फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक जीएसटी आने के बाद कंपोजिट स्कीम में आए व्यापारियों ने टैक्स चोरी अधिक की है. कंपोज़िशन स्कीम क्या है, इसे ठीक से समझना होगा। "छोटी कंपनियों के लिए रिटर्न भरना आसान हो इसलिए यह व्यवस्था बनाई गई है। उनकी प्रक्रिया भी सरल है और तीन महीने में एक बार भरना होता है." आज की तारीख़ में कंपोज़िशन स्कीम के तहत दर्ज छोटी कंपनियों की संख्या करीब 15 लाख है. जबकि सितंबर में इनकी संख्या 10 से 11 लाख थी। इनमें से भी मात्र 6 लाख कंपनियों ने ही जुलाई से सितंबर का जीएसटी रिटर्न भरा है. इन 6 लाख कंपनियों ने मात्र 250 करोड़ का टैक्स दिया है. इन कंपनियों का औसत टर्नओवर 2 लाख है। अगर आप पूरे साल का इनका डेटा देखें तो मात्र 8 लाख है। समस्या यह है कि जिन कंपनियों का या फर्म का सालाना 20 लाख से कम का टर्नओवर हो उन्हें जीएसटी रिटर्न भरने की ज़रूरत भी नहीं है। इसका मतलब है कि छोटी कंपनियां अपना टर्नओवर कम बता रही हैं। भारत की व्यवस्था आप जानते ही हैं कि दस लाख कंपनियों का आडिट करने में ज़माना गुज़र जाएगा। इस रिपोर्ट के आधार पर कहा जा सकता है कि बड़े पैमाने पर कर चोरी की छूट दी जा रही है। आखिर जीएसटी के आने से कर चोरी कहां बंद हुई है? क्या 20 लाख से कम के टर्नओवर पर रिटर्न नहीं भरने की छूट इसलिए दी गई ताकि कंपनियां इसका लाभ उठाकर चोरी कर सकें और उधर नेता जनता के बीच ढोल पीटते रहें कि हमने जीएसटी लाकर चोरी रोक दी है। जीएसटी फाइल करने को आसान बनाने के नाम पर राजनेता से लेकर जानकार तक यह सुझाव दे रहे हैं कि कंपोज़िशन स्कीम के तहत कंपोज़िशन स्कीम के तहत डेढ़ करोड़ के टर्नओवर वाली कंपनियों को भी शामिल किया जाए। यह ज़रूर कुछ ऐसा खेल है जिसे हम आम पाठक नहीं समझते हैं मगर ध्यान से देखेंगे तो इस खेल को समझना इतना भी मुश्किल नहीं है। कंपोज़िशन स्कीम के तहत 20 लाख टर्नओवर की सीमा को बढ़ा कर डेढ़ करोड़ करने की कोई ज़रूरत नहीं है बल्कि टैक्स चोरी रोकने के लिए ज़रूरी है कि 20 लाख से भी कम कर दिया जाए। बिजनेस स्टैंडर्ड में श्रीमि चौधरी की रिपोर्ट पर ग़ौर कीजिए। CBDT ( central board of direct taxex) को दिसंबर की तिमाही का अग्रिम कर वसूली का के आंकड़ो को जुटाने में काफी मुश्किलें आ रही हैं। दिसंबर 15 तक करदाताओं को अग्रिम कर देना होता है। चोटी की 100 कंपनियों ने जो अग्रिम कर जमा किया है और जो टैक्स विभाग ने अनुमान लगाया था, उसमें काफी अंतर है। मिलान करने में देरी के कारण अभी तक यह आंकड़ा सामने नहीं आया है। नवंबर की जीएसटी वसूली काफी घटी है। वित्तीय घाटा बढ़ गया है। सरकार ने 50,000 करोड़ का कर्ज़ लिया है। ऐसे में अग्रिम कर (Advance Tax) वसूली का आंकड़ा भी कम आएगा तो विज्ञापनबाज़ी का मज़ा ख़राब हो जाएगा। अधिकारियों ने कहा है कि हर तिमाही में हमारे आंकलन और वास्तविक अग्रिम कर जमा में 5 से 7 फीसदी का अंतर आ ही जाता है मगर इस बार यह अंतर 15 और 20 फीसदी तक दिख रहा है।
Sunday, December 31, 2017
वित्तीय घाटा
देश का राजकोषीय घाटा मौजूदा वित्त वर्ष के खत्म होने के चार महीने पहले ही तय लक्ष्य को पार कर गया है. नवंबर महीने के अंत में यह लक्ष्य का 112 फीसदी हो गया है. महालेखा नियंत्रक द्वारा शुक्रवार को जारी रिपोर्ट के अनुसार ऐसा अप्रत्यक्ष कर (जीएसटी) संग्रह के कम रहने और खर्च के ज्यादा रहने के चलते हुआ है. ऐसे में वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.2 फीसदी तक सीमित रखने का लक्ष्य पूरा न हो पाने की आशंका है. जानकारों के अनुसार यदि ऐसा हुआ तो आने वाले महीनों में महंगाई और बढ़ सकती है.रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल से नवंबर के बीच देश का राजकोषीय घाटा (सरकार के आय और खर्च का अंतर) 6.12 लाख करोड़ रुपये हो गया है. पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में यह पूरे साल के तय लक्ष्य का केवल 86 फीसदी था. हालांकि वित्त वर्ष 2016-17 में सरकार का लक्ष्य इसे जीडीपी के 3.5 फीसदी तक रखने का लक्ष्य था. महालेखा नियंत्रक के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2017-18 में सरकार को अब तक कुल 8.04 लाख करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ. यह 15.15 लाख करोड़ रुपये के बजट लक्ष्य का केवल 53 फीसदी है. पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में वार्षिक लक्ष्य का करीब 58 फीसदी राजस्व प्राप्त हुआ था. इससे पहले जारी हुए आंकड़ों के अनुसार नवंबर में जीएसटी संग्रह पिछले पांच महीनों में सबसे कम (80,808 करोड़ रुपये) रहा था. जानकारों के अनुसार ऐसा कई सारी वस्तुओं का कर स्लैब घटाने से हुआ. इसके एक महीने पहले अक्टूबर में 83,000 करोड़ रु का जीएसटी संग्रह हुआ था.
