Monday, July 29, 2019

आज़म खान विवाद पर टिप्पणी

मैं आजम खान का न कभी सपोर्ट करता हूँ न कभी उनकी पूर्णतया उनकी राजनीति से सहमत रहा. लेकिन मैं ये जनता हूँ कि आजम खान इतना भी तालिबानी, या कोई आतंकी नहीं हैं जितना मिडिया बना बना रहा है.
मैं बात करूँगा अभी जो 2-3 दिन पहले संसद में हुआ, क्योंकि महिला का मामला था इसलिए सब लिबरल भी उनके खिलाफ बोल पड़े. सब विपक्षी सांसद तक उनके खिलाफ बोले. लेकिन मुझे ये भेड़चाल लगा. मैं उसदिन लोकसभा लाइव देख रहा था. मामला ये था कि मुख़्तार अब्बास नकवी हमेशा की तरह कई शेर बोलकर चले गए. तो जवाब में आजम खान ने शेर पढ़ा, "तू इधर उधर की न बात कर, बस ये बता कि काफिला क्यों लुटा?"
तो चेयर पर बैठी मैडम ने कहा कि "आप भी इधर देखिए, इधर मेरी तरफ देखकर बात कीजिये."  तो पूरा संसद खिलखिला पड़ा. अखिलेश से लेकर रविशंकर प्रसाद, और वो मैडम खुद जोर से हंसी. तो जवाब में आजम खान ने कहा. मैडम आप कहें तो मैं आपसे नजर ही न हटाऊँ। आप तो मुझे इतनी अच्छी लगती हैं कि सारी बात मैं आपकी आंखों में ही देखते हुए कह दूँ. आपको कहना पड़े कि नजर हटा लीजिये."
उस समय जैसा माहौल था संसद का, जो उस बात की टाइमिंग थी उसमें मुझे क्या किसी को उसमें कुछ ख़राब नहीं लगा. बल्कि स्पीकर मैडम भी हंस रही थीं. फिर एकदम से खड़े हुए, रविशंकर प्रसाद. और उन्होंने इस बात को मुद्दा बना दिया. उनको बद्तमीज से लेकर न जाने क्या क्या कह दिया तो अखिलेश ने भी जवाब में कहा कि उसमें कोई बात गलत नहीं है, अगर इसको लेकर उनपर गलत कमेंट  हो रहे तो ये सरासर बदतमीजी है. उसदिन किसी विपक्षी महिला सांसद को ये बात गलत नहीं लगी. फिर आजम खान ने माफ़ी नहीं मांगी, वो वहां से निकल गए. फिर जब मिडिया को कोई बात आजम खान के मुंह से सुनाई दे और उसपर ४ घंटे प्राइमटाइम न हुआ तो फायदा ही क्या. और जो रातो रात माहौल बना. उसके बाद पूरी संसद भेड़चाल हो गई. इस देश की संसद का इतिहास रहा है शेरो शायरी वाला. मनमोहन जब पीएम थे तो सुषमा स्वराज उनको खूब शायरी में जवाब देतीं थी. मनमोहन सिंह ने कहा कि, "हमको उनसे वफ़ा की थी उम्मीद, जो नहीं जानते वफ़ा क्या है?" अगर इनके जैसे लोग होते तो मनमोहन सिंह पर आरोप लगा देते कि सुषमा स्वराज पर वो बेवफाई का आरोप लगा रहे. लेकिन सुषमा स्वराज ने जवाब दिया,  "कुछ तो मजबूरियां रहीं होंगी ग़ालिब, यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता." फिर वो बोलीं कि दूसरा शेयर आपके मुताबिक बोल रही हूँ, "तुम्हे वफ़ा याद नहीं, हमें जफ़ा याद नहीं। जिंदगी के दो ही तराने  हैं, एक तुम्हें याद नहीं एक मुझे याद नहीं।"
