Wednesday, July 11, 2018

अमेरिका और चीन का ट्रेड वार

दुनिया की सबसे बड़ी दो अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार युद्ध छिड़ गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उस नीति को लागू करने की अनुमति दे दी है जिसके तहत 50 अरब डॉलर मूल्य के चीन से आयतित सामान पर 25 फीसदी शुल्क लगाया जाएगा. उधर, अमेरिका की इस घोषणा के बाद चीन ने भी पलटवार करते हुए अपने यहां आने वाले अमेरिकी सामान पर समान शुल्क लगाने की घोषणा कर दी है. पिछले एक महीने से इस स्थिति को टालने के लिए इन देशों के बीच बातचीत चल रही थी, लेकिन इनके बीच कोई सहमति नहीं बन सकी. व्यापार युद्ध छिड़ने के बाद सामने आने वाली परिस्थितियों पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि उनके इस फैसले से अमेरिका को फायदा ही होगा क्योंकि वह पहले से ही चीन के साथ बड़े व्यापार घाटे से जूझ रहा है. ट्रंप की दलीलें हैं कि चीन अमेरिकी कंपनियों की तकनीक यानी बौद्धिक संपदा की चोरी कर अमेरिका को हर साल 225 से 600 अरब डॉलर तक का नुकसान पहुंचाता है. साथ ही उसकी वजह से अमेरिका को हर साल 300 से 400 अरब डॉलर का व्यापार घाटा भी होता है.
हालांकि, दुनियाभर के जानकारों की राय डोनाल्ड ट्रंप से एकदम जुदा है. इन लोगों के मुताबिक व्यापार युद्ध से दोनों देशों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा और जीत किसी की भी नहीं होने वाली. ये लोग कहते हैं कि सबसे पहले अमेरिका में इसके परिणामस्वरूप जो भी उद्योग चीनी आयात पर निर्भर हैं, वे अपने उत्पादों की कीमत बढ़ा देंगे और अपने कर्मचारियों की छंटनी करने लगेंगे. इसे अमेरिका द्वारा चीन के स्टील और एल्युमिनियम आयात से समझा जा सकता है. अब अमेरिका ने इन पर शुल्क बढ़ा दिया है और इसके बाद यहां की जो भी इंडस्ट्रीज इन पर निर्भर हैं उन्हें सस्ता स्टील और एल्युमिनियम मिलना बंद हो जाएगा. ऐसे में वे अपने नुकसान की भरपाई कर्मचारियों की संख्या में कटौती कर या फिर अपने उत्पादों के दाम बढ़ाकर करेंगी. इसी तरह चीन से आने वाली हर चीज अमेरिका में महंगी होगी. एक सर्वे के मुताबिक अमेरिका में सबसे निम्न वर्ग का व्यक्ति भी चीन के सस्ते सामान की वजह से 250 से 300 डॉलर तक की अतिरिक्त वार्षिक बचत कर लेता है. ऐसे में अगर चीनी सामान बंद हुआ या महंगा हुआ तो उसकी बचत पर चपत लगनी लाजमी है. अर्थजगत के कई विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर व्यापार युद्ध लंबा खिंचा तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा क्योंकि चीन के सस्ते उत्पाद का कोई दूसरा विकल्प ही नहीं है.
अमेरिका के आगे इससे भी बड़ी दिक्कत तब आएगी जब चीन बदले की कार्रवाई के तहत अमेरिकी कृषि और तकनीक से जुड़े उत्पादों के आयात पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की घोषणा करेगा. सोयाबीन की ही बात करें तो अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक देश है, साथ ही सोयाबीन की खेती उसकी कृषि की रीढ़ की तरह मानी जाती है. आंकड़े बताते हैं कि चीन हर साल अमेरिका का करीब 60 फीसदी तक सोयाबीन खरीदता है. ऐसे में चीन के शुल्क लगाने से इसकी सीधी मार अमेरिकी किसानों को झेलनी पड़ेगी.