आम आदमी पार्टी में फिर घमासान
इस समय आम आदमी पार्टी में राज्य सभा सीटों को लेकर लड़ाई अंतिम दौर में है. केजरीवाल बनाम कुमार विश्वास की लड़ाई का आखिरी अध्याय लिखा जा रहा है. इसमें हार कुमार विश्वास की ही होनी है और इसी के डर से वे अब तक कोई फैसला नहीं ले पा रहे थे. लेकिन आगे ऐसा कर पाना मुश्किल है. दिल्ली में राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं. जनवरी के पहले हफ्ते में ही इनके नाम की घोषणा होनी है. दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी के 70 में से 66 विधायक हैं, इसलिए तीनों सीटें आम आदमी पार्टी को मिलना तय है. लेकिन अरविंद केजरीवाल किसे उम्मीदवार बनाएंगे यह अभी तक तय नहीं हुआ है. गुरुवार को आम आदमी पार्टी के दफ्तर पर कुमार विश्वास के समर्थन में जबरदस्त नारेबाजी हुई. सोशल मीडिया पर कुमार को राज्यसभा उम्मीदवार बनाने की मुहीम शुरू है. इसका खुला समर्थन कुमार विश्वास खुद भी कर रहे हैं. वे ट्विटर पर हर उस ट्वीट को लाइक कर रहे हैं जो उन्हें राज्यसभा उम्मीदवार बनाने की पैरवी करती है. लेकिन जब कुमार के समर्थकों ने आम आदमी पार्टी के दफ्तर पर हल्ला बोला तो उन्होंने इससे खुद को अलग करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि वे ‘मुद्दों के लिए संघर्ष करें, मेरे हित-अहित के लिए नहीं. स्मरण रखिए अभिमन्यु के वध में भी उसकी विजय है.’ उनके इस लिखने से भी अंदाजा हो जाता है कि अब ये करीब-करीब तय हो चुका है कि अरविंद केजरीवाल उन्हें राज्यसभा नहीं भेजेंगे. सुनी-सुनाई है कि कुमार विश्वास को पार्टी के दो-तीन बड़े नेताओं ने बता दिया है कि उनका संसद पहुंचना नामुमकिन है. इसलिए वे वैकल्पिक व्यवस्था की तैयारी में जुट गये हैं. हाल-फिलहाल में जिन लोगों ने कुमार विश्वास से बात की, उनमें से कुछ का मानना है कि वे खुद पार्टी नहीं छोड़ेंगे. वे खुद को पार्टी के ‘टॉप थ्री’ नेताओं में से एक मानते हैं. वे पिछले दिनों बार-बार कहते सुने गए कि अभी जितने लोग पार्टी में शीर्ष पर हैं उनमें से वे, अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया ही पार्टी के ‘फाउंडर मेंबर’ हैं. इसलिए वे पार्टी क्यों छोड़ें, ये पार्टी तो उनकी है. वे कई बार खुद को मनीष सिसौदिया से भी ज्यादा लोकप्रिय बताते हैं. वे कहते हैं कि अरविंद केजरीवाल के बाद उनकी जनसभा की सबसे ज्यादा मांग की आती है. इस हिसाब से पार्टी में उनकी हैसियत नंबर दो की है, मनीष सिसौदिया की नहीं. यह बात मनीष को नागवार गुजर रही है. इस वजह से कुमार विश्वास को केजरीवाल ने नहीं मनीष सिसौदिया ने किनारे लगाया है. कुमार विश्वास और मनीष सिसौदिया दोनों बचपन के मित्र हैं. एक ही साथ पढ़े-लिखे और बड़े हुए. जब अन्ना आंदोलन हुआ तो मनीष की वजह से ही कुमार विश्वास आंदोलन से जुड़े और फिर अरविंद केजरीवाल के करीब आए. जब अन्ना से अलग होने का फैसला हुआ तब भी मनीष सिसौदिया से अपने संबंध की वजह से कुमार ने केजरीवाल की सियायत का रास्ता पकड़ा. जब पार्टी से प्रशांत भूषण और योगेंद्र योदव को निकाला गया तब भी मनीष सिसौदिया के ही कहने पर कुमार विश्वास ने उऩके निष्कासन की घोषणा की थी. लेकिन पिछले कुछ महीने में यह दोस्ती टूट सी गई है. कुमार विश्वास से पहले राजस्थान का कामकाज मनीष सिसौदिया ही देखते थे. उस दौरान वहां आम आदमी पार्टी का कोई खास संगठन नहीं था, बस कुछ पदाधिकारी थे जो मनीष ने ही बनाए थे. लेकिन केजरीवाल और कुमार विश्वास के बीच हुए पिछले समझौते के तहत कुमार को राजस्थान की जिम्मेदारी सौंपी गई. राजस्थान में अजमेर लोकसभा सीट पर उपचुनाव होने वाले हैं. सुनी-सुनाई है कि अरविंद केजरीवाल से ज्यादा मनीष सिसौदिया चाहते थे कि कुमार विश्वास अजमेर से चुनाव लड़ें. राजस्थान इकाई के कई नेताओं के जरिए उनका नाम दिल्ली भिजवाया भी गया. लेकिन अपनी हार तय मानकर कुमार विश्वास ने चुनाव लड़ने के बजाय राज्यसभा की सीट पर अपनी दावेदारी बरकरार रखी. इसके बाद से उनकी केजरीवाल के साथ-साथ अपने पुराने मित्र मनीष सिसौदिया से भी बातचीत बंद है. कुमार तीन राज्यसभा सीट में से एक अपने नाम करना चाहते हैं, अरविंद केजरीवाल तीन में से एक सीट अपने मित्र संजय सिंह के नाम कर चुके हैं. बाकी दो सीटों पर सस्पेंस है. लेकिन इतना तय है कि यह अब कुमार विश्वास को नहीं मिलने वाली.
तीन तलाक़ पर बना क़ानून
एक बार में तीन तलाक़ विधेयक (मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक) लोकसभा में गुरुवार को पारित हो गया. लंबी बहस के बाद बिल के ख़िलाफ़ सभी संशोधन खारिज कर दिये गये यानी इसे बिना किसी संशोधन के पास कर दिया गया. अब इसे राज्यसभा में पेश किया जायेगा. विधेयक पर विपक्षी सदस्य 19 संशोधन प्रस्ताव लेकर आए थे, लेकिन सदन ने सभी को ख़ारिज कर दिया. तीन संशोधनों पर वोटिंग की मांग की गई और वोटिंग होने के बाद स्पीकर सुमित्रा महाजन ने परिणामों की घोषणा करते हुए कहा कि ये ख़ारिज हो गए हैं. इस बिल में तीन साल के जेल का प्रावधान है. बिल के अनुसार अगर कोई तलाक़ देता है तो उसे थाने से नहीं कोर्ट से जमानत नहीं मिलेगी. क़ानून मंत्री ने बहस के दौरान कहा, "देश की महिलाएं बहुत पीड़ित हुआ करती थीं. 22 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया था. आज सुबह मैंने पढ़ा रामपुर की एक महिला को तीन तलाक़ इसलिए दिया गया क्योंकि वो सुबह देर से उठी थी. महिलाओं की गरिमा से जुड़ा है तीन तलाक़. सुप्रीम कोर्ट से भी एक बार में तीन तलाक़ को असंवैधानिक बताया जा चुका है. उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद देश में स्थितियां बदलेंगी, लेकिन जहां इस साल 300 तीन तलाक़ हुए हैं वहीं सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी 100 तीन तलाक़ हुए हैं. हम इस मामले को वोट के चश्मे से नहीं देख रहे हैं. सवाल सियासत का नहीं, हम इसे इंसानियत के चश्मे से देख रहे हैं. आरोप परिवार को तोड़ने का लगाया जा रहा है. लेकिन यह सवाल तब क्यों नहीं उठता जब तलाक़ देकर महिला को फुटपाथ पर रहने के लिए मजबूर किया जाता है." विदेश राज्य मंत्री एम जे अकबर ने तीन तलाक़ पर बिल लाने को ऐतिहासिक मौका बताया. उन्होंने कहा, "यह ऐतिहासिक इसलिए है क्योंकि देश की 9 करोड़ मुस्लिम महिलाओं की तकदीर से जुड़ा है."
उन्होंने एक किस्सा सुनाया, "एक पत्रकार थीं ताया जिनकिन. अंग्रेज़ी अख़बार द गार्डियन की रिपोर्टर. यह बात 1960-61 की है. उन्होंने जवाहर लाल नेहरू से प्रश्न किया कि आपकी सबसे बड़ी कामयाबी क्या है.
जवाहर लाल ने कहा, "हिंदू कोड बिल."
ताया जिनकिन ने फिर पूछा, "क्या मुसलमान औरतों का हक नहीं था बदलाव का."
