किसी समय कल्याण सिंह से हाथ मिला ही चुके हैं. यह अलग बात है कि उसका उन्हें बड़ा ख़ामियाज़ा उठाना पड़ा था.

Friday, December 9, 2016

मोदीजी को कैशलेस के भाई कमलेश की चिट्ठी

सेवा में,
आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी जी, 
महोदय,
                        सबसे पहले तो आपको चरणस्पर्श कर प्रणाम करता हूँ और इसका मुख्य कारण आपका बुज़ुर्ग होना और मेरा भारतीय संस्कारिता में पला बढ़ा होना है, कृपया इसको लेकर मेरे लिए कोई फैन टाइप भूमिका न सोचें।
सर,आज 09 तारीख़ है और आज ही के ठीक 31 दिन पहले आपने जो देश के सारे धन को अपने बालों की तरह सफ़ेद कर देने की प्रतिज्ञा ली थी आज उसका महीना से अधिक हो गया है और आपको "फेयर एंड लवली पर्व " की खूब बधाई और इस "मासिकोत्सव" पर एक पत्र तो बनता ही है।
इधर थोड़ा सा ट्रम्प जी ने मूड खराब कर दिया है पर फिर भी आपको टाइम ईयर ऑफ़ द पर्सन का उपविजेता बनने की भी बधाई। क्या करियेगा, हमीं भारतीयों ने ट्रम्प के लिए हवन पूजा किया था न, भला इतनी जोरदार दुआएं केवल राष्ट्रपति तक थोड़े रूकती, पर्सन ऑफ़ द ईयर भी बना गयी। हाँ इससे हमारे हवन पूजा मार्केट का एक वैश्विक फलक भी तो खुला है, आज दुनिया भर के मित्रों को चुनाव जीतने या पुरस्कार जीतने हेतु भारतीय हवन पूजन की ओर आकर्षण बढ़ा है। हो सकता है कल किसी और देश के प्रत्याशी यहां हवन कराने आयें। इस तरह आपने जान बूझ कर ट्रम्प को आगे कर असल में भारतीय अध्यात्म का ढंका बजवा दिया है और एक नया उद्योग मिला देश को वर्ना जीत तो आप ही की थी। हम सब जानते हैं जी। वैसे भी पुरस्कार विजेता का हो या उपविजेता का, कोई छोटा बड़ा नहीं होता, उसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिए जब की आप तो "फ़क़ीर "आदमी हैं। आपके लिए तो पुरस्कार और सम्मान कुछ मायने नहीं रखता है, लोग हर मौके कुमौके आपकी फोटो वोटो ही खींचते रहें, आपने हमेशा बस इतने में संतोष किया। दिन भर में आपको जो भी 4-5 कपडे पहनने को मिले, आपने पहन कर संतोष किया। आप जिस दिन जापान से भारत लौट एक सभा में रोये, उस दिन भी केवल 3 कपडे बदले और जिस भी रंग का कुर्ता बंडी आपको दिया गया आपने पहन लिया। जब रोलैक्स की 3.5 लाख वाली घडी मिली ट्राई कर ली, ये बात तो आपके एक अहमदाबादी भक्त ने ही बताई थी। आप हमेशा फ़क़ीर की तरह रहे, बचपन में चाय भी बेचा तो किसी से पैसा न लिया क्योंकि रावण का विमान तक खोज निकालने वाला मीडिया आज तक कोई ऐसा ग्राहक नहीं खोज पाया जो बता पाये की मैंने मोदी जी से चाय पी है और पैसे दिए, आपको काला धन से तभी से नफरत था। आप खान पान में भी साधु फ़क़ीर हैं आजकल, जब दुबई वाले काजू के आटे की रोटी मिली खा लिया, जब शिमला की 37000 वाली मशरूम मिली तो खा