Saturday, September 30, 2017

जर्मनी के चुनावों की नतीजे

जर्मनी भी अब अमेरिका जैसे नाटक कर रहा है अपने कट्टरपंथी ना होने का, अब वो भी सड़क पर उतर कर प्रदर्शन कर रहे हैं क़ि जिन 13% लोगों ने एएफडी (पॉप्युलिस्ट राइट विंग पार्टी) को वोट दिया है हम उनसे असहमत हैं. या जर्मनी वैसा नहीं है. लेकिन बात ये भी है क़ि आख़िर एएफडी को वोट देने वाले 13% लोग हैं तो जर्मन ही ना? ठीक वैसे ही जब अमेरिका ट्रम्प को सत्ता में बिठाकर आंदोलन करता है क़ि वो कट्टरपंथी नहीं हैं.
दरअसल वहाँ कट्टरपंथी संगठन को चुनाव में 95 के आसपास सीटें मिलना महज संयोग या संख्या नहीं है. ये एंजेला मार्केल की एक नाकामी के तौर पर देखी जा रही है. सीरिया से आए हुए लोगों के खिलाफ मतलब एंटी माइग्रेट मुद्दे पर एएफडी ने लोगों का समर्थन प्राप्त किया और सीरिया में हो रहे युद्ध में पुतिन की भूमिका महत्वपूर्ण है. इसी कारण आ रहे शरणार्थियों का जर्मनी में आना दक्षिणपंथी दल ने खूब उठाया. इसमें लोग मज़ाक में ही सही पुतिन को एंजेला मार्केल की जीत की तरह देख रहे हैं. असल में पुतिन और एंजेला के बीच के तनातनी वाले संबंध सबको पता हैं. उनकी एक मीटिंग की कुत्ते वाली एक कहानी भी कई बार चर्चा में आती है. इस पार्टी ने यही प्रयोग किया. मार्केल को कुछ हदतक एंटीइनकमबैंसी का भी सामना करना पड़ा. लेकिन पूरे विश्व में हुए चुनावों में एक बात सामने आई है वो है राइटविंग का इस्लाम विरोध के नाम पर जीतना. न जितना तो समर्थन हासिल करना. चाहे आप अमेरिका, भारत, फ्रांस अपवाद हो सकता है. और अब जर्मनी.
वैसे पढ़कर अच्छा लगा कि जर्मनी की चुनाव व्यवस्था काफ़ी अच्छी है. वहाँ जितनी सीटें संसद में हैं उतनी सीटों पर दो दो चुनाव होते हैं. मतलब 299 सीटों पर पहले आप अपने प्रत्याशी को वोट दीजिए, जो मेंबर ऑफ पार्लियामेंट होगा, जो उस एरिया का प्रतिनिधित्व करता है. दूसरा वोट उसी सीट पर आप अपनी पसंद की पार्टी को दे सकते हैं. इसमें आप दूसरी पार्टी को भी पसंद कर सकते हैं.  अर्थात 598 सदस्य संसद में जाते हैं. कई बार जब जब ये डिसबैलेंस हो जाता है तो इसके लिए सीटों की संख्या बढ़ा दी जाती है. अब तक एंजेला मार्केल का बहुमत तो नहीं साबित हुआ लेकिन अंत तक कैसे भी जुगाड़ या गठबंधन करके सरकार उनकी ही बनेगी. यहाँ सीडीयू और सीएसयू के गठबंधन को 246 सीट मिली हैं, इसी गठबंधन की तरफ से चांसलर थी एंजेला मार्केल. कुल 598 सीटों पर चुनाव हुए. एसपीडी (सोसल डेमोक्रेटिक पार्टी) भी इस गठबंधन में शामिल थी जिसे 153 सीट मिली हैं. आल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (एफएफडी) अभी एक दो साल पुरानी ही पार्टी है. इस चुनावों के नतीजे इसलिए और चौकाने वाले हैं क्योंकि हिटलर के बाद से इस देश (जर्मनी) ने कसम खा ली थी क़ि कभी राइट विंग या दक्षिण पंथी पार्टी या नेता को सत्ता के करीब जाने का मौका नहीं देंगे. और एएफडी ठीक उसी तरह की राजनीति करता है. वैसे तो वहाँ क़ानून में हिटलर का समर्थन करना क्राइम है इसलिए वो खुलकर उसपर नहीं बोलते हैं लेकिन दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी की सेना के कारनामे पर खूब बाते करते हैं क़ि हमने क्या खोया? क्या पाया? इसमें रेडिकल लेफ्ट हर देश की तरह फिर से फेल हो गई है. सोसलिस्ट पार्टी के नेता ने पहले तो मना किया था एंजेला को समर्थन से लेकिन दोनों पर खूब दबाव है राइटविंग को दूर रखने का. इसलिए हो सकता है जमैका कोलेशन बनाया जाए. ये मजेदार होता है क़ि सभी संभावित गठबंधन वाली पार्टियों के झंडे के रंग (हरा, काला और पीला) को मिलाकर एक किया जाता है और जब उसका रंग जमैका के झंडे की तरह हो जाता है तो इस कोलेशन की सरकार बन जाती है. 

रेलवे की इतनी घटिया हालत क्यों?

एलफिंस्टन स्टेशन के पादचारी पुल (फुटओवर ब्रिज) पर शुक्रवार को हुई भगदड़ में 22 लोगों की मौत के बाद दादर पुलिस स्टेशन में एडीआर यानी कि दुर्घटना से मौत का मामला दर्ज हुआ है. हालांकि मेरा ऐसा मानना है कि इस मामले में पश्चिम रेलवे प्रशासन के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज होना चाहिए और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. वहां के संकरे पुल पर लोगों की भीड़ को चढ़ने और उतरने में रोज की मशक्कत को देखकर कोई भी आसानी से अंदाजा लगा सकता था कि कभी भी यहां भगदड़ हो सकती है और उसका अंजाम क्या होगा? जब ये हादसा हुआ तकरीबन उसी दौरान मैं एलफिंस्टन रेल स्टेशन पर ही चर्चगेट की तरफ बने नए पादचारी पुल पर था. अचानक से शुरू हुई तेज बारिश की वजह से लोग उस पुल पर ही खड़े होकर बारिश रुकने का इंतजार कर रहे थे. जैसे-जैसे स्टेशन पर दूसरी लोकल आती भीड़ और बढ़ती जा रही थी. आलम ये था कि बाहर से स्टेशन पर आने के लिए यात्रियों को पुल पर सीढ़ियां चढ़ने की जगह नहीं मिल रही थी और जाने वाले बारिश में भीगने के डर से पुल से उतर नहीं रहे थे. जो जहां था, वहीं खड़ा था और परेशान भी, क्योंकि दफ़्तर पहुंचने में देर हो रही थी.
मैं खुद साल 1993 से एलफिंस्टन स्टेशन पर आता-जाता रहा हूं. यहाँ अमूमन खाली रहने वाले दोनों रेलवे स्टेशनों पर भीड़ बढ़ती गई. एक समय आ गया था कि दोनों स्टेशनों के बीच से पूरब और पश्चिम को जोड़ने वाले अंग्रेजों के जमाने के बने फ्लाईओवर पर चढ़कर स्टेशन के बाहर निकलने लिए बने पुल पर चढ़ने के लिए सीढ़ियों पर भीड़ इतनी बढ़ गई थी कि उस पर चढ़ने के लिए 3 से 5 मिनट का समय लगने लगा. धक्का-मुक्की और जेब कटने की शिकायतें आम हो गई थीं. ऐसा नहीं है कि रेल प्रशासन को परेल और एलफिंस्टन स्टेशन पर साल दर साल बढ़ रही भीड़ की जानकारी नहीं थी. उसे पूरी जानकारी थी इसलिए पिछले कुछ सालों में एलफिंस्टन पर दक्षिण की तरफ एक पादचारी पुल बनाया गया और उत्तर की तरफ हादसे वाला पुल भी अभी 10 साल पहले ही पुराने पुल से जोड़कर बनाया गया था. लेकिन भीड़ की तुलना में ये दोनों ही पुल नाकाफी रहे.
हादसे के बाद देर शाम खुद पश्चिम रेलवे ने एक प्रेस रिलीज जारी कर दावा किया कि परेल और एलफिंस्टन स्टेशन को जोड़ने के लिए पुराने पुल के समानान्तर ही 12 मीटर चौड़े एक और पुल बनाने की योजना पहले ही पास हो चुकी है और उसका टेंडर भी निकाला जा चुका है. मतलब ये कि रेल प्रशासन यहां की बढ़ती भीड़ और होने वाली अनहोनी की आशंका से भली-भांति परिचित था. लेकिन उसे पुल बनाने के लिए जितनी तेजी दिखानी चाहिए थी, उतनी तेजी नहीं दिखाई. फिर क्यों ना रेल प्रशासन के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज हो? ये सिर्फ हादसा नहीं, जान-बूझकर लोगों को रोज मौत के मुंह में भेजने से कम नहीं है. गैर-इरादतन हत्या का मामला यानी कि धारा 304 आ जिसमें मंशा नहीं, जानकारी जरूरी होती है... और जो रेल प्रशासन को थी.