जवाहर लाल ने जवाब दिया, "वक्त सही नहीं था."
"मेरे मन में पिछले 40 सालों से यह सवाल है कि वक्त कब सही आयेगा."
"लोगों को यह बताया जाता है कि इस्लाम ख़तरे में है. शरीया को बर्बाद किया जा रहा है. मैं मुसलमान के नाते बोलना चाहता हूं कि जो कलमा पढ़ा है तो वो किस हैसियत से यह कह सकता है कि इस्लाम खतरे में है. लेकिन आपने आज़ादी से पहले देश तोड़ने के लिए इस्तेमाल किया और आज समाज तोड़ने के लिए, ज़हर ये फ़ैलाया जा रहा है. केवल कुछ मुसलमान मर्दों की जबरदस्ती खतरे में है."
"शरीया क्या है? शरीया का असल मायने क़ानून नहीं है. इसका मतलब जरिया या रास्ता है. रास्ता फलसफा था लेकिन कानून बनाने वाले इंसान थे. सुन्नियों में कम से कम शरीया के चार स्कूल हैं. चारों के अपने अपने लोग अलग अलग हैं. एक हैं इमाम अबू हनीफ़ा, दूसरे इमाम मालिकी, तीसरे इमाम शाफ़ई और चौथे इमाम हंबल हैं. चार किस्म के क़ानून हैं. ये कहना कि क़ानून नहीं बदले जा सकते, ग़लत है. कानून को इज्तेहाद की बुनियाद पर तब्दील किया जाना चाहिए.'
असम से सिल्चर से कांग्रेस की सांसद सुष्मिता देव ने क़ानून मंत्री से सवाल पूछा, "अगर आप इसे अपराध बनायेंगे और पति को जेल भेजेंगे तो महिला और उसके बच्चे का का भरण-पोषण कौन करेगा? अगर महिलाओं का ख्याल है तो क्या महिला आरक्षण विधेयक भी सरकार संसद में लाएगी? सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में तीन तलाक़ को प्रतिबंधित कर दिया है. अगर मुस्लिम महिलाओं के उत्थान का विचार है तो मुस्लिम महिलाओं के लिए एक फंड बनाया जाये जो पति के जेल जाने की स्थिति में उसके भरण पोषण के लिए इस्तेमाल किया जाये."
हैदराबाद से एआईएमआईएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, "संसद को इस मसले पर क़ानून बनाने का कोई क़ानूनी हक नहीं है क्योंकि ये विधेयक मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है. ये संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है. सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही तलाक-ए-बिद्दत को रद्द कर दिया है. देश में पहले से क़ानून हैं, घरेलू हिंसा निवारण अधिनियम है, आईपीसी है. आप वैसे ही काम को फिर से अपराध घोषित नहीं कर सकते. इस बिल में विरोधाभास हैं. ये बिल कहता है कि जब पति को जेल भेज दिया जाएगा, तब भी सहवास का अधिकार बना रहेगा. उसे भत्ता देना होगा."
"ये कैसे संभव है कि जो आदमी जेल में हो और भत्ता भी अदा करे. आप कैसा क़ानून बना रहे हैं. मंत्री जी ने शुरुआत में ही कहा कि बिल पर मशविरा नहीं किया गया है. अगर ये बिल पास हो जाता है तो मुस्लिम महिलाओं के साथ नाइंसाफ़ी होगी. लोग अपनी पत्नियों को छोड़ देंगे. देश में 20 लाख ऐसी महिलाएं हैं, जिन्हें उनके पतियों ने छोड़ दिया है और वो मुसलमान नहीं हैं. उनके लिए क़ानून बनाए जाने की ज़रूरत है. इनमें गुजरात में हमारी भाभी भी है. उन्हें इंसाफ़ दिलाए जाने की ज़रूरत है. ये सरकार ऐसा नहीं कर रही है."
वैसे एक राय इस बारे में यह भी रही है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद तलाक-ए-बिद्दत की कोई कानूनी हैसियत न रहने की वजह से यह निरर्थक हो ही चुका है। लिहाजा अलग से कानून बनाने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन सच्चाई यह है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद यह चलन बंद नहीं हुआ है। हाल ही में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एक प्रफेसर द्वारा वॉट्सऐप पर तलाक दिए जाने की खबर आई थी। ऐसे मामलों में पीड़ित बीवी पुलिस के पास जाती है तो कानून की गैरमौजूदगी में पुलिस भी कुछ नहीं कर पाती। सरकार इस कमी को दूर करना चाहती है। मानना पड़ेगा कि तलाक-ए-बिद्दत जैसे सदियों से चले आ रहे चलन की सामाजिक मान्यता इतनी जल्दी खत्म नहीं होगी।
कानून कुछ भी कहे, अगर किसी महिला को उसका शौहर तीन बार तलाक कह देता है तो उसकी हैसियत परित्यक्ता जैसी ही हो जाती है। कानून का संरक्षण इस विपत्ति से उबरने में उसकी मदद कर सकता है। इसके अलावा ऐसा करने वाले शौहरों के मन में कानून का खौफ पैदा होगा, जिससे वे गुस्से की हालत में भी अपनी जुबान पर लगाम लगाने की कोशिश करेंगे। हां, इसमें कोई शक नहीं कि ऐसा कोई कानून भरपूर सावधानी की मांग करता है, ताकि इसमें कोई धार्मिक भेद-भाव न खोजा जा सके। पीड़ित महिलाओं को सुरक्षा देने के साथ ही मुस्लिम पुरुषों में भी यह भरोसा बनाए रखना होगा कि बतौर धार्मिक अल्पसंख्यक, इस देश में उनकी पहचान पर कोई आंच नहीं आने वाली।
Saturday, December 23, 2017
अब 2 जी स्पेक्ट्रम हुआ ही नहीं?
