Sunday, December 29, 2013

बेरहम अखिलेश सरकार

पिछले कई महीनों से पूरी राजनैतिक ज़मात के मुंह पर मुज़फ़्फरनगर दंगों की कहानी है। सब एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। यह वह इलाका है जो 1947,1987,1991 और न जाने कितने नाजुक मौकों पर प्रेम और सौहार्द का प्रतीक बना रहा। वहां इस घटिया राजनैतिक कलाबाजी ने दंगे करा दिए। जब दंगे हो गए, तो आरोपी की पहचान कानून पर छोड़ दी गई है। अब सवाल यह उठता है, कि अगर सपा निर्दोष भी है। तो क्या दंगा पीडितो की मदद करना उनका जिम्मा नहीं है? मैं यह नहीं कह रहा हूँ, क़ि प्रदेश सरकार ने कुछ नहीं किया है। लेकिन 40 हजार दंगा पीड़ितों में से बचे हुए 8-10 हजार लोगों की जिम्मेदारी कौन लेगा? एक तरफ वो भूँखो मर रहे है, और दूसरी ओर मुलायम कहते हैं क़ि अब राहत शिविरों में कोई दंगा पीड़ित नहीं हैं। एक तरफ उनके 37 बच्चे शर्दी से मर गए और दूसरी तरफ उनके नौकरशाह कहते हैं क़ि ठंड से किसी की मौत नहीं होती है। उपर से हमारा ये बेरहम समाज, एक मामूली छेड़छाड़ से हुए दंगे में पीड़ित महिलाओं के साथ वहां बलात्कार हुए। लेकिन इन बातों को देख और सुनकर किसी भी सभ्य समाज के कान पर जून तक नहीं रेंगती है। एक तरफ यह सब बातें हो रही हैं, वहीं दूसरी तरफ बेशर्म अखिलेश यादव सपरिवार सैफई महोत्सव मना रहे हैं। मुम्बई से हीरोइनों को 5-5 मिनट के अश्‍लील डांस के लिए करोड़ो रुपए दे रहे हैं। कपिल शर्मा जैसे नॉन-सेन्स कामेडियन की बेहूदा कॉमेडी पर हंस रहे हैं। उन्हें लोगों की जिंदगी से ज्यादा मनोरंजन की चिंता है। संस्कृति के नाम पर जनता का पैसा बर्बाद किया जा रहा है।
लगभग दो साल पहले की बात है, मैने फ़ेसबुक पर समाजवादी पार्टी को समर्थन करने लगा था। पूरा पेज समाजवादी पार्टी से रंगा रहता था। फिर यह सिलसिला नेट से लेकर जमीनी तौर पर भी जारी रहा। अखिलेश का बहुत प्रचार किया था। तब मैने कोई सपा की सदस्यता नहीं ग्रहण की थे। बस लूटते हुए उत्तरप्रदेश को नहीं देखा जा रहा था। ऐसा भी नहीं था कि मैं सपा की गुंडागर्दी से वाकिफ नहीं था। लेकिन एक युवा चेहरा देखा तो फिर से उम्मीद जाग गई थी। हालांकि मुलायम भी वर्तमान देश के सबसे बड़े किसान नेता हैं, लेकिन उनके चमचों और भाइयों की वजह से सब गुंडागर्दी चल रही है। जरा सी बात हुई नहीं कि यादव सरनेम का फायदा उठाना शुरु। एक साल तक तो यही लगा कि शायद हमें युवा मुख्यमंत्री को कुछ समय देना चाहिए। लेकिन समय के साथ-साथ अपराध और कुशासन बढ़ता ही गया। अखिलेश बेचारे मूक-बधिर और अपंग होकर देखते रहे। कोई भी काम की योजना नहीं लाई गई है। कल ही  अखिलेश यादव के फ़ेसबुक पेज पर एडमिन ने 100 पुलों का निर्माण पूर्ण बताया था। मेरे बिठूर में 2007 में मुलायम् सिंह ने पुल का उद्घाटन किया था। आज तक पुल चालू नहीं हुआ है। बोले थे, केन्द्र से बात करेंगे बिठूर रेलवे को फिर से चालू करने की, कुछ नहीं हुआ। सूबे के 30% गावों में बिजली के खम्भे तक नहीं गड़े हैं। जहाँ हैं, भी वहाँ महींनो लाइट नहीं आती है (रामपुर, कन्नौज, सैफई, रायबरेली और अमेठी को छोड़कर)। लैपटाप तो दे दिए, सब विद्यार्थी उन्हें बेंच रहे हैं। चार्जिंग से लेकर कम्प्यूटर समझने तक की समस्या। लैपटाप दिया तो साथ में यह निर्देश भी देते कि सब कॉलेजों में कम्प्यूटर पढ़ाना अनिवार्य होगा। बेरोजगार भत्ता किसी