मैं आजम खान का न कभी सपोर्ट करता हूँ न कभी उनकी पूर्णतया उनकी राजनीति से सहमत रहा. लेकिन मैं ये जनता हूँ कि आजम खान इतना भी तालिबानी, या कोई आतंकी नहीं हैं जितना मिडिया बना बना रहा है.
मैं बात करूँगा अभी जो 2-3 दिन पहले संसद में हुआ, क्योंकि महिला का मामला था इसलिए सब लिबरल भी उनके खिलाफ बोल पड़े. सब विपक्षी सांसद तक उनके खिलाफ बोले. लेकिन मुझे ये भेड़चाल लगा. मैं उसदिन लोकसभा लाइव देख रहा था. मामला ये था कि मुख़्तार अब्बास नकवी हमेशा की तरह कई शेर बोलकर चले गए. तो जवाब में आजम खान ने शेर पढ़ा, "तू इधर उधर की न बात कर, बस ये बता कि काफिला क्यों लुटा?"
तो चेयर पर बैठी मैडम ने कहा कि "आप भी इधर देखिए, इधर मेरी तरफ देखकर बात कीजिये." तो पूरा संसद खिलखिला पड़ा. अखिलेश से लेकर रविशंकर प्रसाद, और वो मैडम खुद जोर से हंसी. तो जवाब में आजम खान ने कहा. मैडम आप कहें तो मैं आपसे नजर ही न हटाऊँ। आप तो मुझे इतनी अच्छी लगती हैं कि सारी बात मैं आपकी आंखों में ही देखते हुए कह दूँ. आपको कहना पड़े कि नजर हटा लीजिये."
उस समय जैसा माहौल था संसद का, जो उस बात की टाइमिंग थी उसमें मुझे क्या किसी को उसमें कुछ ख़राब नहीं लगा. बल्कि स्पीकर मैडम भी हंस रही थीं. फिर एकदम से खड़े हुए, रविशंकर प्रसाद. और उन्होंने इस बात को मुद्दा बना दिया. उनको बद्तमीज से लेकर न जाने क्या क्या कह दिया तो अखिलेश ने भी जवाब में कहा कि उसमें कोई बात गलत नहीं है, अगर इसको लेकर उनपर गलत कमेंट हो रहे तो ये सरासर बदतमीजी है. उसदिन किसी विपक्षी महिला सांसद को ये बात गलत नहीं लगी. फिर आजम खान ने माफ़ी नहीं मांगी, वो वहां से निकल गए. फिर जब मिडिया को कोई बात आजम खान के मुंह से सुनाई दे और उसपर ४ घंटे प्राइमटाइम न हुआ तो फायदा ही क्या. और जो रातो रात माहौल बना. उसके बाद पूरी संसद भेड़चाल हो गई. इस देश की संसद का इतिहास रहा है शेरो शायरी वाला. मनमोहन जब पीएम थे तो सुषमा स्वराज उनको खूब शायरी में जवाब देतीं थी. मनमोहन सिंह ने कहा कि, "हमको उनसे वफ़ा की थी उम्मीद, जो नहीं जानते वफ़ा क्या है?" अगर इनके जैसे लोग होते तो मनमोहन सिंह पर आरोप लगा देते कि सुषमा स्वराज पर वो बेवफाई का आरोप लगा रहे. लेकिन सुषमा स्वराज ने जवाब दिया, "कुछ तो मजबूरियां रहीं होंगी ग़ालिब, यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता." फिर वो बोलीं कि दूसरा शेयर आपके मुताबिक बोल रही हूँ, "तुम्हे वफ़ा याद नहीं, हमें जफ़ा याद नहीं। जिंदगी के दो ही तराने हैं, एक तुम्हें याद नहीं एक मुझे याद नहीं।"
हर बजट में खूब शायरी सुनाई जाती हैं. यहां तक कि निर्मला सीतारमण जिनको हिंदी नहीं आती उन्होंने भी रटकर शायरी कहीं. इसके पहले ओवैसी से लेकर मोदी जी तक शायरी सुनाते रहे हैं. खैर राज्यसभा में तो मैंने इसी बहाने खूब इंजॉय किया है. क्या हम एक लिबरल या खुले दिमाग के इंसान होने के नाते इतना भी बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं रखते हैं? आप देखिये वो समय लोकसभा में क्या हुआ? क्या आजम खान ये बात ऐसी किसी मंशा से कह रहे थे? या मैडम को ही वो बात बुरी लगी. जबकि मैडम ने जब हंगामा बढ़ने पर कहा कि मैं आपकी छोटी बहन हूँ तो आजम ने कहा हाँ बिलकुल आप मेरी प्यारी छोटी बहन हैं. अब अगर इसमें किसी को आपत्ति है तो करते रहे.
