दिल्ली की 'आप' सरकार द्वारा 21 विधायकों की संसदीय सचिव पद पर नियुक्ति में कानूनी विवाद से देश के अन्य राज्यों में इन पदों के औचित्य पर बहस छिड़ गई है। सांसदों और विधायकों को वेतन भत्ते के अलावा संसदीय विशेषाधिकार भी मिलता है। विधायिका में कानून निर्माण के दौरान इन लोगों की तटस्थता और निष्पक्षता रहे इसलिए संविधान के अनुच्छेद 102 तथा 191 में यह प्रावधान किया गया कि सांसद और विधायक अन्य ‘लाभ का पद’ नहीं ले सकते। दिल्ली में मुख्यमंत्री के संसदीय सचिव के पद को 2006 के कानून द्वारा ‘लाभ के पद’ के दायरे से बाहर किया गया परंतु मंत्रियों के संसदीय सचिव ‘लाभ के पद’ के दायरे में ही बने रहे। संविधान के अनुच्छेद-239क के अनुसार अधिकतम 6 मंत्री बनाने के एक महीने बाद ही केजरीवाल को दबाव की वजह से 21 विधायकों को संसदीय सचिव पद पर नियुक्त करना पड़ा, जिसमें कानून की अनदेखी हुई। चुनाव आयोग ने आम आदमी पार्टी के 21 विधायकों को 14 जुलाई को अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया है। अगर चुनाव आयोग ने इन्हें दोषी पाया तो इनकी सदस्यता जा सकती है। राष्ट्रपति इस मामले में केंद्रीय मंत्रिपरिषद से राय नहीं लेते हैं। इस मामले में चुनाव आयोग ही अपनी रिपोर्ट भेज सकता है। संविधान की तमाम व्याख्याओं के अनुसार ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के मामले में कानूनी रूप से केंद्र सरकार या मंत्रिपरिषद का कोई रोल नहीं है। आम आदमी पार्टी ने एक कानून बनाकर राष्ट्रपति को भेजा था लेकिन राष्ट्रपति ने मंज़ूरी नहीं दी। अब यह मामला दिल्ली सरकार के ऊपर तलवार की तरह लटक रहा है। हम और आप जब भी किसी सांसद या विधायक को देखते हैं तो हमेशा उसे सत्ता पक्ष या विपक्ष के प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं। लेकिन लोकसभा या विधानसभा अपने सदस्यों को सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर नहीं देखती है। सदन की कल्पना इस पर आधारित है कि विधायक या सांसद उसके भीतर जनता की आवाज़ हैं। सदन में जो सदस्य मंत्री हैं सिर्फ उन्हें ही सरकार की आवाज़ या प्रतिनिधि माना जाता है। संविधान ने ऐसी कल्पना की है कि विधायक या सांसद सरकार के किसी भी प्रकार के प्रभाव में न आए। इसके लिए ज़रूरी है कि वो ऐसा पद स्वीकार न करे जहां से उसे वेतन आदि की सुविधा मिले, जिससे उससे सत्ता में हिस्सेदार होने का मौका मिले और जो सरकार के सीधे संरक्षण में आ जाए जिस पर सरकार का बस चले। ऐसा इसलिए किया गया है कि सदन में विधायक या सांसद सिर्फ जनता की नुमाइंदगी करें। सरकार के पास अनेक पद होते हैं। वो हर पद में अपने सांसदों को बिठा सकती है, विधायकों को दे सकती है।
दिल्ली सरकार द्वारा मार्च 2015 में जारी अधिसूचना के अनुसार संसदीय सचिवों को कोई अतिरिक्त वेतन या भत्ता नहीं मिलेगा, जैसा कि अन्य राज्यों में होता है। विधायकों द्वारा चुनाव आयोग को दिए गए जवाब में यह कहा गया है कि उन्हें कोई लाभ, पूर्णकालिक कार, ड्राइवर नहीं मिलता और वे सरकारी कार्यों में कोई हस्तक्षेप भी नहीं कर सकते हैं। ऐसे में जब यह गैर क़ानूनी हो गया तो केजरीवाल सरकार ने बिना एलजी की राय के एक नया क़ानून बना डाला जो राष्ट्रपति ने नामंज़ूर कर दिया. आम