Tuesday, September 26, 2017

मनमोहन को हमेशा याद करेगा अर्थ जगत

हमारे देश में एक प्रधान मंत्री थे, मनमोहन सिंह जी. बड़ा चुप रहने और लोगों का जोक मैटेरियल बनने वाले. लेकिन जब मैने उनके बारे में कुछ तथ्य पढ़े तो दंग रह गया क़ि हम तो इनके कर्ज़दार हैं. क्योंकि आज उनका जन्मदिन भी है इसलिए इसपर मैं कुछ लिखना चाहता हूँ. जब भी मनमोहन सिंह से उनकी सफलता के बारे में पूछा गया, उन्होंने कहा: मैं जो कुछ भी हूं, अपनी पढ़ाई-लिखाई की वजह से हूं. आज के पाकिस्तान में पड़ने वाले गाह गांव में पैदा हुए थे मनमोहन सिंह. गांव में ना तो बिजली थी ना स्कूल और हॉस्पिटल. मीलों चलकर स्कूल जाते. केरोसिन लैंप में पढ़-पढ़ के अपनी आंखें खराब कर ली थी इन्होंने. पर पढ़ना नहीं छोड़ा. और पढ़ते-पढ़ते ऑक्सफ़ोर्ड से पीएचडी कर ली. फिर प्रोफेसर, रिज़र्व बैंक गवर्नर, केन्द्रीय मंत्री होते हुए प्रधानमंत्री भी बने.
पार्टीशन के बाद इनका परिवार इंडिया आ गया था. बड़ी दिक्कत थी. पर पढ़ाई में बहुत तेज होने के कारण इनको स्कॉलरशिप मिल गई. हमेशा फर्स्ट आये थे. इंग्लैंड में इनको इकॉनोमिक्स का एडम स्मिथ पुरस्कार मिला था. पर ये बहुत शर्मीले थे. बबक के पत्रकार मार्क टली को इन्होंने एक बार बताया था कि कैंब्रिज में पढ़ने के दौरान ये ठंड में भी ठंडे पानी से ही नहाते थे. क्योंकि गर्म पानी के पास भीड़ लगी रहती थी. और वहां के लोगों को ये अपने लम्बे बाल नहीं दिखाना चाहते थे. बाद में ये इंडिया आ गए और अमृतसर के एक कॉलेज में पढ़ाने लगे. वहां पर उनके पड़ोसी थे लेखक मुल्कराज आनंद. एक दिन आनंद इनको जवाहर लाल नेहरू से मिलाने ले गए. नेहरू ने इनको सरकार जॉइन करने के लिए कहा. पर कॉलेज में पढ़ाने का कॉन्ट्रैक्ट था इनका. इन्होंने इनकार कर दिया.
90 के दशक की शुरुआत में भारत की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई थी. दुनिया में भी खाड़ी युद्ध के चलते पेट्रोलियम क्राइसिस हो गई थी. ऐसा हो गया था कि भारत के पास पैसा नहीं बचा था, काम चलाने लायक भी. उस वक़्त नरसिम्हा राव ने मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाया. इकॉनमी में सुधार करने के लिए. मनमोहन सिंह के पास जब मंत्री बनने की खबर आई तो इनको मजाक लगा था. अगली सुबह डांट पड़ी तो समझ आया कि सीरियस मैटर है. इंफ इस सुधार पर नज़र गड़ाए हुआ था. पर देश में ऐसा माहौल बना था कि लोग कहने लगे थे कि ये नेता अब देश को बेच देंगे. ऐसे में नए नियम लाने में डर भी था. राव का साफ़ कहना था कि अगर ये सुधार सफल हो गए तो सरकार को क्रेडिट मिलेगा. अगर नहीं हुआ तो सिर्फ मनमोहन की जिम्मेदारी होगी. पर सुधार सफल हुए. देश सही रास्ते चल पड़ा.
भारत में दो ऐसे एक्ट बने हैं जो जनता को सबसे ज्यादा अधिकार देते हैं: कंज्यूमर एक्ट और र्टी. मनमोहन सिंह के सत्ता में आते ही ये एक्ट पास हो गया. इसके लिए देश के लोग लम्बे समय से लड़ रहे थे. इस एक्ट के चलते जनता अफसरों से जवाब-तलब कर सकती है. इसके पहले अफसर हर रिपोर्ट को कॉन्फीडेंशियल कहकर किसी को बताते ही नहीं थे. इसके चक्कर में भ्रष्टाचार बहुत होता था. पर इसी एक्ट के चलते ही मनमोहन सरकार पर घोटालों के आरोप भी लगे.
ये एक ऐसा एक्ट आया, जिसने सरकार और जनता के रिश्ते को बदल दिया. ये तय करना कि सरकार लोगों को अपने गांव के पास रोजगार दिलाएगी, अपने आप में बहुत बड़ा कदम था. साथ ही ये ऐसा प्रोग्राम था जिसमें औरतों को प्राथमिकता दी गई. ये प्रोग्राम पूरे परिवार को टारगेट करता था. रोजगार ना दिला पाने पर अफसरों पर कार्रवाई का प्रावधान था. सरकारी जिम्मेदारियों की ये नई पहल थी. हालांकि बाद में इसमें भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे. पर वो अलग बातें हैं जो कि एक्ट से अलग हैं. एक्ट के इरादों पर डाउट नहीं किया जा सकता. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस एक्ट की आलोचना करते हुए कहा था कि इसे मनमोहन सरकार की सबसे बड़ी असफलताओं के रूप में याद रखा जायेगा. पर उन्होंने भी इस एक्ट को ख़त्म नहीं किया.
भारत की प्रगति के साथ ही ऊर्जा जरूरतें बहुत ज्यादा बढ़ गईं. हर गांव तक बिजली पहुंचाने के लिए बिजली पैदा करना भी जरूरी था. इसके लिए न्यूक्लिअर प्लांट लगाना सबसे आसान तरीका है. पर इसके साथ ही जिम्मेदारी और खतरा भी बढ़ जाता है. साथ ही देश में माहौल ये भी बन रहा था कि ये सरकार अमेरिका के हाथ फिर कुछ बेचना चाहती है. मनमोहन सरकार की सहयोगी कम्युनिस्ट पार्टी ने ऐलान कर दिया कि ये डील होगी तो हम सरकार से समर्थन वापस ले लेंगे. ले भी लिया. पर बिना किसी डर के मनमोहन सिंह ने इस ऐतिहासिक डील को पूरा किया. ये नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर बहुत बड़ी डिप्लोमेटिक जीत थी. 
स्वतंत्रता से ठीक पहले बंगाल में अकाल पड़ा था. 30 लाख लोग मरे थे. फिर चीन से लड़ाई के तुरंत बाद भी अकाल पड़ा. उसी दौरान पाकिस्तान से भी लड़ाई हुई थी. ग्रीन रेवोलुशन के बाद स्थिति थोड़ी बदली. पर वक़्त गुजरने के बाद भी देश के बहुत सारे लोग भर पेट खाना नहीं खा पा रहे थे. ऐसे में मनमोहन सरकार का लोगों का खाना सुरक्षित करवाना दुनिया की किसी भी सरकार के लिए मॉडल बन गया. ये जरूर है कि एक तरफ इसकी आलोचना हुई कि सरकार लोगों पर पैसा बर्बाद कर रही है. लोगों तक अनाज पहुंच भी नहीं रहा. पर एक हद तक लोगों की जरूरतें जरूर पूरी हुईं. किसी भी आलोचना से परे ये सरकार की जिम्मेदारियों का एक नमूना था.

Monday, September 25, 2017

देवी कहकर ये कैसा व्यवहार?