पांच साल तक 2जी घोटाले का प्रचार करके राजनीति होती रही. तो क्या उस झूठ के उजागर होने के बाद टूजी के झूठ घोटाले पर ही हमें वैसा ही असर देखने को मिलेगा? यह सवाल भी खड़ा होगा कि झूठे आरोप लगाने वालों ने इस झूठे आरोप से क्या क्या कमाया. यह सवाल भी कि झूठ के जरिए हासिल वह बेजा कमाई क्या उनसे वसूली जाएगी? जिन पर ये झूठे आरोप लगे थे उन्हें उस झूठ के कारण कितना नुकसान हुआ? क्या उस बेजा नुकसान की भरपाई संभव है? और आखिरी सवाल यह कि भविष्य में झूठे आरोपों से बचाव की क्या व्यवस्था बन सकती है? इसे भ्रष्टाचार का मामला बताकर इसका नामकरण घोटाला किया गया था. इस झूठे आरोप में भ्रष्टाचार का आकार ऐतिहासिक रूप से सबसे बड़ा बनाया गया था यानी एक लाख 76 हजार करोड़. उसके पहले देश की जनता ने सिर्फ चार छह हजार करोड़ के ही आरोप सुने थे. आमतौर पर उन घोटालों के आरोप भी सिर्फ बड़े कारोबारियों पर ही लगते थे. लेकिन पिछली यूपीए सरकार को तबाह करने के लिए एक लाख 76 हजार करोड़ के घपले घोटाले के आरोप बनाए गए थे. और वाकई आरोपबाजों को तबकी सरकार की छवि को घोर भ्रष्टाचारी बनाने में कामयाबी भी मिल गई थी. मीडिया में जिस तरह से इन आरोपों को जांच पड़ताल के पहले ही सबसे बड़ा भ्रष्टाचार साबित करके दिखाया गया था उसका असर हुए बग़ैर रह भी नहीं सकता था. आखिर 2014 के चुनाव में यूपीए सरकार को जनता ने बेदखल कर दिया था. यह साबित करने के लिए किसी बहस की जरूरत नहीं कि पिछले चुनाव में यूपीए सरकार की हार के कारणों में इस 2जी आवंटन में गड़बड़ी के झूठे आरोपों की कितनी बड़ी भूमिका थी. मामला यह कहते शुरू किया गया था कि सरकार की नीतियों से सरकार के खजाने को एक लाख 76 करोड़ का नुकसान हुआ और जल्दी ही इसे घूसखोरी और महाघोटाले के नाम से प्रचारित कर दिया गया था. अदालत से सब के सब आरोपी बरी हो गए. घूस के लेन देन का कोई सबूत पैदा नहीं किया जा सका. यह आरोप भी नहीं लग सकता कि सरकार ने खुद को बचाने के लिए सीबीआई का इस्तेमाल कर लिया. क्योंकि जांच पड़ताल का काम होते समय सरकार उस राजनीतिक दल की बन गई थी जिसने विपक्ष में रहते हुए आरोप लगाए थे. इसमें क्या कोई शक हो सकता है कि मौजूदा सरकार ने एड़ी से चोटी का दम लगाया होगा कि किसी तरह यह घोटाला साबित हो जाए. उसे यह भी आभास होगा कि यह मामला अगर घोटाला साबित न हुआ तो उसे लेने के देने पड़ जाएंगे. और वही लेने के देने पड़ गए. मौजूदा सरकार पर यह गैरअदालती मुकदमा शुरू हो गया है कि उसने झूठे आरोप लगाकर पिछली सरकार को हटाकर सत्ता हथियाई थी. यानी एक तरह से अब मौजूदा सरकार पर झूठे आरोप का महाघोटाला करने का गैरअदालती मुकदमा शुरू हो गया है. सब जानते हैं कि 2जी का मामला तबके कॉम्पट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल विनोद राय के जरिए बनवाया गया था. उन्होंने ही एक लाख करोड़ की भारी भरकम रकम की अविश्वसनीय फिगर निकालकार रिपोर्ट में दर्ज की थी. बाद में यह 2जी आबंटन रद्द करके दुबारा आबंटन करके भी देख लिया गया था कि सरकार के खजाने में इतनी बड़ी रकम आ ही नहीं सकती थी. सो आरोपों का आधार पहले ही खिसक गया था. लेकिन राजनीतिक नफे नुकसान के चक्कर में मामला चलता रहा और उम्मीद लगाई जाती रही कि जब तक ये आरोप अदालत में चलते रहेंगे तब तक पुरानी सरकार की गर्दन पकड़े रहने में आसानी बनी रहेगी. लेकिन मौजूदा सरकार के चार साल होने को आ रहे थे. अदालत में इसे और लंबा टिकाए रखने की सारी हद पार हो चुकी थी. सो अदालती फैसला करना ही पड़ा और उसमें सब बरी हो गए.
सबसे ज्यादा ए राजा ने, उससे थोड़ा कम कनिमोई ने, उससे थोड़ार कम पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने. राजा और कनिमोई तो जेल में बंद तक रहीं. ये सब जनप्रतिनिधि थे. सो उस जनता ने भी दुख और जलालत उठाई जिसने उन्हें चुनकर सरकार में भेजा था. खैर शर्मिंदगी से गुस्साई जनता ने अपनी जलालत कम करने के लिए बाद में अपने प्रिय नेताओं से बदला ले लिया. जनता ने यूपीए को बेदखल कर दिया. वैसे एक तरह से यह भी कहा जा सकता है कि आरोप लगाने वालों ने जनता के जरिए यूपीए को बेदखल करवा दिया. लेकिन आज देखें तो जनता को ही सबसे ज्यादा नुकसान भुगतना पड़ा. कम से यह नुकसान तो जनता को हुआ ही कि वह अपराधबोध में आ गई है. आरोप लगाने वाले लोग अभी भी घाटे में नहीं हैं. वे ज्यादातर लोग सत्ता में हैं. इन आरोपों का अधिकतम लाभ वे पिछले चुनाव में ले चुके हैं. हालांकि इस मामले में सभी आरोपियों के बरी होने के बाद भी झूठे आरोप लगाने वाले लोग चुप नहीं बैठेंगे. वे जरूर चाहेंगे कि एक के बाद एक ऊंची अदालतों में यह मामला किसी न किसी तरह चलता रहे. इस बात के कहने का आधार यह है कि मौजूदा सरकार की तरफ से उसके वित्तमंत्री ने कहा है कि कांग्रेस इस मामले में सभी आरोपियों के बरी होने को बेकसूर होने का प्रमाणपत्र न माने. हालांकि वे खुद एक बड़े वकील हैं और वे ही कह रहे हों कि अदालत से बरी होना प्रमाणपत्र नहीं है तो यह बात इस बात का संकेत है कि सरकार मामले को ऊंची अदालत में चलवाती रहेगी. इस तरह से वह लंबे समय तक अपने ऊपर लगने वाले इस आरोप से बचती रहेगी कि उसने झूठ बोलने का महाघोटाला किया है. अदालत से आरोपियों के बरी होने के बाद भी वह यह कहती रहेगी कि मामला ऊंची अदालत में विचाराधीन है. यह बात कानूनी मामले में तो कारगर हो सकती है लेकिन जनता के बीच झूठ का जो संदेश चला गया है, उसे मिटाने की कोई जुगाड़ आसान नहीं है. इधर 2019 का चुनाव सिर पर हैं.
लगता है बिल्कुल नहीं बन पाएगा. राजनीति तो टिकी ही प्रचार प्रसार पर है. सरकार कोई भी हो, वह तो अपनी झूठी उपलब्धियों को भी प्रचार के रथ पर सवार कर देती है. कितनी बार आश्वासनों के झूठ का पर्दाफाश होते जनता ने अपनी आखों से देखा है. लेकिन वायदों पर यकीन करने के अलावा उसके पास दूसरा चारा क्या है. हालांकि गौर से देखें तो झूठ और सच के बीच फर्क के लिए उसे अजमाकर देखना उतना जरूरी भी नहीं है. एक विकल्प यह भी है कि उसका निपटारा अक्ल लगाकर, सोच समझकर, विचार विमर्श के जरिए, परामर्श के जरिए हाल के हाल भी किया जा सकता है. मसलन 2जी मामले में जितनी अविश्वसनीय आकार की रकम के घोटाले का आरोप लगाया जा रहा था उसके झूठ को क्या पहली नज़र में ही साफ साफ नहीं देखा जा सकता था. जो जानकार और अनुभवी लोग सच्चाई देखकर बता रहे थे उनपर भ्रष्टाचारियों के साझेदार का आरोप लगाकर चुप कराया जा रहा था. यानी जब हम चैतरफा झूठ से घिरे हों तो 2जी के झूठ के पर्दाफाश का आखिरी ऐलान होने में भी अड़चन ही है.