लिया। विदेश जहाज़ से घूमना तो मज़बूरी है, पर आपने देश के पायलटों की ख़ुशी के लिए देश के अंदर भी हमेशा फ़क़ीर की तरह हवा में घूमे, कभी रेल यात्रा जैसे विलाषी माध्यम का प्रयोग नहीं किया। अब तो रेल और भी इतना मंहगा कर दे रहे कि आम आदमी भी जहाज़ ही घूमे, रेल जैसे विलाषिता से दूर रहे। आप 22 घंटे काम करते हैं, ढाई साल में छुट्टी नहीं ली। क्या जरूरत है छुट्टी की? कौन सा जसोदा काकी को गोवा लेकर जाना है।
सर,आप तो फ़क़ीर हैं, जैसे तैसे रह लेते हैं, पर पूरा देश थोड़े आपकी तरह महामानव है। ये जल्दी टूट जाता है, जरा सा कष्ट झेलने में हांफ जा रहा है सर। लाइन में लगा उकता जाता है। ये देश और इसकी करोडों देहाती आबादी को पता भी नहीं की आप भविष्य का भारत गढ़ रहे हैं। ये तो रोजमारी करने वाली खाने कमाने वाली जनता है सर, ये क्या जाने की देश कैसे बनता है। ये लोग तो इस खटनी मरनी में दिन गुज़ार देते हैं कि रात की रोटी कैसे बने। सर,मानता हूँ कि ये फेसबुक और व्हाट्सअप पर एक्टिव पीपुल ऑफ़ इंडिया की समझदारी आपके साथ है पर दूसरी तरफ भारत की जनता कहलाने वाली जनता की मज़बूरी भी को तो देखिएगा न सर? आपने मुरादाबाद में कहा कि लोग व्हाट्सअप कर सकते हैं तो पेटीएम क्यों नहीं? ए सर, क्या
ये देश केवल उसका थोड़े है जिनके हाथ में मोबाइल है, ये देश उनका भी तो है न सर जिनके हाथ में खाली कटोरी है। जिनके पास मोबाइल में इंटरनेट नहीं, उनके हाथों में पड़े हुए घट्टे हैं, छाले हैं। ये नेटवर्क के टावर वाले इलाके के लोग नहीं, जंगल और पहाड़ वाले इलाके के भी तो लोग हैं सर।
सर, जिस देश की करोड़ों जनता पेट के लिए पीठ पर बोझ ढोती है वो "पेपीएम" साॅरी टाइपिंग मिस्टेक पेटीएम नहीं कर सकती, जिद कर रहे है आप। ऐसे देश में कैशलेस इकोनॉमी सेंसेलेस माना जायेगा सर।
आप कहते हैं अमेरिका में,स्वीडन में कैशलेस है न सब, तो सर पहले अमेरिका जैसे बना तो लीजिये भारत को। वहां हर जगह स्कूल है, अस्पताल है, रोज़गार है, बैंक है सो कैशलेस भी है, वैसे मेरी रिसर्च में पाया कि अमेरिका में भी 60% ही कैशलेस है, पर भारत में जहां आज तक गांव गांव बिजली नहीं, स्कूल नहीं, अस्पताल नहीं, रोजगार नहीं वहां पेटीएम पंहुचा के कैशलेस करने का दावा एक मजाक है सर। सर,जनता को सारी सुविधाएँ बस जियो के सिम से ही नहीं पहुचाई जा सकती। अम्बानी का रिलायन्स पवनपुत्र हनुमान नहीं।
सर, क्या देश का पीएम जब एक पूरी जमात को किनारे कर पेटीएम करो का नारा देगा तो डर नहीं लगेगा सर? सर आपने कहा था देश बदलेंगे, पर आपने नोट बदल दिया। इस बदलाव की फेसबुक छाप खुशफहमी से निकल जरा गांव देहात भी तो घूमिये न सर। जिस बुढ़िया ने कभी जरुरत पर पोती के शादी के लिए 50-60 हज़ार छुपा के रखे थे और जिसे आज तक गांव के चोर न खोज के निकाल पाये, आपने बैंक में जमा करवा दिए जो गांव में बैंक चार चार दिन लाइन में लगने के बाद भी 2000 ही देता है।