नवरात्रि  में हमारा समाज कन्याओं की पूजा करता आया है. उन्हें भोजन पर आमंत्रित किया जाता है. चरण धोकर स्वागत किया जाता है और तिलक के बाद दक्षिणा और उपहार देकर विदा करने की परंपरा है.  पूरे नौ दिन तक देश शक्ति की अराधना करता है. यह कैसी विडंबना है कि जिस नवरात्रि में चारों ओर से जय माता दी की आवाज गूंज रही है, ठीक उसी वक्त में विश्वविद्यालय के एक कैंपस से लड़कियों की चीखें निकल रही थीं. जिस वक्त देश गरबे की उमंग में थिरक रहा था, उसी वक्त लड़कियां अपनी सुरक्षा की मांगों को लेकर धरना—प्रदर्शन कर रही थीं, उनकी बातों को सुनना तो दूर, उल्टे पुलिसिया कहर बरस जाता है, अजीब विडंबना है कि देश के प्रधानमंत्री के सपनों के शहर में यह सब कुछ होता है, एक ऐसे विश्वविद्यालय में यह सब होता है जिसका नाम पूरे देश में बड़े सम्मान से लिया जाता है. ऐसे शहर में यह सब हो जाता है जो अपने आप में अद्भुत है. साल 2015 में हमारे देश में महिलाओं के साथ बलात्कार की 34651 घटनाएं हुईं. इन्हें साल दर साल टेबल में दिए गए आंकड़ों से देखा जा सकता है. इसी साल में महि‍लाओं के साथ 3 लाख 27 हजार 394 मामले दर्ज कि‍ए गए. यह याद रखा जाना चाहि‍ए कि अब भी समाज में कई-कई वजहों से अपराध दर्ज करवाए और नहीं कि‍ए जाते हैं. इसमें बहुत हैरानी की बात नहीं है कि उत्‍तरप्रदेश में सबसे अधि‍क 35, 527 अपराध दर्ज कि‍ए गए हैं. महि‍लाओं के साथ छेड़खानी के अपराधों की बात करें तो पूरे देश में 2015  में 82,422 घटनाएं हुईं, इनमें 7885 घटनाएं अकेले यूपी की हैं. 
यदि संख्या का बढ़ते जाना प्रगति है तो देखिए कि हमारा समाज कहां से कहां पहुंचा. यह आंकड़े भर नहीं हैं,  दरअसल तो इन आंकड़ों की रोशनी में हम अपने विकास के पहिए पर सवार समाज को देख सकते हैं. हम देख सकते हैं कि तमाम धार्मिक मान्यताओं और धर्म के भी बाजार होते जाने के बीच सामाजिक विद्रुपताएं कैसे राक्षसी आकार ले रही हैं. हमें चिंता होने लगती है कि हम आगे जा रहे हैं या नहीं. पन्ने पलट-पलट कर आंकड़ों को देखने लगते हैं, आंकड़े हमारी स्थितियों पर क्रूरता से हंसते हैं.
जब हम इन तस्वीरों को कुछ यूं देखते हैं कि 2005 से लेकर 2014 तक देश में ऐसी 71872 लड़कियां किसी वासना का शिकार हुई हैं तब हमें समझ आता है कि दरअसल हम कन्याओं को पूजते तो हैं, लेकिन उन्हें एक सुरक्षित समाज आज तक नहीं दे पाए हैं. पहले मोर्चे पर तो हम ऐसी घटनाओं को रोक पाने में असफल हैं, मामला अब केवल सड़कों तक ही सीमित नहीं रहा हैं. जिस तरह से हमारे समाज में बच्चों और महिलाओं को चारदीवारी के अंदर व्यवहार मिल रहा है, वह बेहद चिंताजनक है. चाहे उस आलीशान स्कूल का मामला ले लें, जिसकी दीवारों के अंदर के बच्चे की रहस्यमय हत्या हो जाती है, और हम हत्या की वजह भी नहीं खोज पाते, या एक धार्मिक शहर में विवि के होस्टल में लड़कियों का रहना मुहाल हो जाता है.
अपराध को रोकना तो अलग बात है, अब अपराधों के खिलाफ आवाज उठाना भी एक चुनौती भरा काम हो गया है. यदि बीएचयू की लड़कियां अपराध के खिलाफ आवाज उठा रही हैं, तो यह तय करना कि उनके साथ क्या व्यवहार किया जाएगा, पर ऐसा तो कतई नहीं होना चाहिए कि उनकी आवाज का मुकाबला पुलिस की लाठी से किया जाए.  इस वक्त मुश्किल यह हो गया है कि ज्यादातर सवालों का जवाब हम राजनीतिक व्यवस्था में खोज रहे हैं, और राजनीति की आंखों पर अपना चश्मा है. वह कहां मुखरित होती है और कहां मौन हो जाती है,समझ में नहीं आता, ऐसे में आमजन अपनी आवाज लगाए भी तो कहां लगाएं.

Wednesday, September 20, 2017

रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या

देश के पांच बड़े वकीलों ने फैसला किया है कि वे रोहिंग्या शरणार्थियों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करेंगे. सबसे पहले प्रशांत भूषण के ज़रिए मोहम्मद सलिमुल्लाह और मोहम्मद शाक़िर ने याचिका दायर कर रोहिंग्या को वापस म्यांमार भेजे जाने के फैसले को चुनौती दी थी. इनका कहना है कि वापस गए तो मारे जाएंगे. फिर रोशन तारा जैसवाल, ज़ेबा ख़ैर, के जी गोपालकृष्णन जैसे वकील भी इस लड़ाई में साथ आ गए मगर अब चोटी के पांच वकीलों ने भी रोहिंग्या की तरफ से बहस करने का फैसला किया है. फली एस नरीमन, कपिल सिब्बल, प्रशांत भूषण, राजीव धवन और कोलिन गोज़ाल्विस रोहिंग्या के पक्ष में दलील देंगे. भारत सरकार की तरफ से एडिशनल सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता बहस कर रहे हैं. 3 अक्तूबर को सुनवाई होनी है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी कहा है कि रोहिंगया मुसलमान शरणार्थियों को वापस भेजने के सरकार के फैसले का विरोध करेगा. इस मामले में केएन गोविंदाचार्य और चेन्नई की एक संस्था इंडिक कलेक्टिव ट्रस्ट भी हस्तक्षेप करने वाले हैं. दोनों ही रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस भेजने के पक्ष में हैं. गोविंदाचार्य ने कहा है कि अगर ये रहेंगे तो भारत का एक और विभाजन हो सकता है. अलक़ायदा जैसे आतंकी संगठन इनका इस्तमाल कर सकते हैं. इंडिक कलेक्टिव ट्रस्ट कहा कहना है कि ये भारत की सामाजिक आर्थिक और सुरक्षा के लिए ख़तरा हो सकते हैं. म्यनमार पर दबाव डाला जाना चाहिए कि वो अपनी सीमा के भीतर के विवादों को सुलझाए. यह संस्था मानती है कि मानवाधिकार का संकट है लेकिन इसका समाधान उसी ज़मीन पर जाकर करना चाहिए. यह भी सवाल उठ रहा है कि रोहिंग्या जम्मू तक कैसे पहुंच गए. इसके अलावा केंद्र सरकार के हलफमाने में दिए गए तर्कों को भी जानना चाहिए. सरकार का मानना है कि इस मामले में अदालत दखल न दे, देशहित में सरकार को ही फैसला लेने दें. रोहिंग्या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं. रोहिंग्या देशविरोधी गतिविधियों में शामिल रहे हैं. मानव तस्करी और हवाला नेटवर्क से जुड़े हैं. कई आतंकी संगठन इनके ज़रिये सांप्रदायिक हिंसा फैलाने की साज़िश कर रहे हैं. इसमें पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई और आतंकी संगठन आईसीसी भी है. आतंकी पृष्ठभूमि वाले कुछ रोहिंग्या की पहचान की गई है. भारत में रहे तो बौद्दों के ख़िलाफ़ हिंसा हो सकती है. भारत की आबादी ज़्यादा है. सामाजिक आर्थिक ढांचा जटिल है. रोहिंग्या को देश में उपलब्ध संसाधनों में से सुविधाएं देने पर नागरिकों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा. जम्मू में रहने वाले रोहिंग्या शरणार्थियों की दलील है कि सभी 7 हज़ार रोहिंग्याओं का आतंकवाद से कोई लेना देना नहीं है. जब से वे जम्मू में रह रहे हैं उनके खिलाफ कोई आरोप नहीं लगा है. स्थानीय पुलिस एक साल से उनकी पूछताछ कर रही है और उसके पास सभी की पूरी जानकारी है. हमारे सहयोगी श्रीनिवासन जैन के टज्ञ्थ वर्सेज़ हाइप में यह रिपोर्ट दिखाई कि जहां जहां रोहिंग्या रहते हैं यानी जम्मू जयपुर, दिल्ली, फरीदाबाद, मेवात में, वहां उनके खिलाफ पुलिस में किस तरह की रिपोर्ट दर्ज है. 20 जनवरी को मुख्यमंत्री महबूबी मुफ्ती ने कहा कि 'जम्मू और कश्मीर में कोई भी रोहिंग्या आतंकवाद में लिप्त नहीं पाया गया. इन विदेशियों के उग्रवादीकरण की एक भी घटना सामने नहीं आई'. जम्मू में रोहिंग्या के ख़िलाफ़ 14 एफआईआर हैं. इनमें कई प्रकार के अपराध हैं. एक अवैध रूप से सीमा पार करना भी है. 5,473 रोहिंग्या रहते हैं और इस हिसाब से अपराध दर हुआ 0.24 फीसदी है. जम्मू के आईजी पुलिस ने कहा है कि रोहिंग्या के खिलाफ़ चौंकाने वाला तो कोई आपराधिक मामला नहीं देखा है. दिल्ली में 1000 रोहिंग्या रहते हैं. पुलिस के पास इनके खिलाफ एक भी एफआईआर नहीं है. जयपुर में 350 रोहिंग्या रहते हैं, यहां के चार थानों में सिर्फ एक मामला दर्ज है. रोहिंग्या पुरुष पर एक रोहिंग्या महिला ने बलात्कार का आरोप लगाया है. हरियाणा के फरीदाबाद और मेवात में कोई केस नहीं दर्ज नहीं हुआ है. इस सभी शहरों में पुलिस का कहना है कि वे रोहिंग्या के शिविरों की लगातार निगरानी करती रहती है. चार लाख रोहिंग्या बांग्लादेश से भागने के लिए मजबूर हुए हैं फिर भी आंग सांग सू चीकहती हैं कि ज़्यादातर मुसलमान रखाइन इलाके में रह रहे हैं. उन्होंने कहा कि वे भागने वालों से बात करना चाहती हैं जो रह गए हैं उनसे भी ताकि समस्या का समाधान हो सके. उन्होंने कहा जो बांग्लादेश गए हैं, जांच वगैरह के बाद वापस आ सकते हैं. सू ची के इस बयान की आलोचना हो रही है कि उन्होंने रोहिंग्या पर ज़ुल्म ढाने वाली सेना के बारे में नहीं कहा है. दुनिया कह रही है कि रोहिंग्या की हालत देखिए, इन्हें तड़पा तड़पा कर मारा जा रहा है. ये इंसानियत का सवाल है, मज़हब का नहीं. वो तो कहिए कि खालसा एड जैसा संगठन भी हैं जो बहस को छोड़ इनकी मदद के लिए कूद पड़ा है और पूरी दुनिया में इनकी तारीफ भी हो रही है. भारत सरकार ने भी अपनी तरफ से मदद भेजी है.
जो लोग रोहिंग्या के भारत में रहने का विरोध कर रहे हैं उनके मोटा-मोटी तीन चार प्रकार के तर्क हैं. ये आतंकी संगठन से ताल्लुक रखते हैं, आतंकी गतिविधियों के लिए ज़रिया बन सकते हैं, भारत के संसाधनों पर बोझ हो सकते हैं. हमने इन तीन चार सवालों को लेकर उन चार वकीलों से बात कि वे क्यों रोहिंग्या शरणार्थी के लिए बहस करना चाहते हैं. 
रोहिंग्याओं को भारत में शरण क्यों दी जानी चाहिए?
सरकार कह रही है कि रोहिंग्याओं से आतंकवादी ख़तरा हो सकता है, इस तर्क से आप कितने सहमत हैं?
सरकार कह रही है कि रोहिंग्याओं को शरण देने से देश के संसाधनों पर बोझ पड़ेगा. इससे आप कितने सहमत हैं? क्या रोहिंग्याओं का मुद्दा उछालना किसी सियासी या चुनावी रणनीति के तहत ध्रुवीकरण की कोशिश है?
रोहिंग्या समस्या को सरकार क्या म्यांमार सरकार के साथ बातचीत कर नहीं सुलझा सकती? सरकार कह रही है कि इस मामले में कोर्ट दखल ना दे? इस मामले में डील करने का अधिकार सरकार को ही है? इस पर आप क्या सोचते हैं?