आदमी पार्टी तो कांग्रेस संस्कृति के ख़िलाफ़ नई राजनीति करने आई थी। इतने विधायकों को संसदीय सचिव बनाने की क्या ज़रूरत था?2006 में शीला दीक्षित ने भी ऐसा किया था, जिसमें राष्ट्रपति कलाम ने एक बार बिल वापस किया, और फिर दोबारा भेजने पर मंज़ूरी दे दी थी. ध्यान रहे कि उस समय एक ही पार्टी की राज्य और केंद्र में सरकार थी. भले ही राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की राय से काम ना करता हो लेकिन वो सरकार के नियंत्रण में होता है इतना तो सबको पता ही है. पिछली सरकार में ममता बनर्जी ने 24 विधायकों को संसदीय सचिव बना दिया था। वे इसके लिए कानून भी लेकर आईं, लेकिन 2013 में एक जनहित याचिका दायर हुई। कलकत्ता हाईकोर्ट ने ममता बनर्जी के उस कानून को असंवैधानिक बताकर खारिज कर दिया और 24 विधायकों की नियुक्ति रद्द कर दी। लेकिन उनकी सदस्यता नहीं गई। जबकि ये विधायक संसदीय सचिव रह चुके थे। 2006 में छत्तीसगढ़ सरकार ने प्रिवेंशन ऑफ डिस्क्वालिफिकेशन अमेंडमेंट बिल लाकर 90 पदों को ऑफिस ऑफ प्रॉफिट से बाहर कर दिया। अब दिल्ली में हंगामा हुआ तो छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी ने मांग शुरू कर दी है कि जिन 11 संसदीय सचिवों को हटाया जाए जिसे बीजेपी सरकार ने नियुक्त किये हैं।
अब केजरीवाल यह दलील देकर भी अपने विधायकों को बचा सकते हैं कि उनकी संसदीय सचिव पद पर वैध नियुक्ति कभी हुई ही नहीं क्योंकि उसे उपराज्यपाल की मंजूरी नहीं मिली थी। पर इस कानूनी बचाव से उन्हें उपराज्यपाल की सर्वोच्चता के साथ अपनी गलती को स्वीकारना होगा जो राजनीतिक तौर पर उनके लिए घातक सिद्ध हो सकता है इसीलिए अन्य राज्यों में संसदीय सचिव पद के दुरुपयोग के मामलों को दिखाकर, केजरीवाल इस लड़ाई को राजनीति के अखाड़े में लड़ना चाह रहे हैं।
केजरीवाल ने पूर्ववर्ती कांग्रेस तथा भाजपा सरकारों द्वारा दिल्ली में संसदीय सचिव की परंपरा का ब्यौरा देते हुए अन्य राज्यों में बड़े पैमाने पर इन पदों की नियुक्ति पर सवाल खड़े किए हैं। भाजपा शासित हरियाणा और गुजरात में 4, राजस्थान में 5, अरुणाचल प्रदेश में 19 संसदीय सचिवों की नियुक्ति का ब्यौरा आया है जिनमें से अधिकांश को राज्यमंत्री का दर्जा तथा वेतन भी मिलता है। परंतु इन राज्यों ने संसदीय सचिव को लाभ के पद से बाहर रखने के लिए कानून पारित किए हैं जो दिल्ली में नियुक्ति के पहले नहीं हुआ।
दिल्ली के मामलों में राष्ट्रपति कोई भी फैसला गृह मंत्रालय और केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश पर करते हैं। अन्य राज्यों में संसदीय सचिवों पर कार्रवाई किए बगैर यदि दिल्ली के विधायकों को अयोग्य घोषित किया जाता है तो केजरीवाल उसका राजनीतिक लाभ पंजाब तथा गोवा के चुनावों में ले सकते हैं। इन राजनीतिक समीकरणों में उलझा संसदीय सचिव विवाद क्या अपने कानूनी अंजाम तक पहुंच पाएगा, आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा..।