भी लायक को नहीं मिल रहा है। जरूरतमंदों फार्म कचरे में होगे। ओ. बी. सी. की स्कॉलरसिप पिछले वर्ष से नहीं मिली है। अस्पतालों की हालत पहले से खराब। बसपा सरकार से दुगुना भ्रष्टाचार, पहले तो मायावती के डर से अधिकारी भी टाइम पर आते थे, अब तो वो भी नहीं। मेरे गाँव में कुछ दलितों की जमीन पर यादवों के कब्जे को लेकर मुकदमा था। कब्जा 50 साल पहले से दलितों के पास था, जैसे सपा सरकार बनी उस जमीन पर कब्जा यादवों का हो गया। जबकि सारे गाँव को पता है, जमीन किसकी है, लेकिन डर की वजह से कोई बोलता नहीं है। विधायकों और छुटभैये नेताओं की जमकर चल रही है। कौन कहता है, कि सपा सरकार मुसलमानो की हमदर्द है, वो केवल रामपुर, और आजमगढ में ही ऐसा  होगा। मेरे यहाँ तो मुस्लिम और दलितों की स्थिति समान है। जो यादव चाहे मार-पीट लेता है, और रिपोर्ट लिखना भी मुस्किल। हम लोगों और  मीडिया  के दबाव से  अखिलेश ने कुछ सख्त कार्यवाही के ओर्डर दिए, जब पुलिस कुछ कारवाही करे तो जाति का वोट मोदी न ले जाए इस डर से शिवपाल ने फिर से वही स्थिति कर दी। पुलिस की भर्ती हो रही है। पिछली सरकार में 35 हजार सिपाही भर्ती हुए थे, मैने भी टेस्ट दिया था। फेल हो गया था। कम से कम 40-50 मित्र आज पुलिस में हैं, किसी ने नहीं बताया कि उसके 100 रुपए भी घूस में खर्च हुए। लेकिन इसबार तो बहुत मित्र कहते हैं, "यार मेरी सेटिंग 4.5 लाख में है। तो कोई कहता है, कि मेरे मामा अमिताभ बाजपाई के खास हैं।" पूरी 41 हजार की लिस्ट पहले से ही तैयार है। बस 2014 के चुनाव की औपचारिकता बाकी है। सारा का सारा युवा नेतृत्व फेल हो गया। जितना हम मायावती के शासन काल में 5 साल में छके (परेशान) थे, उतना ही आज सपा की सरकार ने 18 महीने में कर दिया है। अब  लगता है कि इससे अच्छी तो मायावती की सरकार ही थी। अब मेरी इस बात को कुछ लोग राजनैतिक महत्वाकांक्षा और दलबदलू नीति से जोड़ सकते हैं। लेकिन मैं आम आदमी हूँ, तो आम आदमी का ही दर्द बता रहा हूँ। जब एक सरकार बुरा करती है, तो दूसरे से उम्मीद और जब दूसरी सरकार गलत करे तो फिर पहले या तीसरे से उम्मीद। आखिर आम आदमी कर भी क्या सकता है, सिवाय उम्मीद के। जब पूरे देश की सरकार (केन्द्र) से ऊभ गए तो दूसरे की तरफ देखने लगे। लेकिन मेरी दिक्कत यह है, कि दूसरे विकल्प (मोदी) की विचारधारा को भी देखना पड़ेगा। क्योंकि किसी भी देश के लिए पैसे का घोटाला, खून की नदियाँ बहने से थोड़ा सा ठीक होगा। अब हमे तीसरे विकल्प की उम्मीद है, लेकिन तीसरे मोर्चे की अगुवाई तो खुद मुलायम ही कर रहे हैं। तो हमसे समर्थन की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। राहुल गाँधी भी दो बार मीडिया मार्केटिंग दौरा करके बैठ गए। अखिलेश को निर्देश देते हैं। अगर वो कुछ नहीं कर रहे हैं, तो कम से कम अपनी केन्द्र सरकार से ही कुछ मदद करा देते। मदद तो छोडो, बेचारे पीड़ित युवाओं का नाम ISI से जोड़ दिया।लेकिन जो जनता 225 सीटें दिलाना जानती है, वो 45 सीटों पर भी सीमित रखने का माद्दा रखती है। अगर 2017 तक सरकार चली(राष्ट्रपति शासन लगने का डर है।) तो चुनाव में सपा की भी हालत दिल्ली और राजस्थान में कांग्रेस जैसी होगी।
(ब्लॉग में किसी पर भी जातिगत टिप्पणी नहीं की गई है, बस उत्तर प्रदेश की जमीनी हकीकत बताई है। )

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