पेट्रोल के बढ़ते दाम

पेट्रोल के बढ़ते दाम देश की जनता को और मारने पर तुले हैं. ऐसे में मुंबई में सबसे अधिक 80 रुपए से अधिक भाव हो गये हैं. देश की जनता को और मारने पर तुले हैं. ऐसे में मुंबई में सबसे अधिक 80 रुपए से अधिक भाव हो गये हैं. सितंबर 2013 में अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में कच्चे तेल की कीमत 109.45 डॉलर प्रति बैरल थी. तब पेट्रोल के दाम दिल्ली में 76 रुपये 06 पैसे प्रति लीटर, कोलकाता में 83 रुपये 63 पैसे प्रति लीटर, मुंबई में 83 रुपये 62 पैसे हो गए थे. तब देश की राजनीति में तूफ़ान खड़ा हो गया था. सितंबर 2017 में अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में कच्चे तेल की क़ीमत है 54.58 डॉलर प्रति बैरल. यानी सितंबर 2013 की तुलना में इस महीने 54.89 डॉलर प्रति बैरल सस्ता है. तो दिल्ली में 70 रुपये 58 पैसे, कोलकाता में 73 रुपये 25 पैसे, मुंबई में 79 रुपये 62 पैसे प्रति लीटर के भाव क्यों हैं. कच्चे तेल के दाम में पचास फीसदी से भी ज़्यादा की कमी आ गई है मगर पेट्रोल के दाम में कमी क्यों नहीं आई है. मीडिया में महानगरों के तेल के दाम बताने का चलन है, लेकिन दूर दराज़ के शहरों के दाम देखेंगे तो दामों में काफी अंतर दिखेगा. जैसे 17 सितंबर यानी रविवार के दिन महाराष्ट्र के 3 शहरों में पेट्रोल का रेट 81 रुपये प्रति लीटर से अधिक हो गया था. मुंबई से भी ज़्यादा महंगा, मुंबई में 79 रुपये 62 पैसे प्रति लीटर है. तीन ऐसे ज़िले हैं जहां पेट्रोल 81 रुपये प्रति लीटर से भी अधिक है. ये तीनों ज़िले हैं परभणी - 81.31 प्रति लीटर, नांदेड़ में 81.19 प्रति लीटर, यवतमाल में 81.07 प्रति लीटर. उड़ीसा में सोमवार को तेल की बढ़ती कीमतों के विरोध में बीजू जनता दल ने कुछ घंटे के बंद का आहवान किया था. मगर यहां ज़्यादातर जगहों में पेट्रोल की कीमतें 70 रुपये से कम हैं. भुवनेश्वर 69.38 रुपये प्रति लीटर और कटक में 69.56 प्रति लीटर हैं. डीएमके नेता एम के स्टालिन ने रोज़ दाम बढ़ाने की व्यवस्था को वापस लेने की मांग की है. महाराष्ट्र में शिवसेना भी पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने की योजना बना रही है. कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ से लेकर कई जगहों पर प्रदर्शन किए हैं. सरकार की तरफ से भी बयान आए हैं. केंद्रीय पर्यटन राज्य मंत्री के जे आल्फोंस का बयान भी विचित्र किस्म का है. उन्होंने कहा कि 'पेट्रोल ख़रीदने वाले भूखे तो नहीं मर रहे हैं. हम उन्हीं लोगों पर कर लगा रहे हैं जो कर अदा कर सकते हैं. जिनके पास कार है, बाइक है, निश्चित रूप से वह भूखे नहीं मर रहे हैं. जो चुका सकता है उसे चुकाना चाहिए.' 
कोई भूखे मर जाएगा तभी कहेंगे कि महंगाई है. उनके बयान से लग रहा है कि जो लोग भूखे मर रहे हैं उन्हें पेट्रोल सस्ता मिलेगा, जो नहीं मर रहे हैं उन्हें महंगा मिलेगा. उनका यह तर्क व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी पर चलाए जा रहे तर्कों से मेल खाता है जिसमें समझाया जा रहा है कि जन कल्याणकारी योजनाओं के लिए पेट्रोल के दाम बढ़ाए गए हैं. अगर ऐसा था तो वित्त मंत्री को बजट में ही इसकी घोषणा कर देनी चाहिए थी. क्या परभणी के लोगों को मालूम है कि वे 81 रुपये 31 पैसे प्रति लीटर पेट्रोल ख़रीद कर देश की योजनाओं को सपोर्ट कर रहे हैं? हम पहले से कृषि कल्याण उपकर और स्वच्छ भारत उपकर दे ही तो रहे थे, ये कौन सा नया टैक्स है जो वसूला जा रहा है. डीज़ल के कारण किसानों पर क्या बीत रही है किसी किसान से पूछ लीजिए. इसका असर जुताई, सिंचाई, कटाई और छंटनी पर पड़ रहा है. ज़्यादातर जगहों में किसान खेती के लिए डीज़ल पर ही निर्भर होते हैं. करनाल के किसान ने बताया कि गेहूं की बुवाई के लिए ट्रैक्टर में बीजाई करने की मशीन लगी होती है जिसे केरा करना कहते हैं, उसका रेट बढ़ गया है. पिछले साल एक एकड़ के लिए 1000 रुपये था जो इस साल बढ़कर 1400 रुपये हो गया. सिर्फ बुवाई की लागत में 400 रुपये की वृद्धि हो गई.  पिछले साल एक एकड़ खेत में धान की कटाई के लिए कंबाइन हारवेस्टर ने 1000 रुपये लिये थे जो अब 2000 मांग रहा है. सरकार इस अनुपात में लागत मूल्य नहीं बढ़ाती है. बिहार के बगहा में किसानों ने बताया कि पहले एक बीघा खेत जोतने के लिए पांच रुपये में ट्रैक्टर मिल जाता था जो इस साल 1000 मांग रहा है. सिर्फ जुताई में लागत डबल है. सोचिए किसानों पर क्या बीतेगी. डीज़ल के दाम बढ़ने से ट्रक भाड़े में तीस से चालीस रुपये प्रति क्विंटल का अतिरिक्त भार पड़ गया है. इससे वे इतने ही घाटे में चले गए हैं. क्योंकि आलू के रेट बढ़ नहीं रहे हैं. महाराष्ट्र तक भेजने का खर्चा, आढ़त का खर्चा और कोल्ड स्टोरेज का किराया अगर जोड़ ले तो यह आलू के भाव से ज़्यादा हो जाता है. किसानों का कहना है कि पता ही नहीं चला कि दाम बढ़ रहे हैं. धीरे धीरे मीठी छुरी हमारी गर्दन पर चलती रही. तकलीफ का यही पैमाना नहीं हो सकता कि लोग सड़क पर नहीं उतरे हैं. आप किसानों की सोचिए. डीज़ल के कारण जो लागत बढ़ी है क्या उस अनुपात में एस एस पी बढ़ेगी. कभी नहीं. आम तौर पर एमएसपी 50 से 60 रुपये प्रति क्विंटल भी नहीं बढ़ती है मगर खेती की लागत में कई गुना वृद्धि हो घई जिसका असर कर्ज़ चुकाने की क्षमता पर भी पड़ेगा. पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के बयानों को भी देखिए, क्या पेट्रोल डीज़ल के दाम बढ़ने के कारण संतोषजनक हैं. सरकार तेल कंपनियों के काम में दखल नहीं देती है, उपभोक्ताओं की आकांक्षा और विकास के साथ भी हमें संतुलन बनाकर चलना है. हाईवे, रोड, रेलवे, ग्रामीण स्वच्छता, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए पैसा देना है. इसलिए टैक्स में कटौती नहीं हो सकती है. अमरीका में आए इरमा और हार्वी तूफान के कारण रिफाइनिंग क्षमता में 13 प्रतिशत की कमी आई है, इसलिए भी दाम बढ़े हैं. भारत के ग्राहकों के हित में ये डायनेमिक सिस्टम पारदर्शी और भरोसे की व्यवस्था है. आने वाले दिनों में कीमत कम भी हो सकती है. पेट्रोल और डीज़ल को जीएसटी में लाने से दाम में कमी हो सकती है. पेट्रोलियम मंत्री ने दावा किया था कि राज्य सरकारों ने पेट्रो उत्पादों पर वैट बढ़ा दिया है इससे भी दाम बढ़े हैं. लेकिन हिन्दू अखबार के संवाददाता अनिल कुमार शास्त्री की रिपोर्ट बताती है कि केंद्र ने ज्यादा वसूली की है. 2014-15 की तुलना में 2016-17 में पेट्रो उत्पादों से होने वाली कमाई दुगनी हुई है. 1 लाख 72 हज़ार करोड़ से बढ़कर 3 लाख 34 हज़ार करोड़ हो गई. साफ है कि सेंटर ने ज्यादा शुल्क बढ़ाए हैं. पेट्रोलियम उत्पादों से राज्यों को होने वाली आय में 29-30 हज़ार करोड़ की ही वृद्धि हुई है. 

