Thursday, June 18, 2020

क्या फिर से जीतेंगे ट्रम्प?

पिछले कुछ सप्ताह डोनाल्ड ट्रंप के लिए मुश्किल भरे साबित हुए हैं. बुरी खबरों के बीच उन्हें अपने चुनाव प्रचार में उतरना पड़ रहा है, इससे उनका चुनावी अभियान भी प्रभावित हो रहा है. ऐसा लग रहा है कि बतौर राष्ट्रपति वे लगातार संकटों से घिरते जा रहे है. ऐसे समय में उनके दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने की उम्मीदें गंभीर संकट में दिख रही हैं.
डोनाल्ड ट्रंप एक सहज राजनेता है. चार साल पहले वे चुनावी समर में कूदे और सभी अनुमानों और भविष्यवाणियों को किनारे करते हुए पहले उन्होंने अपनी पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद के नामांकन वाली रेस जीती और इसके बाद अमरीका के राष्ट्रपति का चुनाव भी जीत लिया.
कहने की जरूरत नहीं है, ऐसी उपलब्धि से किसी भी शख्स को अपने फ़ैसले पर फख्ऱ होगा. उन पलों को जब ट्रंप याद करते होंगे तो उन्हें सहज जुलाई, 2015 का वक्त याद आता होगा जहां वे विवादों, लोगों के नाम लेकर उन पर आरोप लगाने, विवादों, असंयमित ट्वीटों और उससे जुड़े विवादों को लेकर वे राष्ट्रपति पद से दूर दिखने लगे थे लेकिन वहां से वापसी करते हुए वे शीर्ष पद तक पहुंच गए.
तब सारे के सारे विशेषज्ञ ग़लत साबित हुए थे और डोनाल्ड ट्रंप सही.
बड़े फ़ैसलों को लेकर ट्रंप निश्चित तौर पर सही थी. वे चुनाव के दौरान एक बाहरी शख़्स के तौर पर रेस में शामिल हुए थे जबकि अमरीका के आम लोगों का मूड राजनीतिक प्रतिष्ठानों के ख़िलाफ़ दिख रहा था. ट्रंप ने इस मूड को भांप लिया और इसको भुनाया भी. हालांकि हो सकता है कि उस दौरान की उनकी ग़लतियों और गलत फैसलों को उनकी कामयाबी ने ढक दिया हो.

इसके चार साल बाद, राष्ट्रपति की अपनी सहज प्रवृति उनको धोखा दे सकती है. ट्रंप 2016 की अपनी जीत को दोहराना चाहते हैं- वे खुद को एक फिर बार फिर से सत्ता प्रतिष्ठानों के ख़िलाफ़ संघर्ष करते हुए उम्मीदवार के तौर पर पेश करना चाहते हैं जो वाशिंगटनीय दलदल यानी विपक्षी उम्मीदवार से लड़ रहा है.
उनकी इस रणनीति ने तो पिछले चुनाव में उन्हें फ़ायदा पहुंचाया था, इससे उन्हें अहम राज्यों में निर्णायक बढ़त मिले. वहीं फ्लोटिंग मतदाताओं और परंपरागत तौर पर कंजरवेटिव मतदाताओं ने भी उन्हें संदेह का लाभ दिया था. वैसे मतदाता जो अंतिम समय तक अपना पक्ष तय नहीं कर पाए थे, वे जब मतदान करने पहुंचे तो उन्होंने ट्रंप को वोट दिया.
लेकिन इस बार ट्रंप कोई अनजाने उम्मीदवार नहीं हैं, लोगों ने उनके चार साल के कार्यकाल को देख लिया है. हालांकि अभी भी मतदाताओं का 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा उन पर भरोसा कर रहे हैं. लेकिन सर्वेक्षणों के मुताबिक अगर वे बुर्जुगों, शहरी इलाक़ों के शिक्षित मतदाताओं और धार्मिक मतदाताओं का समर्थन खोते रहेंगे तो यह पर्याप्त नहीं होगा.
