Sunday, February 2, 2014

क्या बॉलीवुड को राजनीति पर बोलना चाहिए?

हमारा हिन्दुस्तान बहुत सारी संस्कृतियों और विचारधाराओं का देश हैफिर भी यहाँ पर कुछ क्रिकेट या बॉलीवुड को धर्म से कम नहीं माना जाता हैबॉलीवुड ने अपने 100 साल में बहुत सारे महानायक और महानाइकायें दी हैंइसमें दिलीप कुमार से लेकर अमिताभ बच्चन और आमिर ख़ान तक और मधुबाल और रेखा से लेकर दीपिका या ऐश्वर्या राय तक कलाकार दिए हैंइनका एक मात्र काम माना जाता रहा है, मनोरंजन करनाउन्होंने हमेशा बदलते वक्त में देश के हर मुद्दे पर अच्छी फिल्में और गाने दिए हैंयह एक बहस का विषय हो सकता है क़ि फिल्मों में सबकुछ सही ही नहीं होता हैलेकिन अगर नकारात्मक पहलू को छोड़ दिया जाए तो फिल्मों ने हर पीढी की सोंच को बदलने का काम किया हैगाँव-गाँव तक फैशन पहुँचालोगों में अंग्रेज़ी जानने की इच्छा आई और इसी का प्रभाव था कि अनपढ लोगों को भी देश के इतिहास और कल्चर के बारे में ज्ञान हुआइसमें सबसे अच्छी बात यह थी कि आज पूरे देश में सबसे ज्यादा हिन्दी का प्रचार-प्रसार हुआआज बंगाली और मद्रासी लोग भी फिल्में देखकर हिन्दी सीख रहे हैंदेश का युवा जागरूक हुआ
देश में 1947 के बाद से सबसे अधिक सम्प्रदायिक सौहार्द खराब हो रहा थालेकिन फिल्मों ने इसे जोड़ने का एक बड़ा प्रयास कियाबॉलीवुड ने ही कितने कट्टरपंथियों की सोंच बदल दीदिलीप (यूसुफ़) साहब, तलत महमूद, रफी साहब, गुलजार और जावेद साहब, सलीम ख़ान, शाहरुख ख़ान, आमिर ख़ान और सैकड़ों गायक, लेखक, और कलाकारों की यह पंक्ति पूरे हिन्दू बहुल देश के दिलों पर छा गईपुरानी कुप्रथाओं के अंत में भी फिल्मों ने एक बड़ी भूमिका अदा कीआज कितने ही युवा प्रेम-विवाह करते हैं, उनके मन से समाज, जाति, धर्म, और क्षेत्र का डर खत्म हो चुका हैआप मुम्बई में ही देखेंगे कि कितने ही यूपी और बिहार के लड़के महाराष्ट्रियन लड़कियों से शादी करते हैंमराठी, बंगाली, मद्रासी, पंजाबी, गुजराती सब एक-दूसरे से प्रेम-विवाह कर रहे हैंकहने का मतलब समाज को एक सकारात्मक सोच दी है इस बॉलीवुड नेपिछले कुछ वर्षों में ख़ान की तिकड़ी (सलमान, आमिर, शाहरुख) के आगे कोई टिक नहीं पाया हैतीनों में से किसी की भी फिल्म आती हैतो यह रिकार्ड टूटने की बात होती है क़ि दबंग से धूम3 ने कितने 100 करोड़ ज्यादा कमाएपूरे देश में लोगों को 15-15 दिन तक टिकट के लिए संघर्ष करना पड़ता हैजब कोई फिल्म इतनी हिट होती है, तो जाहिर सी बात है क़ि ये फिल्में पूरे देश के हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई भी देखते होंगे? केवल मुसलमानों के ही थियेटर जाने से तो कोई फिल्म 500 करोड़ नहीं कमा सकती हैमेरा मतलब है, इस देश का 90% तबका सेकुलर विचारधारा का हैसब इन फिल्मी सितारों को आँखों पर बिठाकर रखते हैं
जब ऐसे में कोई अभिनेता कोई राजनैतिक या देश के गंभीर मुद्दे जिनपर उन्हें नहीं बोलना चाहिए, बोल देता है, तो पूरे देश को ठेस पहुंचती हैकोई भी इसे पसंद नहीं करता है. जैसे 2-3 साल पहले ही शाहरुख ख़ान ने पाकिस्तान के खिलाडियों को भारत में खेलने की अनुमति को लेकर एक ऐसा ही बयान दे दिया थातब पूरा देश 26/11 के दर्द उबर भी नहीं पाया थातब उनका पूरे देश में बहुत विरोध हुआ थाजो किसी हद तक जायज भी थाहालांकि कुछ राष्ट्रवादियों के विरोध के तरीके को मैं सही नहीं मानता हूँमैं पूरे देश में लता मंगेशकर के गीतों को लोग दिल से सुनते हैंयहाँ तक कि भारत में जितने मशहूर ग़ुलाम अली हुए, उतनी ही लताजी पाकिस्तान मेंमैं भी अभी तक उनके गीतों को बहुत पसंद करता था. कुछ दिन पहले ही वो अपनी मोदी भक्ति को पूरे देश के सामने दिखा चुकी हैं। 15-31 जनवरी तक तहलका में 5 साल की बेस्ट कवर स्टोरी दी गई हैंउसमें ही लता जी पर भी एक स्टोरी हैपता नहीं क्यों कल मेरे बहुत प्रयास के बाद भी उसे मैं दिल से पढ नहीं सकाअभी 14 जनवरी से एक बहुत बड़ी चर्चा हो रही थी, सलमान ख़ान के मोदी के लिए "जय हो" के नारे लगानामैंने सलमान की 3-4 साल में कोई फिल्म नहीं छोड़ी थीइसे देखने का मन ही नहीं हुआइंटरनेट पर देखी लेकिन अच्छी फिल्म के बाद भी दिल से प्रसन्सा नहीं कर पायाअगर यह फिल्म फ्लॉप हुई है, तो केवल मुस्लिमों के नाराज होने से ही नहीं बल्कि हम जैसे सेकुलर हिन्दुओं की वजह सेएक हफ्ता भी नहीं हुआ पूरे के पूरे हॉल खाली पड़े हैंसलमान ने यह सब फिल्म को हिट करने के लिए किया था, लेकिन दांव उल्टा पड गया
कहने का मतलब यही है, क़ि जो जिसका काम है वही करे तो ज्यादा अच्छा रहता हैचाहे वो नेता हो, संत हो, अभिनेता या गायक हो सबको अपने-अपने काम करने चाहिएहो सकता है, आपकी निजी राय में कोई व्यक्ति विशेष अच्छा हो, लेकिन सर्वजनिक तौर पर आपकी प्रभाव का असर पड़ता हैक्योंकि आप "आम आदमी" नहीं हो। आपकी बात का असर पूरे समाज पर पड़ता है और आपकी यह विचारधारा उन प्रशंसकों के दिलों को ठेस पहुंचती है, जिनकी सँख्या करोड़ो में है भले ही यह प्रसंसा राहुल गाँधी या अरविन्द केजरीवाल की हो सभी को बोलने का मौलिक अधिकार हैअगर आपको बोलना ही है तो फिल्मी कैरियर छोड़कर राजनीति में कूद जाओ

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