पिछले 3-4 दिन से मैं काफ़ी परेशान हूँ, जिसका कारण है देश में राजनैतिक भूचाल। जेएनयू में 9 तारीख को हुआ देशविरोधी मार्च, फिर 11 तारीख को छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी। हैरानी की बात यह है कि अब तक किसी भी वीडियो में कन्हैया को ग़लत नहीं कहा गया है। जो असली दोषी हैं उनको तो गिरफ्तार ही नहीं किया गया। इसके बाद कोर्ट में कन्हैया की पेशी के समय जो हुआ वो बहुत शर्मनाक है। पटियाला हाउस कोर्ट में कुछ ‘देशभक्त’ वकीलों या वकीलों के लिबास में कुछ ‘देशभक्त’ गुंडों ने पत्रकारों और जेएनयू के कुछ छात्र-छात्राओं को पीट दिया, उनके मोबाइल छीन लिए ताकि वे उनकी ‘देशभक्ति’ के विडियो नहीं ले सकें, महिला पत्रकारों के साथ बदतमीज़ी की। जज साहब देखते रहे, कुछ नहीं कर सके और बस्सी साहब की पुलिस तमाशा देखती रही। देश के गृह मंत्री जो जेएनयू मामले में इतने उत्तेजित थे कि तुरंत प्रेस के सामने आकर अपनी बात कही, अपनी पार्टी के विधायक ओ।पी। शर्मा की गुंडागर्दी पर मौन धारण किए हुए हैं। शायद फ़ोन पर उनको बधाई भी दी हो। आज पत्रकारों का एक दल गृह मंत्री से मिलने की कोशिश करेगा और उम्मीद है, गृह मंत्री ‘कानून अपना काम करेगा और दोषियों को कतई नहीं बख्शा जाएगा’ टाइप का कोई बयान दे देकर फ़ारिग हो लेंगे। उन तथाकथित ‘देशभक्तों’ का कहना है कि इन छात्रों और पत्रकारों की पिटाई इसलिए हुई कि वे सब देशद्रोही थे। देशद्रोही थे क्योंकि वे देशभक्ति के मामले में एक ख़ास विचारधारा के लोगों कीकी हाँ में हाँ नहीं मिलाते हैं। आप पूछेंगे, कि यह ख़ास विचारधारा क्या है? जो लोग कहते हैं कि यह देश हिंदुओं का है और केवल हिंदुओं का है। ये लोग कहते हैं क़ि हिंदू संस्कृति और धर्म विश्व में सर्वश्रेष्ठ हैं इसलिए यह देश भी सर्वश्रेष्ठ है। वो कहते हैं कि इस देश में जो भी अच्छाई है, वह हिंदुओं और हिंदुत्व के कारण है और जो बुराई है, वह दूसरे धर्मावलंबियों और मतों-मान्यताओं के कारण है। जो इस विचारधारा को मानता है, वह हुआ देशभक्त। और जो नहीं मानता, वह हुआ देशद्रोही। हद है सरकार की अनआधिकारिक एजेंसियाँ आजकल देशभक्ति का सर्टिफिकेट लेकर घूम रही हैं।
ये लोग वो हैं जो गाय को अपनी माता मानता हो भले ही पैरों में गऊमाता के चमड़े से बना चमचमाता जूता या चप्पल पहनता हो, और छोड़ देता हो उसे सड़क पर पोलिथीन खाने के लिए। जो मुसलमानों, ईसाइयों तथा दलितों और पिछड़ों से ऊपरी तौर पर न सही, मगर मन-ही-मन घृणा करते हैं। ये वो लोग हैं जो देववाणी संस्कृत को विश्व की सर्वश्रेष्ठ और वैज्ञानिक भाषा मानते हैं और महिलाओं के गुप्तांगों से जुड़ी सारी गालियां शिशुपाल की तरह कंठस्थ रखते हैं, यही हैं परम संस्कारी असली (फर्जी) देशभक्त। जो हर पाकिस्तानी मां-बहन के साथ सहवास करने (मूल शब्द मैं नहीं लिख सकता) की दिली ख़्वाहिश रखता हो और साथ ही भारत माता की जय के नारे भी बहुत ज़ोरशोर से लगाता हो, वह हुआ भारत माता का सच्चा सपूत और दूसरे शब्दों में देशभक्त। ये वही सेठ लोग हैं जो अपने छोटे या बड़े कारोबार में जमकर मिलावट करके जनता को लूटते हैं, और सरकार को टैक्स देने में चोरी करते हैं। आज यही लोग एक और टैक्सवाद लेकर आए हैं। कहते हैं हमारे टैक्स से यूनिवर्सिटी चलती है। फिर ये देशभक्त लोग टैक्स बचा बचाकर मंदिरों और राजनैतिक दलों को जमकर चंदा देते हैं। कौन समझाए इन नासमझ लोगों को राज्य का मतलब। इनको संविधान के बारे में पता ही क्या होता है?