इसे अमेरिका द्वारा चीन के स्टील और एल्युमिनियम आयात से समझा जा सकता है. अब अमेरिका ने इन पर शुल्क बढ़ा दिया है और इसके बाद यहां की जो भी इंडस्ट्रीज इन पर निर्भर हैं उन्हें सस्ता स्टील और एल्युमिनियम मिलना बंद हो जाएगा. ऐसे में वे अपने नुकसान की भरपाई कर्मचारियों की संख्या में कटौती कर या फिर अपने उत्पादों के दाम बढ़ाकर करेंगी. इसी तरह चीन से आने वाली हर चीज अमेरिका में महंगी होगी. एक सर्वे के मुताबिक अमेरिका में सबसे निम्न वर्ग का व्यक्ति भी चीन के सस्ते सामान की वजह से 250 से 300 डॉलर तक की अतिरिक्त वार्षिक बचत कर लेता है. ऐसे में अगर चीनी सामान बंद हुआ या महंगा हुआ तो उसकी बचत पर चपत लगनी लाजमी है. अर्थजगत के कई विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर व्यापार युद्ध लंबा खिंचा तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा क्योंकि चीन के सस्ते उत्पाद का कोई दूसरा विकल्प ही नहीं है.
अमेरिका के आगे इससे भी बड़ी दिक्कत तब आएगी जब चीन बदले की कार्रवाई के तहत अमेरिकी कृषि और तकनीक से जुड़े उत्पादों के आयात पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की घोषणा करेगा. सोयाबीन की ही बात करें तो अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक देश है, साथ ही सोयाबीन की खेती उसकी कृषि की रीढ़ की तरह मानी जाती है. आंकड़े बताते हैं कि चीन हर साल अमेरिका का करीब 60 फीसदी तक सोयाबीन खरीदता है. ऐसे में चीन के शुल्क लगाने से इसकी सीधी मार अमेरिकी किसानों को झेलनी पड़ेगी.
चीन के कुल निर्यात में अमेरिका की 18 फीसदी हिस्सेदारी है, वहीं चीन की जीडीपी में निर्यात योग्य वस्तुओं की हिस्सेदारी करीब 20 फीसदी है. इस लिहाज से व्यापार युद्ध के चलते उसके लिए भी मुश्किलें खड़ी होनी तय हैं. ज्यादातर विश्लेषकों का यह भी कहना है कि चीन के अमेरिकी निर्यात को देखते हुए इस व्यापार युद्ध की शुरुआत में सबसे ज्यादा नुकसान चीन को ही होगा. इनके मुताबिक इस शुरुआत में चीन के साथ ऐसा इसलिए होगा क्योंकि उसके यहां बने उत्पादों का एक बड़ा हिस्सा अमेरिका में खपता है. उसे तब तक यह नुकसान उठाना ही पड़ेगा जब तक वह कोई दूसरा वैकल्पिक बाज़ार नहीं खोज लेता. हालांकि, माना जा रहा है कि उसे यह विकल्प खोजने में ज्यादा समय नहीं लगेगा क्योंकि खुद उसके पास भी एक बड़ा बाजार है, दूसरी बात यह भी है कि चीनी उत्पादों की कम कीमत की वजह से उन्हें किसी भी बाजार में जगह बनाने में ज्यादा समय नहीं लगता. चीन ने व्यापार युद्ध से बनने वाले परिस्थितियों से उबरने के लिए पहले से तैयारी भी शुरू कर दी है. उसने भारत सहित कई देशों से चीनी समान का आयात बढ़ाने को लेकर बातचीत की है. पिछले कुछ समय से भारत के साथ चीन के सुधरते रिश्तों के पीछे की एक बड़ी वजह यही है. जानकारों की मानें तो चीन द्वारा अमेरिकी सामान पर शुल्क लगाने से भी चीन को ज्यादा नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा. इनके मुताबिक चीन के पास अमेरिका से हटकर अन्य देशों से वस्तुएं-सामान आयात करने का विकल्प खुला है. यात्री एयरक्राफ्ट के मामले में ही देखें तो फ़्रांस की कंपनी ‘एयरबस’ चीन से अनुबंध करने को तैयार बैठी है.
इसके अलावा जानकार एक और बात भी बताते हैं. ये लोग कहते हैं कि चीन तमाम क्षेत्रों में जिस तेजी से प्रगति कर रहा है उसे देखते हुए इस एशियाई दिग्गज को अमेरिकी कंपनियों पर ज्यादा दिन निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ने वाली. उदाहरण के लिए चीनी सरकार पिछले कुछ सालों से जिस तरह से अपने यहां की सेमीकंडक्टर निर्माता कंपनियों और एयरक्राफ्ट कंपनियों को प्रोत्साहन दे रही है, उससे इन क्षेत्रों में उसके जल्द आत्मनिर्भर बनने की इच्छाशक्ति का पता चलता है.
यानी इस पूरे मामले को अगर दो लाइनों में समझें तो चीन को केवल निर्यात के मामले में ही नुकसान उठाना पड़ेगा और वह भी शुरू के सालों में जबकि, इससे अलग अमेरिकी अर्थव्यवस्था को आयात और निर्यात दोनों मोर्चों पर मार झेलनी पड़ सकती है.