मोदी जी ने गुजरात चुनाव जीता लेकिन राहुल ने दिल
कांग्रेस के नए अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए विधानसभा चुनाव के नतीजे अच्छे रहे. गुजरात में कांग्रेस की संतुष्टि इस बात को लेकर है कि पिछले 6 चुनावों के बाद पहली बार कांग्रेस जमीन पर लड़ती दिखाई दे रही थी. कांग्रेस के नए राजनीतिक समीकरण के जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को किला बचाने के लिए धुआंधार रैलिया करनी पड़ी. परिणाम बीजेपी के पक्ष में रहा, लेकिन राहुल गांधी के लिए कई मायनों में ये नतीजे उत्साह बढ़ाने वाले है. बीजेपी के मुकाबले गुजरात में कांग्रेस का संगठन कमज़ोर था. राहुल गांधी ने पार्टी के नेताओं की मदद से कांग्रेस को मुकाबले में लाकर खड़ा कर दिया. कांग्रेस के सांसद और यूथ कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राजीव सातव कहते हैं, 'अगर राहुल गांधी पहले से प्रचार की शुरुआत न करते तो नतीजे और खराब हो सकते थे. राहुल गांधी इस चुनाव में फाइटर की तरह उभर कर निकले और नतीजों की परवाह किए बिना काम करते रहे.' कांग्रेस की विरोधी शिवसेना ने भी उनकी तारीफ की है. कांग्रेस पार्टी के बाहर कार्यकर्ताओं का जोश बता रहा था कि राहुल गांधी अध्यक्ष बनने के बाद पहले इम्तेहान में पास हो गए हैं. हालांकि राहुल गांधी को डिस्टिन्क्शन की उम्मीद थी, जो नहीं मिल पाया. हालाँकि राहुल गांधी ने गुजरातियों का दिल जीता है. राहुल गांधी ने भी कहा कि वह गुजरात और हिमाचल की जनता को धन्यवाद करते हैं, जिन्होंने उनके प्रति इतना प्यार दिखाया है.
हिमाचल प्रदेश की हार से कांग्रेस की सत्ता सिर्फ पांच राज्यों मे सिमट गई है, लेकिन कार्यकर्ता निराश नहीं हैं. उनमें राहुल गांधी को लेकर जो संशय था वो कुछ हद तक दूर हुआ है, क्योंकि गुजरात चुनाव में कांग्रेस के नए अध्यक्ष के लिए एक लिट्मस टेस्ट भी था. कार्यकर्ता कह रहे कि जिस तरह राहुल गांधी ने लीड किया, उससे ये आशा जगी कि 2019 में कांग्रेस की स्थिति राहुल गांधी की अगुवाई में बेहतर हो सकती है. राहुल गांधी गुजरात के चुनाव में नए तेवर के साथ दिखे, जो पार्टी के लिए फायदेमंद रहा. वह मैदान भले नहीं मार पाए, लेकिन पार्टी के भीतर खुद को साबित करने में कामयाब रहे. कांग्रेस के युवा नेता और गुजरात चुनाव में पार्टी का कामकाज देख रहे आसिफ जाह का भी कहना है कि राहुल गांधी जनता से कनेक्ट करने में कामयाब रहे. राहुल गांधी ने बेरोजगारी, जीएसटी, नोटबंदी और किसानों का मुद्दा उठाया, जिससे जनता का भरोसा राहुल गांधी पर बढ़ा है. कांग्रेस के भीतर और बाहर भी राहुल गांधी को लेकर कई सवाल खड़े किए जा रहे थे. खासकर निर्विरोध अध्यक्ष निर्वाचित होने पर शहज़ाद पूनावाला ने खुलेआम सवाल उठाए. राहुल गांधी की राजनीतिक समझ पर अक्सर लोग उंगली उठाते रहे हैं. गुजरात के नतीजों ने राहुल गांधी को इन सब के बीच मज़बूत किया है. अगर नतीजे एकतरफा बीजेपी के पक्ष में जाता तो राहुल गांधी पर सवाल उठना लाज़िमी था. गुजरात में प्रचार का दारमोदार राहुल पर ही था. चुनाव के दौरान भी सेंटर स्टेज पर राहुल गांधी ही थे. पार्टी के प्रदेश के नेता राहुल गांधी के साथ दिखे ज़रूर, लेकिन लाइमलाइट में राहुल ही रहे. बीजेपी ने भी राहुल गांधी को ही टारगेट किया, चाहे वो सोमनाथ का मसला हो या फिर आरक्षण को लेकर पाटीदार अनामत आंदोलन के मसौदे की बात रही हो. गुजरात चुनाव कांग्रेस के लिए संजीवनी तो नहीं बन पाए, लेकिन पार्टी को निराशा से बाहर लाने में मददगार ज़रूर हुए हैं. हालांकि आगे राहुल गांधी की चुनौती आसान नहीं रहने वाली. सामने नरेंद्र मोदी अमित शाह की जोड़ी है, जिसने विपरीत परिस्थिति में बीजेपी को गुजरात में जीत दिला दी है. दोनों ही नेता 24 घंटे राजनीति के बारे में सोचते हैं, सटीक फैसले लेते हैं. चाहे यूपी के चुनाव रहे हों, महाराष्ट्र में शिवसेना से अलग होकर विधानसभा और नगर निगम चुनाव में जाने का फैसला हो या फिर दिल्ली में नगर निगम चुनाव में सभी मौजूदा पार्षदों का टिकट काटने का फैसला हो, ये सभी फैसले चुनाव की कसौटी पर खरे साबित हुए हैं. राहुल गांधी को इनकी सूझबूझ और एनर्जी लेवल की बराबरी करनी पड़ेगी. 2014 के आम चुनाव के बाद बीजेपी ने कई चुनाव जीते. बीजेपी के संगठन में भी कई बदलाव देखने को मिले, लेकिन कांग्रेस में अब तक मामूली फेरबदल ही हो पाया है. कांग्रेस के अध्यक्ष ने कहा है कि कांग्रेस में जल्दी ही बदलाव होगा और नए लोगों को पार्टी में काम करने का मौका मिलेगा. राहुल गांधी को 2018 की शुरुआत में ही फेरबदल करना पड़ेगा, क्योंकि 2019 के चुनावों में ज्यादा वक्त नहीं बचा है. इस बीच चार बड़े राज्यों कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव हैं. कांग्रेस के पास नेताओं का अभाव नहीं है. राजस्थान को छोड़ दें तो बाकी दोनों राज्यों में बीजेपी की सत्ता को 15 साल हो जाएंगे.
कांग्रेस में नया उत्साह बढ़ाने के लिए राहुल गांधी को इन चार राज्यों में तो ज़ोर लगाना ही पड़ेगा. साथ ही साथ लोकसभा चुनाव की तैयारी भी करनी पड़ेगी. नया गठबंधन भी बनाने की ज़िम्मेदारी बहुत हद तक राहुल के कंधों पर रहेगी. हालांकि इस मामले में सोनिया गांधी राहुल गांधी का मार्गदर्शन करती रहेंगी. राहुल गांधी को बीजेपी के चाणक्य का मुकाबला करने के लिए सीनियर नेताओं का सहयोग लेना पड़ सकता है. एनसीपी के नेता प्रफुल्ल पटेल ने कहा भी कि 'कांग्रेस अगर उनके साथ होती तो नतीजे और अच्छे होते.' ज़ाहिर है ये प्रफुल्ल का तंज़ था, राहुल गांधी के लिए शरद पवार और लालू प्रसाद जैसे सहयोगी नेताओं को डील करना भी चैलेंज है. ये लोग ऐन मौके पर ऐसे फैसले ले सकते हैं, जो कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हो सकते हैं. लालू ने साफ कहा है कि ये अभी तय नहीं है कि 2019 में चुनाव राहुल की अगुवाई में लड़ा जाएगा. राहुल गांधी को इन नेताओं को साथ लेकर चलने का सबक भी यूपीए 1-2 के कांग्रेस के सीनियर नेताओं के साथ बैठकर समझना पड़ेगा.
