Friday, March 24, 2017

योगी जी के नाम खुला खत

आदरणीय योगी आदित्यनाथ जी महाराज,
आपको मूर्ख मंत्री साॅरी मुख्य मंत्री बनने पर बधाई। आपके कुछ कार्य मुझे बडे अच्छे लगे जैसे लाल बत्ती न लेना, कम से कम कोई बात तो केजरीवाल से सीखा आपने। फिर गैर कानूनी स्लॉटर हाउस बंद कर दिया, मैं तो आपसे उम्मीद करता हूँ कि इसके लाइसेंस रद्द कर दो। कानूनी या गैर कानूनी कैसे भी जानवरों की हत्या न हो। गुटखा और पालीथीन पहले से ही बंद था, लेकिन ठीक वैसे जैसे मुम्बई दिल्ली में बंद के बाद भी सब चलता है। आपने रिपीट ऑर्डर किया अच्छी बात है। 
अब सब जगह नारे लग रहे हैं,  
"यूपी में रहना है तो सिंगल-सिंगल कहना है।" कहीं ये आपका, पीएम का और आरएसएस का सिंगल होने का फ्रस्टेशन तो नहीं है कि न गर्लफ्रेंड रखेगें और न रखने देगे। पहले तो इसका नाम एंटी रोमियो नहीं रखो। क्योंकि रोमियो कोई सडकछाप आशिक नहीं था, उसका बडा इतिहास है। खैर क्या कहूँ इतिहास तो आप लोगों का कमजोर सब्जेक्ट है। मोदी जी की डिग्री में मैंने देखा कि वो हिस्ट्री में फेल कर गए थे। दूसरी बात आप बजरंग दल वाले काम पुलिस से करवा रहे हैं। फासिज्म की कौन सी नई परिभाषा है ये? जहाँ प्यार करना दुश्वार हो जाए। रही बात अपराध की तो आप यूपी, एमपी, छत्तीसगढ, राजस्थान के आकडे मिला लो। महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में यूपी प्रति लाख जनसंख्या के आधार पर सबसे कम है। मैं जानता हूँ कि मुंबई का 100 नंबर एक-एक घंटे तक कोई उठाता नहीं है लेकिन यूपी में 20-25 मिनट में पुलिस पहुंच जाती थी। ये विश्व के सबसे बेहतरीन पुलिस सिस्टम में सुधार के जैसे है। यूनाइटेड स्टेट की एक तीन सदस्यीय समिति ने इसकी तारीफ की थी।  यहाँ संख्या इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि सब केश दर्ज अधिक होते थे। बाकी जगह तो बिना दर्ज किए ही लोग भगा दिए जाते हैं पुलिस स्टेशन से। यहां क्योंकि पुलिस के 100 नंबर पर काॅल सेंटर के जैसे प्रोफेशनल बैठते थे तो कोई डरता नहीं था फोन करने पर और आसानी से शिकायत दर्ज कराई जाती थी। लेकिन आपने आते ही नायक फिल्म का अनिल कपूर बनने के चक्कर में सब बदलना शुरू कर दिया। जिससे कानून व्यवस्था और उलझ गई है। लेकिन क्या करें यूपी में तो लोग राष्ट्रवाद और हिन्दू मुस्लिम मंदिर मस्जिद के चक्कर में पागल थे। उनको नहीं दिखा कि पहले तो आपके राष्ट्रीय अध्यक्ष (अमित शाह) जिनपर आधा दर्जन से अधिक केश और जिनको गुजरात हाईकोर्ट ने तडीपार किया, और आज भी जमानत पर हैं। फिर आपके प्रदेश अध्यक्ष (केशव प्रसाद मौर्या) जिनपर दर्जन भर केश हैं। फिर आप खुद जिस पर 17-18 केश हैं। जिन जिन गुंडों को सपा से अखिलेश ने बाहर किया वो सब आपके यहाँ आकर एमएलए बन गए। ऐसे कैसे आप अपराध खत्म करेंगे? ये तो वैसे ही हुआ कि विजय माल्या नोटबंदी का सपोर्ट करने लगे। लेकिन ये यूपी की जनता नासमझ है उसे अपने छोटे भाई बिहार से सीखने की जरूरत थी। यहाँ सब मंदिर मस्जिद के नशे में डूबे हुए थे, जबकि 80% घरों में शौचालय नही है, पेट में रोटी नहीं है लेकिन राम मंदिर चाहिए। लोगों को भडकाना बडा आसान है। आपकी सोच ही अराजकतावादी है। आप कहते हैं कोई एक मारे तो तुम सौ मारो। क्यों भाई कानून है आप कौन हो मारने वाले? उसे कानून से सजा दिलाओ। एक के बदले सौ? अरे एक गलत था बाकी 99 की क्या गलती? आप कहते हैं कि वो तुम्हारी एक लडकी से शादी करें तुम सौ लडकियां उनके घर से उठा लाओ। क्यों भाई? कानून संविधान सब तेल लेने गया क्या? ऐसे तो कल जो ताकतवर होगा कोर्ट न जाकर खुद ही फैसला कर लेगा। महिलाओं की रक्षा करने चले? आपके महिलाओं के खिलाफ जो बयान हैं वो ट्रम्प को भी पीछे छोड देते हैं। एक पुराने वीडियो में आपका समर्थक कहता है कि मुस्लिम औरतों को कब्र से खोदकर रेप करो। और आप मंच पर सामने बैठे हुए ताली बजाते हैं। आप खुद कहते हैं कि हर लडकी एक जिंदा बम है, उसे घर में ही कैद करके रखो नही तो बाहर जाएगी तो समाज की इज्जत खराब करेगी। पता नहीं कौन सा चश्मा लगा है आपको? ये सती प्रथा आप जैसे लोगों की ही देन होगा। आप कहते हैं कि औरतों को कोई अधिकार नहीं है कि वो पुरुषों की बराबरी करें। ऐसी घटिया मानसिकता वाले मूर्ख मंत्री साॅरी मुख्य मंत्री पर कैसे हम महिलाओं की रक्षा का भरोसा कर लें। आप तो फतवे वालों के जैसे लडकियों के जींस पहनने पर भी रोक लगाने की सोच रखते