कमियाँ और कारण बहुत होंगे उनमें से एक प्रमुख कारण -
2012 में समाजवादी पार्टी ने पूरी सीटों पर चुनाव लड़ा था और 2.2 करोड़ वोट मिले थे जो कुल मतदान का लगभग 29 % था हर सीट पर औसतन 54000 वोट मिले थे और 224 सीट जीती थी. 2017 में समाजवादी पार्टी ने 311 सीट पर चुनाव लड़ा और 1.89 करोड़ वोट मिले जो कुल मतदान का 22 % है और गठबंधन के साथ जोड़कर 403 सीट पर 28 प्रतिशत से ज़्यादा है और हर सीट पर लगभग 60000 वोट मिले है और मात्र 47 +7 = 54सीट जीत पायी है.
भाजपा गठबंधन को क़रीब 41 प्रतिशत और समाजवादी पार्टी गठबंधन को 28 प्रतिशत वोट मिले है इस चुनाव में भाजपा और सपा के बीच वोटों का जो क़रीब 13 प्रतिशत का अंतर है उसने क़रीब 4-5 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं का वोट बँटकर बसपा को मतदान हुआ है 97 मुस्लिम प्रत्याशियों के वजह से और कुछ फ़तवा जारी करने वालों का भी इज़्ज़त सम्मान होगा और क़रीब 2 प्रतिशत निषाद वोट जो सपा के साथ रहता था वह और क़रीब 3-4 प्रतिशत लोहार, प्रजापति, नाई ,पाल और प्रत्याशी की जाति का वोट जो सपा के साथ रहता था वह सपा संगठन के इन जतीयो के नेताओ के सक्रियता में कमी और भाजपा rss के यादववाद के झूठे प्रचार और बनाए हुए यादव विरोधी माहौल और चुनावी वादों के चलते भाजपा को गया इस बार वही अंतर पैदा हुआ है और विधानसभा वार सपा और भाजपा के बीच हार जीत का जो अन्तर है वो यही वोट है. और कुछ वोट मशीन में भी बना दिया होगा भाजपा वालों ने उसकी भी जाँच हो.
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