Sunday, June 5, 2016

मथुरा कांड की जिम्मेदारी किसकी?

दो दिन पहले की बात है, सभी न्यूज चैनल्स पर लगातार जमकर हाहाकार मचा हुआ था। मथुरा में हुआ सत्याग्रह के नाम पर आतंकवाद अंदर तक झकझोर देने वाला था।  सबके सब आंदोलनकारी पगलाए हुए थे। किसी अधिकारी पुलिस या सिपाही को समझ में नहीं आ रहा था कि आख़िर किया क्या जाए?  आख़िर इस हिंसा के लिए कौन जिम्मेदार है। यह सवाल शायद मन को कुरेदता रहेगा। अवैध  कब्जाने वाले इस कदर हिंसक हो गए कि एसपी सिटी को सीधे माथे पर गोली मार दी। मुकुल द्विवेदी के साथ एसओ संतोष यादव भी मारे गए। दो पुलिस वालों समेत 24 लोगों की जान चली गई, 23 पुलिस वाले ज़ख्मी भी हुए। प्रशासन और पुलिस इस बात से हैरान है कि उपद्रवियों के पास इतनी  भारी मात्रा में हथियार मौजूद निकला। डीजीपी के अनुसार पुलिस को पता था कि हथियार थे, लेकिन पता नहीं था कि इनका प्रयोग होगा। तो कैसे इस कदर हालात बेकाबू हो गए? मथुरा के जवाहरबाग इलाके में दो साल पहले जय गुरुदेव के समर्थकों ने डेरा जमा लिया। वे खुद को सत्याग्रही कहते थे। इन लोगों ने तीन दिन के लिए अनुमति मांगी थी प्रदर्शन के लिए लेकिन इनको हटाना नामुमकिन हो गया। जवाहर पार्क को मथुरा का दिल या फिर कहें सबसे ख़ास स्थान माना जाता है। ठीक कलेक्टरेट के पास डेरा जमाना आसान नहीं था, लेकिन 280 एकड़ के दायरे में जब भी पुलिस ज़मीन के इस अवैध कब्जे को हटाने की कोशिश करती तो हर बार महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों को सामने कर दिया जाता था। आठ बार इन्हें हटाने की कोशिशें हुईं। इस बार तो पुलिस कोर्ट के आर्डर के साथ तैयारी करके आई थी, लेकिन सब बेकाबू हो गया।
जवाहर पार्क में डेरा जमाए यह  लोग खुद को जय गुरुदेव के उपासक बताते हैं, जिनकी उनके अनुयाइयों में बहुत मान्यता है। मथुरा में मंदिर है। सन 2012 में उनकी मृत्यु हुई। जय गुरुदेव खुद को सुभाष चन्द्र बोस बताते रहे। जय गुरुदेव का जीवन राजनीति और अध्यात्म का मिश्रण बताया जाता है। उनकी मृत्यु के बाद रामवृक्ष यादव और पंकज यादव के बीच सत्ता संभालने पर खींचतान होने लगी। कहा जाता है कि रामवृक्ष को समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल यादव का संरक्षण मिल गया और इसी के बूते वह जवाहर बाग में आ जमा। मथुरा में हिंसा का अगुवा रामवृक्ष यादव बताया जा रहा है, जो एक हिंसक बाहुबली के तौर पर काम करता रहा है। वह यूपी के ही गाजीपुर का रहने वाला है और कई मामले उस पर दर्ज हैं। वह अब सुभाष चंद्र बोस के नाम पर स्वाधीन भारत सुभाष सेना चला रहा था। इस कैम्प में सशस्त्र ट्रेनिग भी दी जाती रही। मेरे गाँव में ही बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो जय गुरुदेव को अपना भगवान मानते हैं। अभी तक वो जिंदा हैं, कुछ साल बाद वापस आएँगे, सुभाषचन्द्र बोस जैसी कहाँिया कहते रहते हैं। अगर राजनीतिक समर्थन की बात करूँ तो हमेशा से ही समाजवादी पार्टी का समर्थन रहा है इनको। जब जय गुरुदेव जिंदा थे तब भी हर बार चुनावों में बाकायदा पोस्टर्स में उनकी तस्वीरें और समर्थन के संदेश या नारे छपते थे। स्थानीय चुनावों में अभी भी जय गुरुदेव के समर्थक हमेशा मुलायम सिंह यादव के समर्थक रहे हैं। इसको आप मथुरा की स्थानीय  राजनीति से जोड़कर मत देखिए। 
हमारे सहयोगी रवीश रंजन ने कब्जे वाली जमीन का दौरा करके देखा कि किस तरह से यहां हजारों लोग बसे हुए प्रशासन द्वारा बिजली काटे जाने पर सोलार पैनन से ऊर्जा ली जाती थी। कूलर, गाड़ियां, ट्रैक्टर सब मौजूद थे। भंडारा चलता था, खाने-पीने की कमी नहीं थी। उत्तर प्रदेश के एडीजीपी दलजीत सिंह चौधरी के अनुसार यहां यूपी-बिहार,नेपाल के लोग बसे हुए हैं। 
विरोधी दलों बसपा और भाजपा ने सपा पर जबर्जस्त हमला किया है। यहा तक कि भाजपा ने तो समाजवादी पार्टी से 5 सवाल भी पुंछ डाले हैं। 
1- इस भूमाफिया को किसका राजनीतिक संरक्षण हासिल है?
2- सब कुछ जानते हुए भी उसकी गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई?
3- पुलिस की तैयारी क्यों नहीं थी? इंटेलिजेंस क्या कर रही थी?
4- प्रशासन को क्यों नहीं मालूम था कि बम-बारूद जमा हो रहे हैं?
5- अगर एसपी-एसएचओ को नहीं बचा सकते तो आम आदमी की हिफ़ाज़त कैसे?
समाजवादी पार्टी पर सवाल उठा रही बीजेपी खुद भी फंस रही है। मथुरा से उनकी सांसद हेमा मालीनी अपने संसदीय क्षेत्र की उथल-पुथल से दूर फिल्म शूटिंग की फोटो पोस्ट करती रहीं, लेकिन जब सवाल उठे तो वे संवेदना जताकर वहां पंहुची भीं। धरना देने का प्लान बनाया लेकिन गर्मी को देखते हुए रद्द कर दिया। इस मामले में राजनीतिक उठापटक इसलिए भी बहुत तेज हो रही है क्योंकि 2017 में उत्तरप्रदेश में चुनाव हैं। इसलिए समाजवादी पार्टी हमेशा की तरह अपने ओबीसी वॉटर्स, मिडल क्लास (ध्यान रहे क़ि यही वर्ग बाबा जय गुरुदेव के भक्तों का है) में अपनी पुरानी पैठ बनाए रखने की कोशिश की है। दूसरी तरह भाजपा ने 2014 में इसी तबके के सहारे 73 लोकसभा की सीटें जीती थी। तो उसको भी यह वोट नहीं छोड़ना है। तभी तो अबतक भाजपा सपा के खिलाफ बोल रही है, ना कि उन दंगाइयों के खिलाफ। कांग्रेस न्यूट्रल है यह तो समझ में आता है लेकिन इसमें सबसे प्रमुख बात यह है कि बसपा (मायावती) भी पुरी तरह से चुप्पी साधे हुए है। यह कैसे हो रहा है किसी को समझ में नहीं आ रहा है। लेकिन मेरा अनुमान यह है कि शायद मायावती का चुप रहना उनको राजनैतिक फायदेमंद नज़र आ रहा होगा। 

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