इसी संसद का इतिहास है जहाँ भारत के महान नेता राम मनोहर लोहिया से किसी महिला सांसद ने बहस के दौरान कहा कि आपने तो शादी ही नहीं की है. तो वो बोले कि आपने मौका ही नहीं दिया. और संसद ठहाकों से गूँज पड़ा. और एक बार वो अपने बगल में बैठी किसी महिला सांसद से बात कर रहे थे तो स्पीकर ने कहा डॉक्टर साब, क्या कर रहे हैं आप, आपकी वजह से हम डिस्टर्ब हो रहे तो वो बोले सर मैं मोहब्बत कर रहा हूँ. और स्पीकर सहित सब हंसने लगे. असल में वो उस महिला सांसद को कुछ समझा रहे थे. एक और संसद थे पीलू मोदी। बताते हैं कि वो तो इंदिरा गाँधी पर ऐसे तंज करते थे कि लोग कन्फ्यूज रहते थे कि वो उनके दुश्मन हैं या मित्र। वो लड़ते हैं या फ्लर्ट करते हैं.फेसबुक पर ही कभी हम या आप कोई शायरी पोस्ट करते हैं,
"वफ़ा के ख़्वाब मुहब्बत का आसरा ले जा,
अगर चला है तो जो कुछ मुझे दिया ले जा."
तो बहुत से मित्र उसपर किसी शायरी से ही जवाब देते हैं,
"रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ,
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ,
कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख,
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ."
तो क्या आप शब्दशः उस जवाब को ले लेंगे, कि वो आदमी आपसे वो बात कह रहा है? या फिर कोई विवाहित महिला/पुरुष वो शायरी पोस्ट करता है तो आप कहेगे कि जरूर वो कहीं और मोहब्बत में है या फिर घर वाले या घरवाली से बेवफाई मिल रही? कोई किसी की फोटो पर भी बड़ी शायरी के साथ तारीफ कर देता है तो क्या वो आप शब्दशः लेंगे? बहुत से लोगों को फेसबुक पर ही जनता हूँ. और निजी जीवन में भी होते हैं जो एक दूसरे से खुलकर चुहलबाजी और मजाक भी करते हैं. तो क्या वो सब उसी मंशा से कह रहे जो रविशंकर प्रसाद को लगी? और अगर इतनी बात को नहीं समझना चाहते, इसे सब महिला का अपमान कह रहे तो जिस पश्चिमी विकास की तरफ जा रहे वो तुम्हारे लायक नहीं है संस्कृति के ठेकेदारों।
लेकिन आजम खान सॉफ्ट टारगेट हैं आज की तारीख में. किसी को शशि थरूर की 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड, सोनिया गाँधी को जर्सी गाय, लालू यादव अपनी बेटी को सेट कर रहे, रेणुका चौधरी की हंसी राक्षसी है, जैसे शब्द असंसदीय नहीं लगे? मायावती पर घटिया से घटिया टिप्पणी करने वाले दयाशंकर बीजेपी में पद पर बहाल होकर मंत्री भी बन जाएं तो कोई दिक्कत नहीं.
