Sunday, February 21, 2016

इंसान बचाओ मोदी जी, तब देश बचेगा...

आज सुबह ही फॉग का एक एडवरटाइज़मेंट (पाकिस्तान का सैनिक भारतीय सैनिक से कहता है कि भाई भारत में क्या चल रहा है, तो भारतीय सैनिक कहता है, "बस फॉग चल रहा है") देखा, उसके बाद सोचा मैने कि सच में हिन्दुस्तान में चल क्या रहा है? पूरा देश अस्त व्यस्त पड़ा है। कोई दाएं भाग रहा है, कोई बाएं और सीधे चलने वालों का दिमाग चकरा रहा है। राष्ट्रवादी बनाम राष्ट्रविरोधी।
ऐसे में एक "तथाकथित" अच्छी खबर आ गई। 250 रुपये में स्मार्ट फोन और 180 रुपये किलो दाल। चल क्या रहा है समझ में नहीं आ रहा है। हिन्दुस्तान की बर्बादी के नारे कुछ लोग  लगाकर चले गए पुलिस अबतक नहीं पकड़ पाई है और यहां अपने ही लोगों पर पटियाला कोर्ट में लात घूंसे चल रहे हैं। न जिरह न अदालत, सीधे फैसला। नेता, ऐंकर, वकील सब जज बने हुए हैं। खुद ही फैसला करे दे रहे हैं कि कौन देशद्रोही और कौन देशभक्त। देशभक्ति का जज्बा ऐसा कि बस गदर के सनी देओल की तरह हैंडपम्प ही नहीं उखाड़ा। जज साहब हैरान हैं, देश परेशान है। हरियाणा जल रहा है, यूपी और दिल्ली भी उसकी की लपटों में झुलस रहा है। गुजरात में एक आंदोलनकारी हार्दिक पटेल जेल में बीमार पड़े हैं। रोहित के हत्यारे बाहर हैं। कन्हैया जेल में संघर्ष कर रहा है। युवाओं को इससे अधिक और क्या सहन करना पड़ेगा। हर तरफ सवाल है कि भाई यह हो क्या रहा है? और इस झुंझलाहट के बीच याद आ रही हैं (अभी नवभारत टाइम्स के किसी ब्लॉग में पढ़ी थी....) पीयूष मिश्रा की कुछ लाइनें-
"इस मुल्क ने हर शख्स जो काम था सौंपा
उस शख्स ने उस काम की माचिस जला के छोड़ दी।"
आज का हिन्दुस्तान बारूद के ढेर पर बैठा है, लेकिन जिसे देखो माचिस लेकर घूम रहा है। सोसल मीडिया, देश के लिए सुसाइड मीडिया बनता जा रहा है। जिसका (विश्वविद्यालयों का) काम पढ़ाना है वो राजनीति कर रहे हैं, जिसका (इलेक्ट्रानिक मीडिया का) काम सच दिखाना है वो बिना जाँच के कुछ भी झूंठ दिखा रहा है। जिसका (नेता का) काम राजनीति करना है वो दिखाई नहीं दे रहा है। पता ही नहीं चलता कि देश के पीएम हैं या विदेश के? यह सब राष्ट्रभक्ति असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए है। सच तो यह है दोस्तों कि जिस दिन ज़मीनी मुद्दों पर बहस होने लगी उस दिन पॉल खुल जाएगी इन लोगों की। ऐसा भी नहीं है क़ि देश में कोई बात नहीं करता है इन मुद्दों पर। यह बहसें इंटलैक्चुअल्स के बीच नहीं, गरीब आबादी में हैं। पेट्रोल 110 डॉलर प्रति बैरल से उतरकर 25 डालर तक पहुंच गया पर उतना सस्ता नहीं हुआ। मेरे ओफिस में कुछ लड़कियाँ 2-3 घंटे के सफ़र लोकल ट्रेन से करके आती हैं, उनके ट्रेन के सेडयूल बिना किसी तैयारी के ऐसे बदल दिए जाते हैं, कि हालत खराब है। बड़ी देर रात घर पहुँच पाती होंगी। वो कहती हैं कि किराया बढ़ता जा रहा है, कोई भी सुविधा नहीं है। खचाखच भरकर हर ट्रेन जाती है फिर भी रेलवे घाटे में कैसे? कहीं बस या ट्रेन में देखो महिलाएँ जो किचन संभालती हैं वो मोदीजी को ना जाने कैसे कैसे शब्दों के साथ गाली देती हैं। दाल महीनें में सिर्फ़ 3 दिन बनती है, सब्जी के भाव आसमान में हैं। युवाओं की नौकरी स्थिर नहीं है। छात्रों की स्कॉलरसिप बंद हो गई है। क़ानून व्यवस्था कहीं भी सही नहीं है, कल को फिर से मुंबई में भगवान न करे अगर कोई देश का दुश्मन आकर कुछ हमला कर दे तो एक भी तैयारी नहीं होती है पहले से। सब भगवान भरोसे है हमारा काम हक़ीकत बोलना है, भक्तों का काम गाली देना है। 
फिर भी हम गाली सुनकर प्यार से उनके वादे याद दिलाते रहेंगे..... 
दुष्यंत की एक लाइन है,
"कहाँ तो तय था चराग़ हर एक घर के लिए,
कहाँ तो मयस्सर नहीं सारे शहर के लिए......




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