Thursday, July 5, 2018

दिल्ली किसकी? उपराज्यपाल या मुख्यमंत्री

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और दिल्ली के एलजी यानि लेफ्टिनेंट गर्वनर के बीच चल रही जंग के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि दिल्ली सरकार के हर फैसले में दिल्ली के एलजी की सहमति लेना जरूरी नहीं है. साथ ही यह भी कहा है कि दिल्ली सरकार के कैबिनेट को फैसले लेने का अधिकार है और कैबिनेट की सलाह पर चलें एलजी. मगर सबसे महत्वपूर्ण बात कोर्ट ने कही है कि दिल्ली कैबिनेट के फैसले को एलजी लटका नहीं सकते और एलजी कैबिनेट के सभी फैसलों को केन्द्र के पास नहीं भेजें.
साथ ही कोर्ट ने कहा है कि एलजी दिल्ली के प्रशासनिक प्रमुख हैं, मगर यह भी कोर्ट ने साफ कर दिया कि अराजकता और तानाशाही के लिए भी कोई जगह नहीं है और जमीन और कानून व्यवस्था एलजी के पास ही रहेगा. लेकिन क्या यह साफ हो गया है कि दिल्ली का बॉस कौन है..? जी नहीं अदालत ने भी मामला पूरा साफ नहीं किया है बॉस कौन है. कोर्ट ने दोनों के अधिकार बताए हैं, जो संविधान के तहत उन्हें मिले हुए हैं.
उम्मीद की जानी चाहिए कि अब दिल्ली का संकट खत्म हो जाएगा क्योंकि पिछले दिनों एलजी और दिल्ली सरकार के बीच जो कुछ घटा वो इतिहास में कभी नहीं हुआ था. देश में कभी भी चुनी हुई सरकार को धरने पर बैठा नहीं देखा गया था अब तक. इस गतिरोध पर एक तरफ दिल्ली सरकार पर सवाल पर उठ रहे थे कि वह जानबूझकर यह रास्ता अपना रही है वहीं एलजी के बारे में यह कहा जाने लगा था कि एलजी केन्द्र सरकार का मोहरा बने हुए हैं और केन्द्र के ऐजेंडा को लागू करने में लगे हैं. यह एलजी के दफ्तर की छवि के लिए ठीक नहीं हो रहा है. दूसरी तरफ केजरीवाल सरकार पर यह आरोप लग रहे थे कि वह अपनी नाकामी छिपाने के लिए एलजी को दोष दे रही है. लेकिन अब केजरीवाल सरकार की बहानेबाजी नहीं चलेगी क्योंकि अब दिल्ली सरकार अफसरों के ट्रांसफर पोस्टिंग भी कर सकेगी. यह एक ऐसी मांग थी जो केजरीवाल काफी दिनों से कर रहे थे. मगर सबसे बड़ा सवाल है कि क्या अब केजरीवाल बनाम केन्द्र सरकार का झगड़ा खत्म हो जाएगा?

Tuesday, July 3, 2018

संजू फिल्म रिव्यू

#SanjuMovie #MeraWalaReview
कल रात संजू फिल्म देखी, और उसका एक निष्कर्ष निकला, क़ि राजकुमार हिरानी ने ऐसे विषय पर फिल्म बनाई जो उनकी पिछली फिल्मों के स्तर की नहीं थी, फिर भी स्क्रिप्ट लिखते समय ऐसी चतुराई दिखाई क़ि फिल्म में हक़ीकत और इमैजिनेशन का कॉकटेल कर दिया. कई सीन में इमोशन बहुत हैं, सीन ऐसे बनाए गए हैं कि हम तुरंत संजय दत्त को पसंद करने लगते हैं. इसके बाद सभी बातों में मजा आने लगता है और पूरी सहानुभूति संजय दत्त के साथ हो जाती है. जैसे वो अस्पताल वाला ही सीन है, जिसमें नरगिस कैंसर से जूझ रही हैं और बेटा ड्रग्स ले रहा है. लोग उसपर धिक्कारते थे उसे लेकिन सीन ऐसे फिल्माया कि अच्छा लगता है, और ग़लती उसकी नहीं उसको ड्रग्स