Thursday, March 2, 2017

अंत में पिछडती बीएसपी

आपके पाॅइंट नंबर डी में कुछ संदेह है। क्योंकि तीसरे चरण में सपा गठबंधन ने यह कहना शुरू कर दिया था कि बीएसपी बीजेपी से रक्षा बंधन मना लेगी। वो बार बार ऐसा बोले और एक ऑडियो भी वायरल किया जिसमें मायावती अपने वोट बीजेपी में ट्रांसफर करने के लिए कह रही हैं। इसलिए मुस्लिम समुदाय ने उनको बीजेपी के टक्कर में कम माना। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जोर था उनका। गैर यादव ओबीसी सपा बसपा से लगभग निकल चुका है। दलितों में धोबी आदि भी बीजेपी में जा रहे हैं, खासकर सुरक्षित सीटों पर। देखना यह होगा कि बीबीएसपी की सोसल इंजीनियरिंग कितना काम करेगी? यानी ब्राह्मण कैंडीडेट को वोट उस जाति का मिलना। अगर यह नहीं हुआ तो बीएसपी अधिकतर सीटें बहुत कम मार्जिन से हार सकती है। अखिलेश को तो खैर और भी मौके मिल सकते हैं, लेकिन अगर बीएसपी हारी तो पार्टी खत्म मानो। न कोई उनके अलावा विश्वासपात्र लीडर है, न कोई दलित युवा नेता तैयार किया है। बीएसपी का यूपी की राजनीति में रहना बहुत आवश्यक है।मायावती भी इस चुनाव में अकेले ही सबकुछ झोंक कर लड रही हैं, वो एकमात्र नेता हैं उनकी पार्टी की। उनका न किसी से गठबंधन है। ऐसे में पूर्वांचल में उनके खिलाफ हुए मुस्लिम समाज पर आज भरोसा दिलाने के लिए अपने बेस वोटबैंक (21% दलित) के लिए उन्होंने दावा किया। देखते हैं उनको जनता स्वीकार करती है या नहीं? क्योकि 3 चरण तक वो सबसे मजबूत दावेदार थी, लेकिन चौथे में सपा की हवा काम कर गई कि वो भाजपा से हाथ मिला सकती हैं। बात हमें 2014 के लोकसभा चुनावों से शुरू करनी पड़ेगी, जब बीएसपी मोदी लहर में पूरी तरह बह गई, और उसकी लोकसभा में कोई सीट नहीं बची. उसके बाद भी जब हमने ठीक से विश्लेषण किया तो पाया क़ि बीएसपी को लगभग 22-23 % वोट मिले थे. उस समय समाजवादी पार्टी उससे कुछ % ही अधिक वोट पा सकी थी. अगर इसी हिसाब से देखने जाएँगे तो 2012 के विधानसभा चुनावों मे बीएसपी समाजवादी पार्टी से भी बहुत कम मार्जिन से हारी थी, भले ही उसकी सीटें बहुत कम हों.


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