उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद मैं एसपी और बीएसपी की राजनीति पर लगातार नज़र रख रहा हूँ क़ि कैसे ये एक राज्य के मजबूत दल एक राष्ट्रीय पार्टी के हाथो ख़त्म हो रहे हैं. इनके कार्यकर्ताओं से लेकर कई जिला और मंडल स्तर के पदाधिकारियों से भी इसपर चर्चा होती रही लेकिन उनकी बातों में कभी उस वापसी का जुनून नहीं दिखता है. और न इनके नेताओं में वो उर्जा. बीएसपी ने भले ही नगर पालिका में कुछ सीटें जीतकर वापसी की उम्मीद जगाई है लेकिन इन चुनावों का पार्टी से बहुत कम लेना देना होता है. कई बार जातीय समीकरण फिट हो गये, तो कई बार प्रत्याशी की निजी छवि.हाँ भाजपा के लिए ऐसा कह सकते हैं क़ि जनता के मूड में हो कि राज्य और केंद्र में जिसकी सरकार होगी वही शहर का अच्छा विकास कर पाएगा. कई बार जीती हुई पार्टी की लहर भी काम कर जाती है. लेकिन 2012 के विधान सभा चुनावों के बाद हुए चुनावों में 45 सीटों वाली बीजेपी ने 16 में से 10 सीटें जीती थी. शहरी इलाक़ों में उसकी पकड़ पहले से ही अच्छी है. अब तो पूरे यूपी में.
बीएसपी के कई बड़े नेता खुद सपा में जा चुके हैं या जाना चाहते हैं. सोसल मीडिया से लेकर ज़मीन तक पर युवा कार्यकर्ता अब सपा को बेहतर पार्टी मानते हैं बसपा के मुक़ाबले. लेकिन सपा? मुझे याद है अखिलेश यादव ने एक इंटरव्यू में कहा था कि अब कुर्सी नहीं रही तो झगड़ा कैसा? लेकिन आप अभी भी देखिए तो सांगठनिक तौर पर पार्टी के हालत बद से बदतर हैं. युवा कार्यकर्ता साइकिल चलाने, संघर्ष करने, और व्हाट्सएप चलाने वाला तो अखिलेश के साथ है. वो प्रचार कर सकते हैं लेकिन वोट अपना ही डाल सकते हैं. लेकिन 35 साल से अधिक उम्र के नेता जो पब्लिक का वो दिला सकते हैं वो अभी भी नाराज़ हैं शिवपाल सिंह यादव को दरकिनार करने के कारण. बड़े चुनावों में यूपी के ग्रामीण क्षेत्रों का अभी भी अधिकतर वोट मैथड उसी तरह का है जो किसी मुखिया, प्रधान या बड़े आदमी के कहने से वोट करते हैं. मैं कानपुर नगर से लेकिन देहात और कन्नौज के ऐसे कई नेताओं को जनता हूँ जो शिवपाल की सम्मान सहित वापसी के बिना सपा को कभी नहीं उबरने देंगे. उन नेताओं की भी मजबूरी है, पूर्व में मुलायम सिंह की सरकारों में उनको खूब सत्ता लाभ मिला है. संयोगवश वो एक जाति विशेष के हैं जैसे आज की तारीख में बीजेपी सरकार में तथाकथित अगड़ी जाति का वर्चस्व है. दूसरी बात नीतियों दूसरी बात सरकार की नीतियों का विरोध पार्टी उस तरह से नहीं कर पा रही है. अखिलेश एक प्रेस कांफ्रेंस करके चले जाते हैं जब मीडिया ही साथ नहीं तो कितने लोगों तक आपकी बात पहुच पाई? उनको दूसरी पार्टियों से नेता लाने की बजाय अपने रूठे नेताओं को मानना चाहिए. जो कोशिश अब आम आदमी पार्टी करना चाहती है योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को मनाकर. अभी मुलायम सिंह यादव के जन्म दिन पर हुई रैली में उन्होंने अखिलेश से एक अहम बात कही क़ि, "आप लोग सांप्रदायिकता का सामना कैसे नहीं कर पा रहे हैं? जब अयोध्या में गोली चली थी तब भी 109 सीटें आई थी. तो कुछ लोगों ने कहा क़ि अगर तब सोसल मीडिया होता तो आपको भी सीटें न मिलती. लेकिन जब भाजपा आपके ही टेक्नॉलॉजी का प्रयोग आपके खिलाफ कुप्रचार में कर सकती है तो आप काउंटर कैसे नहीं कर पाते हैं? आप अपनी लोहिया वादी समाजवादी नीतियों या विचार धारा को ही फैला दें तो ही बड़ी बात है. आरक्षण पर बार बार वार होता है, नीति आयोग से एससी एसटी का फंड काट लिया जाता है, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोज़गार की हालत खराब है तो भी आपको मुद्दों की कमी लगती है. वो जितनी बार अयोध्या ले जाएँ आप उतनी बार रोज़गार और भुखमरी पर सवाल करो. कैसे नहीं मानेगी जनता? आपकी ही समाजवादी आर्थिक नीति पर तो कांग्रेस और बीजेपी भी कभी मनरेगा तो कभी शिक्षा और खाने का अधिकार और एक रुपए में बीमा देकर लोगों के वोट बटोरती हैं. यही तो है समाजवाद? लेकिन आप उसपर बात तक नहीं करना चाहते? हो सकता है ईवीएम गड़बड़ हो? बसपा ने तो कभी इसके खिलाफ प्रदर्शन भी किया, सपा तो कभी बोल ही ना पाई? इसी प्रदेश में न जाने कितने लोग हैं जो धर्म की राजनीति नहीं चाहते लेकिन आप उनके मुद्दे उठाते ही नहीं बस आज़म ख़ान जैसे लोगों के चक्कर में बीजेपी के जाल में फँसते जाते हैं. वैसे भी अब आम आदमी पार्टी भी यूपी में आ रही है एक विकल्प के तौर पर अगर आप नहीं सुधरे तो किसी और को मौका मिलेगा.
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