Sunday, September 3, 2017

पाकिस्तानी सीरियल बागी की कहानी

इस समय पाकिस्तान में बड़ा ही अच्छा एक सीरियल आ रहा है, " बागी........." जो पाकिस्तान के प्रोग्रेसिव तबके और भारत में भी बहुत पसंद किया जा रहा है. इसमें कन्दिल बलोच की कहानी है, और इरफ़ान रिंद ने डायरेक्ट किया है. पंजाबी और उर्दू मिक्स गजब की भाषा और जगह सिंध-पंजाब की है. सबा कमर की एक्टिंग का तो मैं पहले से ही "हिन्दी मीडियम" फिल्म से दीवाना हूँ, इसमें तो वो पर्दे पर एक्टिंग को असलियत में ढाल देती हैं.
इस ड्रामा का सबसे महत्वपूर्ण उसकी भाषा है, फिर उसका बैक ग्राउन्ड जो पंजाब (पाकिस्तान) के गाँव का है. उसमें खेत खलियान, हरियाली से लेकर मिट्टी से बने घर, छप्पर, गोबर की लिपाई, दीवारों पर पीली मिट्टी की फीनिया, और तालाब. ये सब चीज़ें ड्रामा को एक खूबसूरती देते हैं. कहानी में बिल्कुल आम लड़की जो आम घर में पैदा हुई बड़े सपने लेकर. उसकी नादानियाँ जो समाज की हक़ीकत से परे थी. फिर वो जवान हुई तो भाई और बाप के ज़ोर में शादी करने को तैयार तो हुई लेकिन निकाह से भाग गई. वो आवाज़ उठाकर लड़ती है और फिर प्रेम में पड़ जाती है. हर प्रेमी की तरह उसका वाला भी सपने पूरे करने के सपने दिखाता है, उसी झाँसे में आकर वो अपने प्रेमी से शादी करती है. फिर आम महिला सी जिंदगी घर के काम, चौका बर्तन में सिमट कर सपनों की बलि चढ़ा लेती है. हर आम प्रेम कहानी की तरह उसका पति भी बदल जाता है, खुद को परमेश्वर समझ कर बार बार उसको, " तू औरत है, औकात में रह......." कहकर हुकुम झाड़ता रहता है. फिर बच्चा पैदा हुआ, और पति किसी और के प्यार में पड़ जाता है. इस बीच बीच में वो पति से लड़ती रहती है, लेकिन जब वो गर्भवती होती है उसी समय उसका पति उसको तलाक़ देकर घर से निकल देता है, और वो परिवार व मौलवी द्वारा डरा धमकाकर फिर उसके यहाँ भेज दी जाती है. लेकिन वो कहीं अख़बार या टीवी से धर्म में महिलाओं को मिली आज़ादी पर समझ बनाना शुरू कर देती है, और पुरुष प्रधान समाज का पुरुष वहाँ चिढ़ना शुरू कर देता है. वो तीन तलाक़, बहु विवाह, परदा, महिलाओं के अधिकार, उसके घर से निकलने आदि पर बात करती है. फिर एक बार बग़ावत कर देती है. यहीं तक अभी 6 एपीसोड में दिखाया है. लेकिन कन्दिल बलोच की कहानी पढ़ने पर पता चला कि वो पति को छोड़कर खुद अपने दम पर गायक और मॉडल बनेगी, फिर शहरी फेम में व्यस्त जिंदगी से तंग आकर आत्म हत्या कर लेती है. अभी तक जितना भी देखा बेहतरीन था. भारतीय सीरियल्स से तो नफ़रत होती है, लेकिन उसमें कहीं भी बोरियत और अश्लीलता ना होते हुए बहुत अच्छा सिनेमैटोग्राफ किया है. डायलॉग राइटिंग जिसकी भी है बहुत गजब है. अपने यहाँ के सीरियल्स के जैसे सास बहू और वो ख़तरनाक म्यूजिक नहीं है. सबसे बड़ी बात है इसमें समाज में उठी आवाज़ काफ़ी दूर तक जाएगी. ये बात कुछ कट्टर पंथियों को खराब भी लगी, लेकिन काफ़ी लोगों ने पसंद भी किया है. कम से कम हमारे यहाँ ऐसे सीरियल्स का आना भी बहुत ज़रूरी है. और इनको ये सीखना होगा कि हर सीरियल में मेहता और सिंघानिया साहब जैसे करोड़पति कैरेक्टर ही क्यों होते हैं, आम इंसान का संघर्ष क्यों नहीं?
पाकिस्तान की एक एक्ट्रेस हैं सबा कमर. जिनकी पहली भारतीय फिल्म " हिन्दी मीडियम" बहुत अच्छी थी. फिर मुझे उसकी एक्टिंग पसंद आ गई तो उसके बाद एक फिल्म लाहौर से आगे देखी थी, जो काफ़ी अच्छी अच्छी थी. ये मैने पहली बार कोई पाकिस्तानी फिल्म देखी थी. पाकिस्तान का सिनेमा लगभग नकारा ही माना जाता है, बशर्ते वहाँ के सीरियल्स काफ़ी अच्छे होते हैं. वहाँ सीरियल्स का बड़ा इतिहास रहा है. वो भी सास बहू वाले एकता कपूर के जैसे नहीं बड़े बड़े लेखकों के लिखे ड्रामा वाले सीरियल्स. क्योंकि वो लेखक डीडी उर्दू या पाकिस्तान रेडियो में काम करते हैं, किसी को फिल्म उद्योग में इतनी दिलचस्पी नहीं. इसलिए वो सिनेमा अलग ही सिमट कर रह गया.

Saturday, September 2, 2017

गिरती अर्थव्यवस्था कहीं नोटबंदी का नतीजा तो नहीं?

