करोड़ो रुपए के वोट का चुनाव ख़त्म हो गया है। मुबारक हो लोकतंत्र...........हम जिन नेताओं को अपना प्रतिनिधि बनाकर विधान सभा भेजते हैं, वो हमारे बदले वोट डालते हैं राज्यसभा के चुनावों में। और हमारे वोटों के बदले 100-200-500 करोड़ लेते हैं। वो नेता कभी भी जनता के बीच में जाते ही नहीं हैं। और ना ही जनता का आभार मानते हैं, चुनकर सदन में भेजने के लिए। वो केवल उस दल के आभारी होते हैं, जो उनको टिकट देता है 10-20 करोड़ में। क्या हम ऐसे ईमानदार नेता नहीं भेज सकते हैं जो सदन में जाकर कम से कम सही राजनीति करें। अपराधी, गुंडे या भ्रष्टाचारी को ना चुने। ऐसे लोगों को वोट दें जो ईमानदार हो और खुद आपका प्रतिनिधि बनकर वोट डालने के समय बिके ना। ऐसा तभी संभव है जब हम पार्टी, या एक ख़ास नेता के चेहरे पर ना जाकर वहाँ से लड़ रहे नेता को देखकर वोट देंगे। केजरीवाल ईमानदार हैं, तो क्या हम अपनी विधानसभा से उनके किसी भी प्रत्याशी को वोट दे देंगे। हो सकता है, भाजपा या कांग्रेस या निर्दलीय उम्मीदवार ज़्यादा ईमानदार हो। उसे चुनकर भेजें। ये सोँचकर वोट दिया जाना चाहिए कि हम मोदी जी को नहीं 400 सांसद या विधायक भेज रहे हैं सदन में, जो हमारा प्रतिनिधित्व करेंगे। नहीं तो बड़ी सुविधा का काम है नोटा का प्रयोग। क़ानूनी रूप से भी इस प्रक्रिया में सबसे ज़्यादा मैं इस बात से हैरान हूँ कि जब नेता क्रॉस वोटिंग करते हैं तो उनपर दल बदल क़ानून क्यों नहीं लागू होता है? कल ही हरियाणा में एक महत्वपूर्ण घटना हुई। राज्यसभा के इनेलो समर्थित उम्मीदवार आरके आनंद चुनाव हार गए और उनकी इस हार में हरियाणा के कांग्रेसी विधायकों की बड़ी भूमिका रही। कांग्रेस के 17 में से 14 विधायकों का वोट गिनने लायक नहीं माना गया। और तो और पूर्व मुख्यमंत्री और 10 जनपथ के क़रीबियों में गिने जाने वाले भूपिन्दर सिंह हुडा ने तो अपना बैलेट खाली ही छोड़ दिया। मीटिंग में कांग्रेस की परंपरा के मुताबिक़ ये फैसला लिया गया कि फ़ैसला कांग्रेस आलाकमान पर छोड़ते हैं। फिर संदेश दिया गया कि कांग्रेस आरके आनंद के साथ जाएगी। लेकिन वहीं कांग्रेस के कद्दावर नेता और राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके भूपिंदर सिंह हुडा की सुभाष चंद्रा से हमेशा से छनती रही। कहते हैं कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। हुड्डा की नवीन जिंदल से नहीं बनती और नवीन जिंदल की सुभाष चंद्रा के दुश्मनी। तो ऐसे में दोस्ती का एक और सिरा जुड़ता है। यही कारण रहा कि सुभाष चंद्रा जीत गए और कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी हार गए। राज्यसभा की 11 सीटों पर हुए चुनाव में 12 प्रत्याशी मैदान में थे। हर प्रत्याशी को जीत के लिए प्रथम वरीयता के 34 वोटों की जरूरत थी। राज्य विधानसभा के 403 सदस्यों में से सपा के 229, BSP के 80, बीजेपी के 41, कांग्रेस के 29, आरएलडी के आठ विधायक हैं। पीस पार्टी के चार, कौमी एकता दल के दो, एनसीपी का एक, इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल का एक, अपना दल का एक और तृणमूल कांग्रेस का एक विधायक है। छह विधायक निर्दलीय हैं। मतदान में क्रॉस वोटिंग हुई। सपा के सातवें उम्मीदवार को प्रथम वरीयता के नौ वोट कम पड़ रहे थे, हालांकि वह जीतने में सफल रहे। प्रथम दौर की मतगणना में सपा के केवल तीन प्रत्याशी ही जीत सके। बीएसपी ने अपने 12 अतिरिक्त वोट किसी को नहीं देने का फैसला किया, ताकि 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले किसी पार्टी के साथ होने का दाग उस पर नहीं लगे। बीएसपी के सतीश मिश्र को 39 और अशोक सिद्धार्थ को 42 मत मिले। निर्दलीय प्रीति के मैदान में उतरने से ही मतदान की जरूरत पड़ी। बीजेपी के 16, सपा के बागी और कुछ छोटे दलों के एवं निर्दलीय विधायक प्रीति के प्रस्तावक थे। प्रीति को प्रथम वरीयता के मात्र 18 वोट मिले और वह हार गईं। बस इसी अंदाज में हुई वोटिंग से पता चलता है कि किस तरह से पैसे का खेल चला है. जैसा कि पहले मैने बताया है कि इसको रोंकने की जिम्मदारी हम लोगों की ही है। इन नेताओं से ज़्यादा उम्मीद ना ही करें तो बेहतर है।
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