डोनाल्ड ट्रंप ने अब तक जो क़दम उठाए हैं, वह 2016 के प्ले बुक से ही प्रभावित लग रहे हैं- वे विवादों को हवा दे रहे हैं, समाजिक मुद्दों पर संघर्ष को उकसावा दे रहे हैं, षड्यंत्रकारी सिद्धांतों को बढ़ा रहे हैं और किसी भी तरह की आलोचना का जवाब आलोचना से ही दे रहे हैं.

इन सबके बाद भी सर्वेक्षणों से यह ज़ाहिर हो रहा है कि वे जो बाइडन से पिछड़ गए हैं. कुछ सर्वे में तो वे दहाई अंकों से पिछड़ रहे हैं. हाल ही में इकानामिस्ट मैग्जीन में छपे विश्लेषण में बाइडन को छह में से पांच प्वाइंट मिले हैं, इसके मुताबिक बाइडन 2008 में बराक ओबामा की सहज जीत जैसी स्थिति को दोहरा सकते हैं.
ट्रंप 2016 की रणनीति को ही अपना रहे है लेकिन उनकी मुश्किलें बता रही हैं कि इस बार देश का राष्ट्रीय मूड अलग हो सकता है.
अमरीका के आम लोग कोरोना वायरस की चपेट में है, जिसके चलते एक लाख से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. इस महामारी के चलते अमरीकी अर्थव्यवस्था में गिरावट देखन को मिल रहा है. इसके साथ ही अब नस्लभेद और पुलिस व्यवस्था को लेकर देश भर में विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहा है. इसके अलावा अब दूसरे टकराव के लिए गुंजाइश नहीं हैं. जिस युद्धधर्मिता और अक्खड़पन ने अमरीकी राष्ट्रपति को अतीत में फ़ायदा पहुंचाया है, लेकिन मौजूदा वक्त में यह तरीका उस जनता से मेल नहीं खा रहा है जिसे सहानुभूति, चिकित्सा और सामंजस्य की दरकार है.
अमरीकी राष्ट्रपति उस वक्त क़ानून और व्यवस्था की दुहाई दे रहे है जबिक लोगों की धारना नाटकीय तौर पर ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन के साथ दिखाई दे रही है. आम लोगों के रूझान से यह साफ़ दिख रहा है कि वे जब नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव के लिए वोट डालेंगे तब उनकी प्राथमिकताओं में नस्लीय भेदभाव वास्तविक समस्या के तौर पर शामिल होगा.
कानून और व्यवस्था का अभियान 1960 के अंतिम और 1970 के शुरुआती सालों में नागरिकों के विद्रोह पर क़ाबू पाने में मदद कर रिचर्ड निक्सन को राष्ट्रपति चुनाव में जीत दिला सकता है लेकिन अमरीका अब वह देश नहीं रहा जो 50 साल पहले हुआ करता था.
पिछले कुछ सप्ताह सामने आए मामलों से अमरीका की मौजूदा राजनीतिक स्थिति का पता चल जाता है. गुरुवार को ट्रंप ने दक्षिण के 10 सैन्य ठिकानों के नाम से कंफेडरेट जेनरल के नाम हटाने से इनकार करते हुए कहा कि ऐसा करना यहां प्रशिक्षित सैनिकों का अपमान होगा.
लेकिन उसी वक्त दक्षिण में शुरू हुए और बेहद लोकप्रिय नेस्कर कार रेसिंग सर्किट ने अपने सभी आयोजनों से कंफेडरेट झंडे को फहराने पर पाबंदी लगा दी. स्थानीय और प्रांतीय नेता अपने इलाकों में कंफेडरेट जेनरलों की प्रतिमा हटाना शुरू कर दिया है. और तो और इन जेनरलों के नाम सैन्य ठिकाने के नाम से हटाने की मांग अमरीकी सेना के अंदर से आने लगी है. अटलांटिक मैग्जीन में सेना के रिटायर्ड जेनरल डेविड पेट्रेएस ने अपने आलेख में इसकी मांग की है.
