Monday, February 29, 2016

मोदी जी को पत्र

आदरणीय,
 श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जी, 
राजनीतिक और वैचारिक असहमति के बावजूद मैं आपका निजी जीवन में बहुत सम्मान करता हूं। मैं ब्लाग के द्वारा तीसरा पत्र आपको लिख रहा हूँ। क्योंकि आप 130 करोड जनता के प्रधानमंत्री हैं, मेरे भी हैं।  इसलिए संवाद आवश्यक है। पत्र इसलिए क्योंकि यह तो हमारी संस्कृति है। देश में पिछले दिनों कई तरह की वारदातें हुईं। जो आपको टीवी, अखबार, आईबी आदि से अलग अलग तरह देखने को मिली होगी। मैं यह भी मानता हूँ कि इतने बड़े देश में अनेक तरह की घटनाएं घटती रहेंगी। इसलिए कुछ प्रमुख घटनाओं का जिक्र करते हुए शुरुआत करता हूं। पिछले दिनों जेजेएनयू में जो हुआ और उसके बाद दिल्ली और फिर देश के अन्य हिस्सों में जो हो रहा है, वह सब बेहद गंभीर है और मैं चाहूंगा कि पूरे मुद्दे पर पहले आप स्वयं गंभीरता से चिंतन करें।

भारत केवल भौगोलिक भारत ही नहीं है। एक सांस्कृतिक भारत भी है हमारे पास। रवींद्रनाथ टैगोर के अनुसार 'भारत एक विचार है न कि एक भौगोलिक सीमा।’ इस भारत की रचना शासकों ने नहीं कवियों, दार्शनिकों, संतों और सच पूछें तो प्रकृति ने स्वयं की है। यह भारत हजारों साल में बना है। यह जो भारत शब्द है भरत से बना है, दुष्यंत और शकुंतला के प्यार-परिणय से उद्भूत भरत, जिनका जन्म और पालन किसी राजमहल में नहीं एक ऋषि के आश्रम(जंगल) में हुआ। जहां आज आपकी सरकार सामाजिक कारणों से उपजे मावोवादियों के खिलाफ ग्रीनहंट कर रही है। वेद व्यास ने एक महाकाव्य लिखा महाभारत जो हमारी सबसे बड़ी सांस्कृतिक धरोहर है। अब इस भारत-महाभारत को कुछ सालों पहले कुछ लोगों ने भारत माता बना दिया। अब तो भारत माता की परिभाषा भी तय कर दी गई है। जिसमें देश के गरीब लोगों की माता को माता नहीं मानते हैं। यही कन्हैया अपने उस तथाकथित देशद्रोही भाषण में कह रहा था।

जबकि कवियों की व्याख्यानुसार  भारत माता पनघट से पानी लाती तो कभी  मजदूरी करती  है। यदि किसी ग्रामीण से पूछा जाता तो उसके अनुसार बकरी चराती भारत माता होतीं। हमारे देश में अनुशासन के लिए बाबा साहेब अम्बेडकर ने संविधान दिया। हमने 26 जनवरी 1950 को इसे स्वीकार किया। जिसे आज हमारी आत्मा और धर्मग्रंथ तक कहा जाता है। हमारा संविधान समानता, भाईचारा और स्वतंत्रता के वो अधिकार देता है जिसके सपने गांधी और भगत सिंह ने देखे थे। कुछ लोगों ने इससे खिलवाड़ करने की भी कोशिश की, जैसे 1975 में इमरजेंसी, लेकिन उन्हें भी आखिर झुकना पड़ा। अर्थात आज जो भारत है वह इस संविधान की पीठ पर है, किसी इंसान, संगठन या धर्म के नहीं। 
प्रधानमंत्री जी, लेकिन इस भारत भक्ति को कुछ लोंगो ने खिलवाड़ बना दिया है। न वह संस्कृति को समझते हैं और न राजनीति को। यह वही लोग हैं जो सदियों से चली आ रही असमानता के जन्मदाता हैं। गुलामी करवाई है गरीबों से विभिन्न प्रकार से। जबकि वर्तमान में संविधान ने इनके हाथ बांध दिये तब ये नये तरीके ढूंढ रहे हैं। इसलिए देशभक्ति का प्रमाण पत्र बांट रहे हैं। ये लोग संविधान की जगह मनुस्मृति और शरीयत कानूनों पर यकीन करते हैं। इनकी देशभक्ति भारत पाकिस्तान के मैच में समाप्त हो जाती है।
इस सदी में हमें आगे बढऩा है तो विज्ञान द्वारा उपलब्ध कराये गए ज्ञान और सोच का ही सहारा लेना पड़ेगा। आप खुद ऐसा महसूस करते हैं तभी तो डिजिटल इंडिया चालू किया है। अगर हम पिछड़ गए तो फिर कहीं के नहीं रहेंगेे। जापान और चीन हमसे 200 साल आगे होगा। हम क्यों खुद में परेशान पाकिस्तान और अरब देशों से अपनी तुलना करते हैं। हमारे देश के निर्माण में एक तरफ  तिलक, गांधी और सुभाष, भगत सिंह की कोशिशें थीं तो दूसरी ओर ज्योतिबा फुले, रानाडे, आंबेडकर जैसे लोग सक्रिय थे। जवाहरलाल नेहरू ने सच्चे राष्ट्रनायक की तरह नये भारत की रूप-रेखा बनाई और उसमें प्रतिगामी सोच के लिए कोई जगह नहीं रखी। नये भारत के निर्माण के लिए उन्होंने साधू-संन्यासियों की जगह वैज्ञानिकों, मजदूरों और किसानों का आह्वान किया। देश में वैज्ञानिक चेतना विकसित करने पर जोर दिया।
लेकिन प्रधानमंत्री जी, अप्रत्यक्ष रूप से सरकार की कमान संभालने वाले कुछ संगठन राष्ट्रवाद की इस धारा की बात नहीं करते। उनका  राष्ट्रवाद गोडसे, सावरकर और गोलवलकर का रहा है जो हमेशा विवादों में रहा है। प्रधानमंत्री जी, जहां तक मैंने समझा है केवल वर्चस्व प्राप्त तबकों का ही इतिहास नही होता केवल उन्हीं की पौराणिकता, केवल उनहीं की संस्कृति नहीं होती।
9 फरवरी, 2016 की घटना थी। यदि किसी छात्र ने देश विरोधी नारे लगाये हैं तो यह गलत है। इसके लिए कारवाई करना चाहिए। लेकिन किसी विषय पर चर्चा मात्र से हमें घबराने की जरूरत नहीं है। यूनिवर्सिटी इसी के लिए तो बनते हैं। वहां अनेक देशों के लोग पढ़ते हैं। हमें भी अपनी यूनिवर्सिटियों को इतनी आजादी देनी चाहिए कि वहां लोग मुक्त मन से विचार कर सकें। विश्वविद्यालय में जो विश्व शब्द है उस पर ध्यान दीजिये। शिक्षामंत्री उसे संघ का शिशुमंदिर बनाना चाहती हैं? यूनिवर्सिटियां मानव जाति पर समग्रता से विचार करती हैं, विदेशों में हमारे छात्र पढ़ते हैं तो अपने भारत की बात नहीं करते हैं?
कश्मीर की समस्या पूरे भारत की समस्या से कुछ अलग और जटिल है। आपने वहां उस पी.डी.पी. के साथ सरकार बनाई, जो अफजल को शहीद मानता है। आपका कदम सही है। सरकार बनाकर आपने संवाद बनाने की कोशिश की है। संवाद बनाकर ही बातें आगे बढ़ती है, बढऩी चाहिए यही तरीका है। पाकिस्तान की बार-बार की हरकतों के बावजूद हम उससे संवाद बनाने की कोशिश करते हैं कश्मीर तो अपना है। मैं समझता हूं कि कश्मीर के मसले को आप मुझसे बेहतर समझते हैं क्योंकि मेरी जानकारी के अनुसार आप कुछ समय तक वहां रहे हैं। कश्मीर की समस्या थोड़ा पेचीदा है, वह ब्रिटिश भारत का हिस्सा नहीं था, अलग रियासत था। वह एक खास परिस्थिति में भारत से जुड़ा, जो स्वाभाविक था। इस तरह उसकी स्थिति कुछ वैसी है जैसा किसी परिवार में गोद लिए बच्चे की होती है इसलिए हमारे संविधान में वहां के लिए एक विशेष धारा (370) है। ऐसी धाराओं का सम्मान होना चाहिए। ऐसी ही धाराओं की बदौलत भविष्य में कभी अन्य देश भी भारतीय संघ में जुड़ सकते हैं। इसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल भी हो सकता है। 
तो प्रिय प्रधानमंत्री जी, नाराज नागरिकों, खासकर युवाओं से संवाद विकसित करना चाहिए, तकरार नहीं। दंड देकर, जबर्दस्ती देशभक्ति नहीं थोपी जा सकती। मुझे उन नाराज नौजवानों से अधिक खतरा आपके उन भक्तों से है जो राष्ट्रवाद का झंडा लेकर देश को लूट रहे हैं। हरियाणा में यही हुआ।
कभी आपने अपने मित्र बड़े अंबानी से नहीं पूछा कि भाई जिस देश में किसान, छोटे-छोटे कर्जा को लेकर आत्महत्या कर रहे हैं, वहां तुम करोडो की वीकेंड पार्टी क्यों करते हो? आपने पूंजीपतियों के लिए लाखों करोड़ के कर्ज माफी की घोसना की है लेकिन भारत के किसानों-मजदूरों की चिंता आपको नहीं है। हैदराबाद वि.वि. का एक होनहार छात्र रोहित वेमुला आत्महत्या करने पर मजबूर हुआ। आपको इसपर रोना भी आया। आपको समझ सकता हू। आप ही के शब्दों में आप निनिचली जाति के हो, बचपन में चाय बेचने वाले, दूसरों के घर मजदूरी करने वाली महान मां के बेटे। आप पर कुछ भरोसा तो है मुझे। आपसे संवाद करने से बात बन सकती है। इस लिए मोदी जी उठो, जागो और गरीबों से न्याय करो।
धन्यवाद!

