आदरणीय,
श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जी,
राजनीतिक और वैचारिक असहमति के बावजूद मैं आपका निजी जीवन में बहुत सम्मान करता हूं। मैं ब्लाग के द्वारा तीसरा पत्र आपको लिख रहा हूँ। क्योंकि आप 130 करोड जनता के प्रधानमंत्री हैं, मेरे भी हैं। इसलिए संवाद आवश्यक है। पत्र इसलिए क्योंकि यह तो हमारी संस्कृति है। देश में पिछले दिनों कई तरह की वारदातें हुईं। जो आपको टीवी, अखबार, आईबी आदि से अलग अलग तरह देखने को मिली होगी। मैं यह भी मानता हूँ कि इतने बड़े देश में अनेक तरह की घटनाएं घटती रहेंगी। इसलिए कुछ प्रमुख घटनाओं का जिक्र करते हुए शुरुआत करता हूं। पिछले दिनों जेजेएनयू में जो हुआ और उसके बाद दिल्ली और फिर देश के अन्य हिस्सों में जो हो रहा है, वह सब बेहद गंभीर है और मैं चाहूंगा कि पूरे मुद्दे पर पहले आप स्वयं गंभीरता से चिंतन करें।
भारत केवल भौगोलिक भारत ही नहीं है। एक सांस्कृतिक भारत भी है हमारे पास। रवींद्रनाथ टैगोर के अनुसार 'भारत एक विचार है न कि एक भौगोलिक सीमा।’ इस भारत की रचना शासकों ने नहीं कवियों, दार्शनिकों, संतों और सच पूछें तो प्रकृति ने स्वयं की है। यह भारत हजारों साल में बना है। यह जो भारत शब्द है भरत से बना है, दुष्यंत और शकुंतला के प्यार-परिणय से उद्भूत भरत, जिनका जन्म और पालन किसी राजमहल में नहीं एक ऋषि के आश्रम(जंगल) में हुआ। जहां आज आपकी सरकार सामाजिक कारणों से उपजे मावोवादियों के खिलाफ ग्रीनहंट कर रही है। वेद व्यास ने एक महाकाव्य लिखा महाभारत जो हमारी सबसे बड़ी सांस्कृतिक धरोहर है। अब इस भारत-महाभारत को कुछ सालों पहले कुछ लोगों ने भारत माता बना दिया। अब तो भारत माता की परिभाषा भी तय कर दी गई है। जिसमें देश के गरीब लोगों की माता को माता नहीं मानते हैं। यही कन्हैया अपने उस तथाकथित देशद्रोही भाषण में कह रहा था।
जबकि कवियों की व्याख्यानुसार भारत माता पनघट से पानी लाती तो कभी मजदूरी करती है। यदि किसी ग्रामीण से पूछा जाता तो उसके अनुसार बकरी चराती भारत माता होतीं। हमारे देश में अनुशासन के लिए बाबा साहेब अम्बेडकर ने संविधान दिया। हमने 26 जनवरी 1950 को इसे स्वीकार किया। जिसे आज हमारी आत्मा और धर्मग्रंथ तक कहा जाता है। हमारा संविधान समानता, भाईचारा और स्वतंत्रता के वो अधिकार देता है जिसके सपने गांधी और भगत सिंह ने देखे थे। कुछ लोगों ने इससे खिलवाड़ करने की भी कोशिश की, जैसे 1975 में इमरजेंसी, लेकिन उन्हें भी आखिर झुकना पड़ा। अर्थात आज जो भारत है वह इस संविधान की पीठ पर है, किसी इंसान, संगठन या धर्म के नहीं।
प्रधानमंत्री जी, लेकिन इस भारत भक्ति को कुछ लोंगो ने खिलवाड़ बना दिया है। न वह संस्कृति को समझते हैं और न राजनीति को। यह वही लोग हैं जो सदियों से चली आ रही असमानता के जन्मदाता हैं। गुलामी करवाई है गरीबों से विभिन्न प्रकार से। जबकि वर्तमान में संविधान ने इनके हाथ बांध दिये तब ये नये तरीके ढूंढ रहे हैं। इसलिए देशभक्ति का प्रमाण पत्र बांट रहे हैं। ये लोग संविधान की जगह मनुस्मृति और शरीयत कानूनों पर यकीन करते हैं। इनकी देशभक्ति भारत पाकिस्तान के मैच में समाप्त हो जाती है।
इस सदी में हमें आगे बढऩा है तो विज्ञान द्वारा उपलब्ध कराये गए ज्ञान और सोच का ही सहारा लेना पड़ेगा। आप खुद ऐसा महसूस करते हैं तभी तो डिजिटल इंडिया चालू किया है। अगर हम पिछड़ गए तो फिर कहीं के नहीं रहेंगेे। जापान और चीन हमसे 200 साल आगे होगा। हम क्यों खुद में परेशान पाकिस्तान और अरब देशों से अपनी तुलना करते हैं। हमारे देश के निर्माण में एक तरफ तिलक, गांधी और सुभाष, भगत सिंह की कोशिशें थीं तो दूसरी ओर ज्योतिबा फुले, रानाडे, आंबेडकर जैसे लोग सक्रिय थे। जवाहरलाल नेहरू ने सच्चे राष्ट्रनायक की तरह नये भारत की रूप-रेखा बनाई और उसमें प्रतिगामी सोच के लिए कोई जगह नहीं रखी। नये भारत के निर्माण के लिए उन्होंने साधू-संन्यासियों की जगह वैज्ञानिकों, मजदूरों और किसानों का आह्वान किया। देश में वैज्ञानिक चेतना विकसित करने पर जोर दिया।
