फ्रीडम 251 मोबाई के बारे में बहुत बातें की जा रही हैं. मुझे भी इसमें अपने मन से कुछ अलग समझ में आ रहा है, जो मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ.
देखिए यह सरकार पूरी तरह से ब्रान्डिंग करने वाली सरकार रही हैं. गुजरात के मुख्यमंत्री रहते ऐसा ही करके गुजरात मॉडल पेश किया गया था, जिसे अभी वहाँ के पटेल समुदाय ने ही ध्वस्त कर दिया. आप सरकार के मुख्य काम देखिए, गैस सब्सिडी में सुधार की कोशिश, जनधन योजना, प्रधानमंत्री बीमा योजना, सुकन्या योजना, और सबसे बड़ी स्वच्छ भारत योजना, मन की बात आदि....
इनमें सुकन्या योजना और गैस सब्सिडी तो कुछ हद तक ठीक भी थी, बाकी की सब केवल टीवी, अख़बार, फेसबुक पर एक भावना बनकर ही रह गईं.
ऐसे में मेक इन इंडिया प्रधानमंत्री के लिए युवाओं के बीच रोज़गार और औद्योगिक क्रांति के रूप में प्रस्तुत करना अतिआवश्यक था. एक साल से अधिक हो गया लेकिन कुछ विशेष हो नहीं पाया था. पाकिस्तान, अरब सहित पूरे एशिया में इसका कार्यक्रम होता है, मुंबई में इसके लिए एक पूरा सप्ताह रखा जाता है. फिर दो दिन बाद फ्रीडम 251 का लॉन्चिंग होता है. मैने किरीट सोमैया के ब्लॉग पर पढ़ा था जिसमें उन्होने उस कंपनी के उपर कई सवाल खड़े किए थे. जैसे उस कंपनी रिंगिंगबेल का रजिस्ट्रेशन 3 महीने पहले हुआ है और उसके किसी भी शेयर होल्डर का नाम सामने न आना. वो अलग बात है, और मैं पूर्णतया सत्यता पूर्वक यह नहीं कह सकता हूँ. इस पूरे एपीसोड में यह बात देखने वाली थी क़ि भाजपा के कुछ शीर्ष नेता लॉन्चिंग में गए और उसका मालिक कहता है क़ि वो मेक इन इंडिया के लिए कार्य करने को तैयार है. जिसके बाद तो पूरे देश में इसको मोबाइल क्रांति के रूप में देखा जाने लगा और करोड़ों लोगों ने ओनलाइन रजिस्ट्रेशन करवा दिया. इसकी डिलीवरी की सीमा भी न्यूनतम 6 महीने तक रखी गई है, जिससे यह प्रतीत होता है कि यह सब सरकार के ही किसी प्लान के तहत हो सकता है. इसी बीच टेलीकॉम मिनिस्टर रविशंकर प्रसाद का लोगों के पैसे वापस करवाने की गारंटी देना और दूसरे दिन ही इनकम टैक्स की रेट डालना, सरकार का उससे कुछ संबंध नहीं है, यह दर्शाने के लिए हो सकता है.
मैं इसबारे में यह शत प्रतिशत सत्यता के साथ नहीं कह सकता हूँ लेकिन यह मेरा पूर्वानुमान है क़ि हो सकता है क़ि सरकार ने ही कुछ 400-500 करोड़ का इनवेस्टमेंट कर दिया हो या फिर किसी अपने ही समर्थक व्यापारी को कुछ सपोर्ट कर दिया हो. क्योंकि जब मोदी जी 2017 में यूपी में और 2019 में चुनाव के लिए जाएँगे तो कुछ क्रांतिकारी काम नहीं होंगे जनता ख़ासकर युवाओं के बीच लेकर जा सकें. ऐसे में यह मोबाइल क्रांति काफ़ी मददगार होगी. वैसे यह ठीक भी है खाना मिले ना मिले मोबाइल सबको ज़रूर मिले.
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