के दलदल में घुसाने वाले की लगती है. मतलब संजय दत्त को पूरी तरह से मासूम दिखाने की कोशिश की है. विनी (राइटर) का उसपर बुक लिखने से मना करना और फिर लिखना एक हमदर्दी का ही सीक़वेंस है. उनके जीवन के कई ऐसे पहलू हैं जिनका फिल्म में ज़िक्र भी नहीं है. कई लोगों से उनके रिश्ते, चाहे वो हीरोइनों (माधुरी दीक्षित, रेखा और भी कई) के साथ रहे हों, या अंडरवर्ड के लोगों के साथ. किसी को धमकाना या घर के बाहर फायर करना, उनकी बेटी के साथ उनके रिश्ते अच्छे नहीं रहे, राजनीति में उनका करियर, बाला साहब ठाकरे से उनका और सुनील दत्त का मिलना. उन्होंने वहीं पहलू चुने जिससे यह लगे कि संजय दत्त मासूम थे और न चाहते हुए भी उलझते चले गए। कह सकते हैं क़ि 35-40 साल की जिंदगी 3 घंटे में समेटना था ड्रग्स और जेल वाले एपीसोड ने ही एक एक हाफ़ ख़त्म कर दिया है. लोग रणबीर कपूर की संजय दत्त की एक्टिंग की तारीफ कर रहे हैं. जो मुझे एवरेज ही लगी. ऐसे तो कपिल शर्मा के शो में कोई कर जाता था. आप बरफी जैसी फिल्म करने वाले रणबीर कपूर से और बेहतर की उम्मीद करते थे. एमएस धोनी में सुशांत सिंह राजपूत इससे बेहतर थे कॉपी करने में. लेकिन अंत में रणबीर कपूर को ठीक कह सकते हैं, लुक पर काफ़ी मेहनत की है उनके बुढ़ापे से लेकर जवानी तक और चरसी से लेकर वजन बढ़ने तक का रोल किया है.
इसके अलावा सुनील दत्त का रोल भी परेश रावल नहीं कर पाए, इमोशनल सीन और सब बेहतर था लेकिन बार बार लग रहा था क़ि ये सुनील दत्त नहीं परेश रावल हैं. अन्नू कपूर जैसा कोई दूसरा एक्टर और अच्छा होता. वहीं संजय दत्त को ड्रग्स देने वाले व्यक्ति का किरदार जिसने निभाया नाम नहीं पता लेकिन उसने इतने शानदार तरीके से किया है उससे आप नफरत करने लगते हैं. छोटे-छोटे रोल में अनुष्का शर्मा, दीया मिर्जा, सोनम कपूर, बोमन ईरानी, करिश्मा तन्ना, मनीषा कोइराला, ने अपना काम बढ़िया तरीके से किया है. सबसे अच्छा काम संजय दत्त के दोस्त का रोल करने वाले विकी कौशल ने किया है. फिल्म का एक गाना, कर हर मैदान फ़तेह अच्छा है. कुल मिलकर मैं 5 में से 3 स्टार ही दूँगा. अगर उनकी जिंदगी के कुछ हिस्से और दिखाए होते तो 1 स्टार और बढ़ जाता। क्योकि ये बायोपिक है। बाकी का आधा स्टार परेश रावल के हिस्से काट लिया.
इसे संजय दत्त का सफाइनामा कह सकते हैं. एक चीज़ इससे किसी भी लत में डूबे लोगों सीखने लायक है क़ि अगर आप ज़िद कर लें तो हर चीज़ छोड़ सकते हैं. केवल एक बार बात दिल को लग जाए. वहीं दूसरी तरफ इसमें एक पुरषवादी समाज की हक़ीकत भी नज़र आती है. कोई आदमी ये क़ुबूल करता है कि वो 308 लड़कियों के साथ सोया है, लेकिन हम सिर्फ़ हंस देते हैं. और अगर यही बात किसी महिला ने कही होती तो रंडी वैश्या ना जाने क्या क्या कहकर थूकने लगते उसपर. लेकिन यहाँ हंसकर आगे बढ़ गए. मैं ना इसे राजकुमार हिरानी की बेस्ट फिल्म कहूँगा, ना रणबीर कपूर की, और संजय दत्त का तो सवाल ही नहीं.