सादर
आपका शुभेच्छुक:
कमलेश कुमार राठोड
(कृषकपुत्र, युवा, राष्ट्रभक्त विधि, सोध छात्र)

Saturday, February 27, 2016

मोबाइल क्रांति "Freedom 251"

फ्रीडम 251 मोबाई के बारे में बहुत बातें की जा रही हैं. मुझे भी इसमें अपने मन से कुछ अलग समझ में आ रहा है, जो मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ.
देखिए यह सरकार पूरी तरह से ब्रान्डिंग करने वाली सरकार रही हैं. गुजरात के मुख्यमंत्री रहते ऐसा ही करके गुजरात मॉडल पेश किया गया था, जिसे अभी वहाँ के पटेल समुदाय ने ही ध्वस्त कर दिया. आप सरकार के मुख्य काम देखिए, गैस सब्सिडी में सुधार की कोशिश, जनधन योजना, प्रधानमंत्री बीमा योजना, सुकन्या योजना, और सबसे बड़ी स्वच्छ भारत योजना, मन की बात आदि....
इनमें सुकन्या योजना और गैस सब्सिडी तो कुछ हद तक ठीक भी थी, बाकी की सब केवल टीवी, अख़बार, फेसबुक पर एक भावना बनकर ही रह गईं.
ऐसे में मेक इन इंडिया प्रधानमंत्री के लिए युवाओं के बीच रोज़गार और औद्योगिक क्रांति के रूप में प्रस्तुत करना अतिआवश्यक था. एक साल से अधिक हो गया लेकिन कुछ विशेष हो नहीं पाया था. पाकिस्तान, अरब सहित पूरे एशिया में इसका कार्यक्रम होता है, मुंबई में इसके लिए एक पूरा सप्ताह रखा जाता है. फिर दो दिन बाद फ्रीडम 251 का लॉन्चिंग होता है. मैने किरीट सोमैया के ब्लॉग पर पढ़ा था जिसमें उन्होने उस कंपनी के उपर कई सवाल खड़े किए थे. जैसे उस कंपनी रिंगिंगबेल का रजिस्ट्रेशन 3 महीने पहले हुआ है और उसके किसी भी शेयर होल्डर का नाम सामने न आना. वो अलग बात है, और मैं पूर्णतया सत्यता पूर्वक यह नहीं कह सकता हूँ. इस पूरे एपीसोड में यह बात देखने वाली थी क़ि भाजपा के कुछ शीर्ष नेता लॉन्चिंग में गए और उसका मालिक कहता है क़ि वो मेक इन इंडिया के लिए कार्य करने को तैयार है. जिसके बाद तो पूरे देश में इसको मोबाइल क्रांति के रूप में देखा जाने लगा और करोड़ों लोगों ने ओनलाइन रजिस्ट्रेशन करवा दिया. इसकी डिलीवरी की सीमा भी न्यूनतम 6 महीने तक रखी गई है, जिससे यह प्रतीत होता है कि यह सब सरकार के ही किसी प्लान के तहत हो सकता है. इसी बीच टेलीकॉम मिनिस्टर रविशंकर प्रसाद का लोगों के पैसे वापस करवाने की गारंटी देना और दूसरे दिन ही इनकम टैक्स की रेट डालना, सरकार का उससे कुछ संबंध नहीं है, यह दर्शाने के लिए हो सकता है.
मैं इसबारे में यह शत प्रतिशत सत्यता के साथ नहीं कह सकता हूँ लेकिन यह मेरा पूर्वानुमान है क़ि हो सकता है क़ि सरकार ने ही कुछ 400-500 करोड़ का इनवेस्टमेंट कर दिया हो या फिर किसी अपने ही समर्थक व्यापारी को कुछ सपोर्ट कर दिया हो. क्योंकि जब मोदी जी 2017 में यूपी में और 2019 में चुनाव के लिए जाएँगे तो कुछ क्रांतिकारी काम नहीं होंगे जनता ख़ासकर युवाओं के बीच लेकर जा सकें. ऐसे में यह मोबाइल क्रांति काफ़ी मददगार होगी. वैसे यह ठीक भी है खाना मिले ना मिले मोबाइल सबको ज़रूर मिले.

Sunday, February 21, 2016

इंसान बचाओ मोदी जी, तब देश बचेगा...