लेकिन प्रधानमंत्री जी, अप्रत्यक्ष रूप से सरकार की कमान संभालने वाले कुछ संगठन राष्ट्रवाद की इस धारा की बात नहीं करते। उनका राष्ट्रवाद गोडसे, सावरकर और गोलवलकर का रहा है जो हमेशा विवादों में रहा है। प्रधानमंत्री जी, जहां तक मैंने समझा है केवल वर्चस्व प्राप्त तबकों का ही इतिहास नही होता केवल उन्हीं की पौराणिकता, केवल उनहीं की संस्कृति नहीं होती।
9 फरवरी, 2016 की घटना थी। यदि किसी छात्र ने देश विरोधी नारे लगाये हैं तो यह गलत है। इसके लिए कारवाई करना चाहिए। लेकिन किसी विषय पर चर्चा मात्र से हमें घबराने की जरूरत नहीं है। यूनिवर्सिटी इसी के लिए तो बनते हैं। वहां अनेक देशों के लोग पढ़ते हैं। हमें भी अपनी यूनिवर्सिटियों को इतनी आजादी देनी चाहिए कि वहां लोग मुक्त मन से विचार कर सकें। विश्वविद्यालय में जो विश्व शब्द है उस पर ध्यान दीजिये। शिक्षामंत्री उसे संघ का शिशुमंदिर बनाना चाहती हैं? यूनिवर्सिटियां मानव जाति पर समग्रता से विचार करती हैं, विदेशों में हमारे छात्र पढ़ते हैं तो अपने भारत की बात नहीं करते हैं?
कश्मीर की समस्या पूरे भारत की समस्या से कुछ अलग और जटिल है। आपने वहां उस पी.डी.पी. के साथ सरकार बनाई, जो अफजल को शहीद मानता है। आपका कदम सही है। सरकार बनाकर आपने संवाद बनाने की कोशिश की है। संवाद बनाकर ही बातें आगे बढ़ती है, बढऩी चाहिए यही तरीका है। पाकिस्तान की बार-बार की हरकतों के बावजूद हम उससे संवाद बनाने की कोशिश करते हैं कश्मीर तो अपना है। मैं समझता हूं कि कश्मीर के मसले को आप मुझसे बेहतर समझते हैं क्योंकि मेरी जानकारी के अनुसार आप कुछ समय तक वहां रहे हैं। कश्मीर की समस्या थोड़ा पेचीदा है, वह ब्रिटिश भारत का हिस्सा नहीं था, अलग रियासत था। वह एक खास परिस्थिति में भारत से जुड़ा, जो स्वाभाविक था। इस तरह उसकी स्थिति कुछ वैसी है जैसा किसी परिवार में गोद लिए बच्चे की होती है इसलिए हमारे संविधान में वहां के लिए एक विशेष धारा (370) है। ऐसी धाराओं का सम्मान होना चाहिए। ऐसी ही धाराओं की बदौलत भविष्य में कभी अन्य देश भी भारतीय संघ में जुड़ सकते हैं। इसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल भी हो सकता है।
तो प्रिय प्रधानमंत्री जी, नाराज नागरिकों, खासकर युवाओं से संवाद विकसित करना चाहिए, तकरार नहीं। दंड देकर, जबर्दस्ती देशभक्ति नहीं थोपी जा सकती। मुझे उन नाराज नौजवानों से अधिक खतरा आपके उन भक्तों से है जो राष्ट्रवाद का झंडा लेकर देश को लूट रहे हैं। हरियाणा में यही हुआ।
कभी आपने अपने मित्र बड़े अंबानी से नहीं पूछा कि भाई जिस देश में किसान, छोटे-छोटे कर्जा को लेकर आत्महत्या कर रहे हैं, वहां तुम करोडो की वीकेंड पार्टी क्यों करते हो? आपने पूंजीपतियों के लिए लाखों करोड़ के कर्ज माफी की घोसना की है लेकिन भारत के किसानों-मजदूरों की चिंता आपको नहीं है। हैदराबाद वि.वि. का एक होनहार छात्र रोहित वेमुला आत्महत्या करने पर मजबूर हुआ। आपको इसपर रोना भी आया। आपको समझ सकता हू। आप ही के शब्दों में आप निनिचली जाति के हो, बचपन में चाय बेचने वाले, दूसरों के घर मजदूरी करने वाली महान मां के बेटे। आप पर कुछ भरोसा तो है मुझे। आपसे संवाद करने से बात बन सकती है। इस लिए मोदी जी उठो, जागो और गरीबों से न्याय करो।
धन्यवाद!
सादर
आपका शुभेच्छुक:
कमलेश कुमार राठोड
(कृषकपुत्र, युवा, राष्ट्रभक्त विधि, सोध छात्र)
No comments:
Post a Comment