भारतीय रिज़र्व बैंक को 8 महीने लग गए यह बताने में नोटबंदी के बाद उसके खजाने में 99 फीसदी नोट वापस आ गए हैं. जबकि 8 नवंबर को नोटबंदी का एलान हुआ और 28 नवंबर को ही रिज़र्व ने प्रोविज़नल यानी अस्थायी तौर पर बता दिया था कि 8 लाख 45 लाख करोड़ वापस आ गए हैं. करीब 55 फीसदी नोट बग़ैर नोट गिनने की नई मशीनों के ही गिन लिए गए. जब संसदीय समिति बार-बार पूछती रही कि आप पूरा आंकड़ा क्यों नहीं दे रहे. तब जून में रिज़र्व बैंक ने कहा था कि उसके पास नोट गिनने की पर्याप्त मशीन नहीं है, अभी टेंडर निकलना है. इसी 17 जुलाई को यह ख़बर छपी थी. किसी को ध्यान नहीं रहा कि बैंक जब नोट देते होंगे तो गिन कर ही देते होंगे तो फिर रिज़र्व बैंक को बताने में देरी क्यों हो रही थी. यही नहीं 14 दिसंबर 2016 को रिज़र्व बैंक ने ही बयान दिया कि 80 फीसदी नोट वापस आ गए हैं यानी 12 लाख 44 हज़ार करोड़ मूल्य के पांच सौ और हज़ार के नोट वापस आ गए हैं. अब एक बार फिर से याद कीजिए कि जो रिजर्व बैंक 8 नवंबर की नोटबंदी के बाद 35 दिन के भीतर 12 लाख 44 हज़ार करोड़ गिन सकता था उसे बाकी के 3 लाख करोड़ के नोट गिनने में 13 दिसंबर से 30 अगस्त क्यों लगा. 261 दिन क्यों लगा? क्यों रिजर्व बैंक जनता के सामने शर्मिंदा होता रहा कि वो नोटों की गिनती नहीं कर पाया है. किसके लिए रिज़र्व बैंक अपनी बरसों की साख दांव पर लगा रहा था. क्या यह सब इसलिए किया गया ताकि नोटबंदी की असलीयत छिपी रहे और इस बीच चुनाव निकल जाएं, सत्ता परिवर्तन हो जाए. जनता को भी याद नहीं रहा कि रिज़र्व बैंक ने 80 फीसदी पैसे का हिसाब तो 13-14 दिसंबर को ही बता दिया था. 3 लाख करोड़ से भी कम गिनने में रिजर्व बैंक को नई मशीनों की क्यों ज़रूरत पड़ी, भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी सालाना रिपोर्ट में यह क्यों नहीं बताया कि कितनी मशीनों खरीदी गईं और कितने टेंडर निकाले गए. रिज़र्व बैंक ने सिर्फ नए नोट छापने की लागत करीब आठ हज़ार करोड़ बताई है. पुराने नोटों के मात्र 16 हज़ार करोड़ नोट आने बाकी रह गए हैं. 

मीडिया विजिल ने छापा है कि किस तरह प्रिंट यानी अख़बारात में भी इस ख़बर को सामान्य ख़बर की तरह छापा गया है. जबकि नोटबंदी के समय का भी अख़बार निकाल कर देख सकते हैं. लोगों की परेशानियों की ख़बरें भीतर के पन्नों पर सिंगल कॉलम में छपती थी और तारीफ की ख़बरें पहले पन्ने पर. नोटबंदी क्यों की गई, इस सवाल का जवाब ज़रूरी है क्योंकि उसके बाद से अर्थव्यवस्था में गिरावट की लगातार ख़बरें आ रही हैं. आज ही ख़बर आई है कि अप्रैल से जून के बीच के बीच भारत की जीडीपी गिर गई है. 6.6 फीसदी का अनुमान था, लेकिन 5.7 प्रतिशत ही जीडीपी दर्ज हुई है. जनवरी से मार्च की तिमाही में जीडीपी की दर 6.1 प्रतिशत थी. 31 अगस्त 2016 को जीडीपी की दर 7.1 प्रतिशत थी. अर्थव्यवस्था के 8 कोर सेक्टर की विकास दर घटकर 2.4 फीसदी हो गई. एक साल पहले जुलाई 2016 में विकास दर 3.1 थी.
एक प्रतिशत जीडीपी कम होने का मतलब है अर्थव्यवस्था के आकार से एक लाख तीस हज़ार करोड़ रुपये का कम हो जाना. इसका असर नौकरियों और कारोबार पर पड़ता है. एक साल से अलग अलग सेक्टर में भारतीय अर्थव्यवस्था के धीमा पड़ने की ख़बरें आ रही हैं. क्या इन्हीं सवालों की जवाबदेही से बचने के लिए दूसरे तीसरे फायदे गिनाए जा रहे हैं. पीटीआई के हवाले से वित्त मंत्री ने कहा कि पहली तिमाही के जीडीपी दर में गिरावट चिंता की बात है. बुधवार की शाम जब रिजर्व बैंक की रिपोट आई तो वित्त मंत्री नोटबंदी का बचाव कर रहे थे. कह रहे थे कि कुछ लोग नोटबंदी को नहीं समझ पा रहे हैं. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि रिजर्व बैंक ने जो आंकड़े दिए हैं अपनी वार्षिक रिपोर्ट में जो जो पैसा वापस बैंकिंग सिस्टम में डिपॉजिट हुआ डिमोनेटाइजेशन के बाद उसके संबंध में कुछ लोगों ने टिप्पणी की थी विमुद्रीकरण या डिमोनेटाइजेशन का एकमात्र उद्देश्य यही था कि लोग पैसा जमा ना कराएं और पैसा जप्त हो जाए जिन लोगों ने जीवन में कभी कालेधन के खिलाफ जंग नहीं लड़ी वह शायद इस प्रक्रिया का उद्देश्य क्या था यह समझ नहीं पाए. यह उद्देश्य किसी का पैसा जब्त करने का नहीं था. बैंकिंग सिस्टम में पैसा आ जाए इसका यह अर्थ नहीं की वह सारा वैध पैसा था. उस पैसे के खिलाफ भी टैक्स विभाग पूरी जांच करता है. कार्यवाही करता है. यही कारण है कि लाखों लोगों को नोटिस पर डाला गया है.

यह सही है कि सरकार ने कभी एक सुर से दावा नहीं किया कि कितने लाख करोड़ नोट बैंक में जमा नहीं होंगे और जितना पैसा नहीं आएगा उतना उसकी कमाई होगी. राजस्व सचिव हंसमुख आधिया ने 8 दिसंबर को कहा था कि सरकार उम्मीद करती है कि सारा पैसा बैंकिग सिस्टम में वापस आएगा, मगर सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार की राय रखते हुए अटारनी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा था. हमारे अनुमान के अनुसार लोग 10-11 लाख करोड़ बैंकों में जमा करेंगे. बाकी के 4-5 लाख करोड़ रुपये जो भारत के खिलाफ उत्तर पूर्व और जम्मू कश्मीर में इस्तमाल किए जाते हैं वो नष्ट हो जाएंगे.

कई भाषणों में कहा गया कि लोग नोट जला रहे हैं. समंदर में फेंक कर आ रहे हैं. व्हाट्स अप यूनिवर्सिटी से लेकर मीडिया के ज़रिये लोगों तक अफवाहों की शक्ल में खबरें पहुंच रही थी और जनता हतप्रभ होकर जान देकर भी वाह वाह कर रही थी. उन भाषणों का यही इशारा था कि जिनके पास काला धन है वो बैंक तक पहुंचेंगे नहीं. 14 नवंबर 2016 को यूपी के गाज़ीपुर में अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरें मोदी ने ही कहा था कि लोग गंगा में नोट बहा रहे हैं.

