ये कैशलेस इकॉनमी क्या है? क्या इससे जीडीपी बढ जाएगा? क्या टैक्स चोरी खत्म हो जाती है, मेरे लिए यह नया विषय था तो थोडा रिसर्च करना पडा। देखा तो पाया कि अमेरिका में 30 से 32 लाख करोड़ की टैक्स चोरी हर साल होती है। जिस तरह से भारत में आयकर विभाग है उसी तरह से अमेरिका के इंटरनल रेवेन्यू सर्विस की एक रिपोर्ट इसी साल अप्रैल में छपी है। इस रिपोर्ट के अनुसार 2008 से 2010 के बीच हर साल औसतन 458 अरब डालर की टैक्स चोरी हुई है। अगर मैंने इसका भारतीय मुद्रा में सही हिसाब लगाया है तो अमरीका में 30 से 32 लाख करोड़ रुपये सालाना टैक्स चोरी हो जाती है। यह आंकड़ा इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में नोटबंदी के बाद से कैशलेश का ऐसा प्रचार किया जा रहा है जैसे ये हाजमोला की गोली है जो अर्थव्यवस्था की बदहज़मियों को दूर कर देगी। कहा जा रहा है कि भारत में टैक्स चोरी बंद हो जाएगी या कम से कम हो जाएगी लेकिन अमेरिका में कहाँ कम हो गई। कहां बंद हो गई है।
फ्रांस की संसद की रिपोर्ट है कि हर साल 40 से 60 अरब यूरो की टैक्स चोरी होती है। 60 अरब यूरो को भारतीय मुद्रा में बदलेंगे तो यह चार लाख करोड़ होता है। वहां का टैक्स विभाग 60 अरब यूरो की कर चोरी में से 10 से 12 अरब यूरो ही वसूल पाता है। यानी 30 से 50 अरब यूरो की टैक्स चोरी वहां भी हो ही जाती है। ब्रिटेन में हर साल 16 अरब यूरो की टैक्सचोरी होती है। भारतीय मुद्रा में 11 हज़ार करोड़ की चोरी। जापान के नेशनल टैक्स एजेंसी ने इस साल की रिपोर्ट मे कहा है कि इस साल 13.8 अरब येन की टैक्स चोरी हुई है। भारतीय मुद्रा में 850 करोड़ की टैक्स चोरी होती है।1974 के बाद वहां इस साल सबसे कम टैक्स चोरी हुई है।
मान लीजिए कि पूरी आबादी इलेक्ट्रानिक तरीके से लेन-देन करती है तो भी यह गारंटी कौन अर्थशास्त्री दे रहा है कि उन तमाम लेन-देन की निगरानी सरकारें कर लेंगी। क्या यह उनके लिए मुमकिन होगा। अगर ऐसा है तो सरकार सभी बैंक खातों की जांच कर ले। हमारे बैंक तो इलेक्ट्रानिक हैं न। कई लोग कहते हैं कि बैंकों में अभी भी लोगों के कई नाम से खाते खुले हैं। बैंक अपने ग्राहकों से पहचान पत्र मांगता है तब भी बैंकों में खाता खोलकर काला-धन रखा ही जाता है। आयकर विभाग तमाम शहरों के कुछ बड़े दुकानदारों या बिजनेसमैन के यहां छापे डालकर लोगों में भ्रम पैदा करती है, सरकार सबको पकड़ रही है। क्या आप यह बात आसानी से मान लेंगे कि सांसदों, विधायकों के पास काला धन नहीं है। क्या सभी दलों के सांसदों या विधायकों के यहां छापे की ख़बर आपने सुनी है।
दुनिया में आप कहीं भी टैक्स चोरों का प्रतिशत देखेंगे कि ज़्यादातर बड़ी कंपनियां टैक्स चोरी करती हैं। आप उन्हें चोर कहेंगे तो वे आपके सामने कई तरह के टेक्नीकल नामों वाले एकाउंट्स रख देंगे। लेकिन कोई किसान दो लाख का लोन न चुका पाये तो उसके लिए ऐसे नामों वाले एकाउंट या बहीखाते नहीं होते। उसे या तो चोर बनने के डर से नहर में कूद कर जान देनी पड़ती है या ज़मीन गिरवी रखनी पड़ती है। क्या उनके लिए आपने सुना है कि कोई ट्राइब्यूनल है। 2015 में Independent Commission for the Reform of International Corporate Taxation(ICRIT) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अंतर्राष्ट्रीय कारपोरेट टैक्स सिस्टम बेकार हो चुकी है। अब बताइये, जिसकी तरह हम होना चाहते हैं, उसे ही बेकार और रद्दी कहा जा रहा है। इंटरनेट सर्च के दौरान ब्रिटेन के अख़बार गार्डियन में इस रिपोर्ट का ज़िक्र मिला है। इतने तथ्य और रिपोर्ट हैं कि आपको हर जानकारी को संशय के साथ देखना चाहिए। इस रिपोर्ट का कहना है कि मल्टीनेशनल कंपनियां जिस मात्रा में टैक्स चोरी करती हैं उसका भार अंत में सामान्य करदाताओं पर पड़ता है। क्योंकि सरकारें उनका तो कुछ बिगाड़ नहीं पाती हैं। एक दो छापे मारकर अपना गुणगान करती रहती हैं। इन मल्टीनेशनल कंपनियों के टैक्स लूट के कारण सरकारें गरीबी दूर करने या लोक कल्याण के कार्यक्रमों पर ख़र्चा कम कर देती हैं।