हर बजट में खूब शायरी सुनाई जाती हैं. यहां तक कि निर्मला सीतारमण जिनको हिंदी नहीं आती उन्होंने भी रटकर शायरी कहीं. इसके पहले ओवैसी से लेकर मोदी जी तक शायरी सुनाते रहे हैं. खैर राज्यसभा में तो मैंने इसी बहाने खूब इंजॉय किया है. क्या हम एक लिबरल या खुले दिमाग के इंसान होने के नाते इतना भी बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं रखते हैं? आप देखिये वो समय  लोकसभा में क्या हुआ? क्या आजम खान ये बात ऐसी किसी मंशा से कह रहे थे? या मैडम को ही वो बात बुरी लगी. जबकि मैडम ने जब हंगामा बढ़ने पर कहा कि मैं आपकी छोटी बहन हूँ तो आजम ने कहा हाँ बिलकुल आप मेरी प्यारी छोटी बहन हैं. अब अगर इसमें किसी को आपत्ति है तो करते रहे.
इसी संसद का इतिहास है जहाँ भारत के महान नेता राम मनोहर लोहिया से किसी महिला सांसद  ने बहस के दौरान कहा कि आपने तो शादी ही नहीं की है. तो वो बोले कि आपने मौका ही नहीं दिया. और संसद ठहाकों से गूँज पड़ा. और एक बार वो अपने बगल में बैठी किसी महिला सांसद से बात कर रहे थे तो स्पीकर ने कहा डॉक्टर साब, क्या कर रहे हैं आप, आपकी वजह से हम डिस्टर्ब हो रहे तो वो बोले सर मैं मोहब्बत कर रहा हूँ.  और स्पीकर सहित सब हंसने लगे. असल में वो उस महिला सांसद को कुछ समझा रहे थे. एक और संसद थे पीलू मोदी। बताते हैं कि वो तो इंदिरा गाँधी पर ऐसे तंज करते थे कि लोग कन्फ्यूज रहते थे कि वो उनके दुश्मन हैं या मित्र। वो लड़ते हैं या फ्लर्ट करते हैं.फेसबुक पर ही कभी हम या आप कोई शायरी पोस्ट करते हैं,
"वफ़ा के ख़्वाब मुहब्बत का आसरा ले जा,
अगर चला है तो जो कुछ मुझे दिया ले जा."
तो बहुत से मित्र उसपर किसी शायरी से ही जवाब देते हैं,
"रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ,
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ,
कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख,
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ."
तो क्या आप शब्दशः उस जवाब को ले लेंगे, कि वो आदमी आपसे वो बात कह रहा है? या फिर कोई विवाहित महिला/पुरुष वो शायरी पोस्ट करता है तो आप कहेगे कि जरूर वो कहीं और मोहब्बत में है या फिर घर वाले या घरवाली से बेवफाई मिल रही? कोई किसी की फोटो पर भी बड़ी शायरी के साथ तारीफ कर देता है तो क्या वो आप शब्दशः लेंगे? बहुत से लोगों को फेसबुक पर ही जनता हूँ. और निजी जीवन में भी होते हैं जो एक दूसरे से खुलकर चुहलबाजी और मजाक भी करते हैं. तो क्या वो सब उसी मंशा से कह रहे जो रविशंकर प्रसाद को लगी? और अगर इतनी बात को नहीं समझना चाहते, इसे  सब महिला का अपमान कह रहे तो जिस पश्चिमी विकास की तरफ जा रहे वो तुम्हारे लायक नहीं है संस्कृति के ठेकेदारों।
लेकिन आजम खान सॉफ्ट टारगेट हैं आज की तारीख में. किसी को शशि थरूर की 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड, सोनिया गाँधी को जर्सी गाय, लालू यादव अपनी बेटी को सेट कर रहे, रेणुका चौधरी की हंसी राक्षसी है, जैसे शब्द असंसदीय नहीं लगे? मायावती पर घटिया से घटिया टिप्पणी करने वाले दयाशंकर बीजेपी में पद पर बहाल होकर मंत्री भी बन जाएं तो कोई दिक्कत नहीं.

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