वो कौन था जो गंगा में नोट बहा रहा था, क्या गंगा में बहने वाला नोट भी घूम फिर कर रिज़र्व बैंक पहुंच गया है. इसी सात फरवरी को लोकसभा में प्रधानमंत्री का बयान इशारा करता है कि लोग जानना चाहते हैं कि कितने नोट बैंकों में पहुंचे. वो इसलिए जानना चाहते थे कि जो नहीं पहुंचे, उनकी संख्या क्या है ताकि नोटबंदी के असर को समझा जा सके.
अब सुविधा के अनुसार बैंकों में पैसा नहीं आने की बात को नकारा जा रहा है. जब सारा पैसा बैंक में आ गया तो क्या आतंकवादियों और नक्सलियों ने भी अपना पैसा जमा करा दिया है? अगर डिज़िटाइजेशन और करदाताओं के आधार को बढ़ाना था तो उसके लिए नोटबंदी ही क्यों ज़रूरी थी और यह बात 8 नवंबर के भाषण में क्यों नहीं कही गई. इंडिया स्पेंड और बूम लाइव डाट इन ने नोटबंदी के एलान वाले 8 नवंबर के भाषण का भी दोबारा विश्लेषण किया है. 8 नवंबर के भाषण में डिजिटल या कैशलेस का एक बार भी ज़िक्र नहीं हुआ. उसी भाषण में 18 बार काला धन और पांच बार जाली नोट का ज़िक्र आया. 27 नवंबर के भाषण में पहली बार डिजिटल और कैशलेस का इस्तमाल करते हैं. इस भाषण में नकली नोट का इस्तेमाल ही नहीं करते हैं. 
नोटंदी के पहली भाषण में पांच बार जाली नोट का ज़िक्र आया. इसे लेकर बड़ी-बड़ी बातें अनौपचारिक रूप से फैलाई गईं कि भारत में बड़ी संख्या में जाली नोट घुस गया है. लेकिन पिछले कई साल के सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि जाली नोटों के बारे में जितना प्रचार किया गया सही नहीं है. इसी 18 जुलाई को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राज्यसभा में दिए अपने लिखित बयान में बताया था कि नोटबंदी के दिन से लेकर 14 जुलाई तक 29 राज्यों में 11 करोड़ 23 लाख के जाली नोट पकड़े गए हैं. उनके बयान के 43 दिन के भीतर रिजर्व बैंक की सालाना रिपोर्ट में जाली नोटों की राशि 40 करोड़ हो जाती है. मंनी कंट्रोल पर लता वेंकटेश ने लिखा है कि सच्चाई यह है कि नकली नोटों की ज़ब्ती में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. जितने नोट चलन में हैं उनका मात्र 0.0007% ही जाली नोट ज़ब्त हुआ है. 
भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार 2016-17 में 7 लाख 62 हज़ार पीस जाली नोट बरामद हुए हैं. एक साल पहले 6 लाख 32 हज़ार पीस बरामद हुए थे. दो साल के भीतर खास अंतर तो नहीं है तो फिर जाली नोट ज़ब्त करने या बर्बाद करने के लिए नोटबंदी की क्या ज़रूरत थी. आठ अगस्त के कई अखबारों में गृह राज्य मंत्री हंसराज अहीर का लोकसभा में दिया गया बयान छपा है, वे बताते हैं कि  नोटबंदी के बाद 2000 के 9254 जाली नोट पकड़े गए हैं. 1000 और 500 के 23, 429 नोट नकली पकड़े गए हैं. इनमें से आधे नकली नोट गुजरात में पकड़े गए हैं. नोटबंदी के बाद भी नकली नोटों पर खास असर नहीं पड़ा.
वित्त मंत्री, गृह राज्य मंत्री और रिज़र्व बैंक के आंकड़े में भी काफी अंतर है. 18 जुलाई के बयान में 11 करोड़ जाली नोट पकड़ा जाता है, 8 अगस्त के बयान में ढाई करोड़ के जाली नोट पकड़े जाते हैं और 31 अगस्त की रिपोर्ट में 40 करोड़ के जाली नोट पकड़े जाते हैं. वित्त मंत्रालय का ही एक बयान है कि चार साल से ज़ब्त होने वाली नकली नोटों के मूल्य में खास बदलाव नहीं आया है. नोटबंदी के कारण भारतीय रिज़र्व बैंक की कमाई पर पड़ा है. 2015-16 में आरबीआई ने भारत सरकार को 65.875 करोड़ रुपये दिए थे. 2016-17 में आरबीआई सरकार को 30,695 करोड़ रुपये ही दे सकेगी. सरकार का बजट अनुमान था कि 58,000 करोड़ आएगा. नोटबंदी के कारण ही रिज़र्व बैंक की कमाई करीब 35,000 करोड़ कम हुई है. क्योंकि बैंकों के जमा नोट पर काफी मात्रा में ब्याज़ देना पड़ा है. रिज़र्व बैंक की घरेलु संसाधनों से होने वाली आय में करीब 10000 करोड़ की कमी आई है. बैंकों को भी काफी तकलीफ हुई. सारा नगद पैसा सिस्टम में आने से उन्हें ब्याज़ देना पड़ा. इसके चलते बैंकों ने फिक्स डिपोज़िट पर ब्याज़ कम कर दिया, तरह तरह के शुल्क लगा दिए. ये नुकसान नोटबंदी के कारण उपभोक्ता को उठाना पड़ा. 31 जुलाई की खबर के अनुसार स्टेट बैंक ने 1 करोड़ से कम जमा राशि पर ब्याज़ दर में 0.5 प्रतिशत की कटौती कर दी. 90 फीसदी खातों में 1 करोड़ से कम की राशि जमा है. इन खातों में ज़्यादातर रिटायर और साधारण लोगों का पैसा जमा रहता है. 1 करोड़ से अधिक की जमा राशि पर ब्याज़ दर नहीं घटी. अमीरों पर मेहरबानी के भी जायज़ आर्थिक तर्क हुआ करते हैं. नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट, किसान विकास पत्र पर ब्याज़ दर कम हुआ.
डिजिटल लेन देन में ज़रूर नवंबर से लेकर अभी तक 28 प्रतिशत का ग्रोथ हुआ है, लेकिन क्या यह लक्ष्य बगैर नोटबंदी के पूरा नहीं किया जा सकता था. जब से रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट आई है कांग्रेस आक्रामक हो गई है. जवाब में बीजेपी कई फायदे गिना रही है. आज तक लोगों के मैसेज आते हैं कि उनकी मां का पैसा रखा हुआ रह गया है क्या लौटेगा. भारतीय रिजर्व बैंक के बाहर 30 मार्च के पहले लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था कि उनकी कमाई का पांच-दस हज़ार किसी तरह लौट जाए मगर सरकार टस से मस नहीं हुई.  
15 अगस्त को प्रधानमंत्री ने अपने बयान में किसी बाहर की एजेंसी का हवाले से कह दिया कि 3 लाख करोड़ अतिरिक्त बैंकिंग सिस्टम में आ गया है. जब लोगों ने पूछा कि रिज़र्व बैंक से पहले ये कौन सी बाहर की एजेंसी है जिसके रिसर्च के बारे में प्रधानमंत्री ज़िक्र कर रहे हैं तो वित्त मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री लेख नहीं लिख रहे थे कि सोर्स बताना ज़रूरी है. वित्त मंत्री भूल गए कि प्रधानमंत्री 15 अगस्त को दिन पूरे देश को संबोधित कर रहे थे जिसकी गरिमा किसी भी लेख से ज़्यादा होती है. माना जाता है कि 15 अगस्त को कोई ग़लत नहीं बोलेगा. बैंकों में जमा की गई राशि में पौने दो लाख करोड़ से अधिक राशि शक के घेरे में है. कम से कम दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा कालाधन उसको बैंको तक पहुंचना पड़ा है. अब व्यवस्था के साथ उनको अपना जवाब देने के लिए मजबूर हुए हैं. नए कालेधन पर भी बहुत बड़ी रुकावट आ गई है. इस वर्ष, इसका परिणाम देखिए, 01 अप्रैल से 05 अगस्त तक इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करने वाले नए व्यक्तिगत करदाताओं की संख्या 56 लाख है. पिछले साल उसी अवधि में ये संख्या सिर्फ 22 लाख थी. दोगुना से भी ज्यादा! यह कारण कालेधन के खिलाफ हमारी लड़ाई का परिणाम है.
प्रधानमंत्री ने यह बात भी किस आधार पर कही कि तीन लाख में से दो लाख करोड़ काला धन है. भारतीय रिज़र्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में इस तरह का कोई दावा नहीं किया है कि बैंकों में इतना काला धन आया है. बयानों और आंकड़ों में इतना अंतर क्यों आ रहा है. अरुण जेटली ने तो घुमाते हुए तब कहा था कि राजस्व के आंकड़े होते हैं और संभावित राजस्व लाभ के आंकड़े होते हैं जो अलग अलग प्रकार के राजस्व विभागों के आतंरिक जांच, नोटिस, जवाब के आधार पर आधारित होते हैं. यह आरबीआई की रिपोर्ट पर निर्भर नहीं होता है. लेकिन आरबीआई ने क्या कहा है बैंकों ने रिज़र्व बैंक को बताया है कि 2016-17 में संदिग्ध लेन-देन की संख्या 4.73 लाख है. लेन-देन की संख्या बता रहे हैं, कितना संदिग्ध पैसा है ये नहीं बता रहे हैं. 2015-16 में संदिग्ध 1 लाख 6 हज़ार लेनदेन संदिग्ध थी. रिजर्व बैंक यही बता देता कि 2015-16 में जो संदिग्ध लेन देन रिपोर्ट हुई थी उसमें से कितने में काला धन निकला तो कुछ अंदाज़ा मिलता, मगर इसकी जानकारी नहीं है. अगस्त महीने में ही वित्त राज्य मंत्री संतोष गंगवार ने संसद में बयान दिया है कि 2016-17 के दौरान आयकर विभाग ने 13,715 करोड़ की अघोषित आय पकड़ी है. लेकिन यह संख्या तो कहीं से भी तीन लाख करोड़ के करीब नही है. नोटबंदी के कारण इतना विवाद हो गया है कि पहली बार हुआ जब 15 अगस्त के भाषण के बाद कई दिनों तक चेकिंग होती रही कि प्रधानमंत्री ने सही बोला है या नहीं. 15 अगस्त के दिन ही हमारे सहयोगी श्रीनिवासन जैन की टीम ने प्रधानमंत्री के करदाताओं से संबंधित आंकड़ों की फैक्ट चेकिंग की थी यानी जो कहा गया वो बात सही थी या नहीं. उनका सवाल था कितने करदाता बढ़े हैं. 

