एक बार में तीन तलाक़ विधेयक (मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक) लोकसभा में गुरुवार को पारित हो गया. लंबी बहस के बाद बिल के ख़िलाफ़ सभी संशोधन खारिज कर दिये गये यानी इसे बिना किसी संशोधन के पास कर दिया गया. अब इसे राज्यसभा में पेश किया जायेगा. विधेयक पर विपक्षी सदस्य 19 संशोधन प्रस्ताव लेकर आए थे, लेकिन सदन ने सभी को ख़ारिज कर दिया. तीन संशोधनों पर वोटिंग की मांग की गई और वोटिंग होने के बाद स्पीकर सुमित्रा महाजन ने परिणामों की घोषणा करते हुए कहा कि ये ख़ारिज हो गए हैं. इस बिल में तीन साल के जेल का प्रावधान है. बिल के अनुसार अगर कोई तलाक़ देता है तो उसे थाने से नहीं कोर्ट से जमानत नहीं मिलेगी. क़ानून मंत्री ने बहस के दौरान कहा, "देश की महिलाएं बहुत पीड़ित हुआ करती थीं. 22 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया था. आज सुबह मैंने पढ़ा रामपुर की एक महिला को तीन तलाक़ इसलिए दिया गया क्योंकि वो सुबह देर से उठी थी. महिलाओं की गरिमा से जुड़ा है तीन तलाक़. सुप्रीम कोर्ट से भी एक बार में तीन तलाक़ को असंवैधानिक बताया जा चुका है. उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद देश में स्थितियां बदलेंगी, लेकिन जहां इस साल 300 तीन तलाक़ हुए हैं वहीं सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी 100 तीन तलाक़ हुए हैं. हम इस मामले को वोट के चश्मे से नहीं देख रहे हैं. सवाल सियासत का नहीं, हम इसे इंसानियत के चश्मे से देख रहे हैं. आरोप परिवार को तोड़ने का लगाया जा रहा है. लेकिन यह सवाल तब क्यों नहीं उठता जब तलाक़ देकर महिला को फुटपाथ पर रहने के लिए मजबूर किया जाता है." विदेश राज्य मंत्री एम जे अकबर ने तीन तलाक़ पर बिल लाने को ऐतिहासिक मौका बताया. उन्होंने कहा, "यह ऐतिहासिक इसलिए है क्योंकि देश की 9 करोड़ मुस्लिम महिलाओं की तकदीर से जुड़ा है."
उन्होंने एक किस्सा सुनाया, "एक पत्रकार थीं ताया जिनकिन. अंग्रेज़ी अख़बार द गार्डियन की रिपोर्टर. यह बात 1960-61 की है. उन्होंने जवाहर लाल नेहरू से प्रश्न किया कि आपकी सबसे बड़ी कामयाबी क्या है.
जवाहर लाल ने कहा, "हिंदू कोड बिल."
ताया जिनकिन ने फिर पूछा, "क्या मुसलमान औरतों का हक नहीं था बदलाव का."
जवाहर लाल ने जवाब दिया, "वक्त सही नहीं था."
"मेरे मन में पिछले 40 सालों से यह सवाल है कि वक्त कब सही आयेगा."
"लोगों को यह बताया जाता है कि इस्लाम ख़तरे में है. शरीया को बर्बाद किया जा रहा है. मैं मुसलमान के नाते बोलना चाहता हूं कि जो कलमा पढ़ा है तो वो किस हैसियत से यह कह सकता है कि इस्लाम खतरे में है. लेकिन आपने आज़ादी से पहले देश तोड़ने के लिए इस्तेमाल किया और आज समाज तोड़ने के लिए, ज़हर ये फ़ैलाया जा रहा है. केवल कुछ मुसलमान मर्दों की जबरदस्ती खतरे में है."
"शरीया क्या है? शरीया का असल मायने क़ानून नहीं है. इसका मतलब जरिया या रास्ता है. रास्ता फलसफा था लेकिन कानून बनाने वाले इंसान थे. सुन्नियों में कम से कम शरीया के चार स्कूल हैं. चारों के अपने अपने लोग अलग अलग हैं. एक हैं इमाम अबू हनीफ़ा, दूसरे इमाम मालिकी, तीसरे इमाम शाफ़ई और चौथे इमाम हंबल हैं. चार किस्म के क़ानून हैं. ये कहना कि क़ानून नहीं बदले जा सकते, ग़लत है. कानून को इज्तेहाद की बुनियाद पर तब्दील किया जाना चाहिए.'