ये कैसी क्रूरतम छापेमारी है सर? सर,ये जो गांव देहात के करोड़ों दादा,बाबा,माई, दादी,मौसी,नानी के छिपे पैसे निकल रहे हैं न ये काला या भूरा धन नहीं बल्कि उनके जीवन का आसरा था, परिवार के मुश्किल के दिनों का सहारा था जिसे कोई बैंक के लॉकर से ज्यादा सुरक्षित रखा था इन माताओं ने। ये गलती से किसी किसी गरीब के लिए  किसी अन्य की मज़बूरी से डाले गए जन धन खाते में आये 1 या 2 लाख रूपये से ज्यादा सफ़ेद और नश्वर धन था। वो पुरानी मटकी और चावल के डिब्बे में रखा पैसा जन धन खाता नहीं, जीवन खाता था और हर घर का आधार था। आज वो आधार छीन गया न सर, हाथ में रह गया है आधार कार्ड की फोटो कॉपी और बदले गए 2 हज़ार के नोट। 
आप मुरादाबाद में लोगों को ब्लैक मेल की क्लास देते नजर आए, 
सर, क्या अब देश के गरीब का दिन इन्ही पैसो से बदलेगा। कम से कम भारत का पीएम तो ऐसा न बोलता सर। ये घास की रोटी खा स्वाभिमान खातिर मिट जाने वाले पुरखों का देश है, शासन चलाने में मूल्यों का तो क़द्र करिये सर। ये लुटेरे बाल्मीकि से संत बाल्मीकि बनाने का देश है,गरीब को लुटेरा बनाने का नहीं।
सर ईधर आपको क्या हो गया है, किसके संगत में हैं? मुरादाबाद में आप बोले की" अगर भ्रस्टाचार से मुक्ति चाहिए, विकास चाहिये तो भाईओं बहनों बजाओ जोर की ताली"।सर ये क्या है? क्या ताली से होगा ये सब। ये मदारियों की भाषा क्यों बोलने लगे आप। सर,आपके पीछे नेहरू,इंदिरा,लोहिया,श्यामा प्रसाद,जार्ज,वाजपेयी जी की परंपरा है भाषण देने की,उनसे सीखिए न कुछ यूट्यूब से। वैसे अगर आप कैश लेस इंडिया में स्पीचलेस रैली करने लगें तो कितना बेहतर होगा. इससे भी अच्छा होगा क़ि आप टेक्नॉलॉजी का प्रयोग करते हुए भाषण भी रिकॉर्ड करवा कर यूटयूब पर डाल दिया जाए. 
सर,माना कि जैसे बिना जिम गए चंद्रगुप्त योद्धा थे,बिना पढ़े अकबर विद्वान थे वैसे बिना कोर्स के आप भी दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री हैं पर सर थोड़ा समाजशास्त्र भी देख लीजिए की कैसे गड़बड़ा गया है देश का।इस पत्र के बाद मुझ पर जो हमला होगा वो जनता हूँ सर, आपके समर्थक से तो डर नहीं पर अनुयायी से गाली सुनूँगा ही।ससोशल मीडिया पर आपकी आलोचना करना मोगेम्बो के अड्डे पर जा मोगेम्बो को छाती ठोक हड़काने जैसा है सो इसका अंजाम जानता हूँ। पर चूँकि सर, डर लगता नही इसलिए लिखबे करूँगा। क्योंकि, सच लिखने में डर जाऊंगा तो घूंट के मर जाऊंगा, इससे अच्छा है लड़ के मर जाऊं। और सर याद रखियेगा, ये फेसबुक पर जयजयकार करती खायी अघाई सेना आपको असली जमींन पर युद्ध हरवा न दे। व्हाट्सअप से निकल जमींन पर पड़े भूखों से मिलिए, समाधान