Tuesday, June 26, 2018

इमरजेंसी, इंदिरा गाँधी या हिटलर

यह सच है कि इमरजेंसी भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय है. इस दौर में नागरिक अधिकार छीन लिए गए. नेताओं, लेखकों, पत्रकारों को जेल में डाला गया. उन्हें यंत्रणाएं दी गईं. लोगों की जबरन नसबंदी कराई गई. 20 सूत्री कार्यक्रम थोपा गया. अनुशासन पर्व के नाम पर तानाशाही का चाबुक चलाया गया. यह भी सच है कि इंदिरा गांधी को इतिहास उनके इस कृत्य के लिए कभी माफ़ नहीं करेगा. भारतीय जनता ने तो उन्होंने 1977 में ही दंडित कर दिया था.
लेकिन कुछ बातें इस संदर्भ में और जोड़ने और समझने की ज़रूरत है. कांग्रेस जिस तरह आ़ज़ादी की लड़ाई में अपने शामिल होने के सूद के सहारे भारतीय लोकतंत्र की ठेकेदारी का दावा नहीं कर सकती, उसी तरह बीजेपी भी इमरजेंसी के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई की कमाई को लोकतंत्र पर अपने कब्ज़े का आधार नहीं बना सकती. आज़ादी की लड़ाई अगर 70 साल पुरानी घटना है तो इमरजेंसी भी 40 साल पीछे छूट चुकी है. लेकिन सिर्फ अतीत हो जाने के तर्क से नहीं, भारतीय लोकतंत्र का हाल देखते हुए भी कांग्रेस और बीजेपी के अपने-अपने दावों को फिर से परखने की ज़रूरत है. मिसाल के तौर पर जेटली को हिटलर और इंदिरा गांधी के बहुत सारे साम्य याद आए, यह नहीं याद आया कि हिटलर ने अंत में एक बंकर में आत्महत्या की. जबकि इंदिरा गांधी ने 19 महीने बाद चुनाव करवाए, उनमें हारीं, तीन साल सत्ता से बाहर रहीं और अंततः जनता पार्टी की टूटन के बाद नए सिरे से चुनाव जीत कर सत्ता में वापस लौटीं. वापसी का यह मौका भी इंदिरा गांधी को जिन वजहों से मिला, उनमें बाकी बातों के अलावा जनता पार्टी से जनसंघ घटक का विश्वासघात भी था. आरएसएस के साथ अपना जुड़ाव बनाए रखने की ज़िद में जनसंघ से जुड़े नेताओं ने जनता पार्टी को टूटने दिया. इसी से इंदिरा गांधी की वापसी हुई. दूसरी बात ज़्यादा गंभीर है. हिटलर ने सिर्फ देश का हवाला नहीं दिया था, जर्मनी को आर्यों की श्रेष्ठता के सिद्धांत पर पुनर्परिभाषित करने की कोशिश भी की. जर्मनी में सारी हिंसा दरअसल नस्ली श्रेष्ठता की इस वैचारिकी की देन थी. दूसरी तरफ़ इंदिरा गांधी ने भारत की बहुलता का अंत-अंत तक सम्मान किया और अंततः उसी की रक्षा के लिए जान दी. यह बात सार्वजनिक है कि इंदिरा गांधी को ख़ुफिया एजेंसियों ने सलाह दी थी कि वे अपने सुरक्षा दस्ते में सिखों को जगह न दें. लेकिन सांप्रदायिक आधार पर ऐसा भेदभाव इंदिरा गांधी को मंज़ूर नहीं था. अंततः वे अपने इस विश्वास के लिए शहीद हो गईं. दिलचस्प ये है कि सिख आतंकवाद से जुड़़े चेहरों को जिन दलों ने नायकत्व प्रदान किया, जो आतंकवादियों को सरोपा भेंट करते रहे, जो बेअंत सिंह के हत्यारों की माफ़ी के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पास करते रहे, उनके साथ आज की तारीख बीजेपी खड़ी है. दूसरी बात यह कि हिटलर की यह जो वैचारिक विरासत है, उसके असली वारिस भारत में कौन हैं? कौन हैं जो एक धर्म या नस्ल की श्रेष्ठता के आधार पर एक नया और ख़ौफ़नाक भारत बनाना चाहते हैं. निस्संदेह यह बीजेपी है जो इस मामले में हिटलर के ज़्यादा करीब दिखती है, बल्कि हिटलर, नाजी जर्मनी और फासीवादी इटली उसकी प्रेरणा रहे हैं, यह बात भी किसी से छुपी नहीं है. आरएसएस के पहली पंक्ति के नेताओं में एक बीएस मूंजे बाक़ायदा इटली जाकर मुसोलिनी से मिले थे और अपनी डायरी में उन्होंने मुसोलिनी की तारीफ़ की थी. वीर सावरकर भारत को जर्मनी की तरह पितृभूमि कहते रहे और मुसलमानों से उसी तरह पेश आना चाहते थे जैसे यूरोप में "नीग्रो' के साथ पेश आया जाता था. तो यह बीजेपी है जो नाज़ी पार्टी के ज़्यादा क़रीब है. अफ़सोस और चिंता की बात यह है कि यह क़रीबी सैद्धांतिक स्तर पर हाल के वर्षों में कुछ और बड़ी हुई है. पुरस्कार वापस करने वाले लेखकों को गैंग बताना, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों की हत्या, गोरक्षा के नाम पर लोगों को घर से निकाल कर मारना, सड़कों पर पीटना, लव जेहाद के नाम पर होने वाली हिंसा, तरह-तरह के जुलूसों और आयोजनों के बहाने बहुसंख्यकवाद की आक्रामक अभिव्यक्ति- ये सब बताते हैं कि भारत में पहली बार इतने व्यापक पैमाने पर बहुसंख्यकवाद की आक्रामकता को सत्ता का संरक्षण मिल रहा है. मॉब लिंचिंग का ऐसा माहौल किसी दूसरे दौर में याद नहीं आता है. सोशल मीडिया पर झूठ और नफ़रत की जो नई भाषा दिख रही है, पत्रकारिता पर जिस तरह के दबाव बनाए जा रहे हैं, वे एक तरह की इमरजेंसी का ही इशारा हैं, बल्कि इस मायने में ज़्यादा ख़ौफ़नाक कि यह इमरजेंसी बिल्कुल अदृश्य है. यह सच है कि 'इंदिरा इज़ इंडिया' की तरह इस दौर में कोई 'नरेंद्र मोदी इज़ इंडिया' नहीं कह रहा. लेकिन नरेंद्र मोदी की जिस तरह नायक-पूजा हो रही है, वह इंदिरा गांधी के दौर की ही याद दिलाने वाला है. पूरी सरकार उनके भरोसे है, सारे चुनाव उनके सहारे लड़े जा रहे हैं, हर जगह उनका चेहरा पेश किया जा रहा है. वे आकाशवाणी पर मन की बात कह रहे हैं, विज्ञापनों में गैस बेच रहे हैं और ख़बरों में उनके लंबे-लंबे भाषण इस्तेमाल हो रहे हैं. नोटबंदी और जीएसटी जैसे बड़े-बडे फ़ैसले या तो गोपनीय ढंग से या फिर हड़बड़ी में लागू किए जा रहे हैं, विश्वविद्यालयों और दूसरे लोकतांत्रिक संस्थानों को तहस-नहस किया जा रहा है. 19 महीने की इमरजेंसी इंदिरा गांधी की वह राजनीतिक महाभूल थी जो उनके दशकों के राजनीतिक करियर पर भारी पड़ रही है, लेकिन बीते 4 साल में जिस चालाकी से इमरजेंसी जैसे हालात बना दिए गए हैं, वह बीजेपी का डरावना सयानापन है.