असम से सिल्चर से कांग्रेस की सांसद सुष्मिता देव ने क़ानून मंत्री से सवाल पूछा, "अगर आप इसे अपराध बनायेंगे और पति को जेल भेजेंगे तो महिला और उसके बच्चे का का भरण-पोषण कौन करेगा? अगर महिलाओं का ख्याल है तो क्या महिला आरक्षण विधेयक भी सरकार संसद में लाएगी? सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में तीन तलाक़ को प्रतिबंधित कर दिया है. अगर मुस्लिम महिलाओं के उत्थान का विचार है तो मुस्लिम महिलाओं के लिए एक फंड बनाया जाये जो पति के जेल जाने की स्थिति में उसके भरण पोषण के लिए इस्तेमाल किया जाये."
हैदराबाद से एआईएमआईएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, "संसद को इस मसले पर क़ानून बनाने का कोई क़ानूनी हक नहीं है क्योंकि ये विधेयक मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है. ये संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है. सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही तलाक-ए-बिद्दत को रद्द कर दिया है. देश में पहले से क़ानून हैं, घरेलू हिंसा निवारण अधिनियम है, आईपीसी है. आप वैसे ही काम को फिर से अपराध घोषित नहीं कर सकते. इस बिल में विरोधाभास हैं. ये बिल कहता है कि जब पति को जेल भेज दिया जाएगा, तब भी सहवास का अधिकार बना रहेगा. उसे भत्ता देना होगा."
"ये कैसे संभव है कि जो आदमी जेल में हो और भत्ता भी अदा करे. आप कैसा क़ानून बना रहे हैं. मंत्री जी ने शुरुआत में ही कहा कि बिल पर मशविरा नहीं किया गया है. अगर ये बिल पास हो जाता है तो मुस्लिम महिलाओं के साथ नाइंसाफ़ी होगी. लोग अपनी पत्नियों को छोड़ देंगे. देश में 20 लाख ऐसी महिलाएं हैं, जिन्हें उनके पतियों ने छोड़ दिया है और वो मुसलमान नहीं हैं. उनके लिए क़ानून बनाए जाने की ज़रूरत है. इनमें गुजरात में हमारी भाभी भी है. उन्हें इंसाफ़ दिलाए जाने की ज़रूरत है. ये सरकार ऐसा नहीं कर रही है."
वैसे एक राय इस बारे में यह भी रही है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद तलाक-ए-बिद्दत की कोई कानूनी हैसियत न रहने की वजह से यह निरर्थक हो ही चुका है। लिहाजा अलग से कानून बनाने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन सच्चाई यह है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद यह चलन बंद नहीं हुआ है। हाल ही में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एक प्रफेसर द्वारा वॉट्सऐप पर तलाक दिए जाने की खबर आई थी। ऐसे मामलों में पीड़ित बीवी पुलिस के पास जाती है तो कानून की गैरमौजूदगी में पुलिस भी कुछ नहीं कर पाती। सरकार इस कमी को दूर करना चाहती है। मानना पड़ेगा कि तलाक-ए-बिद्दत जैसे सदियों से चले आ रहे चलन की सामाजिक मान्यता इतनी जल्दी खत्म नहीं होगी।
कानून कुछ भी कहे, अगर किसी महिला को उसका शौहर तीन बार तलाक कह देता है तो उसकी हैसियत परित्यक्ता जैसी ही हो जाती है। कानून का संरक्षण इस विपत्ति से उबरने में उसकी मदद कर सकता है। इसके अलावा ऐसा करने वाले शौहरों के मन में कानून का खौफ पैदा होगा, जिससे वे गुस्से की हालत में भी अपनी जुबान पर लगाम लगाने की कोशिश करेंगे। हां, इसमें कोई शक नहीं कि ऐसा कोई कानून भरपूर सावधानी की मांग करता है, ताकि इसमें कोई धार्मिक भेद-भाव न खोजा जा सके। पीड़ित महिलाओं को सुरक्षा देने के साथ ही मुस्लिम पुरुषों में भी यह भरोसा बनाए रखना होगा कि बतौर धार्मिक अल्पसंख्यक, इस देश में उनकी पहचान पर कोई आंच नहीं आने वाली।
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