दीजिये वर्ना हर भूखे पेट के अंदर एक युद्ध कुलबुला रहा है, आवाज़ भले नहीं निकल रही, सीधे विस्फोट होगा। क्योंकि मैं किसान का बेटा हूं रोज उस दर्द से रूबरू होता हूं, लोगों की रबी की फसलें बरबाद और बहुत लेट हो गई है, जानवरों को चारा तक नहीं बचा है, इतनी शरदी में बीमार बुजुर्गों को दवाइयों के लिए पैसे नहीं हैं, गरीब मजदूरों को मजदूरी नहीं मिल रही है, शहरों से मजदूरों की वापसी हो रही है। कहीं ऐसा ना हो क़ि आप कैशलेस इकोनॉमी के चक्कर में ग्रेनलेस एग्रीकल्चर भी चालू ना करवा दें. फिर क्या खाना इंटरनेट से डाउनलोड करके खाओगे? बस अंत में एक सवाल और क़ि गुजरात या और किसी राज्य में हार्दिक पटेल जैसा युवा नेता आ गया तो आपकी सरकार तो इंटरनेट बंद करवा देगी, फिर तो आपका नेट पेमेंट बंद भी हो जाएगा. आप कौन से इकॉनमिक सुधार की उम्मीद कर रहे हैं दूसरे क्वार्टर में जीडीपी. 3% बढा लेकिन न ईएमआई कम हुई न ब्याज दर? आप दुनिया की कौन अर्थनीति के फार्मूले से इसे बढाएंगे? मुझे अपना शुभचिंतक ही जानिए, दुश्मन नहीं हूँ,इसी देश का हूँ,आप मेरे भी पीएम हैं सर। जय हिंद।
आपका शुभचिंतक
और कैश"लेश" का छोटा भाई कम"लेश"

Monday, November 28, 2016

कैशलेस इकॉनमी मतलब राम राज्य?

ये कैशलेस इकॉनमी क्या है? क्या इससे जीडीपी बढ जाएगा? क्या टैक्स चोरी खत्म हो जाती है, मेरे लिए यह नया विषय था तो थोडा रिसर्च करना पडा। देखा तो पाया कि अमेरिका में 30 से 32 लाख करोड़ की टैक्स चोरी हर साल होती है। जिस तरह से भारत में आयकर विभाग है उसी तरह से अमेरिका के इंटरनल रेवेन्यू सर्विस की एक रिपोर्ट इसी साल अप्रैल में छपी है। इस रिपोर्ट के अनुसार 2008 से 2010 के बीच हर साल औसतन 458 अरब डालर की टैक्स चोरी हुई है। अगर मैंने इसका भारतीय मुद्रा में सही हिसाब लगाया है तो अमरीका में 30 से 32 लाख करोड़ रुपये सालाना टैक्स चोरी हो जाती है। यह आंकड़ा इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में नोटबंदी के बाद से कैशलेश का ऐसा प्रचार किया जा रहा है जैसे ये हाजमोला की गोली है जो अर्थव्यवस्था की बदहज़मियों को दूर कर देगी। कहा जा रहा है कि भारत में टैक्स चोरी बंद हो जाएगी या कम से कम हो जाएगी लेकिन अमेरिका में कहाँ कम हो गई। कहां बंद हो गई है।
फ्रांस की संसद की रिपोर्ट है कि हर साल 40 से 60 अरब यूरो की टैक्स चोरी होती है। 60 अरब यूरो को भारतीय मुद्रा में बदलेंगे तो यह चार लाख करोड़ होता है। वहां का टैक्स विभाग 60 अरब यूरो की कर चोरी में से 10 से 12 अरब यूरो ही वसूल पाता है। यानी 30 से 50 अरब यूरो की टैक्स चोरी वहां भी हो ही जाती है। ब्रिटेन में हर साल 16 अरब यूरो की टैक्सचोरी होती है। भारतीय मुद्रा में 11 हज़ार करोड़ की चोरी। जापान के नेशनल टैक्स एजेंसी ने इस साल की रिपोर्ट मे कहा है कि इस साल 13.8 अरब येन की टैक्स चोरी हुई है। भारतीय मुद्रा में 850 करोड़ की टैक्स चोरी होती है।1974 के बाद वहां इस साल सबसे कम टैक्स चोरी हुई है।