अमरीका में इन दिनों एक सांस्कृतिक संघर्ष देखने को मिला है, जिसका पहले ट्रंप आनंद उठा चुके हैं. पुलिस के अन्यायपूर्ण तौर तरीकों के ख़िलाफ़ पेशेवर एथलीटों ने राष्ट्रीय गान के वक्त घुटने टेक कर विरोध जताया है. नेशनल फुटबाल लीग ने आधाकारिक तौर पर खेद जताते हुए विरोध प्रदर्शन में शामिल खिलाड़ियों का साथ नहीं देने की घोषणा की है. इन खिलाड़ियों में पूर्व क्वार्टरबैक कोलीन केपरनिक भी शामिल हैं.
अमरीकी सॉकर फे़डरेशन ने बुधवार को इस बात आवश्यकता को दोहराने के लिए मतदान किया है कि राष्ट्रीय गान के सभी खिलाड़ी सम्मानपूर्वक खड़े रहें. विवादों से दूर रहने वाले डेमोक्रेट्स अब एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए अपने घुटने टेक रहे हैं. इस बीच, ट्रंप ने इस अभ्यास की निंदा जारी करते हुए नेशनल फुटबॉल लीग और लीग के क्वार्टर बैक ड्रीउ ब्रीस पर निशाना साधा. ब्रीस ने घुटने टेकने को राष्ट्रविरोधी मानने वाले अपने बयान के लिए हाल ही में माफ़ी मांगी है.
दो सप्ताह पहले, डोनाल्ड ट्रंप के एक चर्च में जाने से पहले क़ानून प्रवर्तन एजेंसी और नेशनल गार्ड के सैनिकों ने बलपूर्वक नजदीक के पार्क खाली करा लिया था. यहां ट्रंप ने बाइबिल हाथ में लेकर फोटोग्राफरों से तस्वीरें खिंचवाई थी. इसके बाद से वे लगातार अपने इस क़दम का बचाव कर रहे हैं, इस दौरान वे ये बताते हैं कि सुरक्षा बलों के लिए पार्क खाली कराना कितना आसान था. उन्होंने ट्वीट किया था, "पार्क में सैर."
वहीं अमरीकी नेताओं और अमरीकी सेना के सादे कपड़े वाले सदस्यों ने इस घटना से खुद को अलग करना शुरू कर दिया है. पूर्व रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस सहित कई सेवानिवृत्त जनरलों ने इस कार्रवाई को लापरवाही भरा बताया था. लेकिन मौजूदा रक्षा मंत्री मार्क एस्पर और ज्वाइंट चीफ ऑफ़ स्टॉफ मार्क मिले ने ट्रंप के साथ चर्च जाने को लेकर खे़द जताया है.
पिछले सप्ताह वाशिंगटन डीसी में सुरक्षा मुहैया कराने के लिए भेजे गए नेशनल गार्ड के सदस्यों के बीच व्यापाक बेचैनी पर न्यूयार्क टाइम्स ने रिपोर्ट प्रकाशित की है.
इसमें सबसे विवादास्पद प्रकरण ट्रंप का वो ट्वीट था जिसमें एक 75 साल का वीडियो प्रदर्शनकारी ज़मीन पर गिरा दिख रहा है और न्यूयार्क पुलिस ने उसे शख़्स को लहूलुहान कर रखा है. ट्रंप ने आरोप लगाया थ कि यह कट्टर वामपंथी देशद्रोही शख़्स क़ानून प्रवर्तन करने वाली एजेंसियों की इलेक्ट्रानिक निगरानी कर रहा था. इस आरोप को दक्षिण पंथी मीडिया ने खूब हवा दी लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप के कई रिपब्लिकन समर्थनों ने इस ट्वीट का समर्थन नहीं किया.
इन सबने लोगों के मन में राष्ट्रपति के फ़ैसलों पर सवाल उत्पन्न किया है. खासकर संकट के समय में वे जिस तरह के फ़ैसले ले रहे हैं, उसने उनके फिर से राष्ट्रपति चुने जाने की राह में मुश्किलें पैदा कर दी हैं.