आज सुबह ही फॉग का एक एडवरटाइज़मेंट (पाकिस्तान का सैनिक भारतीय सैनिक से कहता है कि भाई भारत में क्या चल रहा है, तो भारतीय सैनिक कहता है, "बस फॉग चल रहा है") देखा, उसके बाद सोचा मैने कि सच में हिन्दुस्तान में चल क्या रहा है? पूरा देश अस्त व्यस्त पड़ा है। कोई दाएं भाग रहा है, कोई बाएं और सीधे चलने वालों का दिमाग चकरा रहा है। राष्ट्रवादी बनाम राष्ट्रविरोधी।
ऐसे में एक "तथाकथित" अच्छी खबर आ गई। 250 रुपये में स्मार्ट फोन और 180 रुपये किलो दाल। चल क्या रहा है समझ में नहीं आ रहा है। हिन्दुस्तान की बर्बादी के नारे कुछ लोग  लगाकर चले गए पुलिस अबतक नहीं पकड़ पाई है और यहां अपने ही लोगों पर पटियाला कोर्ट में लात घूंसे चल रहे हैं। न जिरह न अदालत, सीधे फैसला। नेता, ऐंकर, वकील सब जज बने हुए हैं। खुद ही फैसला करे दे रहे हैं कि कौन देशद्रोही और कौन देशभक्त। देशभक्ति का जज्बा ऐसा कि बस गदर के सनी देओल की तरह हैंडपम्प ही नहीं उखाड़ा। जज साहब हैरान हैं, देश परेशान है। हरियाणा जल रहा है, यूपी और दिल्ली भी उसकी की लपटों में झुलस रहा है। गुजरात में एक आंदोलनकारी हार्दिक पटेल जेल में बीमार पड़े हैं। रोहित के हत्यारे बाहर हैं। कन्हैया जेल में संघर्ष कर रहा है। युवाओं को इससे अधिक और क्या सहन करना पड़ेगा। हर तरफ सवाल है कि भाई यह हो क्या रहा है? और इस झुंझलाहट के बीच याद आ रही हैं (अभी नवभारत टाइम्स के किसी ब्लॉग में पढ़ी थी....) पीयूष मिश्रा की कुछ लाइनें-
"इस मुल्क ने हर शख्स जो काम था सौंपा
उस शख्स ने उस काम की माचिस जला के छोड़ दी।"
आज का हिन्दुस्तान बारूद के ढेर पर बैठा है, लेकिन जिसे देखो माचिस लेकर घूम रहा है। सोसल मीडिया, देश के लिए सुसाइड मीडिया बनता जा रहा है। जिसका (विश्वविद्यालयों का) काम पढ़ाना है वो राजनीति कर रहे हैं, जिसका (इलेक्ट्रानिक मीडिया का) काम सच दिखाना है वो बिना जाँच के कुछ भी झूंठ दिखा रहा है। जिसका (नेता का) काम राजनीति करना है वो दिखाई नहीं दे रहा है। पता ही नहीं चलता कि देश के पीएम हैं या विदेश के? यह सब राष्ट्रभक्ति असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए है। सच तो यह है दोस्तों कि जिस दिन ज़मीनी मुद्दों पर बहस होने लगी उस दिन पॉल खुल जाएगी इन लोगों की। ऐसा भी नहीं है क़ि देश में कोई बात नहीं करता है इन मुद्दों पर। यह बहसें इंटलैक्चुअल्स के बीच नहीं, गरीब आबादी में हैं। पेट्रोल 110 डॉलर प्रति बैरल से उतरकर 25 डालर तक पहुंच गया पर उतना सस्ता नहीं हुआ। मेरे ओफिस में कुछ लड़कियाँ 2-3 घंटे के सफ़र लोकल ट्रेन से करके आती हैं, उनके ट्रेन के सेडयूल बिना किसी तैयारी के ऐसे बदल दिए जाते हैं, कि हालत खराब है। बड़ी देर रात घर पहुँच पाती होंगी। वो कहती हैं कि किराया बढ़ता जा रहा है, कोई भी सुविधा नहीं है। खचाखच भरकर हर ट्रेन जाती है फिर भी रेलवे घाटे में कैसे? कहीं बस या ट्रेन में देखो महिलाएँ जो किचन संभालती हैं वो मोदीजी को ना जाने कैसे कैसे शब्दों के साथ गाली देती हैं। दाल महीनें में सिर्फ़ 3 दिन बनती है, सब्जी के भाव आसमान में हैं। युवाओं की नौकरी स्थिर नहीं है। छात्रों की स्कॉलरसिप बंद हो गई है। क़ानून व्यवस्था कहीं भी सही नहीं है, कल को फिर से मुंबई में भगवान न करे अगर कोई देश का दुश्मन आकर कुछ हमला कर दे तो एक भी तैयारी नहीं होती है पहले से। सब भगवान भरोसे है हमारा काम हक़ीकत बोलना है, भक्तों का काम गाली देना है। 
फिर भी हम गाली सुनकर प्यार से उनके वादे याद दिलाते रहेंगे..... 
दुष्यंत की एक लाइन है,
"कहाँ तो तय था चराग़ हर एक घर के लिए,
कहाँ तो मयस्सर नहीं सारे शहर के लिए......




