Tuesday, February 9, 2016

आरक्षण क्यों ज़रूरी है?

अभी कुछ दिन पहले ही मेरे मित्र से आरक्षण को लेकर बहस हो गई थी. उन्होने बड़ा विरोध किया लेकिन कोई भी बड़ा तर्क नहीं दे पाए. अपने खुद के अनुभव तो बताते रहे. मैने भी बहुत तर्क दिए लेकिन वो माने नहीं. ऐसे ही कई युवा हैं जो केवल फेसबुक और व्हाट्सएप के मैसेजेस देखकर ही कोई राय बना लेते हैं, उसी को लेकर आज मैने जवाब तैयार किया है. आख़िर आरक्षण की ज़रूरत हमारे समाज में है क्यों?
बात वे कह रहे हैं जिनके बाप-दादों ने शिक्षा और संपत्ति पर पिछले दो हज़ार सालों या उससे भी ज़्यादा समय से 100 परसेंट आरक्षण अपने समुदाय के नाम कर रखा है। आदिवासी एकलव्य धनुर्विद्या नहीं सीख सकता था। सीख ली तो उसे अंगूठा कटवाना पड़ा ताकि वह एक राजपुत्र अर्जुन से श्रेष्ठ न निकल जाए। शूद्र शंबूक तपस्या नहीं कर सकता था और इस अपराध के लिए राम ने ब्राह्मणों की शिकायत पर उसका सर धड़ से अलग कर दिया। कितना अद्भुत न्याय है मर्यादा पुरुषोत्तम राम का। और मनु के क्या कहने, उनका कानून है कि यदि किसी शूद्र के कान में वेदमंत्र चले गए तो उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया जाए। कैसी महान हिंदू संस्कृति है कि दलितों को मंदिरों में प्रवेश नहीं करने दिया जाता। प्रवेश करेंगे तो भगवान अपवित्र हो जाएंगे। शंबूक की हत्या रामायण का एक अत्यंत घृणित अध्याय है मगर इसे कभी भी सामने नहीं लाया जाता।
आदिकाल से चला आ रहा है यह अन्याय और आज भी चल रहा है। आदिकाल से एक समूह को पढ़ने-लिखने-सीखने और आगे बढ़ने से वंचित रखा गया, समाज से काटकर अलग रखा गया, उसे अपमानित किया गया। इसी कारण आज वे इस स्थिति में नहीं हैं कि आपसे मुकाबला कर सकें। इसीलिए उनको आरक्षण चाहिए। किसी को सालों तक अंधेरे कमरे में बांधकर रखो, खाने-पीने को कुछ न दो और फिर एक दिन बंधन खोलकर कहो कि आओ, मेरे साथ दौड़ो। मेरी बराबरी करो। यह न्याय है या मज़ाक़ है?
और एक बात। कहा जा रहा है कि जातिवाद का फ़ायदा उठाना छोड़ो और हमारे साथ जाति तोड़ने की मुहीम में शामिल हो जाओ। कमाल है। जातीय श्रेष्ठता का बिगुल बजानेवाले आज जाति तोड़ने की बात कर रहे हैं। इसलिए कर रहे हैं कि आज उनको जाति के कारण परेशानी आ रही है। जब तक जाति के नाम पर अपना वर्चस्व चल रहा था, तब तक जाति बहुत अच्छी थी। आज भी दोस्ती-यारी और खाने-पीने से लेकर शादी-ब्याह तक में ये जाति के दायरे से बाहर नहीं निकलते लेकिन आरक्षण के कारण कॉलेजों में सींटें कम हो गईं, सरकारी नौकरियां कम हो गईं तो नारा दे रहे हैं जाति तोड़ने का। उत्कर्ष और उनके भाइयो, जाति तोड़नी है तो पहले अपने बाप और दादा-दादी से जाकर कह दो कि ‘मैं दहेज लेकर आपके द्वारा चुनी गई अपनी ही जाति की लड़की से शादी नहीं करूंगा। मैं ख़ुद चुनूंगा अपनी जीवनसंगिनी। अपनी पसंद से करूंगा चाहे वह जिस जाति या धर्म की हो।’ ऐसा कहो, फिर उस पर अमल करो और अपनी उस विजातीय या विधर्मी पत्नी को लेकर अपने बाप-दादा के घर जाओ। यदि घरवाले उसे स्वीकार न करें तो अपना घर-परिवार छोड़ दो।
जिस दिन तुम यह सब करोगे, उस दिन तुम्हारे सर से तुम्हारे पूर्वजों के पाप का बोझ ख़त्म होगा। वरना तुम्हारी हर सांस उन दलितों और वंचितों की ऋणी है। ख़ैर मनाओ कि वे अपने हिस्से की कुछ सीटें और सरकारी नौकरियां ही मांग रहे हैं। अगर उनके और उनके पूर्वजों के ख़ून, पसीने और आंसुओं का हिसाब करने बैठोगे तो तुम्हारे रक्त की एक-एक बूंद, तुम्हारे घर की एक-एक ईंट और तुम्हारे बैंक में पड़ा एक-एक रुपया उनके हिस्से में चला जाएगा

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