संविधान ही वह सीमा हो सकती है जिसके भीतर भारत नाम के राष्ट्र को समाहित किया जा सकता है। लेकिन कुछ लोग इसकी परिधि को संविधान के जरिए नहीं बल्कि एक धर्मविशेष या मतविशेष के जरिए बांधना चाहते हैं और निश्चित तौर वह परिधि संविधान की तुलना में छोटी ही होगी। इस लिहाज से उनका राष्ट्र छोटा होगा। निष्कर्ष के तौर पर यह कह सकते हैं कि वह लोग जो मौजूदा राष्ट्र की विशालता को काट-छांटकर उसे छोटा करना चाहते हैं, असल में राष्ट्रद्रोही तो वे हुए।
अट्ठारहवीं सदी में ‘वॉल्तेयर’ ने एक बात कही थी, ‘मैं जानता हूं कि तुम्हारी बात गलत है, फिर भी तुम्हारी अभिव्यक्ति के अधिकार के लिए मैं अपनी जान तक देने के लिए तैयार हूं।’ हमारा संविधान भी अनुच्छेद 19 (A) के तहत यही कहता है। वह खुद की आलोचना (यही खूबी उसे लचीला और समय के साथ परिवर्तनशील बनाए रखने में मददगार भी बनाती है) और विरोधियों की प्रशंसा करने तक का अधिकार देता है।
हम कितनी ही राष्ट्रविरोधी गतिविधियां (रोज़मर्रा के जीवन में कानून तोड़ना) करते रहें लेकिन हम राष्ट्रद्रोही का तमगा नहीं लेना चाहते हैं, और राष्ट्रवादी बनने के लिए किसी ख़ास विचारधारा की हाँ में हाँ मिलना सीख लेते हैं। आप मान भी लेते हैं क्योंकि आपको राष्ट्रवादी कहलाना पसंद है।
अब आते हैं राजनैतिक पहलू पर तो सबसे प्रमुख बात गौर करने वाली है कि जो भाजपा समर्थक अपने विरोधियों को देशद्रोही कह रहे हैं वो भाजपा तो खुद ही जम्मू कश्मीर में 8 दिन पहले तक उस पीडीपी के साथ सरकार चला रही थी, जो अफ़ज़ल गुरु को शहीद मानती है। हमेशा ही जम्मू कश्मीर के अलगाववादियों से रिश्ते रखे हैं। कल राकेश सिन्हा को कहते सुना कि वह राज्यवाद है। कैसा राज्यवाद है यह? पंजाब के आतंकवादी राजवाना और भुल्लर की फाँसी की सज़ा के मामलों में अकालियों के साथ मिलकर क्या करते रहे हैं, पूरे देश को पता है।
अब अगर राष्ट्रद्रोह की परिभाषा तय करने की बात की जाए कि कैसे तय होगा कि कौन देशभक्त है और कौन राष्ट्र विरोधी? इतिहास में अगर हम जाकर देखें तो पता चलता है कि जब 1942 में महात्मा गाँधी ने "भारत छोड़ो आंदोलन" चलाया तो उनके साथ अंबेडकर, कम्युनिष्ट पूर्ण रूप से शामिल नहीं थे। संघ तो लिखित तौर पर अँग्रेज़ों को कह चुका था कि वो इस आंदोलन में साथ नहीं है। सोचिए अगर तब महात्मा गाँधी ने उन लोगों को गैर-राष्ट्रवादी कह दिया होता तो क्या होता था? महात्मा गाँधी जैसे विश्व के सबसे बड़े नेता (मृत्यु के बाद भी) ने यह स्टैम्प लगा दिया होता तो आजतक उनके धब्बे नहीं छूटते। सोचिए ये महान लोग जिन्हें हम पूजते हैं, वो कहाँ होते? लेकिन उनको पता था कि ये लोग अलग अलग विचारधारा के लोग हैं, जो मेरी एक बात से सहमत नहीं होंगे लेकिन देशप्रेम तो उनका भी वैसा ही है जैसा मेरा।
प्रेमचंद गोयनका, जिनको सबसे ज़्यादा दक्षिणपंथियों द्वारा वैचारिक तौर पर कोर्ट किया जाता है, ने तो कह दिया था कि राष्ट्रवाद देश का सबसे बड़ा कोढ़ है। यह बात उनके आलेखों में मौजूद है। रवीन्द्र नाथ ठाकुर जब जापान गए तो स्टेज पर जाते ही उन्होने राष्ट्रवाद के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया। तो जापान के लोगों ने उनकी आलोचना की थी। अब आता हूँ दक्षिण पंथियों के राष्ट्रवाद के सबसे बड़े हीरो "वीर सावरकर की" तो मुझे लगता है कि राष्ट्रवाद में सबसे अधिक विरोधाभाष और मतभेद उन्होंने ही पैदा किए थे। वो कहते थे पुण्यभूमि और जन्मभूमि अलग अलग बाते हैं। जो लोग भारत को पुण्यभूमि नहीं मानते हैं वो राष्ट्रवादी नहीं हो सकते हैं। बस यहीं से शुरू हो गया राष्ट्रवाद का सांप्रदायिककरण। जिसमें ना जाने कितने लोग मारे गए?