Wednesday, February 17, 2016

राष्ट्रवाद की परिभाषा

पिछले 3-4 दिन से मैं काफ़ी परेशान हूँ, जिसका कारण है देश में राजनैतिक भूचाल। जेएनयू में 9 तारीख को हुआ देशविरोधी मार्च, फिर 11 तारीख को छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी। हैरानी की बात यह है कि अब तक किसी भी वीडियो में कन्हैया को ग़लत नहीं कहा गया है। जो असली दोषी हैं उनको तो गिरफ्तार ही नहीं किया गया। इसके बाद कोर्ट में कन्हैया की पेशी के समय जो हुआ वो बहुत शर्मनाक है। पटियाला हाउस कोर्ट में कुछ ‘देशभक्त’ वकीलों या वकीलों के लिबास में कुछ ‘देशभक्त’ गुंडों ने पत्रकारों और जेएनयू के कुछ छात्र-छात्राओं को पीट दिया, उनके मोबाइल छीन लिए ताकि वे उनकी ‘देशभक्ति’ के विडियो नहीं ले सकें, महिला पत्रकारों के साथ बदतमीज़ी की। जज साहब देखते रहे, कुछ नहीं कर सके और  बस्सी साहब की पुलिस तमाशा देखती रही। देश के गृह मंत्री जो जेएनयू मामले में इतने उत्तेजित थे कि तुरंत प्रेस के सामने आकर अपनी बात कही, अपनी पार्टी के विधायक ओ।पी। शर्मा की गुंडागर्दी पर मौन धारण किए हुए हैं। शायद फ़ोन पर उनको बधाई भी दी हो। आज पत्रकारों का एक दल गृह मंत्री से मिलने की कोशिश करेगा और उम्मीद है, गृह मंत्री ‘कानून अपना काम करेगा और दोषियों को कतई नहीं बख्शा जाएगा’ टाइप का कोई बयान दे देकर फ़ारिग हो लेंगे। उन तथाकथित ‘देशभक्तों’ का कहना है कि इन छात्रों और पत्रकारों की पिटाई इसलिए हुई कि वे सब देशद्रोही थे। देशद्रोही थे क्योंकि वे देशभक्ति के मामले में एक ख़ास विचारधारा के लोगों कीकी हाँ में हाँ नहीं मिलाते हैं। आप पूछेंगे, कि यह ख़ास विचारधारा क्या है? जो लोग कहते हैं कि यह देश हिंदुओं का है और केवल हिंदुओं का है। ये लोग कहते हैं क़ि हिंदू संस्कृति और धर्म विश्व में सर्वश्रेष्ठ हैं इसलिए यह देश भी सर्वश्रेष्ठ है। वो कहते हैं कि इस देश में जो भी अच्छाई है, वह हिंदुओं और हिंदुत्व के कारण है और जो बुराई है, वह दूसरे धर्मावलंबियों और मतों-मान्यताओं के कारण है। जो इस विचारधारा को मानता है, वह हुआ देशभक्त। और जो नहीं मानता, वह हुआ देशद्रोही। हद है सरकार की अनआधिकारिक एजेंसियाँ आजकल देशभक्ति का सर्टिफिकेट लेकर घूम रही हैं।
ये लोग वो हैं जो गाय को अपनी माता मानता हो भले ही पैरों में गऊमाता के चमड़े से बना चमचमाता जूता या चप्पल पहनता हो, और छोड़ देता हो उसे सड़क पर पोलिथीन खाने के लिए। जो मुसलमानों, ईसाइयों तथा दलितों और पिछड़ों से ऊपरी तौर पर न सही, मगर मन-ही-मन घृणा करते हैं। ये वो लोग हैं जो देववाणी संस्कृत को विश्व की सर्वश्रेष्ठ और वैज्ञानिक भाषा मानते हैं  और महिलाओं के गुप्तांगों से जुड़ी सारी गालियां शिशुपाल की तरह कंठस्थ रखते हैं, यही हैं परम संस्कारी असली (फर्जी) देशभक्त। जो हर पाकिस्तानी मां-बहन के साथ सहवास करने (मूल शब्द मैं नहीं लिख सकता) की दिली ख़्वाहिश रखता हो और साथ ही भारत माता की जय के नारे भी बहुत ज़ोरशोर से लगाता हो, वह हुआ भारत माता का सच्चा सपूत और दूसरे शब्दों में देशभक्त। ये वही सेठ लोग हैं जो अपने छोटे या बड़े कारोबार में जमकर मिलावट करके जनता को लूटते हैं, और सरकार को टैक्स देने में चोरी करते हैं। आज यही लोग एक और टैक्सवाद लेकर आए हैं। कहते हैं हमारे टैक्स से यूनिवर्सिटी चलती है। फिर ये देशभक्त लोग टैक्स बचा बचाकर मंदिरों और राजनैतिक दलों को जमकर चंदा देते हैं। कौन समझाए इन नासमझ लोगों को राज्य का मतलब।  इनको संविधान के बारे में पता ही क्या होता है?
संविधान ही वह सीमा हो सकती है जिसके भीतर भारत नाम के राष्ट्र को समाहित किया जा सकता है। लेकिन कुछ लोग इसकी परिधि को संविधान के जरिए नहीं बल्कि एक धर्मविशेष या मतविशेष के जरिए बांधना चाहते हैं और निश्चित तौर वह परिधि संविधान की तुलना में छोटी ही होगी। इस लिहाज से उनका राष्ट्र छोटा होगा। निष्कर्ष के तौर पर यह कह सकते हैं कि वह लोग जो मौजूदा राष्ट्र की विशालता को काट-छांटकर उसे छोटा करना चाहते हैं, असल में राष्ट्रद्रोही तो वे हुए।
अट्ठारहवीं सदी में ‘वॉल्तेयर’ ने एक बात कही थी, ‘मैं जानता हूं कि तुम्हारी बात गलत है, फिर भी तुम्हारी अभिव्यक्ति के अधिकार के लिए मैं अपनी जान तक देने के लिए तैयार हूं।’ हमारा संविधान भी अनुच्छेद 19 (A) के तहत यही कहता है। वह खुद की आलोचना (यही खूबी उसे लचीला और समय के साथ परिवर्तनशील बनाए रखने में मददगार भी बनाती है) और विरोधियों की प्रशंसा करने तक का अधिकार देता है।
हम कितनी ही राष्ट्रविरोधी गतिविधियां (रोज़मर्रा के जीवन में कानून तोड़ना) करते रहें लेकिन हम राष्ट्रद्रोही का तमगा नहीं लेना चाहते हैं, और राष्ट्रवादी बनने के लिए किसी ख़ास विचारधारा की हाँ में हाँ मिलना सीख लेते हैं। आप मान भी लेते हैं क्योंकि आपको राष्ट्रवादी कहलाना पसंद है।
अब आते हैं राजनैतिक पहलू पर तो सबसे प्रमुख बात गौर करने वाली है कि जो भाजपा समर्थक अपने विरोधियों को देशद्रोही कह रहे हैं वो भाजपा तो खुद ही जम्मू कश्मीर में 8 दिन पहले तक उस पीडीपी के साथ सरकार चला रही थी, जो अफ़ज़ल गुरु को शहीद मानती है। हमेशा ही जम्मू कश्मीर के अलगाववादियों से रिश्ते रखे हैं। कल राकेश सिन्हा को कहते सुना कि वह राज्यवाद है। कैसा राज्यवाद है यह?  पंजाब के आतंकवादी राजवाना और भुल्लर की फाँसी की सज़ा के मामलों में अकालियों के साथ मिलकर क्या करते रहे हैं, पूरे देश को पता है।
अब अगर राष्ट्रद्रोह की परिभाषा तय करने की बात की जाए कि कैसे तय होगा कि कौन देशभक्त है और कौन राष्ट्र विरोधी? इतिहास में अगर हम जाकर देखें तो पता चलता है कि जब 1942 में महात्मा गाँधी ने "भारत छोड़ो आंदोलन" चलाया तो उनके साथ अंबेडकर, कम्युनिष्ट पूर्ण रूप से शामिल नहीं थे। संघ तो लिखित तौर पर अँग्रेज़ों को कह चुका था कि वो इस आंदोलन में साथ नहीं है। सोचिए अगर तब महात्मा गाँधी ने उन लोगों को गैर-राष्ट्रवादी कह दिया होता तो क्या होता था? महात्मा गाँधी जैसे विश्व के सबसे बड़े नेता (मृत्यु के बाद भी) ने यह स्टैम्प लगा दिया होता तो आजतक उनके धब्बे नहीं छूटते। सोचिए ये महान लोग जिन्हें हम पूजते हैं, वो कहाँ होते? लेकिन उनको पता था कि ये लोग अलग अलग विचारधारा के लोग हैं, जो मेरी एक बात से सहमत नहीं होंगे लेकिन देशप्रेम तो उनका भी वैसा ही है जैसा मेरा।
प्रेमचंद गोयनका, जिनको सबसे ज़्यादा दक्षिणपंथियों द्वारा वैचारिक तौर पर कोर्ट किया जाता है, ने तो कह दिया था कि राष्ट्रवाद देश का सबसे बड़ा कोढ़ है। यह बात उनके आलेखों में मौजूद है। रवीन्द्र नाथ ठाकुर जब जापान गए तो स्टेज पर जाते ही उन्होने राष्ट्रवाद के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया। तो जापान के लोगों ने उनकी आलोचना की थी। अब आता हूँ दक्षिण पंथियों के राष्ट्रवाद के सबसे बड़े हीरो "वीर सावरकर की" तो मुझे लगता है कि राष्ट्रवाद में सबसे अधिक विरोधाभाष और मतभेद उन्होंने ही पैदा किए थे। वो कहते थे पुण्यभूमि और जन्मभूमि अलग अलग बाते हैं। जो लोग भारत को पुण्यभूमि नहीं मानते हैं वो राष्ट्रवादी नहीं हो सकते हैं। बस यहीं से शुरू हो गया राष्ट्रवाद का सांप्रदायिककरण। जिसमें ना जाने कितने लोग मारे गए?
अब पिछले कुछ समय से खास तरह के एजेंडे को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है और जेएनयू प्रकरण में भी वही एजेंडा काम कर रहा है। इसे जितनी जल्दी हो सके समझ लेना बेहतर होगा, क्योंकि  फासीवादी देशभक्ति लाशों का हिसाब नहीं मांगती।

Thursday, February 11, 2016

ढाई आखर प्रेम के, पढ़े सो पंडित होय !