Monday, July 29, 2019
आज़म खान विवाद पर टिप्पणी
Friday, July 26, 2019
तीन तलाक़ पर ओवैसी
जितना मैं समझ पाया उस हिसाब से कहता हूँ कि तीन तलाक पर आप सब लोग मौलानाओं और ओवैसी को एक साइड रखकर देखेंगे तो ठीक से बात नहीं समझ आएगी. मौलाना और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कहते हैं कि तीन तलाक मान्य है और इसको जारी रखना चाहिए. जबकि ओवैसी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हैं कि जब तीन तलाक null n void मतलब अमान्य है तो फिर उसपर कानून बनाने का कोई अर्थ नहीं है. और अगर कानून बना भी दिया तो वो पुरे कानून के खिलाफ नहीं हैं. आपको बताते चलूँ कि पहले जब ये बिल लोकसभा में आया तो बहुत गलतियां थी, तो उसको सुधर के लिए स्टैंडिंग कमिटी में भेजा गया. उस कमिटी के हिस्सा ओवैसी भी थे. कमिटी की रिपोर्ट में 17 सुझाव दिए गए जिन प्रावधानों को बदलना था. सरकार ने उसमें से 11 सुझाव मान लिए. ओवैसी उन्हीं 6 सुझावों के खिलाफ हैं. मैं तीन तलाक के खिलाफ तो हमेशा से लिखा और बोला हूँ और न तो ओवैसी की राजनीति से कभी सहमत हुआ. लेकिन कल लोकसभा में ओवैसी ने जो तर्क रखे वो वाजिब थे.
उनके तर्कों को अगर गौर से देखें तो एक बात उन्होंने कही कि अगर कोई आदमी तीन तलाक बोलकर तलाक दे देता है, फिर उसको जेल में डाला गया. तो फिर औरत उससे मेंटिनेंस कैसे क्लेम करेगी? दो में से एक ही काम यहाँ हो सकता है या तो जेल में डालो फिर जब वो जेल में है और कुछ कमाएगा नहीं तो मेंटिनेंस कैसे देगा? और अगर मेंटिनेंस लेना है तो उसको जेल के बहार रखना पड़ेगा. ओवैसी कह रहे कि तलाक अमान्य हो जाये, उसका मुकदमा चले लेकिन आदमी को जेल में न डाला जाए. दूसरी बात ये है कि अगर उस आदमी को जेल में डाल दिया गया तो फिर उस महिला का उससे तलाक हो जाना चाहिये. क्योंकि जब तक उससे तलाक नहीं होगा तो जेल में डालना बेवकूफी है. भला कौन सी महिला चाहेगी कि उसका पति जेल में रहे. और इसमें महिला अगर उससे तलाक लेना चाहे तो नहीं ले सकती उसको सजा पूरी होने तक इन्तजार करना पड़ेगा कि जब वो बहार आये तो तलाक ले वो. तीन तलाक़ पर मेहर का 100 गुना देना पडे जैसी बात भी उन्होंने कही।
खैर भले ही सरकार की वो साफ नीयत न हो इसपर लेकिन अब कानून आ गया है जो बेहद जरूरी है। जो कुछ कमियां हैं प्रैक्टिस होने के बाद सुधार ली जाएँगी।
#TripleTalaq
Thursday, July 25, 2019
धोनी की असलियत सामने
मैं पहले अमिताभ बच्चन का बड़ा फैन था, लेकिन जैसे ही उनका नाम पनामा पेपर्स में आया, बस उतर गए वो नजर से. ठीक उसी तरह महेंद्र सिंह धोनी का भी फैन था हूँ. खूब उनके डीपी लगता रहा, लेकिन वो नजर से उतरने लगे जब श्रीशांत फिक्सिंग में फंसे और इनका भी नाम सामने आया. फिर उस समय इनकी टीम चेन्नई सुपर किंग्स बैन हुई और उसके मालिक श्रीनिवासन के दामाद पर मुकदमा चला. लेकिन धोनी बच गए बीसीसीआई पर अपनी पकड़ के चलते. उस समय टीम इण्डिया के चयन से लेकर हर चीज पर उनकी पकड़ थी, तब उनकी सीएसके की टीम में फिक्सिंग को लेकर कुछ डिसाइड हो जाता था और उनको न पता होता ये चौकाने वाला था. बात आई गई लेकिन धोनी ने भारतीय क्रिकेट में कुछ नए आयाम दिए, काफी कुछ योगदान है उनका. वो अलग चीज है. लेकिन मुझे उनके शातिर दिमाग पर कभी कभी डर भी लगता था, कि ये आदमी अपनी टीम के खिलाडियों से लेकर, खेल के मैदान तक अपना दिमाग ऐसे प्रयोग करता है जैसे हर हाल में उसको आगे ही जाना है. और मेरा वो डर साबित हुआ जब सबसे पहले इनका नामा सामने आया आम्रपाली ग्रुप के घोटालों में. आउटलुक की रिपोर्ट बताती है कि कैसे इनको आम्रपाली ग्रुप के मालिक अनिल शर्मा ने फायदा पहुँचाया. जो बेचारे लोग अपनी पूरी जिंदगी की कमाई इकठ्ठा करके एक घर खरीदने की कोशिश करते हैं. उन लोगों ने आम्रपाली ग्रुप को घर के लिए पैसा दिया और वही पैसे से आम्रपाली ग्रुप के मालिक ने निजी संपत्ति बना ली. उसको ये पैसा मिला उसका एक कारण धोनी भी थे. क्योंकि वो उसके ब्रांड एम्बेस्डर थे. उस समय धोनी का क्रेज था देश में. और भारतीय लोग क्रिकेटर को भगवान समझते हैं, ऐसे में सब इनके ही चक्कर में फंसे. फिर अनिल शर्मा ने भी धोनी को इनाम दिया और उनकी कंपनियों को पैसा ट्रांसफर किया. जिसमें धोनी से लेकर उनकी वाइफ साक्षी तक डायरेक्टर थीं.