अब पिछले कुछ समय से खास तरह के एजेंडे को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है और जेएनयू प्रकरण में भी वही एजेंडा काम कर रहा है। इसे जितनी जल्दी हो सके समझ लेना बेहतर होगा, क्योंकि फासीवादी देशभक्ति लाशों का हिसाब नहीं मांगती।
ये लोग वो हैं जो गाय को अपनी माता मानता हो भले ही पैरों में गऊमाता के चमड़े से बना चमचमाता जूता या चप्पल पहनता हो, और छोड़ देता हो उसे सड़क पर पोलिथीन खाने के लिए। जो मुसलमानों, ईसाइयों तथा दलितों और पिछड़ों से ऊपरी तौर पर न सही, मगर मन-ही-मन घृणा करते हैं। ये वो लोग हैं जो देववाणी संस्कृत को विश्व की सर्वश्रेष्ठ और वैज्ञानिक भाषा मानते हैं और महिलाओं के गुप्तांगों से जुड़ी सारी गालियां शिशुपाल की तरह कंठस्थ रखते हैं, यही हैं परम संस्कारी असली (फर्जी) देशभक्त। जो हर पाकिस्तानी मां-बहन के साथ सहवास करने (मूल शब्द मैं नहीं लिख सकता) की दिली ख़्वाहिश रखता हो और साथ ही भारत माता की जय के नारे भी बहुत ज़ोरशोर से लगाता हो, वह हुआ भारत माता का सच्चा सपूत और दूसरे शब्दों में देशभक्त। ये वही सेठ लोग हैं जो अपने छोटे या बड़े कारोबार में जमकर मिलावट करके जनता को लूटते हैं, और सरकार को टैक्स देने में चोरी करते हैं। आज यही लोग एक और टैक्सवाद लेकर आए हैं। कहते हैं हमारे टैक्स से यूनिवर्सिटी चलती है। फिर ये देशभक्त लोग टैक्स बचा बचाकर मंदिरों और राजनैतिक दलों को जमकर चंदा देते हैं। कौन समझाए इन नासमझ लोगों को राज्य का मतलब। इनको संविधान के बारे में पता ही क्या होता है?