इसका मतलब यह है कि दुनिया भर की कर प्रणाली ऐसी है कि एक देश का अमीर दूसरे देश में अपना पैसा ले जाकर रख देगा। उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। इसी साल इंडियन एक्सप्रेस ने पनामा पेपर्स पर कई हफ्तों की रिपोर्ट छापी कि कैसे यहां के बड़े बड़े लोग फर्ज़ी कंपनी और शेयर के ज़रिये विदेशों में अपना पैसा रखे हुए हैं। सरकार जांच-वांच का एलान करती है मगर इस रफ्तार से काम करती है कि अंतिम नतीजा आते आते आप सबकुछ भूल चुके होंगे। नोटबंदी के सिलसिले में सब स्लोगन बोल रहे हैं। काला धन चला जाएगा। टैक्स चोरी बंद हो जाएगी। क्या भारत में नेशनल और मल्टीनेशनल कंपनियों की टैक्स चोरी बंद हो जाएगी? इस विश्वास का आधार क्या है? क्या अमरीका में 30 लाख करोड़ रुपये की टैक्स चोरी ग़रीब और आम आदमी करता है। वहां भी बड़ी कंपनियां टैक्स चोरी करती हैं। जानबूझ कर करती हैं ताकि टैक्स अदालतों में लंबे समय तक मामला चले और फिर अदालत के बाहर कुछ ले-दे कर सुलझा लिया जाए।
अमरीका में 70 प्रतिशत लोगों के पास डेबिट या क्रेडिट कार्ड हैं। आखिर अमरीका जैसे अति विकसित देश में 30 प्रतिशत लोगों के पास कार्ड क्यों नहीं है। ज़ाहिर है वे निर्धन होंगे। उनके पास बैंक में रखने के लिए पैसे नहीं होंगे। बैंक भी सबका खाता नहीं खोलते हैं। ग़रीब लोगों को अमरीका क्या भारत में भी कंपनियां क्रेडिट कार्ड नहीं देती हैं। अमरीका में भी दिहाड़ी मज़दूर होते हैं जो नगद में कमाते हैं। वहां क्यों नहीं इसे पूरी तरह ख़त्म कर दिया गया जो भारत में कुछ लोग इसे राष्ट्रवाद में लपेट कर धमकी भरे स्वर में बता रहे हैं कि यह आर्थिक तकलीफों से मुक्ति का श्रेष्ठ मार्ग है। गार्डियन अखबार में कैशलेश अर्थव्यवस्था पर आर्थिक पत्रकार Dominic Frisby का एक क्रिटिकल आर्टिकल पढ़ा। इसमें उन्होंने कहा है कि कैशलेश का नारा दरअसल ग़रीबों के ख़िलाफ़ युद्ध का नारा है। ग़रीबी के ख़िलाफ़ नहीं। उन्होंने कहा है कि जिस तरह से इसकी वकालत की जा रही है, उन नारों को सुनेंगे तो लगेगा कि नगद का इस्तमाल करने वाले लोग अपराधी हैं। आतंकवादी हैं। टैक्स चोर हैं। अब सवाल उठता है क़ि ये डिजिटलाइजेशन की सिक्योरिटी की ज़िम्मेदारी कौन लेगा? जबतक आप ज़मीन पर सुधार नहीं करेगे हवा को कैसे साफ करेंगे? कोई मुझे बीएमसी का एक काम बिना पैसे के करवा के दिखा दे तो मैं जानूं, पहले वो तो ख़तम करो. ओनलाइन सिक्योरिटी की ये हालत है क़ि राहुल गाँधी जैसे बड़े नेता का ट्विटर एकाउन्ट हैक हो गया, फिर कांग्रेस का हो गया, फिर मोदी जी का एप हैक हो गया, कुछ दिन पहले खबर आई क़ि देश के 30 लाख डेबिट कार्ड्स की जानकारी हैक हो गई, कई करोड़ रुपए तो निकाल भी लिए गए, सरकारों की वेबसाइट्स हैक हो रही हैं लेकिन कोई भी हैकर पकड़ा नहीं गया. देश में ई कॉमर्स करोड़ो का कारोबार हो रहा है लेकिन उनकी चारसौ बीसी के खिलाफ एक ढंग का क़ानून नहीं है, और ना ही कोई शिकायत का ठीक ठाक फोरम. इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा?