पॉलिटिको मैग्जीन के कंजरवेटिव नेशनल रिव्यू के एडिटर रिक लॉरी ने लिखा है, "अगर वे नवंबर में हार जाते हैं तो ऐसा इसलिए नहीं होगा कि वे बड़े विधायी सुधार करना चाहते थे जो राजनीतिक रूप में बहुत दूर की बात थी."
"ऐसा इसलिए भी नहीं होगा कि वे उन्होंने कोई क्रिएटिव और अपरंपरागत नीति को अपना लिया था. ऐसा इसलिए भी नहीं होगा कि वे चुनौतीपूर्ण घटनाओं के घिरे हुए थे. ऐसा इसलिए होगा क्योंकि उन्होंने अपने राष्ट्रपति पद को अनावश्यक तौर पर मैदान में उतार दिया है, एक वक्त में 280 शब्द के मैदान में."
हालांकि अभी भी अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में साढ़े चार महीने से ज़्यादा का वक्त बचा है. अभी भी संभव है कि ट्रंप अपनी स्थिति मजबूत कर लें और बाइडन अपनी स्थिति को कमजोर कर सकते हैं.
हालांकि अब तक ट्रंप के ऊपर डेमोक्रेट्स की बढ़त टिकाऊ दिख रही है. यह 2016 के हिलेरी क्लिंटन से ज़्यादा टिकाऊ दिख रही है. पिछले कुछ सप्ताह से डोनाल्ड ट्रंप मुश्किलों में ज़रूर दिख रहे हैं और इस बार उनकी ख़ासियतें उन्हें फेवरिट उम्मीदवार बनाने के लिए पर्याप्त नहीं लग रही हैं.
डोनाल्ड ट्रंप अगर 2016 की कामयाबी को दोहराना चाहते हैं तो उन्होंने 2016 के अपने नज़रिए को त्यागना होगा. उन्हें अमरीकी जनता को यह भरोसा दिलाना होगा कि वे मौजूदा राष्ट्रपति से बेहतर साबित हो सकते हैं और इसके लिए उन्हें चार साल का वक्त और चाहिए.

Tuesday, June 9, 2020

कौन हैं ट्रम्प के सामने जो बाइडन?

जो बाइडन को दुनिया के सबसे तजुर्बेकार राजनेताओं में से एक माना जाता है. लेकिन, वो अपने भाषणों में भयंकर ग़लतियां करने के लिए भी कुख्यात हैं.
हालांकि, डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवार चुने गए बाइडन के बारे में आपके लिए बस इतना जानना पर्याप्त है कि वो इस साल नवंबर में होने वाले चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशी डोनाल्ड ट्रंप को चुनौती देंगे.
जो बाइडन वो इंसान हैं, जो अमरीका की सत्ता के केंद्र व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप के अगले चार बरस बिताने के ख़्वाब की राह में खड़ी इकलौती बाधा हैं.
बराक ओबामा के शासन काल में उप-राष्ट्रपति रहे बाइडन को औपचारिक रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव का प्रत्याशी चुन लिया गया है.
अपने समर्थकों के बीच में जो बाइडन, विदेश नीति के विशेषज्ञ के तौर पर मशहर हैं. उनके पास वॉशिंगटन डी. सी. में राजनीति करने का कई दशकों का तजुर्बा है. वो मीठी ज़ुबान बोलने वाले नेता के तौर पर मशहूर हैं, जो बड़ी आसानी से लोगों का दिल जीत लेते हैं. बाइडन की सबसे बड़ी ख़ासियत ये है कि वो बड़ी सहजता से आम आदमी से नाता जोड़ लेते हैं. अपनी निजी ज़िंदगी में बाइडन ने बहुत से उतार चढ़ाव देखे हैं और बहुत सी त्रासदियां झेली हैं.