मान लीजिए कि पूरी आबादी इलेक्ट्रानिक तरीके से लेन-देन करती है तो भी यह गारंटी कौन अर्थशास्त्री दे रहा है कि उन तमाम लेन-देन की निगरानी सरकारें कर लेंगी। क्या यह उनके लिए मुमकिन होगा। अगर ऐसा है तो सरकार सभी बैंक खातों की जांच कर ले। हमारे बैंक तो इलेक्ट्रानिक हैं न। कई लोग कहते हैं कि बैंकों में अभी भी लोगों के कई नाम से खाते खुले हैं। बैंक अपने ग्राहकों से पहचान पत्र मांगता है तब भी बैंकों में खाता खोलकर काला-धन रखा ही जाता है। आयकर विभाग तमाम शहरों के कुछ बड़े दुकानदारों या बिजनेसमैन के यहां छापे डालकर लोगों में भ्रम पैदा करती है, सरकार सबको पकड़ रही है। क्या आप यह बात आसानी से मान लेंगे कि सांसदों, विधायकों के पास काला धन नहीं है। क्या सभी दलों के सांसदों या विधायकों के यहां छापे की ख़बर आपने सुनी है।
दुनिया में आप कहीं भी टैक्स चोरों का प्रतिशत देखेंगे कि ज़्यादातर बड़ी कंपनियां टैक्स चोरी करती हैं। आप उन्हें चोर कहेंगे तो वे आपके सामने कई तरह के टेक्नीकल नामों वाले एकाउंट्स रख देंगे। लेकिन कोई किसान दो लाख का लोन न चुका पाये तो उसके लिए ऐसे नामों वाले एकाउंट या बहीखाते नहीं होते। उसे या तो चोर बनने के डर से नहर में कूद कर जान देनी पड़ती है या ज़मीन गिरवी रखनी पड़ती है। क्या उनके लिए आपने सुना है कि कोई ट्राइब्यूनल है। 2015 में Independent Commission for the Reform of International Corporate Taxation(ICRIT) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अंतर्राष्ट्रीय कारपोरेट टैक्स सिस्टम बेकार हो चुकी है। अब बताइये, जिसकी तरह हम होना चाहते हैं, उसे ही बेकार और रद्दी कहा जा रहा है। इंटरनेट सर्च के दौरान ब्रिटेन के अख़बार गार्डियन में इस रिपोर्ट का ज़िक्र मिला है। इतने तथ्य और रिपोर्ट हैं कि आपको हर जानकारी को संशय के साथ देखना चाहिए। इस रिपोर्ट का कहना है कि मल्टीनेशनल कंपनियां जिस मात्रा में टैक्स चोरी करती हैं उसका भार अंत में सामान्य करदाताओं पर पड़ता है। क्योंकि सरकारें उनका तो कुछ बिगाड़ नहीं पाती हैं। एक दो छापे मारकर अपना गुणगान करती रहती हैं। इन मल्टीनेशनल कंपनियों के टैक्स लूट के कारण सरकारें गरीबी दूर करने या लोक कल्याण के कार्यक्रमों पर ख़र्चा कम कर देती हैं।