Saturday, December 16, 2017
गुजरात एक्ज़िट पोल्स पर एक नज़र
गुजरात और हिमाचल प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव को लेकर कराए गए एग्ज़िट पोल में दोनों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी को बहुमत मिलने की बात की गई है. एग्ज़िट पोल के अनुमान, गुरुवार को गुजरात विधानसभा चुनाव के दूसरे दौर के मतदान के बाद जारी किए गए. दोनों राज्यों में मतगणना 18 दिसंबर को होनी है. गुजरात चुनाव को लेकर करीब दो हफ़्ते पहले जो ओपिनियन पोल जारी किया गया था, उसमें भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर का अनुमान ज़ाहिर किया गया था. तो कुछ दिनों में ऐसा क्या बदला कि एग्ज़िट पोल में भारतीय जनता पार्टी का मत प्रतिशत बढ़ा हुआ दिखाया गया है? दरअसल "ओपिनियन पोल दूसरे चरण के चुनाव से पहले किया गया, जबकि एग्ज़िट पोल चुनाव के बाद. इस दौरान दो हफ़्तों में कई चीज़ें बदलीं. बीजेपी ने काफी आक्रामक चुनाव प्रचार किया. खासकर प्रधानमंत्री ने ताबड़तोड़ रैलियां कीं, जिसके असर से वोटरों का मन बदल गया."
गुजरात और हिमाचल को लेकर आए एग्ज़िट पोल में भारतीय जनता पार्टी की जीत का दावा किया गया है. लेकिन ज़रूरी नहीं कि एग्ज़िट पोल का अनुमान हर बार सही साबित हो. बिहार और दिल्ली के पिछले विधानसभा के चुनावों के बाद आए एग्ज़िट पोल से वास्तविक नतीजे काफी अलग थे. बिहार में महागठबंधन ने बीजेपी को हराकर सरकार बनाई तो दिल्ली के नतीजों ने सबको चौंका दिया. जहां आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 सीटों पर जीत दर्ज की. ऐसे कई मामलों में एग्ज़िट पोल की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं. "ऐसा नहीं है कि बिहार में एग्ज़िट पोल के सारे नतीजे एकदम उलट थे. कुछ एग्ज़िट पोल ने बीजेपी की जीत दिखाई थी तो कुछ ने महागठबंधन की जीत का अनुमान भी जताया था. जीत हार का अंतर कितना था, इस पर चर्चा ज़रूर हो सकती है." "वहीं दिल्ली विधानसभा चुनाव के वक्त एग्ज़िट पोल ट्रेंड दिखा रहे थे. हां ये ज़रूर है कि कोई ये नहीं कह रहा था कि आम आदमी पार्टी की इतनी बड़ी जीत होगी. ज़्यादा से ज़्यादा 50-52 या 38-40 सीट का अनुमान लगाया गया था." किसी भी पोल के लिए एक सैंपल बनाया जाता है. इस सैंपल में कुछ हज़ार लोग होते हैं. ये लोग राज्य के ही मतदाता होते हैं और इनकी संख्या उसी अनुपात में होती है, जितनी की राज्य में है. इसमें ग्रामीण, शहरी, अलग-अलग धर्म, जाति, लिंग और वर्ग के लोगों को उसी अनुपात में रखा जाता है जितने वो राज्य में हैं. इन सब लोगों से बात की जाती है और जानने की कोशिश की जाती है कि उन्होंने किस पार्टी को वोट दिया या देने वाले हैं? अगर इन सब बातों का ध्यान रखा जाए तो काफ़ी हद तक आपका अनुमान सही हो सकता है. लेकिन अगर सैंपल में अनुपात गलत हुआ तो उलटफेर होने की गुंजाइश रहती है. पश्चिमी देशों में एग्ज़िट या ओपिनियन पोल का अनुमान ज़्यादा सटीक होता है, लेकिन भारत में असल नतीजे इस तरह के पोल से अलग भी मिलते हैं. भारत में अभी सुधार की ज़रूरत है. लेकिन ये भी सच है कि जितनी विविधता भारत के मतदाताओं के बीच है, उतनी पश्चिमी देशों में नहीं है. वहां लोगों में धर्म, जाति की काफ़ी हद तक समानता है. यहां के मुकाबले वहां चुनाव लड़ने वाली पार्टियां कम होती हैं. यही वजह है कि वहां एग्ज़िट पोल के नतीजे सटीक होने की संभावना ज़्यादा है. भारत ही नहीं, कोई भी देश जहां विविधता और पार्टियां ज्यादा हैं, नतीजों में अंतर की गुंजाइश ज़्यादा रहती है. सारे एग्ज़िट पोल संकेत दे रहे हैं कि गुजरात और हिमाचल प्रदेश में बीजेपी को बढ़त है. ये बढ़त कितनी बड़ी होगी ये अलग बात है लेकिन ये ज़रूर तय है कि कांग्रेस 22 साल बाद भी गुजरात चुनाव जीतने में सफल नहीं होगी. अब इंतज़ार है 18 दिसंबर का जब दोनों विधानसभाओं के असल नतीजे आएंगे.
Sunday, December 10, 2017
मणि शंकर अय्यर ने राहुल की मेहनत पर फेरा पानी.
कांग्रेस ने 22 साल में पहली बार गुजरात में ऐसे सियासी समीकरण सेट किए थे, कि बीजेपी का कोई भी अस्त्र काम नहीं आ रहा था. राहुल गांधी ने गुजरात की युवा त्रिमूर्ति के जरिए बीजेपी के खिलाफ घेराबंदी करने के लिए जातिगत फॉर्मूला बनाया था, जो राज्य में कांग्रेस के सत्ता का वनवास खत्म करने की उम्मीद जगा रहा था. इन सबके बीच मणिशंकर अय्यर की फिसली जुबान ने बीजेपी को संजीवनी दे दी है. अय्यर के बयान से गुजरात में कांग्रेस के जीत का जायका बिगड़ता हुआ नजर आ रहा है. मणिशंकर अय्यर ने गुरुवार को नरेंद्र मोदी के लिए 'नीच' शब्द का इस्तेमाल किया. इसके बाद बीजेपी ने अय्यर के बयान को लेकर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया. हालांकि, कांग्रेस ने कुछ घंटे के अंदर ही अय्यर को निलंबित कर दिया लेकिन जो सियासी माहौल बनना था बीजेपी ने उसे हवा दे दी. पीएम नरेंद्र मोदी ने सूरत की चुनावी रैली में कहा, 'अय्यर कहते हैं कि मोदी नीच जाति का है. ये गुजरात का अपमान है. मुगल संस्कार वालों को मेरे जैसे अच्छे कपड़े पहनना सहन नहीं होता है. आपने हमें गधा और गंदी नाली का कीड़ा कहा. 18 तारीख को मतपेटियां बताएगी कि गुजरात के बेटे के अपमान का बदला कैसे लिया जाता है.' हालांकि कांग्रेस ने मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले मणिशंकर अय्यर को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया है. साथ ही मामले में कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है. अय्यर के बयान से सिर्फ नरेंद्र मोदी और बीजेपी ही आहत नहीं हुई हैं बल्कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के माथे पर भी पसीने आ गए. राहुल गांधी अय्यर के बयान के सियासी मायने बखूबी समझते हैं. इसीलिए उन्होंने ट्वीट कर बयान की निंदा की है और मोदी से माफी मांगने की बात भी कही. राहुल गांधी इस बात से वाकिफ हैं कि उन्होंने पिछले चार महीनों से जिस कदर गुजरात की जमीन पर उतरकर काम किया है. राज्य में वेंटिलेटर पर कांग्रेस में जान दिखने लगी थी. राहुल नवसृजन यात्रा के जरिए गुजरात में सियासी फसल उगाने की कोशिश कर रहे थे. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस बार गुजरात के रणभूमि में जातीय सियासी बिसात बिछाई थी. कांग्रेस ने गुजरात के युवा त्रिमूर्ती हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश को अपने साथ मिलाकर जीत का ख्वाब संजोया था. गुजरात में पटेलों की नाराजगी बीजेपी की चिंता का सबब बना हुआ था. कांग्रेस ओबीसी सहित आदिवासी और दलित मतों में सेंधमारी लगाने में जुटी थी, जिससे बीजेपी परेशान थी. बीजेपी की लाख कोशिशों के बावजूद हिंदुत्व की हवा नहीं बन पा रही थी. राहुल गांधी शुरू से ही सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर चल रहे थे. इसीलिए बीजेपी का ये कार्ड भी सफलता का पाला छू नहीं पा रहा था. पीएम मोदी के गुजरात अस्मिता कार्ड चल रहे थे और अपने आपको गुजरात का बेटा बता रहे थे. इसके बावजूद उनकी रैलियों से कहीं ज्यादा भीड़ हार्दिक पटेल की रैली में जुट रही थी. बीजेपी इसकी काट नहीं तलाश पा रही थी. ऐसे में मणिशंकर अय्यर के बयान ने बीजेपी को ब्रह्मास्त्र दे दिया.