वहीं, विरोधियों की नज़र में जो बाइडन ऐसी शख़्सियत हैं, वो अमरीकी सत्ता में गहरे रचे बसे इंसान हैं, जिनमें कमियां ही कमियां हैं. बाइडन के बारे में उनके विरोधी कहते हैं कि वो अपने भाषणों में झूठे दावे करते हैं. साथ ही उनकी एक और आदत को लेकर भी अक्सर चिंता जताई जाती है कि उन्हें महिलाओं के बाल सूंघने की बुरी लत है.
बड़ा सवाल ये है कि क्या बाइडन में वो ख़ासियत है कि वो नवंबर के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप को व्हाइट हाउस से बाहर का रास्ता दिखा सकें?
जो बाइडन का चुनाव प्रचार से बड़ा पुराना नाता रहा है. अमरीका की संघीय राजनीति में उनके करियर की शुरुआत, आज से 47 बरस पहले यानी 1973 में सीनेट के चुनाव से हुई थी. और उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में भागीदारी के लिए पहला दांव आज से 33 साल पहले चला था.
ऐसे में अगर ये कहें कि बाइडन के पास वोटर को लुभाने का क़ुदरती हुनर है, तो ग़लत नहीं होगा. मगर, बाइडन के साथ सबसे बड़ा जोखिम ये है कि वो कभी भी कुछ भी ग़लत बयानी कर सकते हैं, जिससे उनके सारे किए कराए पर पानी फिर जाए.
जनता से रूबरू होने पर जो बाइडन अक्सर जज़्बात में बह जाते हैं. और इसी कारण से राष्ट्रपति चुनाव का उनका पहला अभियान शुरू होने से पहले ही अचानक ही ख़त्म हो गया था (बाइडन तीसरी बार राष्ट्रपति बनने का प्रयास कर रहे हैं).
जब 1987 में बाइडन ने राष्ट्रपति चुनाव में प्रत्याशी बनने के लिए पहली बार कोशिश करनी शुरू की थी, तो उन्होंने रैलियों में ये दावा करना शुरू कर दिया था कि, 'मेरे पुरखे उत्तरी पश्चिमी पेन्सिल्वेनिया में स्थित कोयले की खानों में काम करते थे.' और बाइडन ने भाषण में ये कहना शुरू कर दिया कि उनके पुरखों को ज़िंदगी में आगे बढ़ने के वो मौक़े नहीं मिले जिसके वो हक़दार थे. और बाइडन ये कहा करते थे कि वो इस बात से बेहद ख़फ़ा हैं.
मगर, हक़ीक़त ये है कि बाइडन के पूर्वजों में से किसी ने भी कभी कोयले की खदान में काम नहीं किया था. सच तो ये था कि बाइडन ने ये जुमला, ब्रिटिश राजनेता नील किनॉक की नक़ल करते हुए अदा किया था (इसी तरह बाइडन ने कई अन्य नेताओं के बयान अपने बना कर पेश किए थे). जबकि नील किनॉक के पुरखे तो वाक़ई कोयला खदान में काम करने वाले मज़दूर थे.
और ये तो बाइडन के तमाम झूठे जुमलों में से महज़ एक था. उनके ऐसे बयान अमरीकी राजनीति में 'जो बॉम्ब' के नाम से मशहूर या यूं कहें कि बदनाम हैं.
2012 में अपने राजनीतिक तजुर्बे का बखान करते हुए बाइडन ने जनता को ये कह कर ग़फ़लत में डाल दिया था कि, 'दोस्तो, मैं आपको बता सकता हूं कि मैंने आठ राष्ट्रपतियों के साथ काम किया है. इनमें से तीन के साथ तो मेरा बड़ा नज़दीकी ताल्लुक़ रहा है.' उनके इस जुमले का असल अर्थ तो ये था कि वो तीन राष्ट्रपतियों के साथ क़रीब से काम कर चुके हैं. मगर इसी बात को उन्होंने जिन लफ़्ज़ों में बयां किया, उसका मतलब ये निकलता था कि उनके तीन राष्ट्रपतियों के साथ यौन संबंध रहे थे.