हैं। आप कहते हैं कि हर हिंदू को 4-5 बच्चे पैदा करना चाहिए और जो ऐसा करे उसे सब्सिडी मिले। क्या क्या गिनाऊं विकीपीडिया और गूगल भरा हुआ है आपके कारनामों से। मुझे पता है कि विश्व में हर जगह चरमपंथी  ऐसे ही सुरक्षा के बहाने देकर महिलाओं को कैद करते हैं, तालिबान उदाहरण है। आपको क्या पता एक स्त्री के बारे में? वो हमारी आधी आबादी है इसलिये उनको खुद की रक्षा करने लायक बनने दो। पूरा इतिहास पढा है मैंने जहाँ ट्रम्प से लेकर हिटलर, नीरो और मुसोलिनी इसी तरह एंट्री करते रहे हैं। आप भी ट्रम्प के बडे फैन हैं सुना है मैंने। वहाँ एच1 वीजा पर रोक लगी है जिससे आईटी सेक्टर में रोजगार के लिए अफरातफरी मच गई है। जो अमेरिकी लोग ग्लोबलाइजेशन के मसीहा थे वो आज ये कर रहे हैं। असल में कुछ जगह युरोप, अमेरिका, अरब सहित पूरे विश्व में एक अल्ट्रा राइट आइडियोलाॅजी की राजनीति की तरफ लोग भ्रमित हो रहे हैं। कुछ एनआरआई और हमारे साफ्टवेयर इंजीनियर मित्र इस वीजा वाले फैसले से नाराज हैं। लेकिन क्यों?  राज ठाकरे भी तो यही कहता है। फिर आप (योगी) भी तो वही भाषा बोलते हैं? तो हम सिलेक्टिव क्यों होते हैं, ट्रम्प, योगी और ठाकरे सबका विरोध करने की जरूरत है। यूपी में आजकल कुछ पोस्टर लगे हैं आपके समर्थकों के जो ट्रम्प की तरह यूपी से मुसलमानों को निकालने की बात लिखते हैं। अरे मुसलमानों ने देश की आजादी में कुरबानी दी है और जब उनको पाकिस्तान जाने को कहा गया तो वो नहीं गए। और दूसरी तरफ आपके आरएसएस का इतिहास लिखा पडा जो अंग्रेज सरकार के लिए जासूसी करते थे। रही बात आतंकवाद की तो जो दोषी हैं उन्हें कडी से कडी सजा दो। चाहे मुसलमान हो या एमपी में पकडे गए सात हिंदू लडके जो बीजेपी और आरएसएस से जुडे थे और आईएसआई के एजेंट थे। इसलिए ये सब छोडकर विकास पर ध्यान दो। यूएन की तीन रिपोर्ट अभी हाल ही में आई है, 1: वर्ड हंगर इंडेक्स जिसमें भारत 98 नंबर पर है। 2: वर्ड ह्यूमन रिसोर्स रिपोर्ट जिसमें भारत 112 नंबर पर है। 3: वर्ड हैप्पीनेस कंट्री जिसमें भारत 120 देशों से बाहर है। मतलब हमसे आगे तो बांग्लादेश और नेपाल हैं। बस पाकिस्तान दो तीन स्थान पीछे है। इस बात खुश होना चाहिए कि हम पाकिस्तान से आगे हैं। पता नहीं अगर पाकिस्तान न होता तो हमारी देशभक्ति का क्या होता? पता है लिस्ट में नंबर वन कौन है? नीदरलैंड। जहाँ इसबार चुनाव में ऐसी पार्टी बुरी तरह हार गई जो मुस्लिम और बाहरी लोगों का विरोध करती थी। एक ऐसी पार्टी "ग्रीन लेफ्ट" जीती जो सब छोडकर पर्यावरण संरक्षण की बात कर रही थी।
11 तारीख से मैंने तो राजनीति छोड ही दी थी, लेकिन आज भगत सिंह के शहीद दिवस पर उनको पढकर और एक प्रोग्राम में लेक्चर सुनकर चुप नहीं रहा गया और आपको पत्र लिख बैठा। वैसे पत्र तो राष्ट्रवादी है, "हिंदू"स्तान की विरासत है। और आप लोग तो ऐसे राष्ट्रवादी हैं जो रेलवे के इंग्लिश स्टाइल टायलेट में लोटा रखवा चुके हैं। इसलिए आप तो खुश होगे मुझपर। उम्मीद है आप आलोचना बर्दाश्त करके कुछ सुधार करेगें क्योंकि कबीर दास जी कहते हैं, 
"निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुधाय।"
मतलब अपने आसपास चमचों की फौज से बेहतर है कि क्रिटिकल लोगों को रखो। हाँ, आपके अच्छे कार्यों की हमेशा तारीफ करूंगा बस यूपी में ज्यादा दूध की गंगा जमना न बहा देना क्योंकि आप तो लाल नदियां बहाते हैं। वैसे भी आपका नाम तो अजमेर ब्लास्ट से जुडे लोगों के साथ भी एनआईए की जांच रिपोर्ट में आ चुका है। आप जैसे लोगों को यहाँ फ्रिंज एलिमेंट्स कहा जाता था, और उसमें भी जब आप ही सरकार में आ जाएं तो लोकतंत्र खतरे में आ ही जाता है। आप तो नेपाल तक जाकर डेमोक्रेसी के खिलाफ आंदोलन कर चुके हैं। अच्छा चलते चलते एक और सवाल पूछने का मन हो रहा है। ये बताइए कि उस दिन सीएम हाउस का शुद्धिकरण क्यों कराया था? शायद आप जिसे हिन्दुत्व कहते हैं वो ब्राह्मणवाद है, जो एक यादव के छोडे हुए घर में जाने के पहले शुद्धिकरण करवाया था। सोसल मीडिया पर बैठे बडे नकली अहिंसावादी लोग आपका खूब सपोर्ट करते हैं, मतलब वो यूपी को जलते हुए देखना चाहते हैं। जबकि खुद तो सुरक्षित बैठे हैं। बस अंत में एक रिक्वेस्ट है कि इस एंटी रोमियो स्क्वाड का नाम बदलकर एंटी कन्हैया दल कर दो तो थोडा सा हिंदू टाइप फील होगा। क्यों इसका नाम एक ईसाई के नाम पर रखा है? भारत में प्रेम के प्रतीक तो  श्रीकृष्ण जी ही हैं।