दिल्ली सरकार द्वारा मार्च 2015 में जारी अधिसूचना के अनुसार संसदीय सचिवों को कोई अतिरिक्त वेतन या भत्ता नहीं मिलेगा, जैसा कि अन्य राज्यों में होता है। विधायकों द्वारा चुनाव आयोग को दिए गए जवाब में यह कहा गया है कि उन्हें कोई लाभ, पूर्णकालिक कार, ड्राइवर नहीं मिलता और वे सरकारी कार्यों में कोई हस्तक्षेप भी नहीं कर सकते हैं। ऐसे में जब यह गैर क़ानूनी हो गया तो केजरीवाल सरकार ने बिना एलजी की राय के एक नया क़ानून बना डाला जो राष्ट्रपति ने नामंज़ूर कर दिया. आम आदमी पार्टी तो कांग्रेस संस्कृति के ख़िलाफ़ नई राजनीति करने आई थी। इतने विधायकों को संसदीय सचिव बनाने की क्या ज़रूरत था?2006 में शीला दीक्षित ने भी ऐसा किया था, जिसमें राष्ट्रपति कलाम ने एक बार बिल वापस किया, और फिर दोबारा भेजने पर मंज़ूरी दे दी थी. ध्यान रहे कि उस समय एक ही पार्टी की राज्य और केंद्र में सरकार थी. भले ही राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की राय से काम ना करता हो लेकिन वो सरकार के नियंत्रण में होता है इतना तो सबको पता ही है. पिछली सरकार में ममता बनर्जी ने 24 विधायकों को संसदीय सचिव बना दिया था। वे इसके लिए कानून भी लेकर आईं, लेकिन 2013 में एक जनहित याचिका दायर हुई। कलकत्ता हाईकोर्ट ने ममता बनर्जी के उस कानून को असंवैधानिक बताकर खारिज कर दिया और 24 विधायकों की नियुक्ति रद्द कर दी। लेकिन उनकी सदस्यता नहीं गई। जबकि ये विधायक संसदीय सचिव रह चुके थे। 2006 में छत्तीसगढ़ सरकार ने प्रिवेंशन ऑफ डिस्क्वालिफिकेशन अमेंडमेंट बिल लाकर 90 पदों को ऑफिस ऑफ प्रॉफिट से बाहर कर दिया। अब दिल्ली में हंगामा हुआ तो छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी ने मांग शुरू कर दी है कि जिन 11 संसदीय सचिवों को हटाया जाए जिसे बीजेपी सरकार ने नियुक्त किये हैं।
अब केजरीवाल यह दलील देकर भी अपने विधायकों को बचा सकते हैं कि उनकी संसदीय सचिव पद पर वैध नियुक्ति कभी हुई ही नहीं क्योंकि उसे उपराज्यपाल की मंजूरी नहीं मिली थी। पर इस कानूनी बचाव से उन्हें उपराज्यपाल की सर्वोच्चता के साथ अपनी गलती को स्वीकारना होगा जो राजनीतिक तौर पर उनके लिए घातक सिद्ध हो सकता है इसीलिए अन्य राज्यों में संसदीय सचिव पद के दुरुपयोग के मामलों को दिखाकर, केजरीवाल इस लड़ाई को राजनीति के अखाड़े में लड़ना चाह रहे हैं।
केजरीवाल ने पूर्ववर्ती कांग्रेस तथा भाजपा सरकारों द्वारा दिल्ली में संसदीय सचिव की परंपरा का ब्यौरा देते हुए अन्य राज्यों में बड़े पैमाने पर इन पदों की नियुक्ति पर सवाल खड़े किए हैं। भाजपा शासित हरियाणा और गुजरात में 4, राजस्थान में 5, अरुणाचल प्रदेश में 19 संसदीय सचिवों की नियुक्ति का ब्यौरा आया है जिनमें से अधिकांश को राज्यमंत्री का दर्जा तथा वेतन भी मिलता है। परंतु इन राज्यों ने संसदीय सचिव को लाभ के पद से बाहर रखने के लिए कानून पारित किए हैं जो दिल्ली में नियुक्ति के पहले नहीं हुआ।
दिल्ली के मामलों में राष्ट्रपति कोई भी फैसला गृह मंत्रालय और केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश पर करते हैं। अन्य राज्यों में संसदीय सचिवों पर कार्रवाई किए बगैर यदि दिल्ली के विधायकों को अयोग्य घोषित किया जाता है तो केजरीवाल उसका राजनीतिक लाभ पंजाब तथा गोवा के चुनावों में ले सकते हैं। इन राजनीतिक समीकरणों में उलझा संसदीय सचिव विवाद क्या अपने कानूनी अंजाम तक पहुंच पाएगा, आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा..।
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