Thursday, November 30, 2017

गुजरात में संयमित दिखती कांग्रेस

गुजरात चुनावों में जीत हासिल करने के लिए कांग्रेस संभल-संभल कदम रख रही है और अपनी खोई जमीन को पाने के लिए के लिए बीजेपी को घेरने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही है. गुजरात में सबसे ज्‍यादा आबादी हिन्‍दुओं की है इसलिए कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी भी हिन्‍दू वोट पाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. इतना ही नहीं कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला करने से भी बच रही है. क्‍योंकि 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान सोनिया गांधी ने तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी को 'मौत का सौदगार' कहा था जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा था.
गुजरात में 90 प्रतिशत आबादी हिन्‍दुओं की है और कांग्रेस पार्टी की नजर इन वोटरों पर है. यहीं वजह हे कि पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल, दलित आंदोलन के नेता जिग्‍नेश मेवाणी और ओबीसी आंदोलन के नेता अल्पेश ठाकोर को अपने साथ लेकर आ गई है. जब जिग्‍नेश मेवाणी ने वडगाम विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा की तो कांग्रेस के वर्तमान विधायक मणिभाई वाघेला ने इस सीट से चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया. वहीं अल्पेश ठाकोर कांग्रेस में शामिल हो गए तो हार्दिक पटेल भी कांग्रेस को समर्थन का ऐलान कर चुके हैं. राहुल गांधी अपनी तरफ से भी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं इसलिए वह अब तक 20 से ज्‍यादा मंदिर जा चुके हैं और अपनी हर रैली से पहले मंदिर में जाकर मत्‍था जरूर टेकते हैं. सोशल मीडिया पर भी राहुल गांधी ने अपनी रणनीति बदली है.राहुल ने अपनी डिजिटल टीम में कई बदलाव किए हैं और दिव्या स्पंदना उर्फ राम्या को टीम की हेड बनाया है. राहुल की ये टीम सोशल मीडिया पर व्‍यक्तिगत हमलों से बच रही है और मोदी सरकार को निशाना बनाकर कैंपन चला रही हैं. इसी के तहत ही सोशल मीडिया पर कांग्रेस ने 'विकास पागल हो गया' कैंपन चलाया. राहुल गांधी अपनी रैलियों के दौरान भी किसी पर व्‍यक्तिगत हमलों से जहां तक हो बचने की कोशिश कर रहे हैं. यहीं वजह है वह सरकार के फैसलों को लेकर बीजेपी को घेर रहे हैं. जैसे जीएसटी टैक्‍स पर उन्‍होंने केन्‍द्र सरकार को 'गब्‍बर सिंह टैक्‍स' के नाम पर घेरा था और नोटबंदी समेत केन्‍द्र सरकार के कई फैसलों पर उन्‍होंने सवाल खड़े किए. गुजरात दौरे के दौरान राहुल गांधी कई बार ऐसे फैसले लिए हैं जिससे पार्टी के नेता ही नहीं उनकी सुरक्षा में लगे पुलिसकर्मी भी दंग रह गए हैं. जैसे भरूच दौरे के दौरान जब एक लड़की उनकी गाड़ी के पास पहुंची तो उन्‍होंने उस लड़की को गाड़ी में ऊपर आने दिया. इसके बाद लड़की ने राहुल को बुके दिया और सेल्‍फी भी ली. इतना ही नहीं राहुल अपने दौरे के दौरान कई बार मंदिर जाने और पूजा करने का फैसला भी लिया. अब कांग्रेस में एक नया आत्‍मविश्‍वास आ गया है. राहुल गांधी अब पप्पू नहीं हैं जैसा कि ट्रेडिशनल और सोशल मीडिया में पेश किया जा रहा था. अब उन्हें अधिक गंभीरता से लिया जा रहा है, खासकर उनके बर्कले प्रवास के बाद. राहुल को लेकर मेनस्‍ट्रीम टीवी के कवरेज में भी एक बदलाव देखने को मिला है. अब पहले से बेहतर रूप से कवर किया जा रहा है और ज्यादा स्‍पेस भी दी जा रही है. दूसरा बदलाव मोदी की लोकप्रियता में एक निश्चित गिरावट के रूप में सामने आ रही है. उन्‍हें प्रत्‍यक्ष तौर पर नोटबंदी और जीएसटी को लेकर आर्थिक विकास में तेज गिरावट के लिए दोषी ठहराया जा रहा है. तीसरा और सबसे सबसे बड़ा कारण यह है कि मोदी राहुल गांधी, और कांग्रेस तथा उसके गुजरात कनेक्‍शन पर काफी हमला बोल रहे हैं. चुनावों के दौरान, मोदी सिर्फ अपने ऊपर चर्चा को केंद्रित करने में सफल रहते हैं. चाहे वह नाकारात्‍मक हो या साकारात्‍मक सबकुछ उनके इर्द-गिर्द ही घूमते रहता है. उनकी शैली ऐसी ही है कि वह अपने आसपास एक ध्रुवीकृत वातावरण बना लेते हैं जिसमें कोई उन्‍हें पसंद करे या उनसे घृणा करे लेकिन कभी भी उनकी अनदेखी नहीं कर सकता. लेकिन इस बार वह ऐसा जादू चलाने में असमर्थ दिख रहे हैं. राहुल और हार्दिक पटेल के गठबंधन ने मोदी को सकते में डाल दिया है और बीजेपी को डिफेंसिव मूड में ला दिया है. मोदी अब अपनी नीतियों पर सफाई देते नजर आ रहे हैं. 
राहुल गाँधी ने गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान कई मुद्दे उठाए हैं, जिसमें रोजगार, मकान और संसद के शीतकालीन सत्र में देरी जैसी मुद्दे उठाए. इतना ही न ही नहीं उन्‍होंने राफेल सौदा और जय शाह जैसे मुद्दों को भी अपनी चुनावी रैलियों में उठाया. 