धन्यवाद ।
आपके उत्तर में आशावादी उत्तर प्रदेश का युवा जो नफरत नहीं प्यार की लडाई के साथ खडा है।

Sunday, March 19, 2017

उत्तर प्रदेश हिंदुत्व की नई प्रयोगशाला

गोरखनाथ मठ के महंत और उग्र हिंदू संगठन हिंदू युवा वाहिनी के संस्थापक योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाकर संघ परिवार ने गुजरात के बाद उत्तर प्रदेश को हिंदुत्व की दूसरी प्रयोगशाला बनाने की शुरुआत कर दी है. पर क्या उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी को मिली ज़बरदस्त चुनावी सफलता से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) हिंदू राष्ट्र के अपने मक़सद के एक क़दम और नज़दीक पहुँच गया है? इस सवाल का जवाब आसान नहीं है और न ही हिंदू राष्ट्र को एक राजनीतिक हक़ीक़त में बदलना आसान है. लेकिन नौ दशक पहले 1925 से शुरू हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यात्रा को देखें तो समझ में आएगा कि इस दौर में कई तरह के हिंदूवादी समाज-समितियां बनीं, फैलीं और फिर भुला दी गईं. पर आरएसएस अपनी राह से भटका नहीं है. संघ हमेशा बिना लाग लपेट के घोषित करता रहा है कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना उसका ध्येय है- ऐसा हिंदू राष्ट्र जिसमें हिंदू समाज की जातियां अपनी-अपनी नियत जगह बनी रहें पर राजनीतिक फ़ैसले करते समय ये विभाजन अप्रासंगिक हो जाए. यानी वर्णाश्रम धर्म व्यवस्था में बिना छेड़छाड़ किए संघ सभी हिंदू जातियों को 'समरसता' की छतरी के नीचे ले आना चाहता है. पर इसके लिए उसे बार-बार हिंदू समाज को बताना पड़ता है कि वो चारों ओर से दुश्मनों से घिरा हुआ है. इसके लिए कई बार नए-नए दुश्मन गढ़ने पड़ते हैं ताकि इस दुश्मन का भय दिखाकर हिंदू समाज को एकजुट किया जा सके. पर दुश्मन गढ़कर हिंदुओं को इकट्ठा करना संघ की व्यापक रणनीति का एक हिस्सा मात्र है- पूरी रणनीति नहीं. उत्तर प्रदेश के चुनावी समर में संघ-भाजपा की रणनीति का हर रंग नज़र आया था.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क़ब्रिस्तान-श्मशान का हवाला देकर हिंदू और मुसलमानों को अलग-अलग खड़ा किया, लेकिन साथ में ग़रीब बस्तियों में गैस सिलेंडर भी पहुँचाए और कामगार तबक़े तक ये संदेश पहुंचाने में भी कामयाब रहे कि नोटबंदी दरअसल 'अमीरों पर चोट' है. हालांकि लोकसभा चुनावों में बीजेपी को इससे भी ज़्यादा समर्थन मिला था पर तब उसे नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का असर माना गया था.  भारतीय जनता पार्टी ने एक भी मुसलमान को टिकट न देकर साफ़ संदेश दे दिया कि वो मुसलमानों के वोट की मोहताज नहीं है.
अगर किसी को बची खुची ग़लतफ़हमी रही भी तो गोरखनाथ मठ के महंत योगी आदित्यनाथ को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी और संघ ने इसी संदेश को साफ़-साफ़ और बड़े-बड़े अक्षरों में यूपी के आसमान पर लिख दिया है. इस फ़ैसले से ये भी स्पष्ट हो गया है कि गुजरात के बाद उत्तर प्रदेश हिंदुत्व की प्रयोगशाला बनने जा रहा है. एक मायने में गुजरात के मुक़ाबले उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व का प्रयोग ज़्यादा मुश्किल और ज़्यादा पेचीदा साबित होगा पर नरेंद्र मोदी ने जातीय विभाजन को बेकार साबित करके, क़ब्रिस्तान-श्मशान के ज़रिए हिंदू और मुसलमानों को एक-दूसरे के आमने-सामने खड़ा करके और राष्ट्रवादी-राष्ट्रद्रोही की बहस का इस्तेमाल करके इस प्रयोग की बुनियाद डाल दी है. अब मुख्यमंत्री के तौर पर इस प्रयोग को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी संघ परिवार ने योगी आदित्यनाथ को दी है. गुजरात में हिंदुत्व के प्रयोग और उसके सबक़ योगी के सामने हैं. विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 2002 में गोधरा कांड के बाद गुजरात में एक ऐसा उदाहरण पैदा किया जिसकी स्मृति मुसलमान कभी भुला नहीं सकेंगे. अब उत्तर प्रदेश के चार करोड़ मुसलमानों के सामने वो आदित्यनाथ हैं जिनके मुस्लिम विरोधी बयानों के कारण कई बार विवाद खड़े हुए हैं. मसलन, फ़रवरी 2015 में उन्होंने ऐलान किया कि मौक़ा मिलने पर वो "देश की सभी मस्जिदों में गौरी-गणेश की मूर्तियां स्थापित करवा देंगे." ऐसे आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने पर 'सेकुलरों' या मुसलमानों को एतराज़ है तो हुआ करे. अब संघ-बीजेपी को उनकी परवाह कहां है क्योंकि इस शब्द पर से भारतीयों का विश्वास उठाने की जो मुहिम बीस-पच्चीस साल पहले लालकृष्ण आडवाणी ने शुरू की थी उसका असर अब महसूस किया जाने लगा है. कई मध्यवर्गीय परिवारों में अब धर्मनिरपेक्षता को जनतंत्र का एक महत्वपूर्ण मूल्य नहीं बल्कि कांग्रेसियों और 'फ़ैशनेबल कम्युनिस्टों' का ढकोसला समझा जाने लगा है. पर यहां तक पहुंचने के लिए संघ और भारतीय जनता पार्टी ने ज़बरदस्त लचीलापन दिखाया.
उस दौर में जब महात्मा गाँधी पर हमला करने से पहले उनके कट्टर आलोचक भी दो बार सोचते थे और समाजवाद के ज़रिए बराबरी का सपना साकार करने की बात होती थी, उस दौर में अटल बिहारी वाजपेयी ने 'गांधीवादी समाजवाद' को भारतीय जनता पार्टी का उद्देश्य घोषित कर दिया था. किसी और राजनीतिक ताक़त की ओर से ऐसा लचीलापन दिखाने के उदाहरण कम ही मिलते हैं. भले ही अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर बनाने को बीजेपी ने चुनावी मुद्दा न बनाया हो पर बीजेपी नेताओं ने चुनाव प्रचार के दौरान इसे बार-बार कुरेदा ज़रूर था. बीजेपी के नेता और राज्यसभा सदस्य सुब्रह्मण्यम स्वामी ने बीबीसी से कहा भी था, "अगले दो साल में मैं राम जन्मभूमि मंदिर बनवा दूंगा." बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि का अकेला मुद्दा सीधे-सीधे हिंदुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा कर चुका है. अभी ये विवाद सुप्रीम कोर्ट में है और बीजेपी कहती रही है कि मामला अदालत के ज़रिए या आपसी सुलह-समझौते से निपटाया जाना चाहिए. पर अगले कुछ बरसों में इस विवाद को किसी न किसी नतीजे तक पहुंचाने की कोशिश की जाएगी और अगर अयोध्या में मंदिर बना तो योगी आदित्यनाथ की सरकार इसका विरोध करने वालों के प्रति कैसा रुख़ अपनाएगी अभी इसकी सिर्फ़ कल्पना ही की जा सकती है.सत्ता में भागीदारी से अलग कर दिए गए उत्तर प्रदेश के मुसलमानों में तब क्या इतनी इच्छा शक्ति बाक़ी रह जाएगी कि वो मज़बूती से अपना विरोध भी दर्ज करवा पाएं?
आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की इस नई प्रयोगशाला में कई प्रयोग किए जाने हैं. देखते रहिए.