ताज़ा आर्थिक सर्वे में 5.4 लाख नए करदाता नोटबंदी के बाद जुड़े हैं. पिछले साल ये 45 फीसदी अधिक है. इसी साल वित्त मंत्री ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि 91 लाख नए करदाता जुड़े हैं. कोई समय सीमा नहीं बताई गई थी. प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त को दावा किया कि 56 लाख नए करदाता जुड़े हैं. पिछले साल की तुलना में इस वित्त वर्ष में 25 प्रतिशत करदाता बढ़े हैं. श्रीनिवासन जैन ने अपने अध्ययन से बताया कि अगर पुराने आंकड़े देखें तो 25 प्रतिशत की वृद्धि कोई बड़ी बात नहीं है. 2014-15 में 76 लाख करदाता जुड़े थे और 2016-17 में 80.7 लाख जड़े. क्या ये इतनी बड़ी उपलब्धि है जिसके लिए करोड़ों लोगों को कई दिन तक के लिए बैंकों के आगे खड़ा कर दिया गया. नोटबंदी के समय राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़े भारतीय मज़दूर संघ के अध्यक्ष से हमारे सहयोगी हिमांशु ने बात की थी. 17 जनवरी 2017 के दिन तब के अध्यक्ष बैधनाथ राय ने कहा था कि नोटबंदी के कारण कंस्ट्रक्शन सेक्टर में तीन करोड़ से ज्यादा मज़दूरों को काम न मिलने से पलायन करना पड़ा है. अगर असंगठित क्षेत्र के सभी सेक्टरों को देखा जाए तो नोटबंदी के कारण प्रभावित होने वाले मज़दूरों की संख्या 4 से 5 करोड़ है. मगर आज जब प्राइम टाइम के लिए हमने बैधनाथ राय से फोन पर बात की तो वे पलट गए, कहा कि हो ही नहीं सकता कि 4 से 5 करोड़ मज़दूरों के पलायन की बात कही हो. मगर फोन पर उन्होंने कहा कि वे कहते थे कि नोटबंदी फ्लाप है और साबित हो गया. बैधनाथ की जगह नए अध्यक्ष आ गए हैं. हिमांशु शेखर ने नए अध्यक्ष से भी बात की जिन्होंने कहा कि नोटबंदी की वजह से देश की 25 प्रतिशत आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ा है. कोई सीधे कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है कि नोटबंदी फेल हो गई है, सब इस तरह से कह रहे हैं कि भले ही अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा गई मगर राजनीतिक रूप से ये ब्रिलिएंट आइडिया था. वैसे गोदी मीडिया के दौर में इतना भी बहुत ही है.  ब्रेक के बाद आर्थिक मसलों पर लिखने वाले विवेक ला से बात करेंगे.

4 घंटे की बारिश में ढह गई स्मार्टेस्ट सिटी

मुंबई में जुलाई 2005 में 700 लोग मारे गए, हज़ारों करोड़ की बर्बादी हुई, उससे हमने क्या सबक सीखा और वो सबक कहां है इस वक्त. 2015 में चेन्नई शहर में बारिश और बांध के कारण बाढ़ का पानी घुस गया. एक मंज़िला घर डूब गए. 343 लोग मारे गए. क्या हमने कोई सबक सीखा, सीखा तो वो सबक क्या है. 10 मार्च 2017 के हिन्दू अख़बार में चेन्नई बाढ़ पर फोलोअप स्टोरी छपी है. तमिलनाडु सरकार चेन्नई की नदियों के किनारे बसे 55,000 परिवारों को हटाने की योजना बना रही है. बाढ़ के दो साल बाद राज्य एक्शन प्लान इसलिए बना रहा है क्योंकि मद्रास हाईकोर्ट ने अदयार और कूअम नदी के किनारे से अतिक्रमण हटाने को कहा है. इस 21 जुलाई को सीएजी ने संसद में एक रिपोर्ट रखी. उस रिपोर्ट में 2007 से लेकर 2016 के बीच भारत के 17 राज्यों में बाढ़ नियंत्रण की क्या तैयारी है उसकी समीक्षा की गई है. आपको हैरानी होगी कि अगस्त 2016 तक देश के 15 राज्यों और कें शासित प्रदेशों में फ्लड फोरकास्टिंग सिस्टम ही नहीं लगा है, तय हुआ था कि 100 लगाएंगे. कई जगहों पर टेलीमेट्री स्टेशन बनना था, जिससे तुरंत का तुरंत डेटा मिल जाए, एक तो बना नहीं और जहां बना वहां उपकरण वगैरह चोरी या खराब हो गए. भारत में 4,862 बांध हैं मगर 90 फीसदी के पास आपातकालीन योजना नहीं है. बिहार की बाढ़ में न जाने कितनी सड़कें बह गईं. कोई पूछने और बताने वाला नहीं है कि नदी के बहाव के रास्ते में ये सड़कें कैसे बन गईं. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अभी तक किसी भी राज्य ने अपने यहां बाढ़ के संभावित मैदानों की पहचान नहीं की है मतलब अगर पानी बढ़ा तो कहां तक फैल सकता है और उन इलाकों में घर दुकान नहीं बनाना है. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि 1981 में राष्ट्रीय बाढ़ आयोग ने बाढ़ के संभावित मैदानों की पहचान का सुझाव दिया था. असम और यूपी को छोड़ किसी ने कोई काम नहीं किया. 1975 में सेंट्रल वाटर कमीशन ने राज्यों के लिए एक आदर्श बिल बना कर दिया, मणिपुर और राजस्थान को छोड़ कर किसी ने ऐसा बिल पास नहीं किया. बिल ही पास हुआ होगा, काम तो हुआ नहीं होगा. ये हाल है हमारे देश में बाढ़ नियंत्रण की. स साल के लिए असम ने केंद से 2,392 करोड़ रुपये की मांग की है. सीएजी की रिपोर्ट पढ़कर सन्न रह गया. असम ने 2007 से 2012 के बीच 2,043 करोड़ की मांग की थी, इस पैसे का चालीस फीसदी ही अभी तक मिला है. 
1985 में हुई बारिश के बाद बीएमसी ने ब्रिटिश कंस्लटेंट वाट्सन हॉक्स्ले को नियुक्त किया कि वे शहर की योजना बना कर दें कि एक घंटे में 50 मिलिमीटर बारिश हो जाए तो कैसे निपटा जाए. आठ साल लगाकर रिपोर्ट तैयार की गई, लेकिन बीएमसी ने लागू करने में 12 साल और लगा दिए. इस प्रोजेक्ट का पूरा पैसा भी खर्च नहीं हुआ, न ही सारे सुझावों पर अमल किए गए. मुंबई की नदियं पोइसर, ओशिवारा, दहीसर, मिठी को आज़ाद करने की ज़रूरत है ताकि बारिश का पानी इनके ज़रिये बाहर प्रवाहित हो सके. मगर प्राकृतिक रास्तों का अतिक्रमण होता रहा है. अनदेखी होती रही है. बिल्डिंग बना देंगे तो पानी के निकलने का रास्ता कहां से निकलेगा. मगर हम राजस्थान की बात करेंगे. हिन्दी में भी छप रही डाउन टू अर्थ पत्रिका की इस बार की कवर स्टोरी राजस्थान पर है. अनिल अश्विनी शर्मा ने राजस्थान के बाढ़ग्रस्त इलाकों पाली, सिरोही, जालौर, बाड़मेर और जैसलमेर की तीन दर्जन से अधिक गांवो का दौरा कर यह रिपोर्ट तैयार की है. राजस्थान में बाढ़ न केवल नियमित होती जा रही है बल्कि विनाशकारी रूप धरती जा रही है. राजस्थान के पाली ज़िले में पिछले ही महीने बाढ़ आई थी. बाढ़ का पानी तो उतर गया है मगर लोग सरकार का इंतज़ार कर रहे हैं कि उनके नुकसान की भरपाई करने कब आएगी. यही पाली अगर मुंबई की पाली हिल्स होती तो टीवी वाले तूफान मचा देते. गनीमत है कि राजस्थान वाले पाली के स्थानीय लोग जनहित याचिकाओं के ज़रिए सरकार का ध्यान खींचने की कोशिश कर रहे हैं. पंह साल में बारिश वहां 15 फीसदी की रफ्तार से बढ़ती जा रही है. जलवायु परिवर्तन के कारण यह सब हो रहा है. इस साल राजस्थान के पांच ज़िलों के हज़ार से अधिक गांव बाढ़ से प्रभावित हुए हैं. बारिश के कारण नदियों की धारा बदल रही है. अनिल अश्वनी शर्मा की मेहनत से लिखी गई यह रिपोर्ट राजस्थान और बाढ़ के बारे में समझ ही बदल देती है. अच्छी बात है कि हिन्दी में ऐसी रिपोर्ट लिखी गई है. आमतौर पर पर्यावरण पर पढ़ने लायक लेख अंग्रेज़ी में ही लिखे जाते हैं. 

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...