Tuesday, November 28, 2017

वीपी सिंह एक समाजवादी नेता

राजपाट छोड़कर मांडा में एक मजदूर की ही तरह सिर पर मिट्टी ढोकर सड़क बनाने वाले, कोरांव में तालाब में फावड़े से मिट्टी खोदने वाले, एक विद्यालय में मास्टरी करने वाले और फिर उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री रहते एक घटना पर त्यागपत्र देने वाले, दो पहिया बुलेट मोटर साइकिल से ही पूरे देश में चुनाव प्रचार करने वाले, भ्रष्ट्राचार से लड़ने, टैक्स चोर पूंजीपतियों को देश छोड़ने पर मजबूर कर देने वाले सामाजिक न्याय के मसीहा, महान विचारक, कवि, चित्रकार और गरीबों के सबसे बड़े रहनुमा को उनकी पुण्यतिथि 27 नवम्बर पर शत्- शत् नमन, एक सच्ची श्रद्धांजलि. 
सच्चे अर्थों में वीपी सिंह, महात्मा बुद्ध (राजुमार सिद्धार्थ)के बाद  जन कल्याण के लिये अपना सब कुछ त्याग देने वाले आखिरी राजकुमार थे. आगे कई सदियों तक वीपी सिंह का नाम अमर रहेगा. राजनेताओं में वह भारत के दूसरे अम्बेडकर हैं, जिन्होंने गरीबों, पिछड़ों, दबे कुचले समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन कर भारतीय राजनीति की दिशा और दशा बदलने का काम किया है. यह अलग बात है कि बाबा साहब को मान्यवर कांशीराम ने दलितों का मसीहा बना दिया और उनके विचारों से बहुजन आन्दोलन पैदाकर राजनीति की धारा ही बदल दी. वहीं मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान से लेकर देवगौड़ा तक ने पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के पीठ में छूरा भोकने का काम किया. तीन माह पूर्व मुलायम सिंह यादव ने तो प्रेस कांन्फ्रेस कर कहा कि वीपी सिंह की ११ महींने की सरकार को उन्होंने ही गिरवाई थी. वीपी सिंह का पार्थिव शरीर जब इलाहाबाद पहुंचा तो बहन मायावती पूरे दिन वहां उपस्थित रहीं, लेकिन मुलायम वहां नजर नहीं आये.
वीपी सिंह दुबारा प्रधानमंत्री बनने से इंकार करने वाले शायद पहले राजनेता होंगे. बीमारी के बावजूद भूमि अधिग्रहण के विरोध में पूर्व प्रधान मंत्री वीपी सिंह स्वयं ट्रैक्टर चलाकर दादरी (उ.प्र.) अधिग्रहीत जमीन की जुताई करने पहुंच गए और पहली बार इस देश में किसान और उनका मुद्दा राजनीति की मुख्यधारा में पहुंचा. सहकारी बैंक से कर्जदार किसानों का कर्ज माफ करने वाले वह पहले प्रधानमंत्री थे..
आज जिस टैक्सचोरी रोकने व काले धन की बात की जा रही है, उस पर सबसे पहले वीपी सिंह ने ही लगाम लगाने की पहल की थी. जब धीरुभाई अम्बानी, अमिताभ बच्चन के भाई अजिताभ बच्चन सहित सैकड़ों टैक्सचोर भागकर विदेश में शरण लिये हुये थे, तब यही भाजपा वालों ने पूंजीपतियों को लेकर कमंडल रथ निकाला और एक ईमानदार प्रधानमंत्री को हटाकर ही दम लिया. वीपी सिंह एक मोटरसाइकिल से पूरे देश में प्रचार कर साबित कर दिया था कि उन्हें किसी टैक्स चोर के पैसे की जरुरत नहीं.
अयोध्या विवाद और आरक्षण आंदोलन के केंद्र रहे पूर्व पीएम वीपी सिंह की आज पुण्यतिथि है। वीपी वही 'कमज़ोर' प्रधानमंत्री थे जिन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कीं, जिन्हें इंदिरा जैसी 'ताकतवर' नेता तक लागू करने से बचती रही। सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए आरक्षण वीपी की सरकार ने ही सुनिश्चित किया। देश की सड़कों पर नाराज़ सवर्ण युवकों का हुजूम था। वो खुद को आग लगा रहे थे। जिस राजपूत समाज के वो नेता थे उसने भी उनमें अब दुश्मन खोज निकाला था। कहा जाता है कि डिप्टी पीएम देवीलाल की सियासी चुनौती ने उन्हें ओबीसी का दामन थामने को मजबूर किया था लेकिन वाकई वीपी जानते तो थे ही कि वो कितना बड़ा चैलेंज ले रहे हैं। पत्रकार कुलदीप नैयर कहते हैं कि वीपी ने उनसे एक बार कहा था कि भले ही अपनी एक टांग गंवा दी हो, लेकिन उन्होंने गोल करके ही दम लिया। 
एक बार अटल बिहारी वाजपेयी ने कुलदीप नैयर से कहा था कि मंडल ना होता तो कमंडल भी ना होता। हालांकि आडवाणी अपनी आत्मकथा में ऐसा नहीं मानते, बल्कि वो तो बार बार कहते हैं कि उनके चुनावी घोषणापत्र में राम मंदिर का मुद्दा था, तो ऐसे में जब भाजपा वीपी का साथ दे रही थी तो गठबंधन धर्म का पालन करते हुए उन्हें भी इस मुद्दे पर संवेदनशीलता बरतनी चाहिए थी। बहरहाल, सबने देखा कि वीपी ने कोई मुरव्वत नहीं की। वैसे आरोप ये भी लगता रहता है कि वीपी ने रथ को शुरू में ही क्यों नहीं रोका। रथ चलते ही देश में दंगे भड़कने लगे थे लेकिन वीपी भाजपा के समर्थन से मिली कुरसी पर चुप्पी लगाए बैठे रहे। आखिरकार वीपी एक राजनेता ही तो थे। आडवाणी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि बंबई के एक्सप्रेस टॉवर्स की एक बैठक में वीपी ने सबके सामने कहा था- 'अरे भाई, मस्जिद है कहां? वह तो अभी मंदिर है। पूजा चल रही है। वह इतना जर्जर है कि एक ही धक्के में नीचे गिर जाएगा। उसे ढहाने की ज़रूरत ही क्या है?' अरुण शौरी ने भी 1990 में इस बैठक पर एक लेख लिखा था। ज़ाहिर है, वीपी स्थिति समझ तो रहे ही थे। वीपी ने अयोध्या मसले का हल निकालने के लिए राम जन्मभूमि से जुड़े संतों से 4 महीने का वक्त मांगा था, वो फेल रहे। इसके बाद संघ ने कारसेवा की घोषणा कर दी। आडवाणी ने इसी के बीच में गुंजाइश देखी और प्रमोद महाजन के सुझाव से रथयात्रा का आरंभ हुआ। डॉ कोनराड एल्स्ट अपनी किताब में बताते हैं कि वीपी सिंह के मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के फैसले से कुछ लोग इतने आक्रोशित थे कि उन्होंने आडवाणी की रथयात्रा तक पर पत्थर फेंके। भाजपा वीपी सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी इसलिए आक्रोशित सवर्णों की नज़र में वो इस फैसले का हिस्सा ही थी। वहीं वीपी भी किसी तरह इस विवाद को सुलझाने में जुटे थे। एस गुरुमूर्ति सरकार और मंदिर आंदोलन के नेताओं के बीच वार्ताकार बने थे। वो देशभर में घूम घूम कर धार्मिक गुरूओं से मिल रहे थे। खैर, बाद में किसी भी मसौदे पर सहमति बन पाने से पहले ही लालू सरकार के हाथ आडवाणी गिरफ्तार हो गए, नतीजतन सरकार संकट में आ गई। आज तक अयोध्या विवाद देश का सबसे ज्वलनशील मुद्दा है। किरदार बदल गए हैं लेकिन समस्या जस की तस है। प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने अपने कैबिनेट तक में आधी सीटें पिछड़ा वर्ग को दे दी थीं। ये वीपी थे जिन्होंने बाबासाहेब अंबेडकर का चित्र संसद के केंद्रीय सभागृह में लगवाया और उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया। खुद को भारत रत्न देनेवाले नेहरू और इंदिरा ने कभी बाबासाहेब को भारत रत्न देने योग्य क्यों नहीं समझा ये तो जाना नहीं जा सकता लेकिन वीपी ने कृतज्ञ देश की ओर से उन्हें भारत रत्न दिया। वीपी की राजनीति खत्म हो गई लेकिन उनके फैसलों का असर आज भी देश पर बना हुआ है।