इसका मतलब यह है कि दुनिया भर की कर प्रणाली ऐसी है कि एक देश का अमीर दूसरे देश में अपना पैसा ले जाकर रख देगा। उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। इसी साल इंडियन एक्सप्रेस ने पनामा पेपर्स पर कई हफ्तों की रिपोर्ट छापी कि कैसे यहां के बड़े बड़े लोग फर्ज़ी कंपनी और शेयर के ज़रिये विदेशों में अपना पैसा रखे हुए हैं। सरकार जांच-वांच का एलान करती है मगर इस रफ्तार से काम करती है कि अंतिम नतीजा आते आते आप सबकुछ भूल चुके होंगे। नोटबंदी के सिलसिले में सब स्लोगन बोल रहे हैं। काला धन चला जाएगा। टैक्स चोरी बंद हो जाएगी। क्या भारत में नेशनल और मल्टीनेशनल कंपनियों की टैक्स चोरी बंद हो जाएगी? इस विश्वास का आधार क्या है? क्या अमरीका में 30 लाख करोड़ रुपये की टैक्स चोरी ग़रीब और आम आदमी करता है। वहां भी बड़ी कंपनियां टैक्स चोरी करती हैं। जानबूझ कर करती हैं ताकि टैक्स अदालतों में लंबे समय तक मामला चले और फिर अदालत के बाहर कुछ ले-दे कर सुलझा लिया जाए।
अमरीका में 70 प्रतिशत लोगों के पास डेबिट या क्रेडिट कार्ड हैं। आखिर अमरीका जैसे अति विकसित देश में 30 प्रतिशत लोगों के पास कार्ड क्यों नहीं है। ज़ाहिर है वे निर्धन होंगे। उनके पास बैंक में रखने के लिए पैसे नहीं होंगे। बैंक भी सबका खाता नहीं खोलते हैं। ग़रीब लोगों को अमरीका क्या भारत में भी कंपनियां क्रेडिट कार्ड नहीं देती हैं। अमरीका में भी दिहाड़ी मज़दूर होते हैं जो नगद में कमाते हैं। वहां क्यों नहीं इसे पूरी तरह ख़त्म कर दिया गया जो भारत में कुछ लोग इसे राष्ट्रवाद में लपेट कर धमकी भरे स्वर में बता रहे हैं कि यह आर्थिक तकलीफों से मुक्ति का श्रेष्ठ मार्ग है। गार्डियन अखबार में कैशलेश अर्थव्यवस्था पर आर्थिक पत्रकार Dominic Frisby का एक क्रिटिकल आर्टिकल पढ़ा। इसमें उन्होंने कहा है कि कैशलेश का नारा दरअसल ग़रीबों के ख़िलाफ़ युद्ध का नारा है। ग़रीबी के ख़िलाफ़ नहीं। उन्होंने कहा है कि जिस तरह से इसकी वकालत की जा रही है, उन नारों को सुनेंगे तो लगेगा कि नगद का इस्तमाल करने वाले लोग अपराधी हैं। आतंकवादी हैं। टैक्स चोर हैं। अब सवाल उठता है क़ि ये डिजिटलाइजेशन की सिक्योरिटी की ज़िम्मेदारी कौन लेगा? जबतक आप ज़मीन पर सुधार नहीं करेगे हवा को कैसे साफ करेंगे? कोई मुझे बीएमसी का एक काम बिना पैसे के करवा के दिखा दे तो मैं जानूं, पहले वो तो ख़तम करो. ओनलाइन सिक्योरिटी की ये हालत है क़ि राहुल गाँधी जैसे बड़े नेता का ट्विटर एकाउन्ट हैक हो गया, फिर कांग्रेस का हो गया, फिर मोदी जी का एप हैक हो गया, कुछ दिन पहले खबर आई क़ि देश के 30 लाख डेबिट कार्ड्स की जानकारी हैक हो गई, कई करोड़ रुपए तो निकाल भी लिए गए, सरकारों की वेबसाइट्स हैक हो रही हैं लेकिन कोई भी हैकर पकड़ा नहीं गया. देश में ई कॉमर्स करोड़ो का कारोबार हो रहा है लेकिन उनकी चारसौ बीसी के खिलाफ एक ढंग का क़ानून नहीं है, और ना ही कोई शिकायत का ठीक ठाक फोरम. इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा?