Tuesday, March 14, 2017

सपा की हार की समीक्षा

कमियाँ और कारण  बहुत होंगे उनमें से एक प्रमुख कारण -
2012 में समाजवादी पार्टी ने पूरी सीटों पर चुनाव लड़ा था और 2.2 करोड़ वोट मिले थे जो कुल मतदान का लगभग 29 % था हर सीट पर औसतन 54000 वोट मिले थे और 224 सीट जीती थी. 2017 में समाजवादी पार्टी ने 311 सीट पर चुनाव लड़ा और 1.89 करोड़ वोट मिले जो कुल मतदान का 22 % है और गठबंधन के साथ जोड़कर 403 सीट पर 28 प्रतिशत से ज़्यादा है और हर सीट पर लगभग 60000 वोट मिले है और मात्र 47 +7 = 54सीट जीत पायी है. 
भाजपा गठबंधन को क़रीब 41 प्रतिशत और समाजवादी पार्टी गठबंधन को 28 प्रतिशत वोट मिले है इस चुनाव में भाजपा और सपा के बीच वोटों का जो क़रीब 13 प्रतिशत का अंतर है उसने क़रीब 4-5 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं का वोट बँटकर बसपा को मतदान  हुआ है 97 मुस्लिम प्रत्याशियों के वजह से और कुछ फ़तवा जारी करने वालों का भी इज़्ज़त सम्मान होगा और क़रीब 2 प्रतिशत निषाद वोट जो सपा के साथ रहता था वह और  क़रीब 3-4 प्रतिशत लोहार, प्रजापति, नाई ,पाल और प्रत्याशी की जाति का वोट जो सपा के साथ रहता था वह सपा संगठन के इन जतीयो के नेताओ के सक्रियता में कमी और भाजपा rss के यादववाद के झूठे प्रचार और बनाए हुए यादव विरोधी माहौल और चुनावी वादों के चलते भाजपा को गया इस बार वही अंतर पैदा हुआ है और विधानसभा वार सपा और भाजपा के बीच हार जीत का जो अन्तर है वो यही वोट है. और कुछ वोट मशीन में भी बना दिया होगा भाजपा वालों ने उसकी भी जाँच हो. 

Sunday, March 12, 2017

इन नतीजों का संदेश कुछ अलग भी है.


पांच राज्यों के चुनाव के नए सिरे से विश्लेषण होने लगे हैं. मुख्य मुद्दे तो पूरे चुनाव में ही गायब थे, सो, उस आधार पर हिसाब लगाना ही फिज़ूल है. फुटकर मुद्दे इतने सारे होते हैं कि इस विषय पर पीएचडी की ज़रूरत पड़ेगी. फिर भी मोटे तौर पर विश्लेषण करके कोई एक नतीजा निकालें, तो वह यह है कि वोटर ने क्षेत्रीय राजनीति को बिल्कुल नकार दिया. खासतौर पर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में दोनों बड़े दल सपा और बसपा लगभग नेस्तनाबूद हो गए. बाकी चार राज्यों में दोनों राष्ट्रीय दलों के बीच ही सीधी टक्कर दिखी. फिलहाल, यानी मतगणना के फौरन बाद, इस समय सिर्फ सरसरी नज़र डाल सकते हैं, सो, उसके मुताबिक अगर कांग्रेस उत्तराखंड में हार गई तो पंजाब उसी अंदाज़ में जीत भी गई. आलेख लिखने के समय तक कांग्रेस मणिपुर और गोवा में बीजेपी से काफी आगे है. इन नतीजों से कुल मिलाकर निष्कर्ष यही निकल रहा है कि देश फिलहाल दो-ध्रुवीय राजनीति के मूड में है और ये ध्रुव हैं बीजेपी और कांग्रेस.