अक्सर देखा जाता है कि कोई  अगर “प्यार” इस विषय पर चर्चा करता है तो वह यहीं से शुरू करता है की “प्यार केवल प्रेमी –प्रेमिकाओंका ही नहीं होता, माँ और बेटे का, भगवान और भक्त का भी होता है...” आदि आदि !! लेकिन मुझे यह भाषणबाज़ी नहीं करनी है. या फिर इसकी असलियत पर बात करनी है.
प्रेम को शब्दों में उतारना संभव तो नहीं है, लेकिन कोशिश तो कर ही सकता हूँ. मेरे हिसाब से खुदा जब इश्क की इबारत लिखने बैठा तो थोड़ी देर बाद ही अधूरा छोड़कर उठ गया होगा। इसके अहसास को शिद्दत से महसूस करने के लिए ही इसका अधूरापन बहुत जरूरी है। खुदा ने यह जान-बूझकर अधूरा छोड़ा होगा, क्योंकि इसे पूरा कर देता तो इंसान को किसी चीज की जरूरत नहीं होती। आपने कभी सोचा है कि क्यों किसी को खो देने की कशिश किसी को पा लेने से खुशी से ज्यादा असर रखती है? हर किसी की जिंदगी में किसी को पा लेने की आकांक्षा होती है, जो मंजिल तक नहीं पहुंच पाने के दर्द की शक्ल में हमेशा जिंदा रहती है। चाहे कुछ भी हो, प्रेम आपके अंतर्मन को नई परिभाषा देता है। राधा और कृष्ण के नाम एक ही पन्नो पर लिखे हैं। फर्क बस इतना है कि दोनों एक-दूसरे के पीछे लिखे हैं। साथ भी हैं, जुदा भी नहीं और जुदा भी। ठीक ऐसी ही है इश्क की कायनात जिसमें आप जिसे खो देते हैं, वह आपके जहनो-दिल में ऐसा बस जाता है कि आप उसके साथ भी हैं और जुदा भी। इस अधूरी मोहब्बत ने ही हमें गालिब, फराज, साहिर, फिराक जैसे अजीम शायर दिए हैं। उनके लफ्जों में इश्क के मायने और निखरकर आते हैं। हमेशा किसी की हां से या किसी के पहलू में जिंदगी गुजारने से ही इश्क पूरा नहीं होता। इश्क होने से पहले क्या इस बात की शर्त रखी जाती है कि आप जिसे चाहें वह ताउम्र आपके पास रहे? क्या साथ रहना भी पास रहने जितना अहम नहीं है?शायद है, क्योंकि आपको उस शख्स से अहसासों का जुड़ाव है जो उम्र या फासलों से कभी नहीं मिट पाता।जीवन के हर मोड़ पर जब आप थोड़ी देर रुककर अपने माजी को याद करेंगे तो वह चेहरा आपका पीछा करता नजर आएगा। ऐसा होना आपकी आने वाली जिंदगी पर असर डाले, ऐसाभी नहीं है। वह जो पीछे छूट गया है, उसे आप वापस तो नहीं ला सकते लेकिन उसकी यादें सहेजकर आने वाली जिंदगी में वही रंग भर सकते हैं। यह बात सच है कि अतीत अच्छा हो या बुरा, आगे चलकर दुःख ही देता है। अहमद फराज का एक शेर है :
"उस शख्स को बिछड़ने का सलीका भी नहीं,
जाते हुए खुद को मेरे पास छोड़ गया।" 
जिंदगी इस इश्क के फलसफे से पूरी हो जाती है लेकिन इश्क कभी खुद पूरा नहीं हो पाता। दिलों को दिलों से जोड़ने वाला यह अनूठा एहसास दिलों में नमी भी भर देता है। हर अफसाना बहुत मीठे दर्द से शुरू होता है लेकिन जरूरी नहीं कि ऐसे एहसास पर ही खत्म हो। कई कहानियां अनचाही चुभते हुए अंत पर पर खत्म होती हैं। ऐसे में लगता है कि दुनिया में कुछ भी नहीं बचा। सब कुछ खत्म हो गया। लेकिन यहीं से आपकी मोहब्बत आपकी प्रेरणा बन जाती है। आपके सोचने की शक्ति आश्चर्यजनक रूप से बदलने लगती है। यह ऐसा वक्त होता है जब आपके भीतर सब कुछ टूटने लगता है लेकिन आपके अंदर सृजन नई अंगड़ाई लेता है। लेकिन सबसे मुश्किल लम्हा वह होता है जब वक्त की सीढ़ियों पर वह कभी आपको बैठे मिल जाए। तब क्या कीजिएगा, मुंह फेरकर चले जाइएगा या मुलाकात कीजिएगा? उनकी दहलीज पर न जाने की कसम तो आपने खाई ही होगी लेकिन अगर राह में ही टक्कर हो जाए तो क्या कीजिए? भले ही दोनों के बीच वक्त और हालात बहुत फासला बना देते हैं लेकिन एक-दूसरे को आप दोनों ने कभी भुलाया ही नहीं। एक शायर का शेर है,
"न जाने कितनी बातें थी, न जाने कितने शिकवे थे,
हुआ जब सामना उनसे तो न वो बोले ना हम बोले."
यादों में जिंदा शक्लें ख्वाबों के दरीचों में जब-तब उभर आती हैं। आंखों से समंदर फूट पड़ता है। कदम पीछे जाने को बेताब होते हैं लेकिन उसका कोई रास्ता ही नहीं होता। उसे भूलने के बहाने बार-बारयाद करते हैं।
 'मुद्दतें गुजरी, तेरी याद भी आई ना हमें,
  और हम भूल गए हों तुझे, ऐसा भी नहीं...।'
इश्क वह मुकद्दस जज्बा है जिसमें डूबकर ही उसे समझा जा सकता है। किनारे बैठकर इसकी गहराई का अंदाजा नहीं लगा सकते। हर किसी की जिंदगी में ऐसा मौका आता है जब आपकी मोहब्बत उजड़ जाती है लेकिन यह अंत नहीं होता। यहां से आपकी नई यात्रा शुरू होती है। आपके अंतर की यात्रा, जिसमें आपको खुद को खोजना और पाना होता है। बिछड़े हुए साथी की याद को दिल में दफन करने की कोशिश सभी करते हैं लेकिन ऐसा कभी मुमकिन नहीं होता। और इसे गम की तरह लेने की जरूरत ही नहीं। ऐसी स्थिति में यह सोचें कि आप कितने खुश किस्मत हैं कि खुदा ने इश्क की नेमत आप पर बरसाई है।
प्यार की बात होते ही आजकल सोसल मीडिया पर बेवफ़ाई की बात करना शुरू कर दी जाती है. इसपर ही लिखने वाले शायर ज़्यादा फेमस हुए हैं. फ़राज़ का बड़ा ही मशहूर शेर है,

"बेवफा ने हमारे जख्म का कुछ यूँ किया इलाज,
मरहम भी लगाया तो खंजर की नोक से..."
मेरे हिसाब से किसी को बेवफा कहकर नफ़रत करना ठीक नहीं होता है. सबकी अपनी अपनी मजबूरियाँ होती हैं.
"कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी ग़ालिब,
 यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता...."
कुमार विश्वास की "एक पगली लड़की" कविता की एक लाइन है,
"वो पगली लड़की कहती है, मैं प्यार तुम्ही से करती हूँ,
हूँ बहुत मजबूर, मगर अम्मा बाबा से डरती हूँ..."
मेरा उन मित्रों से भी कहना है जो कल किसी को प्रपोस करने वाले हैं. अगर आपका प्यार आपको स्वीकार करता है, तो खुश हो जाना लेकिन अगर अस्वीकार हो जाता है, तो उसको हंसकर टाल देना. मैने अभी ही चार पाँच दिन पहले एक शेर लिखा था.
"कोई ठुकरा दे तो हंसकर जी लेना,
क्योंकि मोहब्बत की दुनियाँ में जबरजस्ती नहीं होती."