Monday, June 25, 2018

महाराष्ट्र में प्लास्टिक बैन

महाराष्ट्र में प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगा दिए गए हैं, और उससे आम जनमानस में काफ़ी समस्याएँ हैं. अच्छी बात है अगर इसको पर्यावरण बचाने के उद्देश्य से किया जाए. लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं जिनको रखने से आप मुझे कम्युनिस्ट कहेंगे. लेकिन आप सोचकर देखिए क्या ये सही है?
1- आपके बच्चे बारिश से बचाने के लिए प्लास्टिक की थैली में अपनी किताबें नहीं ले जा सकते हैं, लेकिन वे प्लास्टिक कवर में सील किए गए चिप्स को खा सकते हैं।
2- आप स्थानीय स्टोर से खुली दाल, चावल या आंटा नहीं खरीद कर प्लास्टिक बैग में नहीं पैक कर सकते हैं, लेकिन आप एक बड़े बिग बाजार टाइप डिपार्टमेंटल स्टोर से प्लास्टिक बैग में पैक अदानी विल्मार दाल खरीद सकते हैं।
3- छोटे चाय वाले आपको थर्मोकॉल या प्लास्टिक कप में चाय नहीं दे सकते हैं लेकिन आपका नया LED टीवी अभी भी थर्मोकॉल सिक्योरिटी में पैक हो सकता है।
4- आप प्लास्टिक के थैले या कंटेनर में अपने स्थानीय डेयरी से खुला दूध नहीं खरीद सकते हैं, लेकिन आप अमूल जैसे ब्रांड के दूध के पैकेट खरीद सकते हैं.
5- आप बारिस में अपना पर्स बचाने के लिए प्लास्टिक में रखकर उसे नहीं घूम सकते हैं लेकिन आपकी कार में अभी भी लगभग 150 किलो प्लास्टिक लगाया जा सकता है.
इसलिए उन सभी लोगों के लिए दो मिनट की मौन, जो सोचते हैं कि महाराष्ट्र में प्लास्टिक प्रतिबंध पर्यावरणीय कारणों से है, न कि गरीब असंगठित व्यापारी को मारने और कॉर्पोरेट बिक्री को बढ़ावा देने के लिए। अगर इतना ही पर्यावरण की चिंता है तो कुछ वैकल्पिक थैली पहले से निर्धारित करते थे. पर्यावरण खराब करने वाले कुछ और प्रयास भी करते थे. सड़क से निजी वाहन कम करते थे. किसी फैक्ट्री के धुएँ, और निकालने वाले केमिकल्स को  बंद करवाते थे. ज़मीन और जंगल ख़त्म करने वाले किसी काम को बंद करवाते थे. इन सरकारों ने ज़मीन के ऊपर, नीचे, बाहर, नदियों, समंदर, आसमान जहाँ से कुछ निकल सकता है सब निकाल के बर्बाद कर दिया, और आज नाटक कर रहे हैं. अगर यही प्लास्टिक बैन ही ढंग से कर दें तो बड़ी बात है. ये थोड़े दिन बाद फिर से कुछ ना कुछ नाटक करके चुप बैठेंगे नोटाबंदी की तरह. उससे कितना काला धन कम हुआ, आतंकवाद ख़त्म हुआ? वैसे ही ये होगा.
और ऊपर से 5000 रुपए जुर्माना? मज़ाक बना रखा है. कोई आदमी 1000-2000 का समान थैली सहित छोड़ देगा. और आम आदमी 5000 देगा कैसे? कहीं ऐसा ना हो क़ि ये भी अधिकारियों की कमाई का ज़रिया हो जाए. ठीक ट्रैफिक नियमों की तरह. उसमें भी नागरिक की सुरक्षा या ट्रैफिक जाम की चिंता नहीं पुलिस को बस कैसे भी बिना हेल्मेट और लाइसेंस के मिल जाए कोई और अपना टारगेट पूरा करें.