भारत के पूरे काले धन का 6% केवल कैश में है, और भारत के पूरे कैश का  86% नोट बंद हो गया है, केवल 14% पर भारत चल रहा है. तो हम केवल 6% के लिए पूरे देश को कैसे लाइन में लगा सकते हैं? बाकी का 94% ब्लैक मनी पर तो कुछ भी एक्शन ही नहीं हो रहा है? मतलब साफ है ये केवल और केवल सर्जिकल स्टाइक के जैसे राजनीतिक फायदे के लिए हुआ था, नहीं तो चार दिन पहले फिर से 7 जवान कैसे शहीद हो गए? कैसी सुरक्षा है तुम्हारी? पिछले 4 महीने में 41 जवान शहीद हो चुके हैं और एटीएम में खड़े आदमी को सेना के जवान के साथ जोड़कर उसकी अहमियत को कम करते हैं. हमारा काम लाइन में लगना नहीं है, अगर मैं छुट्टी करके लाइन में लगूंगा तो कमाउँगा क्या? फिर खाने और खरीदने को क्या होगा? फिर सरकार टैक्स कैसे ले पाएगी मुझसे? फिर उन सैनिकों को सेलरी कैसे देगी?  कहते हैं कहाँ नुकसान हुआ? अरे गाँवों में जाकर देखो, लोगों के खेत सूख गए, मजदूर और किसान सुबह जाते हैं लाइन में लगने और शाम को 2000 लेकर आते हैं जो कोई दुकानदार लेता नहीं है, मजदूरों को काम नहीं मिल रहा है, बच्चे भूखे मर रहे हैं. मेरे गाँव में लोगों के कोल्डस्टोरेज में रखे हज़ारों क्विंटल आलू सीजन पर कोई खरीद नहीं रहा है, कल मेरे चाचा ही दिल्ली की आज़ाद मंडी लेकर गए तो ट्रक का भाड़ा तक नहीं निकला जो आलू 1400 रुपए पैकेट था 8 तारीख के पहले वो 350 रुपए में बिका. बहुत लोगों ने तो कोल्ड स्टोरेज से निकाले ही नहीं. बहुत लोगों ने तो फेक दिए, मिर्ची की भी फसल का वहाँ अंतिम समय है कोई व्यापारी खरीद नहीं रहा है, गेंहूँ की फसल 20-25 दिन लेट हुई जा रही है, अगले साल के उत्पादन में बहुत कमी होने वाली है. फिर देखते हैं यही कैश ही खा लेना सब लोग. धारावी भिवंडी के कारखाने बंद होने से प्रवासी मजदूर वापस जा रहे हैं, इसका असर भले ही अभी आपको ना दिखे लेकिन अगले 2-3 साल तक जीडीपी की 2-3% कमी के साथ होगा.
अब आते हैं इलेक्ट्रिक पेमेंट सिस्टम पर. देश में कितने % लोग हैं जो स्मार्ट फ़ोन यूज करते हैं? क्या देश में आपके एप डाउनलोड करके सपोर्ट करने वाले ही रहते हैं? देश में बहुत लोग अनपढ़ और ग़रीब हैं वो क्रेडिट डेबिट कार्ड या एप नहीं चला सकते हैं. अमेरिका का उदाहरण तो मैने दिया ना? फिर इससे मंहगाई तो बढ़ेगी ही ना? हर दुकानदार इन सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों को 2-3% सर्विस चार्ज देगा तो वो अपना मार्जिन तो उतना ही रखेगा, और आम आदमी से वसूलेगा.
अंत में एक सवाल और आपसे करना चाहता हूँ क़ि क्या कोई मर्डर कर दे और कह दे क़ि मैं आरोपी हूँ तो वो बच जाना चाहिए? नहीं ना? ठीक उसी तरह एक काला धन रखने वाला अपना कालाधन बता कर कैसे बच सकता है? चाहे वो आतंकवाद का पैसा हो? चाहे वो लोगों की हत्याएँ कराकर कमाया गया पैसा हो? चाहे वो चोरी का पैसा हो? चाहे वो ड्रग्स सप्लाई करके कमाया गया पैसा हो? मार्केट में दलाल लोग 20-30% में नोट बदल कर दे रहे हैं, लेकिन वो नोट भी कालेधन में ही रहते हैं, इसलिए सरकार ने इसी लाइन में आकर 50% में उसको पूरा सफेद करने का ठेका ले लिया. पीएम बोलते थे कि जिसके पास भी कालाधन है बचेगा नहीं? गंगा में नोट बहाने से कोई नहीं बचेगा? लेकिन ये सब जोश तब ठंडा हुआ जब इनके कॉरपोरेट आकाओं के यहाँ से फ़ोन आया होगा? वही कॉरपोरेट आका जिनको 1 रुपए में ज़मीन दी जाती है, कांग्रेस भी उनसे करोड़ो रुपए चंदा लेती थी, आज बीजेपी भी लेती है. 