Wednesday, November 15, 2017

गुजरात में बदले दिखे राहुल

गुजरात में राहुल गांधी एक नए अंदाज़ में हैं. इस बार राहुल गांधी का फोकस खास तौर पर पिछड़ों, दलितों आदिवासी और मुस्लिमों पर है. शायद राहुल गांधी को पाटीदारों के वोटों पर उतना भरोसा नहीं है. शायद उन्हें लगता है कि पाटीदार परंपरागत तौर पर बीजेपी को वोट देते आए हैं. पहले भी गुजरात में कांग्रेस खाम का फार्मूला अपना चुकी है यानी क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम, मगर इस बार राहुल पोडा (पाटीदार, ओबीसी, दलित, आदिवासी) पर फोकस कर रहे हैं. गुजरात में पाटीदार 12 से 15 प्रतिशत है जबकि 14 फीसदी आदिवासी, 9 फीसदी मुस्लिम और 7 फीसदी दलित हैं. राहुल आदिवासी इलाकों में जाते हैं तो किसी आदिवासी युवक को मंच पर बुला कर भाषण दिलवाते हैं. राहुल को मालूम है कि जीएसटी यानी 'गब्बर सिंह टैक्स' हिट हो गया है, इसलिए इस मुहावरे का खूब इस्तेमाल करते हैं. यही नहीं, इस बार राहुल अपने ट्वीट को ले कर भी काफी सुर्ख़ियों में हैं. लगता है कि ट्वीट के किये राहुल ने कोई खास टीम तैयार की है. राहुल का हर ट्वीट खबर बनता है जिससे उनकी इमेज भी मीडिया में बदल रही है. ज़ीएसटी में जो सरकार ने बदलाव किया है उसका भी श्रेय राहुल खुद को देते हैं. राहुल अपने भाषण में एक संवाद पैदा करने की कोशिश करते हैं. वह लोगों से पूछते हैं कि घर देने का वायदा किया गया, मिला कि नहीं और लोग जवाब भी देते हैं. दरअसल दो दशकों से बीजेपी गुजरात में सत्ता में है, यही उसकी मुसीबत भी बन गयी है. कई जगह लोग अब बदलाव की बात भी करने लगे हैं. उन्हें लगता है कि कांग्रेस को भी एक चांस मिलना चाहिए.
राहुल की राह को वाघेला ने भी आसान बना दिया है. वाघेला ने कांग्रेस की राह आसान कर दी है. दरअसल वाघेला कांग्रेस में रहते तो राहुल पर अतिरिक्त भार पड़ता क्योंकि वाघेला कम से कम अपने समर्थकों के लिए 40 सीट जरूर ले जाते ताकि जरुरत पड़ने पर मुख्यमंत्री की दावेदारी पेश की जा सके. मगर अब यह हालत नहीं है. यही वजह है कि राहुल गांधी को टिकट बांटने में आसानी होगी. वह बिना किसी दबाव में आए टिकट बांट सकते हैं. दरअसल राहुल गुजरात में सांप्रदायिक ध्रुविकरण से बचना चाहते हैं. उन्हें लगता है इस पर वो बीजेपी से जीत नहीं सकते, यही वजह है कि राहुल मंदिरों की खाक तो छान रहे हैं मगर मस्जिदों पर नज़र भी नहीं डालते हैं. कांग्रेस ने राहुल की सॉफ्ट हिंदुत्व की छवि बनाई है. राहुल के पक्ष में हार्दिक पटेल हैं जो पाटीदार हैं, ओबीसी नेता के रूप में कांग्रेस में भारत सिंह सोलंकी हैं और साथ में अल्पेश ठाकोर रभी हैं, दलित नेता के रूप में जिग्नेश मेवानी हैं तो आदिवासी नेता के रूप में छोटू भाई वसावा हैं, जिसके वोट से अहमद पटेल ने राज्यसभा का चुनाव जीता था. कुल मिला कर राहुल गांधी को समझ में आ गया है कि लालू का माय हो, खाम हो या पोड़ा हो, यदि चुनाव जीतना है तो एक समीकरण का चलना जरूरी है.

आख़िर जीएसटी पर भी पीछे क्यों भागी सरकार?