धोनी की कंपनियों की जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश भी दिया है. उम्मीद है कि जाँच निष्पक्ष हो और अगर उसमें अगर कुछ गड़बड़ पाया जाता है तो उनको जेल में डाला जाए. मुझे अब धीरे धीरे क्रिकेट से भी नफरत इसलिए हो गई है क्योंकि ये वो खेल है जिसने देश के अन्य खेलों को बर्बाद कर दिया. और मैं दूसरे को बर्बाद करने वाली हर चीज से नफरत करता हूँ. क्रिकेट बोर्ड अब यहां सत्ता का केंद्र हो गया है. राजनेता अब इसमें सीधा सीधा दखल रखते हैं. और डीडीसीए के घोटाले से लेकर न जाने कितनी बार इसमें जमकर चोरी की बातें सामने आई हैं लेकिन हम भारतीय लोग तो ऐसे अंधे हैं कि क्रिकेट को धर्म और क्रिकेटर को भगवान समझते हैं. जिस देश में अभी भी लोग दो वक्त की रोटी न कमा पाते हों वहां कैसे इनके पास इतना पैसा आ जाता है? कोहली, धोनी, सचिन ये इतनी इतनी सम्पदा लेकर कहाँ जाएंगे? और अन्य खेलों के खिलाड़ियों को बुनियादी चीजें भी न नसीब होती हैं.
Sunday, July 14, 2019
सोशल मीडिया पर सरकार की नई पहल
सरकारी कम्प्यूटर सिस्टम यदि असुरक्षित इंटरनेट तन्त्र से जुड़ जाये तो गोपनीय सरकारी डाटा को हैक किया जा सकता है. इसलिए आईटी (IT) मंत्रालय के तहत मीयटी (MeitY) ने 2014 की नीतियों को जारी किया था, जिसके अनुसार सरकारी कम्प्यूटर का निजी कार्य और सोशल मीडिया हेतु इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है. गृह मंत्रालय ने नवीनतम आदेश में सार्वजनिक स्थलों के वाईफाई के इस्तेमाल पर भी एहतियात बरतने को कहा है. क्लासीफाइड डाटा की सुरक्षा के लिए अनेक सावधानी बरतने के साथ, पेन ड्राईव के इस्तेमाल पर भी रोक की बात गृहमंत्रालय ने कही है. ऑफिस के समय और सरकारी कम्प्यूटर सिस्टम में सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर तो 5 साल से प्रतिबन्ध है, जिसका धड़ल्ले से उल्लंघन हो रहा है. तो अब गृह मंत्रालय के नये आदेशों का पालन कैसे सुनिश्चित होगा? सरकारी तन्त्र में साइबर सुरक्षा का सवाल समाज और देश से जुड़ा हुआ है. देश में कम्प्यूटर और इंटरनेट क्रान्ति तो हो गई,लेकिन इसके इस्तेमाल पर जागरुकता अभी तक नहीं बन पाई है. स्मार्ट फोन का हर 6 महीने में नया मॉडल आ जाता है, लेकिन साइबर सुरक्षा के लिए अभी भी दो शताब्दी पुराने टेलीग्राफ एक्ट से काम चलाया जा रहा है. मेक-इन-इण्डिया को रक्षा क्षेत्र में लागू करने की कोशिश है, लेकिन इसे इंटरनेट कम्पनियों पर नहीं लागू किया जा रहा है. खुला बाजार होने के नाते भारत में विश्व के सबसे ज्यादा इंटरनेट ग्राहक हैं, फिर भी कम्पनियों द्वारा भारत में ऑफिस और सर्वर नहीं लगाये जा रहे हैं. इंटरनेट और डिजिटल क्षेत्र में मेक-इन-इण्डिया को प्रभावी तरीके से लागू करना होगा, तभी देश वास्तविक अर्थां में पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बन सकेगा.