भारत के पूरे काले धन का 6% केवल कैश में है, और भारत के पूरे कैश का 86% नोट बंद हो गया है, केवल 14% पर भारत चल रहा है. तो हम केवल 6% के लिए पूरे देश को कैसे लाइन में लगा सकते हैं? बाकी का 94% ब्लैक मनी पर तो कुछ भी एक्शन ही नहीं हो रहा है? मतलब साफ है ये केवल और केवल सर्जिकल स्टाइक के जैसे राजनीतिक फायदे के लिए हुआ था, नहीं तो चार दिन पहले फिर से 7 जवान कैसे शहीद हो गए? कैसी सुरक्षा है तुम्हारी? पिछले 4 महीने में 41 जवान शहीद हो चुके हैं और एटीएम में खड़े आदमी को सेना के जवान के साथ जोड़कर उसकी अहमियत को कम करते हैं. हमारा काम लाइन में लगना नहीं है, अगर मैं छुट्टी करके लाइन में लगूंगा तो कमाउँगा क्या? फिर खाने और खरीदने को क्या होगा? फिर सरकार टैक्स कैसे ले पाएगी मुझसे? फिर उन सैनिकों को सेलरी कैसे देगी? कहते हैं कहाँ नुकसान हुआ? अरे गाँवों में जाकर देखो, लोगों के खेत सूख गए, मजदूर और किसान सुबह जाते हैं लाइन में लगने और शाम को 2000 लेकर आते हैं जो कोई दुकानदार लेता नहीं है, मजदूरों को काम नहीं मिल रहा है, बच्चे भूखे मर रहे हैं. मेरे गाँव में लोगों के कोल्डस्टोरेज में रखे हज़ारों क्विंटल आलू सीजन पर कोई खरीद नहीं रहा है, कल मेरे चाचा ही दिल्ली की आज़ाद मंडी लेकर गए तो ट्रक का भाड़ा तक नहीं निकला जो आलू 1400 रुपए पैकेट था 8 तारीख के पहले वो 350 रुपए में बिका. बहुत लोगों ने तो कोल्ड स्टोरेज से निकाले ही नहीं. बहुत लोगों ने तो फेक दिए, मिर्ची की भी फसल का वहाँ अंतिम समय है कोई व्यापारी खरीद नहीं रहा है, गेंहूँ की फसल 20-25 दिन लेट हुई जा रही है, अगले साल के उत्पादन में बहुत कमी होने वाली है. फिर देखते हैं यही कैश ही खा लेना सब लोग. धारावी भिवंडी के कारखाने बंद होने से प्रवासी मजदूर वापस जा रहे हैं, इसका असर भले ही अभी आपको ना दिखे लेकिन अगले 2-3 साल तक जीडीपी की 2-3% कमी के साथ होगा.
अब आते हैं इलेक्ट्रिक पेमेंट सिस्टम पर. देश में कितने % लोग हैं जो स्मार्ट फ़ोन यूज करते हैं? क्या देश में आपके एप डाउनलोड करके सपोर्ट करने वाले ही रहते हैं? देश में बहुत लोग अनपढ़ और ग़रीब हैं वो क्रेडिट डेबिट कार्ड या एप नहीं चला सकते हैं. अमेरिका का उदाहरण तो मैने दिया ना? फिर इससे मंहगाई तो बढ़ेगी ही ना? हर दुकानदार इन सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों को 2-3% सर्विस चार्ज देगा तो वो अपना मार्जिन तो उतना ही रखेगा, और आम आदमी से वसूलेगा.