प्रदेश में बसपा का सिर्फ 18 सीट पर सिमटना और बीजेपी का 325 सीटें पाना ही उल्लेखनीय है. आने वाले कुछ घंटों में जितने भी नए विश्लेषण होंगे, वे इसी को समझने और समझाने में लगे होंगे. लेकिन सपा की तबाही पर जो चर्चा हो रही होगी, उसमें यह नहीं देखा जा रहा होगा कि बीजेपी के नवोदय में सबसे ज्यादा नुकसान बसपा को हुआ है. यानी बीजेपी की जीत में सबसे बड़ा योगदान बसपा के नुकसान का है. अभी वोट प्रतिशत की आखिरी गणना तो नहीं हो पाई है, लेकिन इतना तो पता चल ही रहा है कि बीजेपी को जहां 40 फीसदी वोट मिलेंगे, वहां बसपा को सिर्फ 20 फीसदी और सपा-कांग्रेस गठबंधन को 27 फीसदी. यानी वोटों के लिहाज से सपा को उतना बड़ा नुकसान नहीं हुआ, जितना सीटों में दिख रहा है. इन तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि बीजेपी को सबसे बड़ा फायदा बसपा के घटाव से हुआ. मतगणना से एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि अगर सपा और कांग्रेस का गठजोड़ न होता तो सपा का वोट प्रतिशत भी घटा होता और उसकी यह स्थिति भी न दिख रही होती, जो इस समय दिख रही है. उल्लेखनीय है कि सपा का अपना वोट प्रतिशत बसपा के बराबर 20 फीसदी के आसपास ही दिख रहा है. लेकिन सीटों में तीन गुना का अंतर है. यह सांख्यिकीय स्थिति सपा में कांग्रेस के वोट जुड़ने से ही बनी है.
जो लोग गठबंधन को फिज़ूल साबित कर रहे थे, वे यही कह रहे थे कि दोनों की हालत इतनी पतली है कि गठबंधन से भी कुछ नहीं होगा. नतीजों के पहले यह किसी ने नहीं कहा था कि इसका नुकसान होगा. हां, सपा में ही अखिलेश-विरोधी खेमा ज़रूर कह रहा था कि कांग्रेस को 100 सीटें देने से सपा को घाटा हो रहा है. यानी उन 100 सीटों पर कांग्रेस तो जीत नहीं सकती और इन सीटों पर भी सपा लड़ती, तो कुछ सीटें और मिलतीं. इसके अलावा जिन सपा उम्मीदवारों के टिकट कटे, उनकी नाराज़गी न झेलनी पड़ती. लेकिन अब जब नतीजे हमारे सामने हैं, तो यह साफ हुआ है कि सपा की हालत पतली ही थी. और यह गठबंधन होने से सपा की 300 सीटों पर कांग्रेस के जो वोट जुड़े हैं, अगर वे न जुड़े होते, तो सपा की हालत भी बसपा की तरह दिखाई देती. सपा को अभी 20 फीसदी वोट मिले हैं. लगभग बसपा के बराबर. लेकिन उसकी सीटें बसपा से तीन गुना ज्यादा आई हैं. यह कांग्रेस के हिस्से के छह फीसदी वोट जुड़ने का असर है. इसमें कोई शक नहीं कि अपने 12 फीसदी वोट के सहारे अगर वह अकेले लड़ती, तो हो सकता है, उसे चार सीट से ही संतोष करना पड़ता. गठबंधन के कारण उसे डेढ़ गुना बड़ा आंकड़ा दिख रहा है. और वैसे भी कम से कम कांग्रेस के लिए यह चुनाव 2019 के लिए एक तैयारी या रिहर्सल से ज्यादा और कुछ नहीं था. यानी सपा-कांग्रेस गठबंधन की हार का कारण और कुछ भी हो सकता है, लेकिन गठबंधन वाला कारण बिल्कुल भी साबित नहीं होता.
क्या इसमें ज़रा भी शक है कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी नहीं, मोदी लड़ रहे थे. मोदी ही उत्तर प्रदेश के संगठन को बज़रिया अमित शाह संभाले थे. उत्तर प्रदेश बीजेपी की बजाय मोदी और केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी का ही दांव पर सबसे ज्यादा लगा था. यानी जिसका सबसे ज्यादा दांव पर लगा था, उसे ही जीता क्यों नहीं माना जाएगा. और अगर जीत का सेहरा खुद के चेहरे पर ही बांधा जाएगा तो आगे की ज़िम्मेदारी से भी वह भाग नहीं पाएगा. यानी उत्तर प्रदेश में मोदी के मन का मुख्यमंत्री और पूरी कैबिनेट भी उनके मन की ही बनेगी. इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश की बीजेपी सरकार का कामकाज और उसका भावी प्रदर्शन मोदी का ही प्रदर्शन माना जाएगा. इस तरह से मोदी के कंधे पर पहले से लदी ढेर सारी चुनौतियों में उत्तर प्रदेश की नई चुनौती और जुड़ गई है. सन 2019 में जब मोदी अपना रिपोर्ट कार्ड पेश कर रहे होंगे, उसमें उत्तर प्रदेश का एक बड़ा-सा कॉलम होगा.
पांच राज्यों के चुनाव बीजेपी के लिए कांग्रेसमुक्त भारत का सपना साकार करने का एक और मौका था, लेकिन ईमानदारी से और वस्तुनिष्ठ तरीके से विश्लेषण करके देखें तो जनता ने यह नारा बिल्कुल नहीं खरीदा. कांग्रेस उत्तराखंड हारी, तो उससे बड़ा प्रदेश पंजाब जीत गई. गोवा और मणिपुर में वह बीजेपी से आगे खड़ी दिखाई दे रही है. कांग्रेस के पक्ष में इस जनादेश को न देखना बड़ी बेईमानी होगी. यानी इन चुनावों को अगर 2019 से पहले के सेमीफाइनल की शक्ल में देखें, तो कांग्रेस का अपना प्रदर्शन पहले से बेहतर ही साबित होगा. कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सपा की जूनियर पार्टनर बनने को राजी ज़रूर हो गई थी, और इससे भविष्य के गठबंधनों में उसकी हैसियत कमतर होने के अंदेशे खड़े हो गए थे. लेकिन अब खुद क्षेत्रीय दलों की हैसियत जिस तरह मिटती दिख रही है, उस नई परिस्थिति में भविष्य के गठबंधन में एंकर बने रहने वाली कांग्रेस की हैसियत और ज़्यादा बढ़ गई है. उत्तर प्रदेश में बीजेपी की भारीभरकम जीत के माहौल में यह बात सुनने में अभी बेतुकी ज़रूर लग सकती है, लेकिन जब हम पहले से ही पांच राज्यों में चुनाव को 2019 का सेमीफाइनल मान रहे थे, तो आगे की बात, यानी 2019 में फाइनल की बात अभी से क्यों नहीं होनी चाहिए...?