जीएसटी की भी नोटबंदी जैसी गत बन रही है. नोटबंदी में जिस तरह से रोज़रोज़ रद्दोबदल करने पड़े थे उसी तरह से जीएसटी में भी शुरू हो गए. नोटबंदी में जैसी बार बार बदनामी हुई थी वैसी अब जीएसटी में होने लगी. अलबत्ता सरकार का पूरा अमला प्रचार करने में लगाया गया है कि जीएसटी की वसूली के रेट कम करने को जनता के लिए बड़ी राहत के तौर पर प्रचारित किया जाए. टीवी पैनल की चर्चाओं में यह बात खासतौर पर चलवाई जा रही है कि इससे गुजरात के व्यापारियों की नाराज़गी कम हागी. इस तरह से आरोप की शक्ल में इस प्रचार पर जो़र है कि गुजरात चुनाव के मददेनज़र यह फैसला किया गया है.                  
पहला सवाल यह कि क्या वाकई यह टैक्स गब्बर सिंह जैसा था जिसे अब कम भयावह बनाने का ऐलान हुआ है. अगर ऐसा है तो यह सवाल सबसे पहले कौंधेगा कि यह भारी भरकम टैक्स लगाया किसने था? जब लगाया गया था तब तर्क दिया गया था कि सरकार को देश के हित में बहुत सी योजनाएं चलानी पड़ती हैं. उसके लिए पैसे की जरूरत पड़ती है सो ऐशोआराम की चीज़ों पर ज्यादा टैक्स तो लगाना ही पड़ेगा. सो नया सवाल यह पैदा हुआ है कि ऐशोआराम की चीजों पर टैक्स घटाने से अब देश हित की योजनाएं चलाने में कमी नहीं आ जाएगी क्या? गौरतलब है कि खासतौर पर ऐशोआराम की चीजों पर टैक्स वसूली के रेट घटाने से सरकार के ख़ज़ाने में बीस हजार करोड़ रुपए कम पहुंचेंगे.
जनता को 20 हजार करोड़ का यह तोहफा देने के लिए सरकार पैसा कहां से जुटा लाई. एक सरल सा जवाब है कि सरकार ने चार महीने पहले जो टैक्स वसूली की नई योजना बनाई थी उससे एक लाख करोड़ की वसूली की योजना थी वह वसूली कम कर दी गई है. यानी, देश के हित में सरकार ने जनता के सिर पर जो बोझ लादा था उस बोझ में कटौती का एलान किया है. इस तरह से क्या यह बहस शुरू नहीं हो जाएगी कि जनता को जो बेजा सज़ा का ऐलान हुआ था उस सज़ा में कटौती हो गई है.
नोटबंदी से मची भारी अफरातफरी और भारी घाटे का काम साबित होने के बाद जीएसटी से भी चारों तरफ परेशानियों का अंबार खड़ा होता जा रहा था. व्यापारी और उपभोक्ता दोनों परेशान हैं. हालांकि व्यापारी टैक्स के रेट से परेशान नहीं थे क्योंकि उन्हें टैक्स अपने पास से नहीं बल्कि नागरिकों से उगाही कर जमा करना था. व्यापारी लोग टैक्स भरने की समय खपाऊ और हिसाब बनाने की खर्चीली प्रक्रिया से परेशान हैं. सो उनके लिए भी सरकार ने टैक्स के कागज़ तैयार करने का बोझ कुछ कम कर दिया. क्या इसे पहले नहीं सोचा जा सकता था? इस तरह सरकार खुद को नौसिखिया साबित करवा रही है. बिल्कुल उसी तरह जिस तरह नोटबंदी में साबित हुई थी. जानकार लोग नफे नुकसान का हिसाब भी बैठा रहे हैं. व्यापारी और नागरिक बेजा तरीके से खा न पाएं उससे सरकार को जितना पैसा बच सकता है उससे कई गुना उस चोरी न हो पाने का इंतजाम करने में खिन्न होकर बर्बाद तो नहीं हो रहा है? इसलिए, एक हिसाब लगना चाहिए कि गोदाम में जितने का माल है उसकी चौकीदारी पर उससे ज्यादा खर्चा तो नहीं बैठ रहा है. यानी, जीएसटी और नोटबंदी के जरिए ऐसी चौकीदारी घाटे का सौदा तो नहीं बन रही है. वैसे इसका पता आम बजट पेश होते समय चलेगा.
केंद्र और राज्य सरकारें अपने पास संसाधनों का रोना रोती रहती हैं. वे तरह तरह के जो टैक्स वसूलती थीं उसकी जगह एक ही टैक्स की व्यवस्था बनाने पर रजामंदी बनाई गई थी. यह रजामंदी इस आश्वासन पर बनी थी कि राज्यों को नई व्यवस्था से अगर कोई घाटा हुआ तो केंद्र सरकार उसकी भरपाई का इंतजाम करेगी. वैसे तो राज्य सरकारें बिल्कुल भी जोखिम उठाने को राजी नहीं होतीं लेकिन राजनीतिक परिदृश्य ऐसा है कि ज्यादातर राज्यों में भी भाजपा की ही सरकारें काबिज़ हैं. सो राज्य सरकारों की तरफ से केंद्र की इच्छा, मंशा या योजना पर नानुकुर करने का कोई सवाल ही नहीं उठता लेकिन राज्यों के संसाधनों में कमी को आखिरकार उन्हें ही झेलना पड़ता है. वे किस तरह से झेलेंगी यह भी आने वाले दिनों में पता चलेगा. जीएसटी से नया हाहाकार न मचने लगे इसे दोनों प्रकार की सरकारों को सोचकर रखना पड़ेगा. और भारतीय लोकतंत्र की जनता को बजट तक इंतजा़र करना पडे़गा कि जीएसटी लागू होने के तोहफे से उसने क्या खोया पाया. खासतौर पर जीएसटी के 28 फीसद टैक्स वाले स्लेब की चीजों पर टैक्स घटने से गरीब जनता को  क्या हासिल होगा?
नोटबंदी के नियमों में बार बार बदलाव की तरह जीएसटी में भी बार बार बदलाव के नफे नुकसान पर मीडिया में रोचक बहसें हो रही हैं. सरकार के तरफदार विशेषज्ञों की सबसे दिलचस्प थ्योरी यह है कि जीएसटी की कंपलायंस यानी इसके मुताबिक टैक्स जमा होने में दिक्कत आ रही थी. उनका तर्क है कि ऐशोआराम की चीजों पर टैक्स कम होने से टैक्स जमा करने वालों की संख्या बढ़ जाएगी. इस तरह से उन्होंने दिलासा दिलाना शुरू किया है कि बदले ऐलान से सरकार के खजाने को 20 हजार करोड़ से कम का ही नुकसान होगा. ऐसा तर्क देने वाले क्या उस समय यह तर्क नहीं दे सकते थे जब 28 फीसद टैक्स वाली स्लैब बनाई गई थी. तब तो यह तर्क दिया गया था कि गरीब जनता के लिए अच्छी योजनाओं के लिए पैसा चाहिए और यह पैसा ऐशो आराम से रहने वालों पर टैक्स से लिया जा सकता है. चार महीने में ही थ्योरियां बदल गईं.