इतने खूबसूरत एहसास से आपको तरबतर किया है। जब भी माजी की यादों में खोएंगे तो हमेशा कुछ न कुछ जरूर पाएंगे। यह बेवजह जाया नहीं हुआ है।भगवान ने दिल के रूप में सबसे अहम हिस्सा हमको दिया है। इसका काम है सिर्फ प्यार करना। यह प्रेम जानता है, प्रेम करता है और प्रेम चाहता है। इसे मौका दें कि आपके अंदर के प्यार को बाहर बिखेरें। अतृप्ति तो प्रेम का स्थार्यी भाव है, जो हमेशा रहेगा। लेकिन इसे तृप्त करने की कोशिश ही जिंदगी को जिंदा रखती है वर्ना दुनिया वीरान होती। 
अंत में मेंहदी हसन की कुछ पंक्तियों के साथ ख़त्म करना चाहूँगा,
"बन गए दोस्त भी मेरे दुश्मन,
इक तुम्हारे करीब आने से,
जबकि अपना तुम्हें बना ही लिया,
तो कौन डरता है अब जमाने से,
तुम भी दुनिया से दुश्मनी ले लो,
दोनो मिल जाएँ इस बहाने से,
चाहे सारा जहाँ मिट जाए,
इश्क मिटता नहीं मिटाने से.

Tuesday, February 9, 2016

आरक्षण क्यों ज़रूरी है?

अभी कुछ दिन पहले ही मेरे मित्र से आरक्षण को लेकर बहस हो गई थी. उन्होने बड़ा विरोध किया लेकिन कोई भी बड़ा तर्क नहीं दे पाए. अपने खुद के अनुभव तो बताते रहे. मैने भी बहुत तर्क दिए लेकिन वो माने नहीं. ऐसे ही कई युवा हैं जो केवल फेसबुक और व्हाट्सएप के मैसेजेस देखकर ही कोई राय बना लेते हैं, उसी को लेकर आज मैने जवाब तैयार किया है. आख़िर आरक्षण की ज़रूरत हमारे समाज में है क्यों?
बात वे कह रहे हैं जिनके बाप-दादों ने शिक्षा और संपत्ति पर पिछले दो हज़ार सालों या उससे भी ज़्यादा समय से 100 परसेंट आरक्षण अपने समुदाय के नाम कर रखा है। आदिवासी एकलव्य धनुर्विद्या नहीं सीख सकता था। सीख ली तो उसे अंगूठा कटवाना पड़ा ताकि वह एक राजपुत्र अर्जुन से श्रेष्ठ न निकल जाए। शूद्र शंबूक तपस्या नहीं कर सकता था और इस अपराध के लिए राम ने ब्राह्मणों की शिकायत पर उसका सर धड़ से अलग कर दिया। कितना अद्भुत न्याय है मर्यादा पुरुषोत्तम राम का। और मनु के क्या कहने, उनका कानून है कि यदि किसी शूद्र के कान में वेदमंत्र चले गए तो उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया जाए। कैसी महान हिंदू संस्कृति है कि दलितों को मंदिरों में प्रवेश नहीं करने दिया जाता। प्रवेश करेंगे तो भगवान अपवित्र हो जाएंगे। शंबूक की हत्या रामायण का एक अत्यंत घृणित अध्याय है मगर इसे कभी भी सामने नहीं लाया जाता।
आदिकाल से चला आ रहा है यह अन्याय और आज भी चल रहा है। आदिकाल से एक समूह को पढ़ने-लिखने-सीखने और आगे बढ़ने से वंचित रखा गया, समाज से काटकर अलग रखा गया, उसे अपमानित किया गया। इसी कारण आज वे इस स्थिति में नहीं हैं कि आपसे मुकाबला कर सकें। इसीलिए उनको आरक्षण चाहिए। किसी को सालों तक अंधेरे कमरे में बांधकर रखो, खाने-पीने को कुछ न दो और फिर एक दिन बंधन खोलकर कहो कि आओ, मेरे साथ दौड़ो। मेरी बराबरी करो। यह न्याय है या मज़ाक़ है?
और एक बात। कहा जा रहा है कि जातिवाद का फ़ायदा उठाना छोड़ो और हमारे साथ जाति तोड़ने की मुहीम में शामिल हो जाओ। कमाल है। जातीय श्रेष्ठता का बिगुल बजानेवाले आज जाति तोड़ने की बात कर रहे हैं। इसलिए कर रहे हैं कि आज उनको जाति के कारण परेशानी आ रही है। जब तक जाति के नाम पर अपना वर्चस्व चल रहा था, तब तक जाति बहुत अच्छी थी। आज भी दोस्ती-यारी और खाने-पीने से लेकर शादी-ब्याह तक में ये जाति के दायरे से बाहर नहीं निकलते लेकिन आरक्षण के कारण कॉलेजों में सींटें कम हो गईं, सरकारी नौकरियां कम हो गईं तो नारा दे रहे हैं जाति तोड़ने का। उत्कर्ष और उनके भाइयो, जाति तोड़नी है तो पहले अपने बाप और दादा-दादी से जाकर कह दो कि ‘मैं दहेज लेकर आपके द्वारा चुनी गई अपनी ही जाति की लड़की से शादी नहीं करूंगा। मैं ख़ुद चुनूंगा अपनी जीवनसंगिनी। अपनी पसंद से करूंगा चाहे वह जिस जाति या धर्म की हो।’ ऐसा कहो, फिर उस पर अमल करो और अपनी उस विजातीय या विधर्मी पत्नी को लेकर अपने बाप-दादा के घर जाओ। यदि घरवाले उसे स्वीकार न करें तो अपना घर-परिवार छोड़ दो।
जिस दिन तुम यह सब करोगे, उस दिन तुम्हारे सर से तुम्हारे पूर्वजों के पाप का बोझ ख़त्म होगा। वरना तुम्हारी हर सांस उन दलितों और वंचितों की ऋणी है। ख़ैर मनाओ कि वे अपने हिस्से की कुछ सीटें और सरकारी नौकरियां ही मांग रहे हैं। अगर उनके और उनके पूर्वजों के ख़ून, पसीने और आंसुओं का हिसाब करने बैठोगे तो तुम्हारे रक्त की एक-एक बूंद, तुम्हारे घर की एक-एक ईंट और तुम्हारे बैंक में पड़ा एक-एक रुपया उनके हिस्से में चला जाएगा

Monday, February 8, 2016

मुस्लिम पर्सनल लॉ पर सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के प्रति लिंगभेद समेत विभिन्न मसलों को लेकर दाखिल जनहित याचिका में शुक्रवार को मुस्लिम संगठन जमीयत-उलेमा-ए-हिंद को पक्षकार बनने की अनुमति दे दी। प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर, न्यायमूर्ति ए के सीकरी और न्यायमूर्ति आर भानुमति की 3 सदस्यीय पीठ ने केंद्र और इस संगठन को 6 हफ्तों में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के अटॉर्नी जनरल और नैशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी को जवाब दाखिल करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा था कि क्या जो मुस्लिम महिलाएं भेदभाव की शिकार हो रही हैं, उसे उनके मूल अधिकार का उल्लंघन नहीं मानना चाहिए और क्या यह अनुच्छेद-14 (समानता) और 21 (जीवन के अधिकार) में दखल नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे भी कई मामले सामने आए हैं, जिनमें कहा गया है लड़की को पैतृक संपत्ति में हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत समान अधिकार मिलने चाहिए। कई मामलों में मुस्लिम महिलाओं को पति से मिलने वाले मनमाने तलाक और दूसरी शादी करने जैसे मामले में पहली पत्नी के लिए सेफगार्ड नहीं है।
जमीयत उलेमा-ए-हिन्द की याचिका के अनुसार सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम पर्सनल लॉ में प्रचलित शादी, तलाक और गुजारा भत्ते के चलन की संवैधानिक वैधता की परख नहीं कर सकता है क्योंकि पर्सनल कानूनों को मौलिक अधिकारों के सहारे चुनौती नहीं दी सकती।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद का कहना है कि पर्सनल लॉ को इस आधार पर वैधता नहीं मिली है कि इन्हें किसी कानून या सक्षम अधिकारी ने बनाया है। पर्सनल लॉ का मूलभूत स्रोत उनके अपने धर्मग्रंथ हैं। मुस्लिम कानून मूलरूप से पवित्र कुरान पर आधारित है और इसलिए यह संविधान के अनुच्छेद 13 में उल्लिखित ‘लागू कानून’ की अभिव्यक्ति के दायरे में नहीं आ सकता। इसकी वैधता को संविधान के भाग-3 के आधार पर दी गयी चुनौती पर नहीं परखा जा सकता।

Friday, February 5, 2016

धार 377(समलैंगिकता) पर बहस...