जब बराक ओबामा ने जो बाइडन को अपने साथ उप-राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया, तो बाइडन ने ये कह कर लोगों को डरा दिया था कि इस बात की तीस फ़ीसद संभावना है कि ओबामा और वो मिलकर अर्थव्यवस्था सुधारने में ग़लतियां कर सकते हैं.
जो बाइडन को क़िस्मत का धनी ही कहा जा सकता है कि उन्हें अमरीका के पहले काले राष्ट्रपति ने अपना उप-राष्ट्रपति बनाया था. क्योंकि, इससे पहले बाइडन ने ओबामा के बारे में ये कह कर हलचल मचा दी थी कि, 'ओबामा ऐसे पहले अफ्रीकी मूल के अमरीकी नागरिक हैं, जो अच्छा बोलते हैं. समझदार हैं. भ्रष्ट नहीं है और दिखने में भी अच्छे हैं.'
अपने इस बयान के बावजूद, इस बार के राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान, जोसेफ बाइडन अमरीका के अफ्रीकी-अमरीकी समुदाय के बीच बहुत लोकप्रिय हैं. लेकिन, हाल ही में एक काले होस्ट के साथ चैट शो के दौरान जो बाइडन ने ऐसा कुछ कह दिया था जिससे बहुत बड़ा हंगामा खड़ा हो गया था. काले अमरीकी होस्ट शार्मलेन था गॉड के साथ बातचीत में बाइडन ने दावा किया था कि, 'अगर आपको ट्रंप और मेरे बीच चुनाव करने में समस्या है, तो फिर आप काले हैं ही नहीं.'
बाइडन के इस इकलौते मुंहफट बयान से अमरीकी मीडिया में तूफ़ान सा आ गया था. जिसके बाद बाइडन के प्रचार अभियान की कमान संभाल रही टीम को लोगों तक ये संदेश पहुंचाने में बड़ी मशक़्क़त करनी पड़ी थी कि बाइडन, अफ्रीकी-अमरीकी मतदाता को हल्के में बिल्कुल नहीं ले रहे हैं.
जो बाइडन के ऐसे बेलगाम बयानों के कारण ही न्यूयॉर्क मैग़ज़ीन के एक पत्रकार ने लिखा था कि, 'बाइडन की पूरी प्रचार टीम बस इसी बात पर ज़ोर दिए रहती है कि कहीं वो कोई अंट-शंट बयान न दे बैठें.'
यूं तो बाइडन एक अच्छे वक्ता हैं. मगर, उनकी भाषण कला का एक पहलू और भी है. आज जब दुनिया में रोबोट जैसे नेताओं की भरमार है, जो सधे हुए बयान देते हैं. बस लिखा हुआ पढ़ देते हैं. लेकिन, बाइडन ऐसे वक्ता हैं जिन्हें सुन कर ऐसा लगता है कि वो दिल से बोल रहे हैं. बाइडन कहते हैं कि बचपन में हकलाने की आदत की वजह से उन्हें टेलिप्रॉम्पटर की मदद से पढ़ना नहीं आता है. वो जो भी बोलते हैं, दिल से बोलते हैं.
जो बाइडन के भाषण में वो दिलकशी है कि वो अमरीका के ब्लू-कॉलर कामकाजी लोगों की भीड़ में अचानक अपने भाषण से जोश भर देते हैं. इसके बाद वो बड़ी सहजता से उस भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं. लोगों से मिलते हैं. हाथ मिलाते हैं उन्हें गले लगाते हैं. लोगों के साथ सेल्फ़ी लेते है. ठीक उसी तरह जैसे कोई बुज़ुर्ग फ़िल्म स्टार हो, जो अचानक अपने फ़ैन्स के बीच पहुंच गया हो.
