हमारा हिन्दुस्तान बहुत
सारी संस्कृतियों
और विचारधाराओं
का देश
है। फिर
भी यहाँ
पर कुछ
क्रिकेट या
बॉलीवुड को
धर्म से
कम नहीं
माना जाता
है। बॉलीवुड
ने अपने
100 साल में
बहुत सारे
महानायक और
महानाइकायें दी हैं। इसमें दिलीप
कुमार से
लेकर अमिताभ
बच्चन और
आमिर ख़ान
तक और
मधुबाल और
रेखा से
लेकर दीपिका
या ऐश्वर्या
राय तक
कलाकार दिए
हैं। इनका
एक मात्र
काम माना
जाता रहा
है, मनोरंजन
करना। उन्होंने
हमेशा बदलते
वक्त में
देश के
हर मुद्दे
पर अच्छी
फिल्में और
गाने दिए
हैं। यह
एक बहस
का विषय
हो सकता
है क़ि
फिल्मों में
सबकुछ सही
ही नहीं
होता है।
लेकिन अगर
नकारात्मक पहलू को छोड़ दिया
जाए तो
फिल्मों ने
हर पीढी
की सोंच
को बदलने
का काम
किया है। गाँव-गाँव
तक फैशन
पहुँचा। लोगों
में अंग्रेज़ी
जानने की
इच्छा आई
और इसी
का प्रभाव
था कि
अनपढ लोगों
को भी
देश के
इतिहास और
कल्चर के
बारे में
ज्ञान हुआ।
इसमें सबसे
अच्छी बात
यह थी
कि आज
पूरे देश
में सबसे
ज्यादा हिन्दी
का प्रचार-प्रसार हुआ।
आज बंगाली
और मद्रासी
लोग भी
फिल्में देखकर
हिन्दी सीख
रहे हैं। देश का
युवा जागरूक
हुआ।
देश में 1947 के
बाद से
सबसे अधिक
सम्प्रदायिक सौहार्द खराब हो रहा
था। लेकिन
फिल्मों ने
इसे जोड़ने
का एक
बड़ा प्रयास
किया। बॉलीवुड
ने ही
कितने कट्टरपंथियों
की सोंच
बदल दी।
दिलीप (यूसुफ़)
साहब, तलत
महमूद, रफी
साहब, गुलजार
और जावेद
साहब, सलीम
ख़ान, शाहरुख
ख़ान, आमिर
ख़ान और
सैकड़ों गायक,
लेखक, और
कलाकारों की
यह पंक्ति
पूरे हिन्दू
बहुल देश
के दिलों
पर छा
गई। पुरानी
कुप्रथाओं के अंत में भी
फिल्मों ने
एक बड़ी
भूमिका अदा
की। आज
कितने ही
युवा प्रेम-विवाह करते
हैं, उनके
मन से
समाज, जाति,
धर्म, और
क्षेत्र का
डर खत्म
हो चुका
है। आप
मुम्बई में
ही देखेंगे
कि कितने
ही यूपी
और बिहार
के लड़के
महाराष्ट्रियन लड़कियों से शादी करते
हैं। मराठी,
बंगाली, मद्रासी,
पंजाबी, गुजराती
सब एक-दूसरे से
प्रेम-विवाह
कर रहे
हैं। कहने
का मतलब
समाज को
एक सकारात्मक
सोच दी
है इस
बॉलीवुड ने।
पिछले कुछ
वर्षों में
ख़ान की
तिकड़ी (सलमान,
आमिर, शाहरुख)
के आगे
कोई टिक
नहीं पाया
है। तीनों
में से
किसी की
भी फिल्म
आती है।
तो यह
रिकार्ड टूटने
की बात
होती है
क़ि दबंग
से धूम3
ने कितने
100 करोड़ ज्यादा कमाए। पूरे देश
में लोगों
को 15-15 दिन
तक टिकट
के लिए
संघर्ष करना
पड़ता है।
जब कोई
फिल्म इतनी
हिट होती
है, तो
जाहिर सी
बात है क़ि ये
फिल्में पूरे
देश के
हिन्दू, मुस्लिम,
सिख और
ईसाई भी
देखते होंगे?