कर्नाटक का राजनीतिक संकट
Thursday, July 11, 2019
Sunday, July 7, 2019
भारतीय क्रिकेट को बदलने वाला खिलाडी
एक होता है एवोल्यूशन माने क्रमिक विकास, दूसरा होता है रेवोल्यूशन माने क्रांति। धोनी का आगाज भारतीय क्रिकेट में उसी रेवोल्यूशन सरीखा रहा है, अर्थात बन्दें ने जब 22 गज लंबाई और 10 फ़ीट चौड़ाई वाली पिच पर 38 इंच लंबाई और 4.25 चौड़ाई वाले बल्ला के साथ आगाज़ किया तब मानों भारतीय क्रिकेट युग में क्रांति की बिगुल बज गया।
उसके बाद वो फिटनेस, खेल-भावना, संयम, और जीत की क्रांति जैसा था, जिसे धोनी ने संभव कर दिखाया।
वो 'लगभग' और 'असंभव' भारतीय क्रिकेट के शब्दकोश से विलुप्त होनें की क्रांति थी, जिसे अपना माही ने पूरा कर दिखाया।
मैच जीतने की जिस परंपरा को गांगुली ने शुरू किया उसे इस कैप्टन कूल ने उसी रेवोल्यूशनरी तरीकें से भारतीय क्रिकेट और भारतीय क्रिकेट-प्रेमियों को आदत बना दिया, और यही धोनी का अपना कल्ट है, जो तमाम लीजेंड्स में उन्हें खास बनाता है।
और ये सब लिखते हुए याद आ रहा है कि अप्रैल के महीने में हमारा मॉर्निंग स्कूल हुआ करता था। उसी महीनें 5 अप्रैल 2005 को स्कूल से छुट्टी होने के बाद अपने स्कूल के एक मित्र के घर भारत पाकिस्तान का वो मैच देखनें पहुँच गया, जिसके बाद पहली बार पूरा भारत धोनी नाम से परिचित हुआ था और दीवाना भी और उसमें मैं भी एक था।
कहतें है हर मूल चीजों का अपना दर्शन होता है, अगर उनको प्रदर्शित करनें वाले खुद भी अजूबे हो फिर क्या कहना। वही हुआ था उस मैच में। टोटल 26 रन पर सचिन पाजी आउट हुए थे और उसके बात सौरभ गाँगुली सबको अचंभित करतें हुए धोनी को तीसरे क्रम पर भेजा जो कि उस समय मैच देखनें वाले सभी दर्शकों के लिए अजीब था, क्योंकि एक सिरीज़ पहलें धोनी अपनें प्रदार्पण मैच में बांग्लादेश के ख़िलाफ़ औसत रहें थे किंतु आज के इस फैसले के लिए गाँगुली को धोनी अपने कारनामें से हंड्रेड अप टू हंड्रेड मार्क दिलवानें थे, और ये धोनी ने बड़ें बेहरमी से पाकिस्तानी बॉलर्स को कूटते हुए दिलाया भी।
कुल 148 रन मात्र 123 गेंद में (4 छक्के और 15 चौके), और जबकि ये उनका मात्र पांचवा एक दिवसीय मैच था, मतलब धोनी ने अपनें खेल की ठसक बल्ले की मार से सबको समझाया। ये भी मालूम हो गया कि उस मैच में पारी समाप्ति के बाद नीली जर्सी और लंबे बालों में बल्ला को हवा में उछालते हुए पवेलियन लौटने वाला हमारा धोनी बाद के भारतीय क्रिकेट के साथ विश्व क्रिकेट के अदम्य आकर्षण का केंद्र बनने वाला है।