आख़िर क्या है FRDI बिल?
10 अगस्त 2017 में लोकसभा में पेश हुए फाइनेंशियल रेज़्यूलेशन एंड डिपोज़िट इंन्श्योरेंस बिल को लेकर चर्चा हो रही है. 18 अगस्त को यह बिल लोकसभा की संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दी गई, इस समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश नहीं की है मगर इसके कुछ प्रावधानों को लेकर मीडिया में चर्चा है कि बैंकों में जमा आपका पैसा सुरक्षित नहीं है. अब बैंक चाहें तो देने से मना कर सकते हैं. यह बिल इसलिए लाया गया है ताकि बैंकिंग सेक्टर की मॉनिटरिंग के लिए एक रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन बनाया जा सके. यह निगम डूबते हुए बैंक के खाताधारखों के पैसे की बीमा का मापदंड भी तय करेगा. नए प्रावधानों में कहा गया है कि खाताधारकों के जमा पैसे का इस्तेमाल बैंक को उबारने में किया जा सकता है. डिपोजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन भी खत्म किया जाना है. जिसके तहत खाताधारकों को 1 लाख रुपये तक लौटानी की गारंटी मिली है. आपके खाते में अगर दस लाख जमा है, बैंक डूब गया तो सिर्फ एक लाख तक मिलेगा. नौ लाख रुपया समझिए डूब गया. इसकी जगह बैंकों को छूट दी जाएगी कि वो आपका पैसा लौटाएंगे या नहीं. अगर लौटाएंगे तो किस रूप में. कहीं लंबे समय के लिए निवेश कर दिया तो आप गए काम से. बैंकों का एनपीए बढ़कर 6 लाख करोड़ से बढ़ गया है. बैंकों के लिए यह बुरी ख़बर तो होती ही है, आपके लिए भी है क्योंकि बैंक डूबेंगे तो आपका पैसा भी डूबेगा. नए प्रावधान के अनुसार डूबते बैंकों से कहा जाएगा कि आप ख़ुद ही बचा लो, खाताधारक को पैसा मत दो. विवाद बिल के चैप्टर 4 सेक्शन 2 को लेकर भी है. इसके मुताबिक रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन रेग्यूलेटर से सलाह-मश्विरे के बाद ये तय करेगा कि फाइनेन्शियल रेज़्यूलेशन एंड डिपोज़िट इंन्श्योरेंस बिल. दिवालिया बैंक के जमाकर्ता को उसके जमा पैसे के बदले कितनी रकम दी जाए. वो तय करेगा कि जमाकर्ता को कोई खास रकम मिले या फिर खाते में जमा पूरा पैसा. जून 2017 में स्टेट बैंक का नॉन परफॉर्मिंग असेट एनपीए बढ़कर 1,88,069 करोड़ हो गया है. स्टेट बैंक की तरह ही पांच अन्य सरकारी बैंक हैं जिनका एनपीए इतना बढ़ गया है कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने उन्हें तत्काल कुछ करने की चेतावनी दी है. सरकारी रिपोर्ट बताती है कि आम भारतीय का 63 फीसदी पैसा सार्वजनिकि क्षेत्र के बैंकों में जमा है, 18 फीसदी ही निजी बैंकों में जमा है. अगर ये सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक डूबे तो बड़ी संख्या में कस्टमर प्रभावित हो जाएंगे. मीरा नांगिया ने लिखा है कि बेल-इन नाम से एक प्रावधान आ रहा है जो प्रस्तावित रेजोलुशन कॉरपोरेशन को अधिकार देगा कि वह बैंकों की लायबिलिटी को रद्द कर दे यानी या बैंक लंबे समय तक के लिए निवेश कर दे, आपको दे ही न. जो पैसा आप बैंकों में फिक्स डिपोज़िट या आम डिपोज़िट जमा करते हैं उसे लायबिलिटी कहते हैं. बैंक आपसे वादा करता है कि आप जब पैसा मांगेंगे तब वह लौटा देगा. अब इस बेल इन के आने के बाद कहा जा रहा है कि बैंक आपको पैसा देने से मना कर सकते हैं. हो सकता है कि बदले में आपको कुछ शेयर दे दें, कोई सिक्योरिटी दे दें. कई जानकारों ने लिखा है कि बैंकों में अब आपका पैसा सुरक्षित नहीं रहेगा. या तो पैसा डूब जाएगा या फिर उस पैसे को बैंक अपनी खातिर कहीं निवेश कर देगा. जिस तरह से आप किसी कंपनी का शेयर खरीदते हैं उसी तरह से बैंकों में पैसा जमा करना हो जाएगा. यह एक बड़ा बदलाव है. बैंकिंग एसोसिएशन के लोगों ने कहा है कि वह भी इस बिल के प्रावधान से सहमत नहीं हैं. बैंक के लिए अब बैल- आउट दरअसल बैल-इन बनने जा रहा है. मतलब, पहले जब कोई बड़ा उद्योगपति किसी बैंक को लोन वापस नहीं करता था और बैंक कंगाली की कगार पर आ जाता था तो सरकार अपनी जेब से पैसे देकर उस बैंक की मदद करती थी जिसे बेल-आउट पैकेज भी कहते हैं. लेकिन अब इस कानून के ज़रिए बेल-इन सिस्टम बना दिया जाएगा यानी देश के आम लोगों का पैसा जो उनके बैंक खातों में जमा है, उसे बैंक हड़प लेगा और उद्योगपतियों का लोन माफ़ करते हुए अपने नुकसान की भरपाई कर लेगा. और ये सबकुछ आपकी मर्ज़ी के बिना किया जाएगा. आलोचनाओं के बाद सरकार ने कहा है कि सरकार कस्टमर के पैसे की सुरक्षा को लेकर प्रतिबद्ध है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने ट्वीट किया है कि फाइनेन्शियल रेज़्यूलेशन एंड डिपोज़िट इंन्श्योरेंस बिल संसद की स्थायी समिति के अधीन है. सरकार की मंशा वित्तीय संस्थानों और खाताधारकों के हितों को सुरक्षित रखना है. यही नहीं वित्त मंत्रालय की तरफ से एक सफाई भी आई है. जिसमें कहा गया है कि मीडिया में बिल में बेल-इन के प्रावधानों को लेकर गलतफहमी फैलाई जा रही है. संसद में जो बिल पेश किया गया है उससे खाताधारकों की मौजूदा सुरक्षा में कोई बदलाव नहीं किया गया है. बिल में पार्दर्शी तरीके से खाताधारकों के लिए सुरक्षा के नए प्रावधान शामिल किये गए हैं. देखते हैं संसदीय समिति इस मामले में क्या रिपोर्ट देती है.
