Saturday, March 11, 2017

लोकतंत्र में जनादेश

कुछ लोग बहुत निराश हैं और कुछ लोग ख़ुशी से मानसिक संतुलन खो रहे हैं। चुनाव था, हो गया। आखिरी तो नहीं था। कोई जीता है तो उसकी भी वजहें हैं, कोई हारा है तो उसकी भी वजह है ही। हारने वाले को अपनी वजह खत्म करनी चाहिए। चुनाव तो पिछले साल भी हुए थे, उससे पिछले साल भी हुए थे और अगले साल भी होंगे। आम आदमी पार्टी को लेकर सभी को लग रहा था कि पंजाब में सरकार बना ली जाएगी। देखिये, ऐसा कोई चमत्कार कोई दल कहीं नहीं कर सकता कि जहाँ भी चुनाव में उतरे और वहीँ सरकार बना ले जाये। सालों बाद किसी पार्टी का नंबर आता है सरकार बनाने का। बीजेपी का भी बहुत साल बाद यूपी में नंबर लगा है। आप पहली बार ही पंजाब में आकर 25-26 सीट ले गए, अच्छा है। आगे की रणनीति बनाइये। अच्छे विपक्ष की भी उतनी ही ज़रूरत है जितनी एक मज़बूत सरकार की। आत्मविश्वास की भी अति नहीं होनी चाहिए वरना बांटने के लिए तैयार लड्डू खुद ही खाने पड़ते हैं। एक वक़्त ऐसा था जब हर जगह कांग्रेस ही आती थी। इंदिरा गाँधी ने इमरजेंसी लगायी, उसके बाद हार गयीं लेकिन 3 साल बाद फिर जनता ने बहुमत दे दिया। उस वक़्त कितने ही लोग ये देख कर निराश होते होंगे। नयी-नयी पार्टियां 2-4 सीटें ही ला पायीं थी। ये दौर होता है। 'वोटिंग ट्रेंड' नहीं बदला है, बस राजनीतिक हथियार बदल गए हैं, तरीके बदल गए हैं। परंपरागत राजनीति करने वालों को समझ लेना चाहिए कि अब राजनीति 'ट्रांजीशन फेज़' में है। बहुत संगठित तरीके से ही आप चुनाव जीत सकते हैं। संगठित आपको हर तरह से होना पड़ता है और हर जगह होना पड़ता है। वोटर समझ गया है कि आप परंपरागत राजनीति वाले नेताओं की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है और ना आपको जनता के प्रतिनिधित्व से मतलब है। आपका वर्गों के प्रतिनिधित्व के प्रति 'कमिटमेंट' कमज़ोर है। विचारधारा के प्रति 'कमिटमेंट' कमज़ोर है। जिनका 'कमिटमेंट' कुर्सी से ऊपर था, उन्होंने राज्यों में सरकार बनायी भी है। लहर के विरुद्ध। 
जैसे-जैसे राजनेता अनुभव के साथ परिपक्व होता है, वैसे ही राजनीति कवर करने वाला भी हर चुनाव के साथ परिपक्व होता है। हमारी उम्र वाले पत्रकारों को इन चुनावों से बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। चुनाव की शुरुआत में ही कुछ पत्रकारों ने शायद समझ लिया था कि किसी के लिए हवा बनाना हमारा काम नहीं है, वोटर पर ही फैसला छोड़ देना चाहिए। यही आदर्श स्थिति है। जो हमारी प्राथमिकता है, ज़रूरी नहीं कि वो एक गरीब वोटर की भी प्राथमिकता है। वो किसी भी बात पर वोट दे सकता है और यही उसका अधिकार है। हमारे लिए घी बाँटना, सिलेंडर बाँटना कोई बड़ी बात नहीं है। जिसके लिए ये प्राथमिकता है, वो तो वोट करेगा ही। विरोधियों को भी ये बात समझनी चाहिए। साथ ही, राहुल गाँधी या कांग्रेस को बाद में आत्मनिरीक्षण की सलाह दीजियेगा, पहले खुद मीडिया को ही आत्मनिरीक्षण कर लेना चाहिए। या तो आत्मनिरीक्षण करें या फिर ज्योतिष पत्रकारिता में ना पड़ें। नरेंद्र मोदी कैसा सोचते हैं और क्या करने वाले हैं, चुनाव में क्या हो सकता है, मीडिया को उसकी भनक तक नहीं लगती है। दिल्ली चुनाव, बिहार चुनाव, बंगाल चुनाव और अब यूपी और पंजाब का चुनाव में मीडिया ने इस बात को साबित किया है। मुश्किल काम तो होता नहीं था, अब आसान काम भी नहीं हो पा रहा। ये तक पता नहीं चल पता है कि कौन सीएम बनने जा रहा है। अब बात साख की है। आप किसी दल की तरह ही फेल हो चुके हैं। व्यक्ति दर व्यक्ति आपका स्टैंड बदलता रहता है। इतना बड़ा लोकतंत्र है, हर बार आपकी सहूलियत को देख कर नतीजा नहीं आ सकता है। जिन्होंने कभी लंबे वक़्त तक विपक्ष में बैठ कर इंतज़ार किया है, आज उनका कुर्सी पर बैठने का वक़्त है। आप हर बार एक ही तरह से अपना एक्सपेरिमेंट करेंगे और चाहेंगे की नतीजा अलग हो तो ऐसा होना साइंटिफिक तो नहीं है। जो आप महसूस कर रहे हैं, ज़रूरी नहीं कि वही नतीजा आये। हो सकता है आपके महसूस करने के पीछे की थ्योरी ही गलत लगी हो।

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