हाल ही में मनोज बाजपेयी की फिल्म "अलीगढ" का ट्रेलर आया  है जिसको "ए" सर्टिफिकेट दे दिया गया है। इसमें कहानी है अलीगढ मुस्लिम  यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सायरस की। जो समलैंगिक (गे) होते हैं। समाज से मिली दुर्भावना के कारण वो आत्महत्या कर लेते हैं। इसके बाद रवीश के ब्लाग पर हिटलर और नाजीवादियों के  समलैंगिकता के बारे में विचार पढे।
इस समय रीयल लाइफ में भी इसपर काफी चर्चा हो रही है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा समलैंगिकता को अपराध मानने के खिलाफ क्यूरेटिव पिटीशंस को 5 सदस्यीय संविधान पीठ को सौंपे जाने के मामले में सरकार और राजनीतिक दलों का दोहरा खेल उजागर हुआ है। तत्कालीन यूपीए सरकार ने 2008 में दिल्ली हाईकोर्ट में एफिडेविट में कहा था कि समलैंगिकता बीमारी होने के साथ अनैतिक भी है पर अब पी. चिदम्बरम और कपिल सिब्बल समलैंगिकता की वकालत कर रहे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा समलैंगिकता के पक्ष में निर्णय को संघ परिवार के लोगों द्वारा 2009 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी थी और अब भाजपा सरकार के मंत्री अरुण जेटली की लामबंदी के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में सरकारी वकील खामोश हैं।
दिलचस्प बात यह है कि क्यूरेटिव पिटीशन दायर करने के लिए तीन सीनियर एडवोकेट द्वारा दिए गए सर्टिफिकेट में मुकुल रोहतगी की अनुशंसा भी शामिल है जो मोदी सरकार में एटार्नी जनरल और सर्वोच्च लॉ आफिसर हैं। केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू के समलैंगिकता  पर बयान के बावजूद सरकार को अब स्पष्ट निर्णय लेना ही पड़ेगा और संघ परिवार के दबाव में यदि इस मामले का विरोध किया गया तो एटार्नी जनरल को बहस से अलग रखना पड़ेगा जिससे बड़ा संवैधानिक संकट भी पैदा हो सकता है।
क्यूरेटिव पिटीशन रुपा अशोक हुरा मामले में संविधान की धारा 142 की व्याख्या से उपजी नई कानूनी व्यवस्था है जिसका फैसला पहले जजों के चैम्बर में होता था और अब खुली अदालत में बहस से फैसला होगा। संविधान पीठ अब यह निर्धारित करेगी कि क्या 2013 में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से न्यायिक विधि व्यवस्था पर कोई संकट है और क्या उस आदेश को पारित करने में नेचुरल जस्टिस के नियमों का उल्लघंन हुआ था। इसमें यह भी देखा जायेगा कि पूर्ववर्ती जज इस मामले में किसी प्रकार का कोई व्यक्तिगत दुराग्रह तो नहीं रखते थे। समलैंगिकता के समर्थकों द्वारा यह कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2012 में ऑर्डर रिजर्व किया था और दिसंबर 2013 में फैसला दिया जो सीपीसी के कानून का उल्लंघन है जिसके अनुसार सुनवाई खत्म होने के 2 महीने के भीतर निर्णय दिया जाना चाहिए। यदि इस मापदंड से देखा जाये तो समलैंगिकता के पक्ष में दिल्ली हाई कोर्ट का निर्णय भी चुनौती के दायरे में आ जायेगा जहां 7 नवंबर 2008 को निर्णय सुरक्षित रखने के बाद जुलाई 2009 में आदेश पारित किया गया था।
दुनिया के 75 से अधिक देशों में समलैंगिकता गैरकानूनी है और इससे एड्स के खतरों की आशंका व्यक्त की जाती है। 42वें विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में समलैंगिकता के खिलाफ सख्त टिप्पणी करते हुए इसमें बदलाव से इंकार किया था। भारत में एक बड़ा तबका समलैंगिकता को  प्राकृतिक व्यवस्था के खिलाफ मानते हुए इसे पश्चिमी बाजार द्वारा पैदा की गई बीमारी मानता है। परन्तु समर्थक वर्ग इसे निजी आजादी से जोड़कर बेडरूम में कानून की तांकझांक के खिलाफ अपना अभियान चला रहा है। 156 वर्ष पुरानी आईपीसी की धारा 377 को बदलते समाज के अनुरूप बदलना ही चाहिए पर उसकी जवाबदेही लेने से नेता इनकार क्यों कर रहे हैं ? सुप्रीम कोर्ट ने 2013 के मूल निर्णय में कहा था कि समलैंगिकता के कानून में बदलाव करना संसद की जिम्मेदारी है। दिल्ली का राजतंत्र महानगरीय मीडिया के दबाव से निर्णय लेने की बाध्यता के बावजूद जमीनी हकीकत से दुराव के वजह से उन्हें अंजाम तक नहीं पंहुचा पाता, जैसा कांग्रेसी नेता शशि थरूर द्वारा दिसंबर 2015 में समलैंगिकता के पक्ष में पेश प्राइवेट बिल की 71-24 बहुमत की विफलता में देखा गया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस विषय पर निर्णय संसदीय सर्वोच्चता में हस्तक्षेप ही होगा जैसा केंद्र सरकार ने अपने 2008 के हलफनामे में कहा था।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार समलैंगिकता के आरोप में  अभी तक सिर्फ 200 लोगों के खिलाफ ही आपराधिक कार्यवाही हुई है परंतु कई अन्य ब्रिटिशकालीन कानूनों के दुरुपयोग से देश की बड़ी आबादी त्रस्त है। दो वयस्क स्त्री-पुरुषों के बीच संबंध को देह व्यापार के नाम पर रोकने का कानून क्यों होना चाहिए? किसी पुरुष द्वारा विवाहित महिला से स्वेच्छा से स्थापित संबंधों को व्यभिचार के तहत अपराध क्यों मानना चाहिए? माननीय सांसद जनता के लिए नए कानून बना सकें और पुराने कानूनों को खत्म कर सकें, इसके लिए संसदीय व्यवस्था में देश तीस हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च करता है। इन कामों को करने की बजाय संसद के सत्र हंगामे की भेंट चढ़ जाते हैं जहां सांसदों के वेतन और पेंशन बढ़ने के कानून जरूर पास हो जाते हैं। न्यायिक सक्रियता और मुकदमों के बढ़ते बोझ पर उंगली उठाने वाले राजनेताओं के पास, समलैंगिकता के बहाने संसद द्वारा आपराधिक कानूनों में आमूलचूल बदलाव का बड़ा अवसर है जिससे संसदीय व्यवस्था की शान भी बहाल हो सकेगी।
अगर बात मेरी राय की करू तो निजी मामला मानते हुए गैरकानूनी नहीं कहना चाहिए। सही बात है जब समाज में हर तरह के लोग हैं तो हो सकता है कि 1-2% लोगों को भगवान ने समलैंगिक बना दिया हो। इसलिए उनके जीने का अधिकार छीनना लोकतंत्र में शोभा नहीं देता है।
रही बात सामाजिक तो यह ठीक भी नहीं है।  भगवान या प्रकृति के कुछ नियम है जो इंसान को मानने चाहिए। उन्हें मानने के लिए किसी को भी मजबूर नहीं करना चाहिए। जो प्रकृति के खिलाफ चलेगा उसे प्रकृत्ति सजा देगी। हमें अपने नियमों पर ही चलना चाहिए और अपनी पीढी को उसी पर चलने की सीख देना चाहिए। बाकी जो जैसे चले चलने दे।

मेनका गांधी की बात में कितना दम?