Saturday, December 2, 2017
बिखरती सपा बसपा की राजनीति
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद मैं एसपी और बीएसपी की राजनीति पर लगातार नज़र रख रहा हूँ क़ि कैसे ये एक राज्य के मजबूत दल एक राष्ट्रीय पार्टी के हाथो ख़त्म हो रहे हैं. इनके कार्यकर्ताओं से लेकर कई जिला और मंडल स्तर के पदाधिकारियों से भी इसपर चर्चा होती रही लेकिन उनकी बातों में कभी उस वापसी का जुनून नहीं दिखता है. और न इनके नेताओं में वो उर्जा. बीएसपी ने भले ही नगर पालिका में कुछ सीटें जीतकर वापसी की उम्मीद जगाई है लेकिन इन चुनावों का पार्टी से बहुत कम लेना देना होता है. कई बार जातीय समीकरण फिट हो गये, तो कई बार प्रत्याशी की निजी छवि.हाँ भाजपा के लिए ऐसा कह सकते हैं क़ि जनता के मूड में हो कि राज्य और केंद्र में जिसकी सरकार होगी वही शहर का अच्छा विकास कर पाएगा. कई बार जीती हुई पार्टी की लहर भी काम कर जाती है. लेकिन 2012 के विधान सभा चुनावों के बाद हुए चुनावों में 45 सीटों वाली बीजेपी ने 16 में से 10 सीटें जीती थी. शहरी इलाक़ों में उसकी पकड़ पहले से ही अच्छी है. अब तो पूरे यूपी में.
बीएसपी के कई बड़े नेता खुद सपा में जा चुके हैं या जाना चाहते हैं. सोसल मीडिया से लेकर ज़मीन तक पर युवा कार्यकर्ता अब सपा को बेहतर पार्टी मानते हैं बसपा के मुक़ाबले. लेकिन सपा? मुझे याद है अखिलेश यादव ने एक इंटरव्यू में कहा था कि अब कुर्सी नहीं रही तो झगड़ा कैसा? लेकिन आप अभी भी देखिए तो सांगठनिक तौर पर पार्टी के हालत बद से बदतर हैं. युवा कार्यकर्ता साइकिल चलाने, संघर्ष करने, और व्हाट्सएप चलाने वाला तो अखिलेश के साथ है. वो प्रचार कर सकते हैं लेकिन वोट अपना ही डाल सकते हैं. लेकिन 35 साल से अधिक उम्र के नेता जो पब्लिक का वो दिला सकते हैं वो अभी भी नाराज़ हैं शिवपाल सिंह यादव को दरकिनार करने के कारण. बड़े चुनावों में यूपी के ग्रामीण क्षेत्रों का अभी भी अधिकतर वोट मैथड उसी तरह का है जो किसी मुखिया, प्रधान या बड़े आदमी के कहने से वोट करते हैं. मैं कानपुर नगर से लेकिन देहात और कन्नौज के ऐसे कई नेताओं को जनता हूँ जो शिवपाल की सम्मान सहित वापसी के बिना सपा को कभी नहीं उबरने देंगे. उन नेताओं की भी मजबूरी है, पूर्व में मुलायम सिंह की सरकारों में उनको खूब सत्ता लाभ मिला है. संयोगवश वो एक जाति विशेष के हैं जैसे आज की तारीख में बीजेपी सरकार में तथाकथित अगड़ी जाति का वर्चस्व है. दूसरी बात नीतियों दूसरी बात सरकार की नीतियों का विरोध पार्टी उस तरह से नहीं कर पा रही है. अखिलेश एक प्रेस कांफ्रेंस करके चले जाते हैं जब मीडिया ही साथ नहीं तो कितने लोगों तक आपकी बात पहुच पाई? उनको दूसरी पार्टियों से नेता लाने की बजाय अपने रूठे नेताओं को मानना चाहिए. जो कोशिश अब आम आदमी पार्टी करना चाहती है योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को मनाकर. अभी मुलायम सिंह यादव के जन्म दिन पर हुई रैली में उन्होंने अखिलेश से एक अहम बात कही क़ि, "आप लोग सांप्रदायिकता का सामना कैसे नहीं कर पा रहे हैं? जब अयोध्या में गोली चली थी तब भी 109 सीटें आई थी. तो कुछ लोगों ने कहा क़ि अगर तब सोसल मीडिया होता तो आपको भी सीटें न मिलती. लेकिन जब भाजपा आपके ही टेक्नॉलॉजी का प्रयोग आपके खिलाफ कुप्रचार में कर सकती है तो आप काउंटर कैसे नहीं कर पाते हैं? आप अपनी लोहिया वादी समाजवादी नीतियों या विचार धारा को ही फैला दें तो ही बड़ी बात है. आरक्षण पर बार बार वार होता है, नीति आयोग से एससी एसटी का फंड काट लिया जाता है, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोज़गार की हालत खराब है तो भी आपको मुद्दों की कमी लगती है. वो जितनी बार अयोध्या ले जाएँ आप उतनी बार रोज़गार और भुखमरी पर सवाल करो. कैसे नहीं मानेगी जनता? आपकी ही समाजवादी आर्थिक नीति पर तो कांग्रेस और बीजेपी भी कभी मनरेगा तो कभी शिक्षा और खाने का अधिकार और एक रुपए में बीमा देकर लोगों के वोट बटोरती हैं. यही तो है समाजवाद? लेकिन आप उसपर बात तक नहीं करना चाहते? हो सकता है ईवीएम गड़बड़ हो? बसपा ने तो कभी इसके खिलाफ प्रदर्शन भी किया, सपा तो कभी बोल ही ना पाई? इसी प्रदेश में न जाने कितने लोग हैं जो धर्म की राजनीति नहीं चाहते लेकिन आप उनके मुद्दे उठाते ही नहीं बस आज़म ख़ान जैसे लोगों के चक्कर में बीजेपी के जाल में फँसते जाते हैं. वैसे भी अब आम आदमी पार्टी भी यूपी में आ रही है एक विकल्प के तौर पर अगर आप नहीं सुधरे तो किसी और को मौका मिलेगा.
Subscribe to:
Comments (Atom)
राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट
*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...
-
*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...
-
कुछ ही दिन पहले पूर्व फिल्म अभिनेत्री तनुश्री दत्ता और अब कंगना रनौट द्वारा साथी कलाकारों व फिल्म निर्देशकों पर लगाए गए यौन उत्पीड़न के ...
-
इस समय पाकिस्तान में बड़ा ही अच्छा एक सीरियल आ रहा है, " बागी........." जो पाकिस्तान के प्रोग्रेसिव तबके और भारत में भी बहुत प...