अंत में एक सवाल और आपसे करना चाहता हूँ क़ि क्या कोई मर्डर कर दे और कह दे क़ि मैं आरोपी हूँ तो वो बच जाना चाहिए? नहीं ना? ठीक उसी तरह एक काला धन रखने वाला अपना कालाधन बता कर कैसे बच सकता है? चाहे वो आतंकवाद का पैसा हो? चाहे वो लोगों की हत्याएँ कराकर कमाया गया पैसा हो? चाहे वो चोरी का पैसा हो? चाहे वो ड्रग्स सप्लाई करके कमाया गया पैसा हो? मार्केट में दलाल लोग 20-30% में नोट बदल कर दे रहे हैं, लेकिन वो नोट भी कालेधन में ही रहते हैं, इसलिए सरकार ने इसी लाइन में आकर 50% में उसको पूरा सफेद करने का ठेका ले लिया. पीएम बोलते थे कि जिसके पास भी कालाधन है बचेगा नहीं? गंगा में नोट बहाने से कोई नहीं बचेगा? लेकिन ये सब जोश तब ठंडा हुआ जब इनके कॉरपोरेट आकाओं के यहाँ से फ़ोन आया होगा? वही कॉरपोरेट आका जिनको 1 रुपए में ज़मीन दी जाती है, कांग्रेस भी उनसे करोड़ो रुपए चंदा लेती थी, आज बीजेपी भी लेती है. 2014 के चुनाव में मोदी जी ने अपने चुनाव प्रचार पर 600 करोड़ रुपए खर्चा किए थे, वो कहाँ से आए थे? आज भी यूपी के चुनाव में वो रैलियाँ हो रही हैं. अड़ानी के प्लेन में घूमने वाले मोदी भिखारी कैसे हो गए? 10 लाख का सूट पहनने वाले फकीर कैसे हो गए? ट्रिकल डाउन थ्योरी इकॉनोमी (मतलब अमीर का विकास होगा तो ग़रीब का खुद ब खुद हो जाएगा) ऐसा सोचनें वाले ग़रीबों के हमदर्द कैसे हो गए? ऐसे में सवाल उठता है क़ि वो आदमी क्यों रोता है जो पिछले समय में लाशों के अंबार देखकर कभी नहीं रोया होगा? ये गुण एक तानाशाह के गुण हैं, रवीन्द्र नाथ टैगोर ने 1889 में लिखा था क़ि दुनियाँ का हर तानाशाह राष्ट्रवाद का चेहरा लगाकर आगे बढ़ता है, वो जनता के बीच अपने झंडे(भगवा) को नीचे रखकर देश के झंडे (तिरंगे) को लेकर जाता है. कभी इंदिरा इज इंडिया कहा जाता था आज मोदी भक्ति को देश भक्ति कहा जाता है. हो सकता है मुझे भी देशभक्त ना समझा जाए, लेकिन ये लोकतंत्र है "लोक" का मतलब होता है लोग......... और लोग केवल मुंबई दिल्ली में ही नहीं गाँवों में भी रहते हैं, स्मार्ट फ़ोन नहीं हो सकता हैं उनके पास, जिनके पास रोटी नहीं है. अभी एक महीने पहले यूएन की वर्ड हॅंगर इंडेक्स की रिपोर्ट आई जिसमें भुखमरी और कुपोषण के मामले में बांग्लादेश और नेपाल तक हमसे आगे हैं, हम पूरे विश्व में 97 नंबर पर हैं और पाकिस्तान 105 मतलब खुश हो सकते हैं क़ि पाकिस्तान से आगे हैं.
