Saturday, March 4, 2017

समाजवाद की अंतिम पीढी

आज लोकसभा टीवी पर एक कार्यक्रम में पुराने समाजवादी नेता शरद यादव बोल रहे थे। लोकतंत्र, स्वराज, समाज, राजनीति,  अर्थतंत्र और समाज के हर पहलू पर बहुत शानदार विचार रखे। मैं राज्यसभा में अक्सर उनके भाषण सुनता हूँ, 11 बार सांसद और सर्वोच्च सांसद रह चुके शरद यादव कानून और इतिहास पर मजबूत पकड रखते हैं। इलेक्ट्रिक इंजीनियर रहे शरद निजी जीवन में बहुत साधारण, ईमानदार और उत्तम आदर्शों के व्यक्ति हैं। अक्सर मीडिया उनके भाषण में नुक्स निकाल कर घेरती है लेकिन वो मन से बहुत साफ नियत के नेता हैं। महिलाओं पर उनकी टिप्पणी लोग गलत कहते हैं लेकिन वो हमेशा समाज में महिलाओं की हकीकत की बात कहते हैं। वो तो संसद में महिलाओं के लिए 50 या 100% तक आरक्षण की बात कह रहे थे लेकिन उनकी आवाज किसी ने न सुनी कि बावजूद आरक्षण के गांव की महिलाओं को क्यों अधिकार नहीं मिल रहे हैं। बरकट्टी का अर्थ शहर के बडे घर की महिलाओं से था कि आरक्षण में भी उनका ही कब्जा है। वहीं बेटी और वोट पर वो एक घंटा बैलट पेपर बचाने पर बोले थे। वोट हजारों सालों के बाद लोगों के लिए सबसे कीमती चीज होनी चाहिए, लेकिन नहीं है। इसलिए वोट की कीमत बेटी के बराबर मानो। ये भी लोग निगेटिव ले गए। असल में वो पुराने समय के गांव जुडे नेता हैं इसलिए शब्दों का चयन थोडा यूपी बिहार की भाषा का हो जाता है जो गलत लगता है। नहीं तो आज लोगों को उनके लोकतंत्र बचाने के लिए साढे चार साल तक जेल में रहने को कौन नकार सकता है। वो स्वराज के सवाल पर कहते हैं कि,"पहले कहते थे जस राजा तस प्रजा। अब होना चाहिए जस प्रजा तस राजा, बस यही स्वराज है। मतलब जैसी जनता उसी में से हर अधिकारी, कर्मचारी, पुलिस, राजा, नेता सब बने बस यही हो जाए तो असली स्वराज है। वो बोले देश के लोगों तक योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है इसका असली कारण है जातिवाद न खत्म होना। मन शांत करके सोचिये बस। और राजनीति में जाति लाना जातिवाद को बढावा नहीं बल्कि खत्म करने के लिए होना चाहिए। जो कई बार होता भी है। उनके और केसी त्यागी के विचारों को मैं बहुत पसंद करता हूँ, पता नहीं आगे चलकर कोई ऐसा वैचारिक नेता होगा भी या नहीं?

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