Saturday, March 11, 2017

मायावती की हार के कारण

मायावती की यह आखिरी पारी थी, जिसमें उनकी शर्मनाक हार हुई है. 19 सीटों पर सिमट कर उन्होंने अपनी पार्टी का अस्तित्व तो बचा लिया है, परन्तु अब उनका खेल खत्म ही समझो. मायावती ने अपनी यह स्थिति अपने आप पैदा की है. मुसलमानों को सौ टिकट देकर एक तरह से उन्होंने भाजपा की झोली में ही सौ सीटें डाल दी थीं. रही-सही कसर उन्होंने चुनाव रैलियों में पूरी कर दी, जिनमें उनका सारा फोकस मुसलमानों को ही अपनी ओर मोड़ने में लगा  रहा था. उन्होंने जनहित के किसी मुद्दे पर कभी कोई फोकस नहीं किया. तीन बार मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वह आज तक जननेता नहीं बन सकीं. आज भी वह लिखा हुआ भाषण ही पढ़ती हैं. जनता से सीधे संवाद करने का जो जरूरी गुण एक नेता में होना चाहिए, वह उनमें नहीं है. हारने के बाद भी उन्होंने अपनी कमियां नहीं देखीं, बल्कि अपनी हार का ठीकरा वोटिंग मशीन पर फोड़ दिया. ऐसी नेता को क्या समझाया जाय! अगर वोटिंग मशीन पर उनके आरोप को मान भी लिया जाए, तो उनकी 19 सीटें कैसे आ गयीं, और सपा-कांग्रेस को 54 सीटें कैसे मिल गयीं? अपनी नाकामी का ठीकरा दूसरों पर फोड़ना आसान है, पर अपनी कमियों को पहिचानना उतना ही मुश्किल. 
अब इसे क्या कहा जाए कि वह केवल टिकट बांटने की रणनीति को ही सोशल इंजिनियरिंग कहती हैं. यह कितनी हास्यास्पद व्याख्या है सोशल इंजिनियरिंग की. उनके दिमाग से यह फितूर अभी तक नहीं निकला है कि 2007 के चुनाव में इसी सोशल इंजिनियरिंग ने उन्हें बहुमत दिलाया था. जबकि वास्तविकता यह थी कि उस समय कांग्रेस और भाजपा के हाशिए पर चले जाने के कारण सवर्ण वर्ग को सत्ता में आने के लिए किसी क्षेत्रीय दल के सहारे की जरूरत थी, और यह सहारा उसे बसपा में दिखाई दिया था. यह शुद्ध राजनीतिक अवसरवादिता थी, सोशल इंजिनियरिंग नहीं थी. अब जब भाजपा हाशिए से बाहर आ गयी है और 2014 में शानदार तरीके से उसकी केन्द्र में वापसी हो गयी है, तो सवर्ण वर्ग को किसी अन्य सहारे की जरूरत नहीं रह गयी, बल्कि कांग्रेस का सवर्ण वोट भी भाजपा में शामिल हो गया. लेकिन मायावती हैं कि अभी तक तथाकथित सोशल इंजिनियरिंग की ही गफलत में जी रही हैं, जबकि सच्चाई यह भी है कि मरणासन्न भाजपा को संजीवनी देने का काम भी मायावती ने ही किया था. उसी 2007 की सोशल इंजिनियरिंग की बसपा सरकार में भाजपा ने अपनी संभावनाओं का आधार मजबूत किया था.
मुझे तो यह विडम्बना ही लगती है कि जो बहुजन राजनीति कभी खड़ी ही नहीं हुई, कांशीराम और मायावती को उसका नायक बताया जाता है. केवल बहुजन नाम रख देने से बहुजन राजनीति नहीं हो जाती. उत्तर भारत में बहुजन आंदोलन और वैचारिकी का जो उद्भव और विकास साठ और सत्तर के दशक में हुआ था, उसे राजनीति में रिपब्लिकन पार्टी ने आगे बढ़ाया था. उससे कांग्रेस इतनी भयभीत हो गयी थी कि उसने अपनी शातिर चालों से उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए और वह खत्म हो गयी.  उसके बाद कांशीराम आये, जिन्होंने बहुजन के नाम पर जाति की राजनीति का माडल खड़ा किया. वह डा. आंबेडकर की उस चेतावनी को भूल गए कि जाति के आधार पर कोई भी निर्माण ज्यादा दिनों तक टिका नहीं रह सकता. बसपा की राजनीति कभी भी बहुजन की राजनीति नहीं रही. बहुजन की राजनीति के केन्द्र में शोषित समाज होता है, उसकी सामाजिक और आर्थिक नीतियां समाजवादी होती हैं, पर, मायावती ने अपने तीनों शासन काल में सार्वजानिक क्षेत्र की इकाइयों को बेचा और निजी इकाइयों को प्रोत्साहित किया. उत्पीडन के मुद्दों पर कभी कोई आन्दोलन नहीं चलाया, यहाँ तक कि रोहित वेमुला, कन्हैया कुमार और जिग्नेश कुमार के प्रकरण में भी पूरी उपेक्षा बरती, जबकि ये ऐसे मुद्दे थे, जो उत्तर प्रदेश में बहुजन वैचारिकी को मजबूत कर सकते थे. 
इन चुनावों में मायावती को मुसलमानों पर भरोसा था, पर मुसलमानों ने उन पर भरोसा नहीं किया, जिसका कारण भाजपा के साथ उनके तीन-तीन गठबंधनों का अतीत है. उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश से मात्र 4 और पूर्वी उत्तर प्रदेश से मात्र 2 सीटें मिली हैं, जिसका मतलब है कि उनके जाटव वोट में भी सेंध लगी है. मायावती की सबसे बड़ी कमी यह है कि वह जमीन की राजनीति से दूर रहती हैं. न वह जमीन से जुड़ती हैं और न उनकी पार्टी में जमीनी नेता हैं. एक सामाजिक और सांस्कृतिक आन्दोलन का कोई मंच भी उन्होंने अपनी पार्टी के साथ नहीं बनाया है. यह इसी का परिणाम है कि वह बहुजन समाज के हिन्दूकरण को नहीं रोक सकीं. इसी हिन्दूकरण ने लोकसभा में उनका सफाया किया और यही हिन्दूकरण उनकी वर्तमान हार का भी बड़ा कारण है. 
मायावती की इससे भी बड़ी कमी यह है कि वह नेतृत्व नहीं उभारतीं. हाशिए के लोगों की राजनीतिक भागीदारी जरूरी है, पर उससे ज्यादा जरूरी है उनमें नेतृत्व पैदा करना, जो वह नहीं करतीं. इसलिए उनके पास एक भी स्टार नेता नहीं है. इस मामले में वह सपा से भी फिसड्डी हैं. मायावती के भक्तों को यह बात बुरी लग सकती है, पर मैं जरूर कहूँगा कि अगर उन्होंने नयी लीडरशिप पैदा नहीं की, वर्गीय बहुजन राजनीति का माडल खड़ा नहीं किया और देश के प्रखर बहुजन बुद्धिजीवियों और आन्दोलन से जुड़े लोगों से संवाद कायम करके उनको अपने साथ नहीं लिया, तो वे 11 मार्च 2017 की तारीख को बसपा के अंत के रूप में अपनी डायरी में दर्ज कर लें.