संविधान ही वह सीमा हो सकती है जिसके भीतर भारत नाम के राष्ट्र को समाहित किया जा सकता है। लेकिन कुछ लोग इसकी परिधि को संविधान के जरिए नहीं बल्कि एक धर्मविशेष या मतविशेष के जरिए बांधना चाहते हैं और निश्चित तौर वह परिधि संविधान की तुलना में छोटी ही होगी। इस लिहाज से उनका राष्ट्र छोटा होगा। निष्कर्ष के तौर पर यह कह सकते हैं कि वह लोग जो मौजूदा राष्ट्र की विशालता को काट-छांटकर उसे छोटा करना चाहते हैं, असल में राष्ट्रद्रोही तो वे हुए।
अट्ठारहवीं सदी में ‘वॉल्तेयर’ ने एक बात कही थी, ‘मैं जानता हूं कि तुम्हारी बात गलत है, फिर भी तुम्हारी अभिव्यक्ति के अधिकार के लिए मैं अपनी जान तक देने के लिए तैयार हूं।’ हमारा संविधान भी अनुच्छेद 19 (A) के तहत यही कहता है। वह खुद की आलोचना (यही खूबी उसे लचीला और समय के साथ परिवर्तनशील बनाए रखने में मददगार भी बनाती है) और विरोधियों की प्रशंसा करने तक का अधिकार देता है।
हम कितनी ही राष्ट्रविरोधी गतिविधियां (रोज़मर्रा के जीवन में कानून तोड़ना) करते रहें लेकिन हम राष्ट्रद्रोही का तमगा नहीं लेना चाहते हैं, और राष्ट्रवादी बनने के लिए किसी ख़ास विचारधारा की हाँ में हाँ मिलना सीख लेते हैं। आप मान भी लेते हैं क्योंकि आपको राष्ट्रवादी कहलाना पसंद है।
अब आते हैं राजनैतिक पहलू पर तो सबसे प्रमुख बात गौर करने वाली है कि जो भाजपा समर्थक अपने विरोधियों को देशद्रोही कह रहे हैं वो भाजपा तो खुद ही जम्मू कश्मीर में 8 दिन पहले तक उस पीडीपी के साथ सरकार चला रही थी, जो अफ़ज़ल गुरु को शहीद मानती है। हमेशा ही जम्मू कश्मीर के अलगाववादियों से रिश्ते रखे हैं। कल राकेश सिन्हा को कहते सुना कि वह राज्यवाद है। कैसा राज्यवाद है यह? पंजाब के आतंकवादी राजवाना और भुल्लर की फाँसी की सज़ा के मामलों में अकालियों के साथ मिलकर क्या करते रहे हैं, पूरे देश को पता है।
अब अगर राष्ट्रद्रोह की परिभाषा तय करने की बात की जाए कि कैसे तय होगा कि कौन देशभक्त है और कौन राष्ट्र विरोधी? इतिहास में अगर हम जाकर देखें तो पता चलता है कि जब 1942 में महात्मा गाँधी ने "भारत छोड़ो आंदोलन" चलाया तो उनके साथ अंबेडकर, कम्युनिष्ट पूर्ण रूप से शामिल नहीं थे। संघ तो लिखित तौर पर अँग्रेज़ों को कह चुका था कि वो इस आंदोलन में साथ नहीं है। सोचिए अगर तब महात्मा गाँधी ने उन लोगों को गैर-राष्ट्रवादी कह दिया होता तो क्या होता था? महात्मा गाँधी जैसे विश्व के सबसे बड़े नेता (मृत्यु के बाद भी) ने यह स्टैम्प लगा दिया होता तो आजतक उनके धब्बे नहीं छूटते। सोचिए ये महान लोग जिन्हें हम पूजते हैं, वो कहाँ होते? लेकिन उनको पता था कि ये लोग अलग अलग विचारधारा के लोग हैं, जो मेरी एक बात से सहमत नहीं होंगे लेकिन देशप्रेम तो उनका भी वैसा ही है जैसा मेरा।
प्रेमचंद गोयनका, जिनको सबसे ज़्यादा दक्षिणपंथियों द्वारा वैचारिक तौर पर कोर्ट किया जाता है, ने तो कह दिया था कि राष्ट्रवाद देश का सबसे बड़ा कोढ़ है। यह बात उनके आलेखों में मौजूद है। रवीन्द्र नाथ ठाकुर जब जापान गए तो स्टेज पर जाते ही उन्होने राष्ट्रवाद के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया। तो जापान के लोगों ने उनकी आलोचना की थी। अब आता हूँ दक्षिण पंथियों के राष्ट्रवाद के सबसे बड़े हीरो "वीर सावरकर की" तो मुझे लगता है कि राष्ट्रवाद में सबसे अधिक विरोधाभाष और मतभेद उन्होंने ही पैदा किए थे। वो कहते थे पुण्यभूमि और जन्मभूमि अलग अलग बाते हैं। जो लोग भारत को पुण्यभूमि नहीं मानते हैं वो राष्ट्रवादी नहीं हो सकते हैं। बस यहीं से शुरू हो गया राष्ट्रवाद का सांप्रदायिककरण। जिसमें ना जाने कितने लोग मारे गए?
अब पिछले कुछ समय से खास तरह के एजेंडे को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है और जेएनयू प्रकरण में भी वही एजेंडा काम कर रहा है। इसे जितनी जल्दी हो सके समझ लेना बेहतर होगा, क्योंकि फासीवादी देशभक्ति लाशों का हिसाब नहीं मांगती।
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