केवल मुसलमानों
के ही
थियेटर जाने
से तो
कोई फिल्म
500 करोड़ नहीं कमा सकती है।
मेरा मतलब
है, इस
देश का
90% तबका सेकुलर
विचारधारा का है। सब इन
फिल्मी सितारों
को आँखों
पर बिठाकर
रखते हैं।
जब ऐसे में
कोई अभिनेता
कोई राजनैतिक
या देश
के गंभीर
मुद्दे जिनपर
उन्हें नहीं
बोलना चाहिए,
बोल देता
है, तो
पूरे देश
को ठेस
पहुंचती है।
कोई भी
इसे पसंद
नहीं करता
है. जैसे
2-3 साल पहले
ही शाहरुख
ख़ान ने
पाकिस्तान के खिलाडियों को भारत
में खेलने
की अनुमति
को लेकर
एक ऐसा
ही बयान
दे दिया
था। तब
पूरा देश
26/11 के दर्द
उबर भी
नहीं पाया
था। तब
उनका पूरे
देश में
बहुत विरोध
हुआ था।
जो किसी
हद तक
जायज भी
था। हालांकि
कुछ राष्ट्रवादियों
के विरोध
के तरीके
को मैं
सही नहीं
मानता हूँ।
मैं पूरे
देश में
लता मंगेशकर
के गीतों
को लोग
दिल से
सुनते हैं।
यहाँ तक
कि भारत
में जितने
मशहूर ग़ुलाम
अली हुए,
उतनी ही
लताजी पाकिस्तान
में। मैं
भी अभी
तक उनके
गीतों को
बहुत पसंद
करता था.
कुछ दिन
पहले ही
वो अपनी
मोदी भक्ति
को पूरे
देश के
सामने दिखा
चुकी हैं।
15-31 जनवरी तक तहलका में 5 साल
की बेस्ट
कवर स्टोरी
दी गई
हैं। उसमें
ही लता
जी पर
भी एक
स्टोरी है।
पता नहीं
क्यों कल
मेरे बहुत
प्रयास के
बाद भी
उसे मैं
दिल से
पढ नहीं
सका। अभी
14 जनवरी से
एक बहुत
बड़ी चर्चा
हो रही
थी, सलमान
ख़ान के
मोदी के
लिए "जय हो" के नारे
लगाना। मैंने
सलमान की
3-4 साल में
कोई फिल्म
नहीं छोड़ी
थी। इसे
देखने का
मन ही
नहीं हुआ।
इंटरनेट पर
देखी लेकिन
अच्छी फिल्म
के बाद
भी दिल
से प्रसन्सा
नहीं कर
पाया। अगर
यह फिल्म
फ्लॉप हुई
है, तो
केवल मुस्लिमों
के नाराज
होने से
ही नहीं
बल्कि हम
जैसे सेकुलर
हिन्दुओं की
वजह से।
एक हफ्ता
भी नहीं
हुआ पूरे
के पूरे
हॉल खाली
पड़े हैं।
सलमान ने
यह सब
फिल्म को
हिट करने
के लिए
किया था,
लेकिन दांव
उल्टा पड
गया।
कहने का मतलब
यही है,
क़ि जो
जिसका काम
है वही
करे तो
ज्यादा अच्छा
रहता है।
चाहे वो
नेता हो,
संत हो,
अभिनेता या
गायक हो
सबको अपने-अपने काम
करने चाहिए।
हो सकता
है, आपकी
निजी राय
में कोई
व्यक्ति विशेष
अच्छा हो,
लेकिन सर्वजनिक
तौर पर
आपकी प्रभाव
का असर
पड़ता है।
क्योंकि आप
"आम आदमी"
नहीं हो। आपकी बात का असर पूरे समाज पर पड़ता है। और आपकी यह विचारधारा उन प्रशंसकों के दिलों को ठेस पहुंचती है, जिनकी सँख्या करोड़ो में है। भले ही यह प्रसंसा राहुल गाँधी या अरविन्द केजरीवाल की हो। सभी को बोलने का मौलिक अधिकार है। अगर आपको बोलना ही है तो फिल्मी कैरियर छोड़कर राजनीति में कूद जाओ।
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