भारत के पूरे काले धन का 6% केवल कैश में है, और भारत के पूरे कैश का 86% नोट बंद हो गया है, केवल 14% पर भारत चल रहा है. तो हम केवल 6% के लिए पूरे देश को कैसे लाइन में लगा सकते हैं? बाकी का 94% ब्लैक मनी पर तो कुछ भी एक्शन ही नहीं हो रहा है? मतलब साफ है ये केवल और केवल सर्जिकल स्टाइक के जैसे राजनीतिक फायदे के लिए हुआ था, नहीं तो चार दिन पहले फिर से 7 जवान कैसे शहीद हो गए? कैसी सुरक्षा है तुम्हारी? पिछले 4 महीने में 41 जवान शहीद हो चुके हैं और एटीएम में खड़े आदमी को सेना के जवान के साथ जोड़कर उसकी अहमियत को कम करते हैं. हमारा काम लाइन में लगना नहीं है, अगर मैं छुट्टी करके लाइन में लगूंगा तो कमाउँगा क्या? फिर खाने और खरीदने को क्या होगा? फिर सरकार टैक्स कैसे ले पाएगी मुझसे? फिर उन सैनिकों को सेलरी कैसे देगी? कहते हैं कहाँ नुकसान हुआ? अरे गाँवों में जाकर देखो, लोगों के खेत सूख गए, मजदूर और किसान सुबह जाते हैं लाइन में लगने और शाम को 2000 लेकर आते हैं जो कोई दुकानदार लेता नहीं है, मजदूरों को काम नहीं मिल रहा है, बच्चे भूखे मर रहे हैं. मेरे गाँव में लोगों के कोल्डस्टोरेज में रखे हज़ारों क्विंटल आलू सीजन पर कोई खरीद नहीं रहा है, कल मेरे चाचा ही दिल्ली की आज़ाद मंडी लेकर गए तो ट्रक का भाड़ा तक नहीं निकला जो आलू 1400 रुपए पैकेट था 8 तारीख के पहले वो 350 रुपए में बिका. बहुत लोगों ने तो कोल्ड स्टोरेज से निकाले ही नहीं. बहुत लोगों ने तो फेक दिए, मिर्ची की भी फसल का वहाँ अंतिम समय है कोई व्यापारी खरीद नहीं रहा है, गेंहूँ की फसल 20-25 दिन लेट हुई जा रही है, अगले साल के उत्पादन में बहुत कमी होने वाली है. फिर देखते हैं यही कैश ही खा लेना सब लोग. धारावी भिवंडी के कारखाने बंद होने से प्रवासी मजदूर वापस जा रहे हैं, इसका असर भले ही अभी आपको ना दिखे लेकिन अगले 2-3 साल तक जीडीपी की 2-3% कमी के साथ होगा.
अब आते हैं इलेक्ट्रिक पेमेंट सिस्टम पर. देश में कितने % लोग हैं जो स्मार्ट फ़ोन यूज करते हैं? क्या देश में आपके एप डाउनलोड करके सपोर्ट करने वाले ही रहते हैं? देश में बहुत लोग अनपढ़ और ग़रीब हैं वो क्रेडिट डेबिट कार्ड या एप नहीं चला सकते हैं. अमेरिका का उदाहरण तो मैने दिया ना? फिर इससे मंहगाई तो बढ़ेगी ही ना? हर दुकानदार इन सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों को 2-3% सर्विस चार्ज देगा तो वो अपना मार्जिन तो उतना ही रखेगा, और आम आदमी से वसूलेगा.
अंत में एक सवाल और आपसे करना चाहता हूँ क़ि क्या कोई मर्डर कर दे और कह दे क़ि मैं आरोपी हूँ तो वो बच जाना चाहिए? नहीं ना? ठीक उसी तरह एक काला धन रखने वाला अपना कालाधन बता कर कैसे बच सकता है? चाहे वो आतंकवाद का पैसा हो? चाहे वो लोगों की हत्याएँ कराकर कमाया गया पैसा हो? चाहे वो चोरी का पैसा हो? चाहे वो ड्रग्स सप्लाई करके कमाया गया पैसा हो? मार्केट में दलाल लोग 20-30% में नोट बदल कर दे रहे हैं, लेकिन वो नोट भी कालेधन में ही रहते हैं, इसलिए सरकार ने इसी लाइन में आकर 50% में उसको पूरा सफेद करने का ठेका ले लिया. पीएम बोलते थे कि जिसके पास भी कालाधन है बचेगा नहीं? गंगा में नोट बहाने से कोई नहीं बचेगा? लेकिन ये सब जोश तब ठंडा हुआ जब इनके कॉरपोरेट आकाओं के यहाँ से फ़ोन आया होगा? वही कॉरपोरेट आका जिनको 1 रुपए में ज़मीन दी जाती है, कांग्रेस भी उनसे करोड़ो रुपए चंदा लेती थी, आज बीजेपी भी लेती है. 