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी का विचार भले ही उन्होंने निजी तौर पर प्रकट किया है, लेकिन यह देश की वर्तमान परिस्थितियों में कतई ठीक नहीं है। मां के गर्भ में भ्रूण के लिंग की जांच को भ्रूणहत्या रोकने का उपाय बताने वाली श्रीमती गांधी सर्वप्रथम तो एक महिला हैं, इसलिए देश उनसे अपेक्षा करता है कि वह महिलाओं के प्रति संवेदनशील होंगी, और उस पर एक ऐसे विभाग का जिम्मा संभाल रही हैं, जो देश में महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए जिम्मेदार है। ऐसी परिस्थितियों में इस तरह के विचार देश में महिलाओं के हालात को कैसे ठीक कर पाएंगे, सोचना होगा।
जनगणना 2011 के आईने में हम अपने बदरंग चेहरे को देख ही चुके हैं, जिसमें स्त्री-पुरुष के निरंतर कम होते जा रहे लिंगानुपात को हमने देखा। अभी-अभी देश के 13 राज्यों में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के नतीजे भी आए हैं और इसमें भी कमोबेश सभी राज्यों में बच्चों के लिंगानुपात में असंतुलन महसूस किया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि एक तरफ हम विकसित हो रहे हैं, और दूसरी और हम लड़कियों के जीने के अधिकार को छीन रहे हैं। श्रीमती गांधी ने भी स्वीकार किया है कि विकसित राज्यों का लिंगानुपात और ज्यादा गंभीर है।
केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री ने कहा कि लिंग जांच को अनिवार्य कर देना चाहिए, ताकि जिन महिलाओं के गर्भ में लड़की है, उनका ध्यान रखा जा सके और इस तरह कन्या भ्रूणहत्या रोकी जा सकेगी। सवाल यह है कि लड़कियों का ध्यान कौन रखता है। जिस देश में लड़कियों को आज भी बोझ माना जा रहा हो, वहां लड़कियों के पक्ष में माहौल बनाना, उनकी उचित देख-रेख करना और उनको किसी भी लड़के के बराबर के अधिकार देना अब भी बड़ी चुनौती है। केवल खानपान और रहन-सहन में ही नहीं। आप केवल उच्च शिक्षा के लिए लेने वाले लोन के आंकड़े उठाकर देख लीजिए। यह साफ समझ में आ जाएगा कि लड़कियां आज भी उपेक्षित हैं। इसकी शुरुआत जब गर्भ से ही हो जाएगी तो या तो वे बचेंगी ही नहीं, या फिर उनकी बचपन की नींव गर्भ में ही इतनी कमजोर हो जाएगी कि उनका पूरा जीवन इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेगा।
हो सकता है कि समाज का एक वर्ग लड़कियों के लिए सकारात्मक दृष्टि के साथ सोचने लगा हो, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि अधिकांशतः ऐसा नहीं है। बल्कि हो तो ऐसा रहा है कि जिन इलाकों में अच्छी शिक्षा है, जो सभ्य माने जाते हैं, या जिन लोगों की नई टेक्नोलॉजी तक पहुंच है, वे पीछे के रास्तों से पता लगाते हैं कि उनकी आने वाली संतान का लिंग क्या है। इसीलिए हम देखते हैं कि शहरों के पॉश इलाकों में इस लिंगानुपात में जर्बदस्त असंतुलन है। देश में साल 2001 में जहां प्रति 1,000 आदमियों पर 927 महिलाएं थीं, वहीं जनगणना 2011 ने हमें बताया कि देश में 10 सालों में प्रति 1,000 पुरुषों पर 919 महिलाएं ही बची हैं। इसका मतलब क्या है।
देश की राजधानी दिल्ली का लिंगानुपात देख लीजिए, 1,000 पुरुषों पर केवल 871 महिलाएं हैं। देश में केवल दो राज्य केरल और पुदुच्चेरी ही ऐसे हैं, जहां लड़कों से ज्यादा लड़कियां हैं। हां, देश के ज्यादातर आदिवासी इलाके जरूर हैं, जो इस अनुपात को तोड़ते हैं। वहां इस तरह की कोई सुविधा नहीं है, कोई तकनीक नहीं है, जिससे मां के गर्भ में लड़का या लड़की का पता लगाया जा सके। और एक पक्ष यह भी है कि ऐसे समाज सामाजिक रूप से लड़कियों के लिए ज्यादा बेहतर माहौल उपलब्ध करते हैं, वहां उनके साथ भेदभाव कम होता है।
मेनका जी ने स्वीकार किया कि "एक बार जांच में यह तय हो जाए कि बच्चा लड़का है या लड़की, उसकी निगरानी रखना आसान हो जाएगा, यह एक अलग नजरिया है। मैंने यह विचार रखे हैं, जिन पर चर्चा की जाएगी..." दूसरी ओर वह कह रही हैं, "गैरकानूनी रूप से अल्ट्रासाउंड करने वाले लोगों को कब तक पकड़ते रहेंगे, ऐसे लोगों को गिरफ्तार करना इस समस्या का स्थायी हल नहीं है..." उनके विचार को लागू करने का दूसरा तरीका क्या होगा, उसके पीछे उनकी विस्तृत योजना क्या है, इसका अभी खुलासा नहीं हुआ है, लेकिन लिंग जांच को रजिस्टर करने का भी तो कोई सिस्टम बनाना ही होगा। इस बात की क्या गारंटी होगी कि लिंग जांच के बाद बच्चे को बचाया ही जाएगा। अभी हम देखते हैं, प्रसव पूर्व लिंग की जांच का बाकायदा कानून होने के बावजूद स्वास्थ्य संस्थाएं निजी हितों के लिए इसकी धज्जियां उड़ाती हैं।
यह सही है कि विकसित राज्यों में अविकसित राज्यों के मुकाबले बाल लिंगानुपात का गिरता स्तर बड़ी समस्या है, लेकिन इसे सुधारने का रास्ता इस गली से होकर नहीं जाता है। सोचना यह चाहिए कि हमारे समाज में लड़कियों को मारे जाने की सबसे बड़ी वजह क्या है। सोचना यह भी होगा कि महिलाओं की स्थिति को बेहतर करने की जिम्मेदारी केवल एक विभाग की नहीं। जब तक देश में लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ अपराध के आंकड़े दुरुस्त नहीं होंगे, जब तक उनका स्वास्थ्य बेहतर नहीं होगा, जब तक उनकी शिक्षा बेहतर नहीं होगी, ऐसी परिस्थितियां बनी ही रहेंगी। न तो इसे कोई जादुई तकनीक ठीक कर सकेगी, न कोई कानून।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...