अमरीका के पूर्व विदेश मंत्री और राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवार रहे जॉन केरी ने न्यूयॉर्कर मैगज़ीन से बातचीत में बाइडन के बारे में कहा था कि, 'वो लोगों को अपनी ओर खींच कर उन्हें गले लगा लेते हैं. कई बार तो लोग उनकी बातों से ही उनकी ओर खिंचे चले आते हैं और कई बार वो लोगों को ख़ुद ही अपने आगोश में भींच लेते हैं. वो दिल को छू लेने वाले राजनेता हैं. और उनमें कोई बनावट नहीं है. वो कोई ढोंग नहीं करते. बड़े सहज भाव से लोगों में घुल मिल जाते हैं.'
पिछले साल आठ महिलाओं ने सामने आकर ये आरोप लगाया था कि जो बाइडन ने उन्हें आपत्तिजनक तरीक़े से छुआ था, गले लगाया था या किस किया था. इन महिलाओं के आरोप लगाने के बाद कई अमरीकी न्यूज़ चैनलों ने बाइडन के सार्वजनिक समारोहों में महिलाओं से अभिवादन करने की नज़दीकी तस्वीरें दिखाई थीं. इनमें कई बार बाइडन को महिलाओं के बाल सूंघते हुए भी देखा गया था. इन आरोपों के जवाब में बाइडन ने कहा था कि, 'भविष्य में मैं महिलाओं से अभिवादन के दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतूंगा.'
लेकिन, अभी इसी साल मार्च महीने में अमरीकी अभिनेत्री तारा रीड ने इल्ज़ाम लगाया था कि जो बाइडन ने तीस साल पहले उनके साथ यौन हिंसा की थी. उन्हें दीवार की ओर धकेल कर उनसे ज़बरदस्ती करने की कोशिश की थी. उस वक़्त तारा रीड, बाइडन के ऑफ़िस में एक सहायक कर्मचारी के तौर पर काम कर रही थीं.
कौन-कौन सुनते हैं राष्ट्रपति के फ़ोन कॉल्स
भले ही आम लोगों से बाइडन की ये नज़दीकी पहले उनके लिए मुसीबत बनती रही हो. लेकिन, इस बार उनके समर्थक ये उम्मीद कर रहे हैं कि उनका जो लोगों से नज़दीकी बनाने का ख़ास स्टाइल है, आम लोगों से जो गर्मजोशी है, उसकी मदद से वो अपनी पुरानी ग़लतियों के भंवर में दोबारा नहीं फंसेंगे. वो डेमोक्रेटिक पार्टी के पुराने राष्ट्रपति चुनाव के प्रत्याशियों जैसी ग़लती नहीं दोहराएंगे. इस बार सावधानी बरतेंगे.
जो बाइडन को अमरीका की संघीय राजनीति में काम करने का लंबा अनुभव रहा है. वो वॉशिंगटन में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं. अमरीकी संसद के ऊपरी सदन यानी सीनेट में बाइडन ने तीन दशक से अधिक समय गुज़ारा है. इसके अलावा वो बराक ओबामा के राज में आठ साल तक उप-राष्ट्रपति रहे हैं. सियासत में इतना लंबा अनुभव काफ़ी काम आता है. मगर, हालिया इतिहास बताता है कि ऐसा हमेशा हो, ये भी ज़रूरी नहीं.
अल गोर (अमरीकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव्स में आठ साल का अनुभव, सीनेट में आठ साल का तजुर्बा और उप-राष्ट्रपति के तौर पर आठ साल का वक़्त) हों, जॉन केरी हों (सीनेट में 28 साल का अनुभव) या फिर हिलेरी क्लिंटन (देश की प्रथम महिला के तौर पर आठ वर्ष का तजुर्बा और सीनेट में आठ साल का अनुभव, विदेश मंत्री के तौर पर चार बरस का तजुर्बा), डेमोक्रेटिक पार्टी के ये सभी अनुभवी राजनेता, अपने से कम तजुर्बा रखने वाले रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशी के हाथों शिकस्त खाने को मजबूर हुए.
जो बाइडन के समर्थक ये मानते हैं कि एक ज़मीनी नेता के तौर पर उनका अनुभव, उन्हें कम अनुभवी ट्रंप के हाथों परास्त होने से बचा लेगा.