2014 के चुनाव में मोदी जी ने अपने चुनाव प्रचार पर 600 करोड़ रुपए खर्चा किए थे, वो कहाँ से आए थे? आज भी यूपी के चुनाव में वो रैलियाँ हो रही हैं. अड़ानी के प्लेन में घूमने वाले मोदी भिखारी कैसे हो गए? 10 लाख का सूट पहनने वाले फकीर कैसे हो गए? ट्रिकल डाउन थ्योरी इकॉनोमी (मतलब अमीर का विकास होगा तो ग़रीब का खुद ब खुद हो जाएगा) ऐसा सोचनें वाले ग़रीबों के हमदर्द कैसे हो गए? ऐसे में सवाल उठता है क़ि वो आदमी क्यों रोता है जो पिछले समय में लाशों के अंबार देखकर कभी नहीं रोया होगा? ये गुण एक तानाशाह के गुण हैं, रवीन्द्र नाथ टैगोर ने 1889 में लिखा था क़ि दुनियाँ का हर तानाशाह राष्ट्रवाद का चेहरा लगाकर आगे बढ़ता है, वो जनता के बीच अपने झंडे(भगवा) को नीचे रखकर देश के झंडे (तिरंगे) को लेकर जाता है. कभी इंदिरा इज इंडिया कहा जाता था आज मोदी भक्ति को देश भक्ति कहा जाता है. हो सकता है मुझे भी देशभक्त ना समझा जाए, लेकिन ये लोकतंत्र है "लोक" का मतलब होता है लोग......... और लोग केवल मुंबई दिल्ली में ही नहीं गाँवों में भी रहते हैं, स्मार्ट फ़ोन नहीं हो सकता हैं उनके पास, जिनके पास रोटी नहीं है. अभी एक महीने पहले यूएन की वर्ड हॅंगर इंडेक्स की रिपोर्ट आई जिसमें भुखमरी और कुपोषण के मामले में बांग्लादेश और नेपाल तक हमसे आगे हैं, हम  पूरे विश्व में 97 नंबर पर हैं और पाकिस्तान 105 मतलब खुश हो सकते हैं क़ि पाकिस्तान से आगे हैं.
नोटबंदी ने हमें अपनी आर्थिक समझ का विस्तार करने का सुनहरा मौका दिया है। हमें नारों को ज्ञान नहीं समझना चाहिए। किसी बात को अंतिम रूप से स्वीकार करने की जगह, तमाम तरह की जानकारियों को जुटाइये। तरह तरह के सवाल पूछिये। फैसला सही है या नहीं है, इसके फेर में क्यों पड़े हैं। फैसला हो चुका है। इसके अच्छे-बुरे असर को जानना चाहिए और इसके बहाने समझ का विस्तार करना चाहिए। हम सब जानते हैं कि राजनीतिक रैलियों में लोग कैसे लाये जाते हैं। ज़ाहिर है अब नेता उन्हें हज़ार-पांच सौ का चेक देकर तो नहीं लायेंगे। नेता ही कहते हैं कि उनकी रैली में पैसे देकर लोग लाए गए थे। अब ऐसी रैली में अगर कोई काला धन की समाप्ति का एलान करे तो पैसे लेकर आई भीड़ ताली तो बजा देगी लेकिन जिस असलीयत को वह जानती है, उससे आंखें कैसे चुरा सकती है। एक काम हो सकता है कि जिस रैली में काला धन की समाप्ति का एलान हो, उसमें कहा जाए कि यहां आई जनता को पैसे देकर नहीं लाया गया है। इस रैली के आयोजन में इतना पैसा ख़र्च हुआ है, कुर्सी से लेकर माइक के लिए इतना इतना किराया देना पड़ा है, इन इन लोगों ने रैली के लिए चंदा दिया है। बेहतर है कि नोटबंदी के लोग किये जा रहे दावों को छोड़ हम सवालों से देखें। हर जवाब हमारी आर्थिक समझदारी को विकसित करेगा। हम भी उतने योग्य नहीं है कि अर्थव्यवस्था के इन बारीक सवालों को दावे के साथ रख सकें। मैंने कोई अंतिम बात नहीं की है। आप भी अंतिम बात जानने का मोह छोड़ दें, नई बातें जानने की बेचैनियों का विस्तार करें।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...