Wednesday, June 20, 2018

केजरीवाल की धारणा पॉलिटिक्स

जो लोग दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों पर अहंकारी और अराजक होने की तोहमत लगाते हैं, उन्हें दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल का रवैया देखना चाहिए. उनके गेस्ट रूम में आठ दिन से राज्य के मुख्यमंत्री-उपमुख्यमंत्री धरने पर बैठे हैं, उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्यमंत्री अनशन की वजह से अस्पताल तक पहुंच चुके, लेकिन उपराज्यपाल ने जैसे तय कर रखा है कि जब तक केंद्र सरकार से हरी झंडी नहीं मिलेगी, वह इन आंदोलनकारियों से बात तक नहीं करेंगे. उनके लिए मुख्यमंत्री के ट्वीट और उनकी ओर से आ रहे अनुरोध भी बेमानी हैं.
केजरीवाल की मुख्य शिकायत क्या है? यही कि अफसर हड़ताल कर रहे हैं, उन्हें काम पर लौटने के लिए कहना चाहिए. अफसरों का कहना है कि वे हड़ताल पर नहीं हैं, लेकिन वे किस तरह काम कर रहे हैं? क्या उन्हें अपने चुने हुए जनप्रतिनिधियों की ऐसी अवहेलना करने का हक है? अगर उन्हें ल्ग की शह न हो, तो क्या वे मंत्रियों की बुलाई बैठक का बहिष्कार कर सकते हैं? क्या यही अफसर दूसरे राज्यों और नेताओं के कहीं ज़्यादा अवमाननापूर्ण व्यवहार के आदी नहीं रहे हैं? क्या वे नेताओं के जूते उठाने से लेकर उनकी गालियां तक सुनते-खाते नहीं देखे गए हैं? कहीं और तो अफसरों के इस रवैये की शिकायत नहीं है?
कहने का मतलब यह नहीं कि अफसरों से ऐसा व्यवहार होना चाहिए. किसी लोकतंत्र में सबको सम्मान और गरिमा के साथ जीने का हक है और अगर हम यह सुनिश्चित नहीं कर पाते, तो हमें इस पर शर्मिन्दा होना चाहिए. आम आदमी पार्टी के प्रसंग में बताया जा रहा है कि उसके नेताओं ने मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ मारपीट की. मारपीट की यह बात भरोसे लायक नहीं लगती. बहुत संभव है, धक्कामुक्की जैसा कुछ हुआ हो, जिसे मुख्य सचिव मारपीट बता रहे हैं. जिस मेडिकल रिपोर्ट के सहारे यह केस बनाया जा रहा है, वह हादसे के 24 घंटे बाद की है. फिर भी मुख्य सचिव की शिकायत वैध है. उनके साथ भी किसी सरकार को हिंसक अहंकार के साथ पेश आने का हक नहीं है. लेकिन क्या इसी बिना पर किसी लोकतांत्रिक सरकार को आप काम करने नहीं देंगे? आप उसको सबक सिखाने के लिए अफसरों को प्रोत्साहित करेंगे कि वे मंत्रियों द्वारा बुलाई गई बैठकों में न जाएं? आप काम न करने के लिए उनकी तरफ़दारी करेंगे?
यह सच है कि अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम के तौर-तरीके कई बार एक तरह की अराजकता का एहसास कराते हैं. कई बार उनकी वैचारिक दिशा से गहरी असहमति का अनुभव होता है. शासन-प्रशासन के खुर्राट लोगों को आम आदमी पार्टी के तौर-तरीके कई बार गैरपेशेवर लगते हैं. उन्हें लगता है कि यह पार्टी नियम-कायदों पर अमल नहीं करती. लेकिन इसके बावजूद इसमें शक नहीं कि भारतीय राजनीति में हाल के वर्षों में जो सबसे उजली धारा देखी है, वह आम आदमी पार्टी की है. यही वजह है कि दिल्ली के लोगों ने उन पर भरोसा जताया है. शिक्षा और सेहत जैसे बुनियादी सवालों पर आम आदमी पार्टी की पहल प्रशंसनीय रही है. लेकिन माहौल कुछ ऐसा बनाया जा रहा है जैसे केजरीवाल और सिसोदिया को धरनों के अलावा कुछ नहीं आता, कि उन्हें दिल्ली का नहीं, अपनी राजनीति का ही ख़याल है. और यह माहौल सिर्फ ब्ज्प-कांग्रेस जैसी पार्टियां ही नहीं बना रहीं, वह अफसरशाही बना रही है, जो दरअसल अपने-आप को बचाए रखने के बाद ही कोई दूसरे काम करती है. राजनीतिक दल और नेता भले बदनाम रहे हों, लेकिन सत्ता का सुख और उसका बेजा लाभ लेने में अफसरशाह उनसे कहीं ज़्यादा आगे रहे हैं. भारत में भ्रष्टाचार की मूल वजह नेता नहीं, अफसर ही हैं.
दरअसल यह पूरी अफसरशाही - खासकर ईयेज़ संवर्ग - इस देश का वह श्रेष्ठिवर्ग है, जिसे अंग्रेज़ों ने अपनी सहूलियत के लिए बनाया था. यह देशसेवा के लिए नहीं, अंग्रेजों की सुविधा के लिए बनाया गया. लेकिन इस गलती के बहाने यह अफसरशाही जिस तरह की मांग कर रही है, वह ख़तरनाक है. वह एक तरह से राजनीतिक नेतृत्व को बेमानी बनाने पर तुली हुई है. सवाल है, इस पर कौन कार्रवाई करेगा? बस एक घटना को लेकर महीनों तक खिंचे इस टकराव का असली मकसद दरअसल अपनी बादशाहत कायम रखना है.

कश्मीर में क्यों पीछे हटी बीजेपी?