उसके बाद कई यादगार पारी उनके बल्ले से देखनें को मिला, जिसमें मेरा धोनी का सबसे पसंदीदा पारी श्रीलंका के खिलाफ उसी कैलेंडर वर्ष में बनाये 183 रन है। उन्हें जल्द ही कप्तानी मिल गई, नये कार्यभार से जितनें धोनी उत्सुक रहें होंगें उससे कही ज्यादा भारतीय मानस थे, लेकिन धोनी ने बिल्कुल उदास नही किया। 2007 के वर्ल्डकप में लीग स्टेज मैच में हारकर जिस तरह से टीम इंडिया बाहर हुई थी और उसके लिए धोनी को सबसे ज्यादा टारगेट भी किया गया था, उस कसक से पहली 20-20टी विश्वकप जीत कर स्वयं के साथ समूचा भारत को उबार लिया।
फिर वहां से अबतक धोनी को अपनें आत्मत्याग, नेतृत्व करनें की कौशलता, विफलताओं के लिए खुद आगे आकर उत्तरदायित्व लेना, टीम भावना के प्रवर्तक, और टीम हित के लिए हर जरूरी फैसले के सजग प्रहरी के रूप में देखा, जो अपनें आप में अद्भुत, अकल्पनीय और बेजोड़ है, और यही धोनी का कल्ट है। (ये 'कल्ट' दुबारा इसीलिए लिख रहा हूँ क्योंकि धोनी की औरा इससे भी बड़ा है।)
मेरा मानना है, विवाद, सफलता के कहानी के संग संग दौड़ लगाती है, जिसमें कुछ विरले होते है जो इस रेस में विवादों को अपनें कारनामें से पिछ छोड़ जाते है, और धोनी यह रेस भी जीत चुका है, पूरी तन्मयता से, नायकत्व से, शालीनता से, विशिष्टता से! आज आलोचना बेशक धोनी के आसपास फटक रहें होंगे लेकिन उस आलोचना में एक सम्मान है जिसको धोनी ने बहुत कुछ खो कर पाया है। तमाम आलोचना के बाद भी इस उम्र में दो विकेट के बीच जितनें तेज धोनी दौड़ते है, क्रिकेट को समझने वाले शायद ही धोनी को उतना गति से समझ पाये है, क्योंकि धोनी वो है जो बिना तामझाम के टेस्ट कप्तानी छोड़ा है, वनडे- टी-20 कप्तानी छोड़कर विराट के नेतृत्व में बतौर विकेट कीपर सह बैट्समैन खेलना स्वीकार किया है वो भी बैटिंग आर्डर नंबर बदलें बिना। ऐसे कई अचरज भरें फैसले 'ऑन द मैच' एंड 'ऑफ द फील्ड' लिए और सही साबित किया, जो सिर्फ और सिर्फ धोनी कर सकतें है।
इसीलिए आज भारतीय क्रिकेट प्रेमियों के मानस पटल पर 'धोनी' सबसें चमकदार सितारा है, जो बेशक उम्रदराज है, बल्ले से थोड़ा बहुत निराश भी कर रहे हैं।
उन्होंने अपने लिए एक स्टैंडर्ड सेट किया है जिससे नीचे का खेल नहीं अच्छा लगता है। उन्होंने हर काम समय पर किया उससे पहले कि किसी की अंगुली उठे चाहे टेस्ट क्रिकेट छोडना हो या कप्तानी छोडना। अब समय आ गया है कि वो अपने अच्छे समय में ही खुद से फैसला लेकर युवाओं को मौका दें।
राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट
*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...
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कुछ ही दिन पहले पूर्व फिल्म अभिनेत्री तनुश्री दत्ता और अब कंगना रनौट द्वारा साथी कलाकारों व फिल्म निर्देशकों पर लगाए गए यौन उत्पीड़न के ...
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इस समय पाकिस्तान में बड़ा ही अच्छा एक सीरियल आ रहा है, " बागी........." जो पाकिस्तान के प्रोग्रेसिव तबके और भारत में भी बहुत प...