Friday, October 20, 2017

गुजरात की युवा तिकड़ी

गुजरात विधानसभा चुनावों के नज़दीक आते-आते राजनीतिक सरगर्मियां तेज़ हो गई हैं. सभी राजनीतिक दल गुजरात में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं. बीजेपी ने भी गुजरात में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. पार्टी कोई भी ऐसा कारण नहीं छोड़ना चाहती जो किसी तरह के बुरे परिणाम का नतीजा बने. ऐसा कहा जा रहा कि पिछले दो सालों में उभरकर सामने आए पाटीदार, ओबीसी और दलित समुदायों को प्रभावित करने वाले तीन युवा बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं. पाटीदार नेता हार्दिक पटेल, दलित नेता जिग्नेश मेवाणी और ओबीसी नेता अल्पेश ठाकुर गुजरात की राजनीति का अहम हिस्सा बन गए हैं.
साल 2015 में पटेल आरक्षण की मांग के बाद हार्दिक पटेल का नाम तेज़ी से उभरकर सामने आया. इस आंदोलन को दबाने की गुजरात सरकार की कोशिशों के बावजूद अभी तक यह मांग शांत नहीं हुई है.
पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के संयोजक हार्दिक पटेल किसी भी पार्टी में न शामिल होने की बात कह चुके हैं. हार्दिक पटेल ने सार्वजनिक तौर पर बीजेपी को आरक्षण न देने के लिए दोषी ठहराया है. अमित शाह को गुजरात गौरव यात्रा के दौरान पाटीदार युवाओं का विरोध भी झेलना पड़ा था. साथ ही हार्दिक पटेल ने कांग्रेस की तरफ़ झुकाव भी प्रकट किया है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के गुजरात जाने पर हार्दिक ने ट्वीट करके उनका स्वागत किया था. ऐसे में बीजेपी की चिंताएं बढ़ना लाज़मी है. पाटीदार भले ही 12 प्रतिशत का वोट शेयर रखते हों लेकिन अपनी आर्थिक ताक़त के कारण वो ​स्थितियां प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं. शुरुआत में इस आंदोलन का विरोध करने के बाद आज बीजेपी पाटीदारों का वोट पाने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है. आंदोलन में शामिल पाटीदार नेताओं के ख़िलाफ़ केस वापस लिए गए हैं और अनामत आंदोलन समिति के सदस्यों पर हुए पुलिस अत्याचार की जांच के लिए समिति का निर्माण किया गया है. हालांकि, इसके बावजूद भी हार्दिक पटेल का रुख़ बीजेपी के प्रति नरम पड़ता नहीं दिख रहा है. राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच के संयोजक जिग्नेश मेवाणी राज्य में दलितों पर हो रहे हमलों के लिए गुजरात सरकार को ज़िम्मेदार मानते हैं. लगातार दलितों पर हुए हमले की ख़बरों के बाद बीजेपी की छवि का पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक भी है. गुजरात में युवा दलित नेता के तौर पर उभरे जिग्नेश पेशे से वकील और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. ऊना में गोरक्षा के नाम पर दलितों की पिटाई के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन का जिग्नेश ने नेतृत्व किया था. 'आज़ादी कूच आंदोलन' में जिग्नेश ने 20 हज़ार दलितों को एक साथ मरे जानवर न उठाने और मैला न ढोने की शपथ दिलाई थी. इस आंदोलन में दलित मुस्लिम एकता भी दिखाई दी थी.
जिग्नेश मेवाणी का कहना है, ''राज्य में दलित पर हो रहे हमलों को रोकने और उनकी स्थिति में सुधार के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है. बीजेपी का हिंदुत्व का एजेंडा है और इस सरकार के रहते उनका भला नहीं हो सकता.'' मेवाणी साफ़-साफ़ कहते हैं, ''इस बार बीजेपी को हर क़ीमत पर हराया जाना चाहिए.'' हालांकि, वह अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर कुछ भी साफ़ तौर पर नहीं कह रहे हैं. राज्य में दलितों का वोट प्रतिशत क़रीब सात फ़ीसदी है. राज्य की कुल आबादी लगभग 6 करोड़ 38 लाख है, जिनमें दलित 35 लाख 92 हज़ार के क़रीब हैं. गुजरात में दलितों का प्रतिनिधित्व बहुत ज्यादा न होने के बावजूद भी चुनाव में हर एक वोट बहुत कीमती होता है. ऐसे में बीजेपी के लिए जिग्नेश मेवाणी मुसीबत ला सकते हैं. ओबीसी नेता के तौर पर उभरे अल्पेश ठाकुर पाटीदारों को आरक्षण देने का विरोध करते रहे हैं. साथ ही वह देसी शराब से होने वाले नुक़सान के चलते शराबबंदी के पक्षधर रहे हैं. ओबीसी, एससी और एसटी एकता मंच के संयोजक अल्पेश ठाकुर ने अलग-अलग मंचों से गुजरात की हालत ख़राब होने की बात कही है. वह कहते हैं कि विकास सिर्फ दिखावा है. गुजरात में लाखों लोगों के पास रोज़गार नहीं है. ओबीसी का वोट प्रतिशत 40 है जो पाटीदार और एससी व एसटी से कहीं ज्यादा है. ऐसे में बीजेपी के लिए ये वर्ग और महत्वपूर्ण हो जाता है. लेकिन, पाटीदारों को आरक्षण देने के मसले पर बीजेपी और उनकी राय एक होने के चलते अल्पेश ठाकुर का झुकाव बीजेपी की तरफ जाने की संभावना है. उनका रुख साफ़ नहीं है. लेकिन, अगर वो बीजेपी की तरफ जाते हैं तो उनके सपोर्ट बेस में दरार पड़ सकती है. अल्पेश का बीजेपी की तरफ झुकाव होना मुश्किल है. क्योंकि बीजेपी ने पाटीदारों को जो लाभ दिए हैं वो ओबीसी को नहीं दिए हैं. इन तीनों नेताओं के उभरने की कहानी निजीकरण से शुरू होती है. जब पीएम नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने वाइब्रेंट गुजरात की बात की.उस समय काफ़ी निजीकरण हुआ. बहुत सारे निजी शैक्षणिक संस्थान आ गए. बहुत बड़े-बड़े समिट होने लगे जिनमें बड़े स्तर पर निवेश होने और रोजगार के अवसर खुलने की बातें कही गईं. लोगों को सुखद भविष्य के सपने दिखाए गए. लोगों ने अपने बच्चों को उन्हीं प्राइवेट इंस्टीट्यूट में महंगी फीस देकर पढ़ाया. लेकिन, जब उनके बच्चे बाज़ार में आए तो उन्हें नौकरी ही नहीं मिली. नौकरी मिली भी तो 5-6 हज़ार की.  'सरकार की कथनी और करनी के अंतर की वजह से युवाओं में निराशा और ग़ुस्सा भर गया है. पाटीदार एक संपन्न वर्ग है. जब उनके बच्चे भी सड़क पर उतरे हैं तो दूसरों का क्या हाल होगा.' घनश्याम दास कहते हैं, ''बीजेपी को ओबीसी से मुश्किल ज़रूर होगी. दलित नेता के तौर पर उभरे जिग्नेश का रुख साफ़ नहीं है कि वह किस तरफ जाएंगे. उन्होंने कांग्रेस की तरफ भी झुकाव नहीं दिखाया है.'' बीजेपी पर गुजरात में चुनौतियां का असर दिखने लगा है तभी बीजेपी नेता लगातार गुजरात दौरे कर रहे हैं.