जम्मू एवं कश्मीर में ऐसा होने की भनक किसी को नहीं लगी. मीडिया को अचानक बताया गया कि ब्ज्प वहां महबूबा मुफ्ती सरकार से अलग होने जा रही है, और दो घंटे के भीतर ही नाकामियों का ठीकरा महबूबा पर फोड़ते हुए ब्ज्प ने सरकार गिराने का ऐलान कर दिया. मसला एक विशेष राज्य में सरकार गिराए जाने का है. सब कुछ फटाफट हुआ, लिहाज़ा जम्मू एवं कश्मीर जैसे खास प्रदेश में इतनी बड़ी राजनीतिक घटना का विश्लेषण ढंग से नहीं हो पा रहा है. फैसला BJP का था, सो, कारण बताने की ज़िम्मेदारी उसी की थी, लेकिन उसने जो कारण गिनाए, उनमें एक भी ऐसा नहीं था, जिसे तात्कालिक कारण माना जा सके. एक ही बात प्रमुखता से कही गई कि कश्मीर में आतंकवाद काबू में नहीं आ रहा था. यानी इसी नाकामी की ज़िम्मेदारी महबूबा के मत्थे मढ़कर सरकार से अलग होने का बहाना समझ में आता है. अब यह अलग सवाल है कि यह बात जनता के गले उतरेगी या नहीं. खासतौर पर इसलिए कि जम्मू एवं कश्मीर सरकार में शामिल यही BJP तीन साल से कहती आ रही थी कि वहां के हालात सुधारने में उसने कमाल कर दिया है. भले ही कश्मीर और साथ ही साथ पूरे देश की जनता का अनुभव इस दावे से उलट रहा हो, लेकिन यह तो जगज़ाहिर है कि नोटबंदी करते समय भी काले धन को आतंकवाद से जोड़ने का प्रचार हुआ था. पत्थरबाजी के खिलाफ मुहिम के तौर पर केंद्र सरकार ने उस नारे का इस्तेमाल किया था. बहुत ही मुश्किल दौर में सर्जिकल स्ट्राइक को प्रचारित करना पड़ा था. लेकिन सामान्य अनुभव यह था कि आए दिन अपने जवानों की शहादत की खबरें रुक नहीं रही थीं. इन हालात में ब्ज्प वहां अपनी छवि बचाने का कोई तरीका नहीं ढूंढती तो और क्या करती?
पिछले तीन साल में कश्मीर को लेकर जो हताशा और निराशा का माहौल बनता चला आया, उसका फायदा कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस को खुद-ब-खुद मिल ही रहा था. यही कारण है कि सरकार गिराने के ऐलान के लिए BJP की प्रेस कॉन्फ्रेंस के फौरन बाद ही कांग्रेस की तरफ से गुलाम नबी आज़ाद  और नेशनल कॉन्फ्रेंस की ओर से उमर अब्दुल्ला सबसे पहले मीडिया के सामने आए. यहां तक कि महबूबा मुफ्ती ने इन दोनों नेताओं के दो घंटे बाद मीडिया से बात की.
महबूबा मुफ्ती की प्रेस कॉन्फ्रेंस की एक बात बहुत ही गौरतलब थी. वह यह कि उन्होंने BJP से नाराज़गी बिल्कुल भी नहीं दिखाई. वह अपनी पार्टी (और गठबंधन) की सरकार के तीन साल के कामकाज का ब्योरा ही देती रहीं. वह बताती रहीं कि जम्मू एवं कश्मीर के लोगों के हित में उन्होंने क्या किया. सभी को लग रहा था कि महबूबा भी BJP जैसे तेवरों में ही BJP के खिलाफ बोलेंगी, लेकिन उन्होंने ऐसा एक भी शब्द न बोलकर मीडिया को चक्कर में डाल दिया. उनके इस अंदाज़ का विश्लेषण अभी हो नहीं पाया है, लेकिन एक अटकल लगाई जा सकती है कि शायद वह अब घाटी की बजाय जम्मू और लद्दाख में जनाधार बढ़ाने की बात सोच रही हों. उनका संयत रहना इस मकसद को हासिल करने में कुछ काम का हो सकता है. आखिरकार वह लम्बे अरसे तक जम्मू एवं कश्मीर की मुख्यमंत्री रही हैं.
BJP-PDP की गठबंधन सरकार तीन साल से ऊपर चल चुकी थी. राजनीतिक विचारधारा में भारी भेद के बावजूद इतने समय तक ऐसी सरकार का चलना आश्चर्य ही माना जाना चाहिए. और फिर अगले साल लोकसभा चुनाव में गठबंधन को भारी दिक्कत आना तय था. सो, आम चुनाव से 10 महीने पहले के वक्त से ज़्यादा माकूल मौका और कौन सा होता. BJP और PDP दोनों के लिए अपने-अपने जनाधारों के पास लौटने के लिए कम से कम इतना वक्त तो चाहिए ही. किसी बात को भुलाने के लिए इतना समय तो लगता ही है. वैसे तो BJP के बड़े नेताओं ने अच्छी तरह सोच लिया होगा कि सरकार गिराकर वहां राष्ट्रपति शासन लगने से उसका झंझट कम नहीं हो जाएगा. राज्यपाल का शासन केंद्र सरकार के शासन जैसा ही माना जाता है, और फिर जम्मू-कश्मीर के मामले में राज्यपाल के सामने हर दिन ही एक चुनौती बनकर खड़ा होगा. ऊपर से राज्यपाल शासन हटाकर जल्दी चुनाव कराने का दबाव भी बना रहेगा. अगर बीच में कोई नया समीकरण नहीं बना, तो ज़्यादा आसार यही हैं कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव अब लोकसभा चुनाव के साथ ही करवाने पड़ेंगे, और अगर ऐसा हुआ, तो BJP के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती साबित होगी.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...