लोकतंत्र में जनादेश

कुछ लोग बहुत निराश हैं और कुछ लोग ख़ुशी से मानसिक संतुलन खो रहे हैं। चुनाव था, हो गया। आखिरी तो नहीं था। कोई जीता है तो उसकी भी वजहें हैं, कोई हारा है तो उसकी भी वजह है ही। हारने वाले को अपनी वजह खत्म करनी चाहिए। चुनाव तो पिछले साल भी हुए थे, उससे पिछले साल भी हुए थे और अगले साल भी होंगे। आम आदमी पार्टी को लेकर सभी को लग रहा था कि पंजाब में सरकार बना ली जाएगी। देखिये, ऐसा कोई चमत्कार कोई दल कहीं नहीं कर सकता कि जहाँ भी चुनाव में उतरे और वहीँ सरकार बना ले जाये। सालों बाद किसी पार्टी का नंबर आता है सरकार बनाने का। बीजेपी का भी बहुत साल बाद यूपी में नंबर लगा है। आप पहली बार ही पंजाब में आकर 25-26 सीट ले गए, अच्छा है। आगे की रणनीति बनाइये। अच्छे विपक्ष की भी उतनी ही ज़रूरत है जितनी एक मज़बूत सरकार की। आत्मविश्वास की भी अति नहीं होनी चाहिए वरना बांटने के लिए तैयार लड्डू खुद ही खाने पड़ते हैं। एक वक़्त ऐसा था जब हर जगह कांग्रेस ही आती थी। इंदिरा गाँधी ने इमरजेंसी लगायी, उसके बाद हार गयीं लेकिन 3 साल बाद फिर जनता ने बहुमत दे दिया। उस वक़्त कितने ही लोग ये देख कर निराश होते होंगे। नयी-नयी पार्टियां 2-4 सीटें ही ला पायीं थी। ये दौर होता है। 'वोटिंग ट्रेंड' नहीं बदला है, बस राजनीतिक हथियार बदल गए हैं, तरीके बदल गए हैं। परंपरागत राजनीति करने वालों को समझ लेना चाहिए कि अब राजनीति 'ट्रांजीशन फेज़' में है। बहुत संगठित तरीके से ही आप चुनाव जीत सकते हैं। संगठित आपको हर तरह से होना पड़ता है और हर जगह होना पड़ता है। वोटर समझ गया है कि आप परंपरागत राजनीति वाले नेताओं की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है और ना आपको जनता के प्रतिनिधित्व से मतलब है। आपका वर्गों के प्रतिनिधित्व के प्रति 'कमिटमेंट' कमज़ोर है। विचारधारा के प्रति 'कमिटमेंट' कमज़ोर है। जिनका 'कमिटमेंट' कुर्सी से ऊपर था, उन्होंने राज्यों में सरकार बनायी भी है। लहर के विरुद्ध। 
जैसे-जैसे राजनेता अनुभव के साथ परिपक्व होता है, वैसे ही राजनीति कवर करने वाला भी हर चुनाव के साथ परिपक्व होता है। हमारी उम्र वाले पत्रकारों को इन चुनावों से बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। चुनाव की शुरुआत में ही कुछ पत्रकारों ने शायद समझ लिया था कि किसी के लिए हवा बनाना हमारा काम नहीं है, वोटर पर ही फैसला छोड़ देना चाहिए। यही आदर्श स्थिति है। जो हमारी प्राथमिकता है, ज़रूरी नहीं कि वो एक गरीब वोटर की भी प्राथमिकता है। वो किसी भी बात पर वोट दे सकता है और यही उसका अधिकार है। हमारे लिए घी बाँटना, सिलेंडर बाँटना कोई बड़ी बात नहीं है। जिसके लिए ये प्राथमिकता है, वो तो वोट करेगा ही। विरोधियों को भी ये बात समझनी चाहिए। साथ ही, राहुल गाँधी या कांग्रेस को बाद में आत्मनिरीक्षण की सलाह दीजियेगा, पहले खुद मीडिया को ही आत्मनिरीक्षण कर लेना चाहिए। या तो आत्मनिरीक्षण करें या फिर ज्योतिष पत्रकारिता में ना पड़ें। नरेंद्र मोदी कैसा सोचते हैं और क्या करने वाले हैं, चुनाव में क्या हो सकता है, मीडिया को उसकी भनक तक नहीं लगती है। दिल्ली चुनाव, बिहार चुनाव, बंगाल चुनाव और अब यूपी और पंजाब का चुनाव में मीडिया ने इस बात को साबित किया है। मुश्किल काम तो होता नहीं था, अब आसान काम भी नहीं हो पा रहा। ये तक पता नहीं चल पता है कि कौन सीएम बनने जा रहा है। अब बात साख की है। आप किसी दल की तरह ही फेल हो चुके हैं। व्यक्ति दर व्यक्ति आपका स्टैंड बदलता रहता है। इतना बड़ा लोकतंत्र है, हर बार आपकी सहूलियत को देख कर नतीजा नहीं आ सकता है। जिन्होंने कभी लंबे वक़्त तक विपक्ष में बैठ कर इंतज़ार किया है, आज उनका कुर्सी पर बैठने का वक़्त है। आप हर बार एक ही तरह से अपना एक्सपेरिमेंट करेंगे और चाहेंगे की नतीजा अलग हो तो ऐसा होना साइंटिफिक तो नहीं है। जो आप महसूस कर रहे हैं, ज़रूरी नहीं कि वही नतीजा आये। हो सकता है आपके महसूस करने के पीछे की थ्योरी ही गलत लगी हो।

Wednesday, March 8, 2017

एक दिन नहीं रोज महिला दिवस हो

आज वुमेंस डे है तो सोसल मीडिया पर महिला सशक्तिकरण की बहार सी आई हुई है, लेकिन ये सब बोलने वाले खुद ही महिला विरोधी हैं। जिन्हें हम सिर्फ "नाईट" की चीज़ समझते है उन्हें आज "डे" की शुभकामनाएं दे रहे हैं.
इस सो काॅल्ड महान देश में गालियां भी औरतों को दी जाती हैं, गलती कोई पुरुष करे और गाली उसकी मां या बहन को? ये कहां का न्याय है? हमारे घर में दो बच्चे होते हैं एक लडका और एक लडकी दोनों भगवान के यहाँ से बराबर आते हैं, कई बार बच्चियाँ ज्यादा होशियार होती हैं। लेकिन उनकी उम्र 15 साल होते होते आप रोड पर दोनों को देखो। लडकी डरेगी, आगे जाएगी, पीछे जाएगी और जब सिग्नल आएगा तब रोड क्राॅस करेगी। दूसरी ओर लडका मर्सडीज के आगे से हाथ हिलाकर कहेगा, "रुक बे रोड क्या तेरे बाप की है? " और  निकल जाएगा। क्यों? आप सबको जवाब पता हैं।
मेरा बडा मन था कि मैं अपने नाम के आगे मां का नाम लगाऊँ, लेकिन ऑफिशियल छोडो फेसबुक पर तक नहीं लगा सका? शायद ये नाकामी मेरी अकेले की नहीं पूरे समाज की है। है न अजीब मैं 9 महीने पेट में एक औरत के रहा, पैदा उसने किया,(कहते हैं कि डिलीवरी के समय हुआ दर्द बीस हड्डियां टूटने के बराबर होता है)फिर दूध उसने ही पिलाया, लेकर मेरे टट्टी पेसाब से खाने पीने का हर ख्याल उसने रखा। और जब कोई पूछे किसके लडके हो तो कहता हूँ तो उस औरत का कहीं नाम ही नहीं आता है। उसमें भी अगर संविधान बाबा साहब अंबेडकर की जगह किसी और ने बनाया होता तो क्या हालत होती? लोग महिला रिजर्वेशन का विरोध करते हैं, ये न होता तो ट्रेन और बस में औरतों की क्या हालत होगी? मुझे तो लगता है कुछ सालों के लिए विधान सभाओं और लोकसभा में 100% महिला आरक्षण हो जाना चाहिए. उसमें भी पढ़ी लिखी, अनपढ़, हाउसवाईफ, मजदूर महिलाओं सभी को पार्लियामेंट भेजा जाए, तो कुछ राजनीति नफ़रत से हटकर ढंग की हो. हमारे देश की मानसिकता बडी अच्छी है, कल ही महिला विकास मंत्री जो खुद एक महिला हैं, कहा है कि लडकियों को छः बजे के बाद हास्टल से निकलने ही नहीं देना चाहिए, अभी बीएचयू सहित देश की बडी यूनिवर्सिटी में लड़कियों को वाईफाई इसलिए नहीं दे रहे कि कहीं वे पॉर्न न देख लें। यूपी में एक बाबा योखी आदित्यनाथ हैं जो कहते हैं कि हर लडकी एक जिंदा बम है, उसे घर में कैद करके रखो, नहीं तो वो बाहर आपकी और समाज की नाक कटाएगी। और उसका प्रचार करने पीएम जाते हैं। जहाँ इतनी गरीब मानसिकता के लोग हैं वहाँ एक नहीं रोज महिला दिवस होना चाहिए। हमारे यहां खुद इतने नमूने भरे हैं कि डोनाल्ड ट्रम्प की कमी ही नहीं है। रही बात महिलाओं को देवी बनाकर पूजा करने की, तो ये फर्जी ड्रामे बंद करो। उसे अपने बराबर सम्मान ही दे दो, वही बहुत है। जो सोचते हैं कि घर में ये काम औरत का है, मर्द इसे करेगा तो पति परमेश्वर वाला सम्मान कम होगा। हर बोझ औरत पर लादने वाले आज बडे फेमिनिस्ट बन रहे हैं। ये ग्रीटिंग कार्ड और डिस्काउंट देने से अच्छा है अपनी मानसिकता बदलो और एक ऐसा समाज बनाओ जहां सभी जेंडर के लोग बराबर हों। अभी भी बहुत सी जगहें मैं देखता हूँ जहाँ लडकियों का रिप्रजेंटेशन बहुत कम है मैं चाहता हूँ जब जगह हमारी आधी आबादी को अधिकार मिले। अपराध विहीन समाज बनाएं।
और अंत में ये ट्रोल याद आ गए, जो भारत माता की जय बोलकर महिलाओं पर भद्दे भद्दे मजाक करते हैं, इनपर भी हंसने नहीं कंट्रोल करने की जरूरत है।
शुक्रिया, इंकलाब जिंदाबाद।
www.politicalkamlesh.blogspot.in