Saturday, October 14, 2017

भूख से हारता भारत

विश्व की महाशक्ति बनने का सपना देखने वाले भारत के लोग खाने जैसी बेसिक नेसेसिटी (बुनियादी जरूरत) से महरूम हैं ये एक बड़ी विडंबना ही कही जा सकती है. देश डिजिटल क्रांति के जरिए वर्ल्ड लीडर के तौर पर बढ़ता दिख रहा है और आने वाले सालों में सबको घर, सबको बिजली जैसे ‘न्यू इंडिया’ की उम्मीदें लगाए बैठा है, लेकिन दुनिया के सारे देशों में से जहां के लोग अपने पेट भरने की रोज की जरूरत को भी पूरा नहीं कर पाते ऐसे देशों में से सिर्फ 19 देशों से आगे है. इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई) के मुताबिक, भारत में भूख एक ‘‘गंभीर’’ समस्या है और 119 देशों के वैश्विक भूख सूचकांक में भारत 100वें पायदान पर है. भारत उत्तर कोरिया और बांग्लादेश जैसे देशों से पीछे है लेकिन पाकिस्तान से आगे हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक, बच्चों में कुपोषण (मेल न्यूट्रीशन) की उच्च दर से देश में भूख का स्तर इतना गंभीर है कि पिछले साल भारत इस इंडेक्स में 97वें स्थान पर था और अब 100वें स्थान पर है. यानी इस साल वर्ल्ड हंगर इंडेक्स में भारत और 3 स्थान पीछे चला गया है. आईएफपीआरआई ने एक बयान में कहा, ‘‘119 देशों में भारत 100वें स्थान पर है और समूचे एशिया में सिर्फ अफगानिस्तान और पाकिस्तान उससे पीछे हैं.’’ उन्होंने कहा, ‘‘31.4 के साथ भारत का 2017 का जीएचआई (वैश्विक भूख सूचकांक) अंक ऊंचाई की तरह है और ‘गंभीर’ श्रेणी में है. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत चीन (29), नेपाल (72), म्यामांर (77), श्रीलंका (84) और बांग्लादेश (88) से भी पीछे है. पाकिस्तान और अफगानिस्तान क्रमश: 106वें और 107वें स्थान पर हैं. जाहिर तौर पर राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर इसे सुधारने के लिए मजबूत प्रतिबद्धता दिखाने की जरूरत है. हाल ही में फोर्ब्स की सबसे धनवान भारतीयों की लिस्ट में दिखा था कि देश के सबसे धनवानों की संपत्ति में पिछले साल के मुकाबले काफी इजाफा हो चुका है. वहीं कल ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत के और नीचे खिसकने से यही आकलन किया जा सकता है कि अमीर और अमीर हो रहे हैं और गरीब और गरीब और गरीब हो रहे हैं. देश के टॉप 100 धनी व्यक्तियों की संपत्ति में 26 फीसदी का इजाफा हुआ है. रिलायंस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी लगातार 10वें साल भारत के सबसे अमीर व्यक्ति रहे और उनकी प्रॉपर्टी बढ़कर 38 अरब डॉलर (करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये) पर पहुंच गई है. अमीरों की संपत्ति का आकलन करने वाली पत्रिका फोर्ब्स की वार्षिक सूची ‘इंडिया रिच लिस्ट 2017’ में यह जानकारी दी गयी थी.
दुनिया के देशों में लोगों को खाने की चीज़ें कैसी और कितनी मिलती हैं?, ग्लोबल हंगर इंडेक्स इसे दिखाने का माध्यम है. हर साल नए आंकड़ों, नए डेटा कलेक्शन के आधार पर ही ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ की लिस्ट निकाली जाती है. इस इंडेक्स में दिखाया जाता है कि दुनिया भर में भूख के खिलाफ चल रही देशों की लड़ाई में कौनसा देश कितना सफल और कितना असफल रहा है. साल 2006 में सबसे पहले वेल्ट हंगरलाइफ नाम के जर्मनी के स्वयंसेवी ऑर्गेनाइजेशन ने ग्लोबल हंगर इंडेक्स जारी किया था, इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के तहत ये काम किया जाता है. इसे सुधारने के लिए सभी राज्यों, सरकारों और सामाजिक संगठनों को मैराथन प्रयास करने होंगे वर्ना ‘इंडिया’ और ‘भारत’ के बीच की खाई को पाटना लगभग-लगभग असंभव हो जाएगा और अमीर-गरीब (वंचितों) के बीच बढ़ते फासले को मिटाने का सरकार का सपना, सपना ही रह जाएगा. एक न्यूक्लियर सुपरपावर देश की बड़ी जनसंख्या खाने जैसी फंडामेंटल जरूरत और हक से भी महरूम हैं जो बेहद गंभीर और चिंताजनक स्थिति कही जा सकती है.
एक और जहां भारत भूख की गंभीर समस्या से जूझ रहा है, वहीं दूसरी और देश में बड़े पैमाने पर खाने की बर्बादी की जाती है. खाने की बर्बादी भुखमरी का एक अहम कारण है. संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 40 फ़ीसदी खाना बर्बाद हो जाता है. इन्हीं आंकड़ों में कहा गया है कि यह उतना खाना होता है जिसे पैसों में आंके तो यह 50 हज़ार करोड़ के आसपास पहुंचेगा. आंकड़ों पर ना भी जाएं, तो भी हम रोज़ाना अपने आस-पास ढेर सारा खाना बर्बाद होते हुए देखते ही हैं. शादी, होटल, पारिवारिक और सामाजिक कार्यक्रमों, यहां तक की घरों में भी कितना खाना यू हीं फेंक दिया जाता है. अगर ये खाना बचा लिया जाए और ज़रूरतमंदों तक पहुंचा दिया जाए तो कई लोगों का पेट भर सकता है.  संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में खाने का पर्याप्त उत्पादन होता है, लेकिन ये खाना हर जरूरतमंद तक नहीं पहुंच पाता. भूख से पीड़ित दुनिया की 25 फ़ीसदी आबादी भारत में रहती है. भारत में करीब साढ़े 19 करोड़ लोग कुपोषित हैं. इसमें वो लोग भी हैं जिन्हें खाना नहीं मिल पाता और वो लोग भी हैं जिनके खाने में पोषण की कमी होती है. खाने की बर्बादी रोकने के लिए हर इंसान को व्यक्तिगत रूप से ज़ागरुक होने की ज़रूरत है. जितना खाना है उतना ही लें. अगर घर में खाना बच जाता है तो अपने आस-पास किसी ज़रूरतमंद को दें. शादी, पार्टी, होटल में भी ऐसा ही किया जा सकता है, वैसे कई संस्थाएं ऐसी हैं जो लोगों का बचा हुआ खाना एकत्रित करके उसे ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंचाने का दावा करती हैं. ऐसी ही एक संस्था रॉबिन हुड आर्मी को शुरू करने वाले संचित जैन बताते हैं कि दिल्ली की एक शादी में बचे खाने से कई बार पांच सौ से ढाई हज़ार लोगों का पेट भर जाता है. संचित जैन खाने की चीज़ों की बर्बादी की वजह सप्लाई चेन का कमज़ोर होना बताते हैं. वो कहते हैं खेतों से अनाज निकलकर मंडी तक तो पहुंच जाता है, लेकिन भंडारण की सुविधाएँ अच्छी नहीं होने और समय पर आगे सप्लाई नहीं किए जाने की वजह से मंडियों में ही सड़ जाता है. रॉबिन हुड आर्मी का दावा है कि वे होटलों से एकत्रित किया हुआ खाना झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों तक पहुंचाते हैं. वैसे सच्चाई यही है कि गैर-सरकारी संस्थाओं के अलावा सरकार भी कई बार खाने की बर्बादी पर चिंता जता चुकी 