2014 के चुनाव में मोदी जी ने अपने चुनाव प्रचार पर 600 करोड़ रुपए खर्चा किए थे, वो कहाँ से आए थे? आज भी यूपी के चुनाव में वो रैलियाँ हो रही हैं. अड़ानी के प्लेन में घूमने वाले मोदी भिखारी कैसे हो गए? 10 लाख का सूट पहनने वाले फकीर कैसे हो गए? ट्रिकल डाउन थ्योरी इकॉनोमी (मतलब अमीर का विकास होगा तो ग़रीब का खुद ब खुद हो जाएगा) ऐसा सोचनें वाले ग़रीबों के हमदर्द कैसे हो गए? ऐसे में सवाल उठता है क़ि वो आदमी क्यों रोता है जो पिछले समय में लाशों के अंबार देखकर कभी नहीं रोया होगा? ये गुण एक तानाशाह के गुण हैं, रवीन्द्र नाथ टैगोर ने 1889 में लिखा था क़ि दुनियाँ का हर तानाशाह राष्ट्रवाद का चेहरा लगाकर आगे बढ़ता है, वो जनता के बीच अपने झंडे(भगवा) को नीचे रखकर देश के झंडे (तिरंगे) को लेकर जाता है. कभी इंदिरा इज इंडिया कहा जाता था आज मोदी भक्ति को देश भक्ति कहा जाता है. हो सकता है मुझे भी देशभक्त ना समझा जाए, लेकिन ये लोकतंत्र है "लोक" का मतलब होता है लोग......... और लोग केवल मुंबई दिल्ली में ही नहीं गाँवों में भी रहते हैं, स्मार्ट फ़ोन नहीं हो सकता हैं उनके पास, जिनके पास रोटी नहीं है. अभी एक महीने पहले यूएन की वर्ड हॅंगर इंडेक्स की रिपोर्ट आई जिसमें भुखमरी और कुपोषण के मामले में बांग्लादेश और नेपाल तक हमसे आगे हैं, हम पूरे विश्व में 97 नंबर पर हैं और पाकिस्तान 105 मतलब खुश हो सकते हैं क़ि पाकिस्तान से आगे हैं.
नोटबंदी ने हमें अपनी आर्थिक समझ का विस्तार करने का सुनहरा मौका दिया है। हमें नारों को ज्ञान नहीं समझना चाहिए। किसी बात को अंतिम रूप से स्वीकार करने की जगह, तमाम तरह की जानकारियों को जुटाइये। तरह तरह के सवाल पूछिये। फैसला सही है या नहीं है, इसके फेर में क्यों पड़े हैं। फैसला हो चुका है। इसके अच्छे-बुरे असर को जानना चाहिए और इसके बहाने समझ का विस्तार करना चाहिए। हम सब जानते हैं कि राजनीतिक रैलियों में लोग कैसे लाये जाते हैं। ज़ाहिर है अब नेता उन्हें हज़ार-पांच सौ का चेक देकर तो नहीं लायेंगे। नेता ही कहते हैं कि उनकी रैली में पैसे देकर लोग लाए गए थे। अब ऐसी रैली में अगर कोई काला धन की समाप्ति का एलान करे तो पैसे लेकर आई भीड़ ताली तो बजा देगी लेकिन जिस असलीयत को वह जानती है, उससे आंखें कैसे चुरा सकती है। एक काम हो सकता है कि जिस रैली में काला धन की समाप्ति का एलान हो, उसमें कहा जाए कि यहां आई जनता को पैसे देकर नहीं लाया गया है। इस रैली के आयोजन में इतना पैसा ख़र्च हुआ है, कुर्सी से लेकर माइक के लिए इतना इतना किराया देना पड़ा है, इन इन लोगों ने रैली के लिए चंदा दिया है। बेहतर है कि नोटबंदी के लोग किये जा रहे दावों को छोड़ हम सवालों से देखें। हर जवाब हमारी आर्थिक समझदारी को विकसित करेगा। हम भी उतने योग्य नहीं है कि अर्थव्यवस्था के इन बारीक सवालों को दावे के साथ रख सकें। मैंने कोई अंतिम बात नहीं की है। आप भी अंतिम बात जानने का मोह छोड़ दें, नई बातें जानने की बेचैनियों का विस्तार करें।
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