Saturday, March 4, 2017

समाजवाद की अंतिम पीढी

आज लोकसभा टीवी पर एक कार्यक्रम में पुराने समाजवादी नेता शरद यादव बोल रहे थे। लोकतंत्र, स्वराज, समाज, राजनीति,  अर्थतंत्र और समाज के हर पहलू पर बहुत शानदार विचार रखे। मैं राज्यसभा में अक्सर उनके भाषण सुनता हूँ, 11 बार सांसद और सर्वोच्च सांसद रह चुके शरद यादव कानून और इतिहास पर मजबूत पकड रखते हैं। इलेक्ट्रिक इंजीनियर रहे शरद निजी जीवन में बहुत साधारण, ईमानदार और उत्तम आदर्शों के व्यक्ति हैं। अक्सर मीडिया उनके भाषण में नुक्स निकाल कर घेरती है लेकिन वो मन से बहुत साफ नियत के नेता हैं। महिलाओं पर उनकी टिप्पणी लोग गलत कहते हैं लेकिन वो हमेशा समाज में महिलाओं की हकीकत की बात कहते हैं। वो तो संसद में महिलाओं के लिए 50 या 100% तक आरक्षण की बात कह रहे थे लेकिन उनकी आवाज किसी ने न सुनी कि बावजूद आरक्षण के गांव की महिलाओं को क्यों अधिकार नहीं मिल रहे हैं। बरकट्टी का अर्थ शहर के बडे घर की महिलाओं से था कि आरक्षण में भी उनका ही कब्जा है। वहीं बेटी और वोट पर वो एक घंटा बैलट पेपर बचाने पर बोले थे। वोट हजारों सालों के बाद लोगों के लिए सबसे कीमती चीज होनी चाहिए, लेकिन नहीं है। इसलिए वोट की कीमत बेटी के बराबर मानो। ये भी लोग निगेटिव ले गए। असल में वो पुराने समय के गांव जुडे नेता हैं इसलिए शब्दों का चयन थोडा यूपी बिहार की भाषा का हो जाता है जो गलत लगता है। नहीं तो आज लोगों को उनके लोकतंत्र बचाने के लिए साढे चार साल तक जेल में रहने को कौन नकार सकता है। वो स्वराज के सवाल पर कहते हैं कि,"पहले कहते थे जस राजा तस प्रजा। अब होना चाहिए जस प्रजा तस राजा, बस यही स्वराज है। मतलब जैसी जनता उसी में से हर अधिकारी, कर्मचारी, पुलिस, राजा, नेता सब बने बस यही हो जाए तो असली स्वराज है। वो बोले देश के लोगों तक योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है इसका असली कारण है जातिवाद न खत्म होना। मन शांत करके सोचिये बस। और राजनीति में जाति लाना जातिवाद को बढावा नहीं बल्कि खत्म करने के लिए होना चाहिए। जो कई बार होता भी है। उनके और केसी त्यागी के विचारों को मैं बहुत पसंद करता हूँ, पता नहीं आगे चलकर कोई ऐसा वैचारिक नेता होगा भी या नहीं?

Thursday, March 2, 2017

अंत में पिछडती बीएसपी

आपके पाॅइंट नंबर डी में कुछ संदेह है। क्योंकि तीसरे चरण में सपा गठबंधन ने यह कहना शुरू कर दिया था कि बीएसपी बीजेपी से रक्षा बंधन मना लेगी। वो बार बार ऐसा बोले और एक ऑडियो भी वायरल किया जिसमें मायावती अपने वोट बीजेपी में ट्रांसफर करने के लिए कह रही हैं। इसलिए मुस्लिम समुदाय ने उनको बीजेपी के टक्कर में कम माना। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जोर था उनका। गैर यादव ओबीसी सपा बसपा से लगभग निकल चुका है। दलितों में धोबी आदि भी बीजेपी में जा रहे हैं, खासकर सुरक्षित सीटों पर। देखना यह होगा कि बीबीएसपी की सोसल इंजीनियरिंग कितना काम करेगी? यानी ब्राह्मण कैंडीडेट को वोट उस जाति का मिलना। अगर यह नहीं हुआ तो बीएसपी अधिकतर सीटें बहुत कम मार्जिन से हार सकती है। अखिलेश को तो खैर और भी मौके मिल सकते हैं, लेकिन अगर बीएसपी हारी तो पार्टी खत्म मानो। न कोई उनके अलावा विश्वासपात्र लीडर है, न कोई दलित युवा नेता तैयार किया है। बीएसपी का यूपी की राजनीति में रहना बहुत आवश्यक है।मायावती भी इस चुनाव में अकेले ही सबकुछ झोंक कर लड रही हैं, वो एकमात्र नेता हैं उनकी पार्टी की। उनका न किसी से गठबंधन है। ऐसे में पूर्वांचल में उनके खिलाफ हुए मुस्लिम समाज पर आज भरोसा दिलाने के लिए अपने बेस वोटबैंक (21% दलित) के लिए उन्होंने दावा किया। देखते हैं उनको जनता स्वीकार करती है या नहीं? क्योकि 3 चरण तक वो सबसे मजबूत दावेदार थी, लेकिन चौथे में सपा की हवा काम कर गई कि वो भाजपा से हाथ मिला सकती हैं। बात हमें 2014 के लोकसभा चुनावों से शुरू करनी पड़ेगी, जब बीएसपी मोदी लहर में पूरी तरह बह गई, और उसकी लोकसभा में कोई सीट नहीं बची. उसके बाद भी जब हमने ठीक से विश्लेषण किया तो पाया क़ि बीएसपी को लगभग 22-23 % वोट मिले थे. उस समय समाजवादी पार्टी उससे कुछ % ही अधिक वोट पा सकी थी. अगर इसी हिसाब से देखने जाएँगे तो 2012 के विधानसभा चुनावों मे बीएसपी समाजवादी पार्टी से भी बहुत कम मार्जिन से हारी थी, भले ही उसकी सीटें बहुत कम हों.


राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...