लोहिया जी का व्यक्तित्व

जेपी तो 1953 से ही सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर दलविहीन लोकतंत्र और ‘सर्वोदय’ का प्रयोग कर रहे थे. ऐसे में वे लोहिया ही थे जिन्होंने विपक्ष क्या होता है और उसे क्या करना चाहिए, का पाठ भारतीय लोकतंत्र को सिखाया. अपने प्रयासों से उन्होंने आजादी के बाद एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस को अपनी मौत से ठीक पहले यानी 1967 तक पानी पीने पर मजबूर कर दिया. लेकिन ऐसा करने के लिए उन्होंने अपने मूल सिद्धांतों से समझौता नहीं किया. राम मनोहर लोहिया की रचनात्मक राजनीति और अद्भुत नेतृत्व क्षमता का प्रभाव इतना दूरगामी रहा कि उनके जाने के करीब 20 सालों बाद ही उनके सिद्धांतों को मानने वाली कई पार्टियां भारतीय लोकतंत्र के पटल पर छाने लगीं. ‘सामाजिक न्याय’ की उनकी संकल्पना तो आज राजनीति का मूल सिद्धांत बन चुकी है. यह राम मनोहर लोहिया की ही दूरदर्शिता थी कि तमाम वंचित जातियों और वर्गों की धीरे-धीरे ही सही, सभी क्षेत्रों में हिस्सेदारी बढ़ रही है. बताया जाता है कि लोहिया शुरू में नेहरूवादी थे और गांधीवादी वे बाद में बने. मतलब यह है कि शुरू में वे गांधी की तुलना में नेहरू से ज्यादा प्रभावित थे. बाद में नेहरू से उनका मोहभंग होता गया और गांधी के सिद्धांतों और कार्यनीतियों पर उनका भरोसा बढ़ता गया. उच्च शिक्षा के दौरान जर्मनी में राम मनोहर लोहिया की राजनीतिक सक्रियता की जानकारी कांग्रेस के नेताओं विशेषकर तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को भी थी. इसलिए 1933 में पीएचडी करने के बाद देश लौटने पर नेहरू ने उन्हें कांग्रेस की विदेश मामलों की समिति में रखा था. अगले दो सालों तक उन्होंने भविष्य के भारत की विदेश नीति तय करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया. इसलिए उन्हें भारत का पहला गैर-आधिकारिक विदेश मंत्री भी कहा जाता है. आजादी के बाद देश ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसे निर्धारित करने में लोहिया का महत्वपूर्ण योगदान था. कांग्रेस मॉडल के तहत कांग्रेस का सदस्य रहते हुए कोई किसी अन्य संगठन का भी सदस्य बन सकता था. इसलिए समाजवादी विचारधारा से प्रभावित जयप्रकाश नारायण जैसे कई कांग्रेसी नेताओं ने मई 1934 में ‘कांग्रेस समाजवादी पार्टी’ की नींव डाली. लोहिया का इसमें महत्वपूर्ण योगदान था. लेकिन नेहरू से लोहिया के संबंध 1939 के बाद खट्टे होने लगे. संबंधों के खराब होने की शुरुआत दूसरे विश्वयुद्ध में भारत के शामिल होने के सवाल पर हुई. लोहिया चाहते थे कि अंग्रेजों की कमजोर स्थिति को और कमजोर करने के लिए भारत को युद्ध में शामिल नहीं होना चाहिए. उधर, नेहरू चाहते थे​ कि भारतीय सेना इस महायुद्ध में अंग्रेजों का साथ दे. नौ अगस्त 1942 को जब भारत छोड़ोंं आंदोलन छेड़ा गया तो अंग्रेजों ने पूरे देश में कांग्रेस के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया. ऐसा लगा अब यह आंदोलन विफल हो जाएगा. लेकिन कांग्रेस के भीतर जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया जैसे समाजवादी नेताओं ने आंदोलन का अगले दो सालों तक सफलतापूर्वक नेतृत्व किया. आंदोलन की घोषणा होते ही मुंबई में एक भूमिगत रेडियो स्टेशन से आंदोलनकारियों को ​दिशा-निर्देश दिए जाने लगे थे. ऐसा करने वाले कोई और नहीं लोहिया थे. अंग्रेज जब तक उस रेडियो स्टेशन को ढूंढ़ पाते तब तक लोहिया कलकत्ता जा चुके थे. वहां वे पर्चे निकालकर लोगों का नेतृत्व करने लगे. उसके बाद वे जयप्रकाश नारायण के साथ नेपाल पहुंच गए. वहां पर ये लोग ‘आजाद दस्ता’ बनाकर आंदोलनकारियों को सशस्त्र गुरिल्ला लड़ाई का प्रशिक्षण देने लगे. अंग्रेजों को दो सालों तक छकाने के बाद जेपी और लोहिया मई 1944 में पकड़ लिए गए. इन दोनों पर मुकदमा चला और वे लाहौर जेल में बंद कर दिए गए. यहां से वे लोग अप्रैल 1946 में ही छूट पाए. जेल में अंग्रेजों ने लोहिया को जमकर यातनाएं दी थीं जिससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था. लोहिया ने अपनी किताब ‘विभाजन के गुनहगार’ में बताया है कि दो जून 1947 की बैठक में वे और जेपी विशेष आमंत्रित सदस्य थे. बैठक का नजारा ऐसा था मानो नेहरू और पटेल पहले से सब कुछ तय कर आए हों. महात्मा गांधी के विरोध करने के बाद नेहरू और पटेल ने कांग्रेस के सभी पदों से इस्तीफा दे देने की धमकी दे दी. लोहिया लिखते हैं कि तब गांधी के पास विभाजन के प्रस्ताव पर मौन सहमति देने और विभाजन के गुनहगारों में शामिल हो जाने के सिवाय दूसरा कोई विकल्प नहीं बच गया था. गांधी के मरने के बाद कांग्रेस मॉडल को नेहरू ने 1948 में खत्म कर दिया. कांग्रेस के समाजवादी नेताओं को पार्टी का विलय कांग्रेस में करने या कांग्रेस छोड़ने का विकल्प दिया गया. लोहिया को तो नेहरू ने कांग्रेस पार्टी का महासचिव बनाने का प्रस्ताव दिया. लेकिन उन्होंने अन्य समा​जवादियों जिनमें जेपी भी शामिल थे, के साथ कांग्रेस छोड़ने का विकल्प चुना. यह समझते हुए भी कि कांग्रेस की छवि देशवासियों के दिलोदिमाग पर छप चुकी है और उसे हटाना आसान नहीं है, खासकर तब जब कोई स्थापित संगठन न हो और न ही मजबूत आर्थिक समर्थन. लेकिन लोहिया और उनके साथियों ने लोकतंत्र के हित मेंं विपक्ष की आवाज बनने और उसे बुलंद करने का फैसला लिया. इसका परिणाम 1948 में ‘सोशलिस्ट पार्टी’ के गठन के रूप में हुआ. फिर 1952 में जेबी कृपलानी की ‘किसान मजदूर पार्टी’ के साथ विलय करके ‘प्रजा सोशलिस्ट पार्टी’ का निर्माण किया गया. हालांकि मतभेदों के चलते लोहिया ने ​1955 में पीएसपी छोड़कर फिर से ‘सोशलिस्ट पार्टी’ को जिंदा करने का निर्णय किया. लोहिया से सोशलिस्ट पार्टियों की इस टूट-फूट पर किसी ने पूछा तो उन्होंने व्यंग्य के लहजे में कहा था, ‘समाजवादी विचारधारा की पार्टियों और अमीबा में एकरूपता है. मतलब जैसे ही पार्टी मजबूत होकर बड़ी बनती है, अमीबा की तरह टूटकर फिर पहले की तरह छोटी हो जाती है.’ उनका यह कथन आज भी खुद को उनकी विरासत का उत्तराधिकारी कहने वाली पार्टियों पर लागू होता दिखता है. लोहिया और अन्य समाजवादियों की पहले आम चुनाव में हार हुई. लेकिन यह हार इन नेताओं की अलोकप्रियता की वजह से नहीं बल्कि उनके संगठन के कांग्रेस की तुलना में कमजोर होने और कमतर आर्थिक संसाधन होने के चलते हुई थी. इसे मजबूत कांग्रेस को नियंत्रण में रखने की जिजीविषा ही कहेंगे कि इस हार के बाद कई सोशलिस्ट पार्टियां एकजुट हो गईं. इसी समय लोहिया के सिद्धांत पार्टी के अन्य नेताओंं को पच नहीं रहे थे. वे जैसे भी हो केरल में सत्ता में बने रहना चाहते थे. इसी बात पर लोहिया ने 1955 में पीएसपी छोड़कर फिर से सोशलिस्ट पार्टी को जिंदा करने का निर्णय लिया. इसके बाद वे घूम-घूमकर तमाम पिछड़ी जातियों के संगठनों को जोड़ने लगे. इसी सिलसिले में उन्होंने बीआर अंबेडकर से मिलकर उनके ‘आॅल इंडिया बैकवर्ड क्लास एसोसिएशन’ के सोशलिस्ट पार्टी में विलय की बात शुरू की. बातचीत पक्की हो गई थी कि दिसंबर 1956 में अंबेडकर का निधन हो गया. और उन्हें अपने साथ जोड़ने की उनकी मुहिम अधूरी रह गई. फिर भी ऐसे दूसरे संगठनों को जोड़ने का उनका प्रयास जारी रहा. राम मनोहर लोहिया के ऐसे प्रयासों का ही नतीजा रहा कि 1967 कांग्रेस पार्टी सात राज्यों में चुनाव हार गई और पहली बार विपक्ष उसे टक्कर देने की हालत में दिखने लगा. इस चुनाव के बाद लोहिया ने तय किया कि वे जेपी को मुख्यधारा में वापस लाकर विपक्ष को और मजबूत बनाएंगे. पर वे अक्टूबर में चल बसे. हालांकि राम मनोहर लोहिया का प्रयास करीब एक दशक बाद रंग लाया जब 1975 में जयप्रकाश नारायण राजनीति की मुख्यधारा में वापस लौटे. आपातकाल के बाद हुए 1977 के चुनाव में विपक्षी पार्टियों की एकजुटता रंग लाई और 25 सालों से केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी को हार का सामना करना पड़ा. राम मनोहर लोहिया ने जर्मनी में रहते कार्ल मार्क्स और एंगेल्स को खूब पढ़ा. लेकिन उन्होंने पाया कि भारत के संदर्भ में कम्युनिस्ट विचारधारा अपूर्ण है. मार्क्सवाद ने साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के संबंधों की जो व्याख्या की थी लोहिया उससे असहमत थे. बल्कि वे तो उसे उल्टा मानते थे. मार्क्सवाद मानता था कि पूंजीवाद के विकास से साम्राज्यवाद पनपता है. इसलिए पूंजीवाद के खात्मे से ही साम्राज्यवाद का विनाश होगा. लोहिया ने बताया कि मामला असल में उल्टा है. वह साम्राज्यवाद ही है जिससे पूंजीवाद का विकास हुआ. इसलिए पूंजीवाद का नाश करने के लिए जरूरी है कि साम्राज्यवाद को उखाड़ फेंका जाए. उन्होंने ब्रिटेन के उदय को भारत जैसे उपनिवेशों के शोषण से जोड़ दिया और कहा कि भारत को आजाद किए बगैर पूंजीवाद की जड़ें कमजोर नहीं हो सकती. इस तरह लोहिया ने पूंजीवाद के विनाश के लिए भारत जैसे उपनिवेशों की आजादी को सबसे महत्वपूर्ण बताया.  
लोहिया ने मार्क्स के वर्ग-सिद्धांत की भारत के संदर्भ में नई व्याख्या दी. उनके अनुसार भारत का समाज औद्योगिक समाज नहीं है. इस समाज में असमानता की मुख्य वजह जाति रही है. यहां पर शोषण का कारण जाति व्यवस्था रही है. इसलिए यहां पर ‘बुर्जुआ’ और ‘सर्वहारा’ वर्गों की मौजूदगी मार्क्सवाद के सिद्धांतों की तरह नहीं है. राम मनोहर लोहिया का मानना था कि भारत की सवर्ण जातियों को बुर्जुआ माना जाना चाहिए और तमाम वंचित वर्गों, जिनमें आदिवासी, दलित, अन्य पिछड़ी जातियां और यहां तक कि सभी समुदायों की महिलाएं भी शामिल हैं, को सर्वहारा माना जाना चाहिए. भारत के संदर्भ में मार्क्सवाद की लोहिया की यह व्याख्या और इसके परिणाम क्रांतिकारी रहे. आलोचकों का भी मानना है कि साठ के दशक से भारत में समाजवादी विचारधारा के साथ-साथ क्षेत्रीय दलों के मजबूत होने के पीछे लोहिया की इस अनूठी व्याख्या का ही योगदान रहा है. इसने जातिगत पहचानों को तो मजबूती दी ही है, राजनीति में वंचित जातियों की पैठ भी बढ़ाई है. हर तरह की विषमता को खत्म करने की दिशा में सप्तक्रांति सिद्धांत को भी राम मनोहर लोहिया की अनूठी देन माना जाता है. इस सिद्धांत में सात बिंदु थे. मसलन रंगभेद खत्म हो, जातिगत भेदभाव बंद हो, औरत और मर्द में कोई अंतर नहीं है, राष्ट्रवाद को संकुचित नहीं व्यापक तरीके से समझा जाए, समाजवादी आर्थिक मॉडल श्रेष्ठ है, सभी देश निरशस्त्रीकरण के रास्ते चलें और भेदभाव से लड़ने का तरीका सत्याग्रह ही होना चाहिए. लोहिया के प्रयासों का ही असर रहा कि तमाम पिछड़ी जातियों में आत्मविश्वास विकसित हुआ. उन्होंने कमाबेश सभी पिछड़ी जाति के नेताओं को आगे बढ़ाया. उनके जाने के बाद उत्तर भारत के कई राज्यों में समाजवादी विचारधारा की सरकार बनी. इससे सामाजिक न्याय को अभूतपूर्व मजबूती मिली. किसी जानकार ने कहा है कि गांधी को छोड़ दिया जाए तो लोहिया का अनुसरण करने वाली पार्टियों और नेताओं की संख्या देश के इतिहास में सबसे ज्यादा है.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...