अमरीका के वोटरों ने कई बार ये साबित किया है कि वो ऐसे नेताओं को राष्ट्रपति चुनने को तरजीह देते हैं, जो ये दावा करता है कि वो वॉशिंगटन की राजनीति का हिस्सा नहीं है. बल्कि, वो इसलिए राष्ट्रपति बनना चाहते हैं ताकि वो वॉशिंगटन की मौजूदा व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंकें. उसमें आमूल चूल बदलाव ले आएं. अक्सर ऐसे नेता अमरीकी जनता को पसंद आते हैं, जो ख़ुद को 'आउटसाइडर' यानी वॉशिंगटन से बाहर वाला कहते हैं.
लेकिन ये एक ऐसा दावा है जो जो बाइडन क़त्तई नहीं कर सकते. क्योंकि उन्होंने अमरीका की शीर्ष राजनीति में लगभग पचास साल का वक़्त गुज़ारा है.
और, वॉशिंगटन की राजनीति में उनके लंबे तजुर्बे को बाइडन के ख़िलाफ़ चुनाव में भुनाया जा सकता है.
अमरीका के राजनीतिक इतिहास में पिछले कुछ दशकों में जो कुछ भी बड़ा उतार चढ़ाव देखने को मिला है, उसमें बाइडन किसी न किसी रूप में ज़रूर शामिल रहे हैं. और बाइडन ने इस दौरान जो भी फ़ैसले लिए हैं, वो शायद राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान उनके हक़ में काम न आएं.
1970 के दशक में उन्होंने अमरीकी बच्चों के बीच नस्लीय भेदभाव कम करने के लिए उन्हें एक साथ पढ़ाने का विरोध करने वालों का साथ दिया था. तब दक्षिण के अमरीकी राज्य इस बात के ख़िलाफ़ थे कि गोरे अमरीकी बच्चों को बसों में भर कर काले बहुल इलाक़ों में ले जाया जाए. इस बार के चुनाव अभियान के दौरान, बाइडन को उनके इस स्टैंड के लिए बार-बार निशाना बनाया गया है.
रिपब्लिकन पार्टी के उनके विरोधी अक्सर, ओबामा प्रशासन में रक्षा मंत्री रहे रॉबर्ट गेट्स के उस बयान का हवाला देत हैं, जिसमें गेट्स ने कहा था कि, 'जो बाइडन को नापसंद करना क़रीब क़रीब नामुमकिन है. मगर दिकक़्त ये है कि पिछले चार दशकों में अमरीका की विदेश नीति हो या फिर घरेलू सुरक्षा से जुड़े मसले, इन सभी मामलों में बाइडन हमेशा ग़लत पक्ष के साथ ही खड़े रहे हैं.'
अब जैसे-जैसे चुनाव का प्रचार अभियान तेज़ होगा, तो तय है कि बाइडन को ऐसे सियासी बयानों के ज़रिए निशाना बनाया जाएगा.
ये बाइडन के लिए अफ़सोस की बात है. मगर, एक ऐसा मसला है जिस मामले में वो किसी अन्य राजनेता के मुक़ाबले अमरीकी जनता के ज़्यादा क़रीब दिखाई देते हैं. और वो है मौत. जब, जो बाइडन, पहली बार अमरीकी सीनेट का चुनाव जीत कर शपथ लेने की तैयारी कर रहे थे, तभी उनकी पत्नी नीलिया और बेटी नाओमी एक कार हादसे में मारी गई थीं. इस दुर्घटना में उनके दोनों बेटे ब्यू और हंटर भी ज़ख़्मी हो गए थे. बाद में ब्यू की 46 साल की उम्र में 2015 में ब्रेन ट्यूमर से मौत हो गई थी.
इतनी युवावस्था में इतने क़रीबी लोगों को गंवा देने के कारण, आज जो बाइडन से बहुत से आम अमरीकी लोग जुड़ाव महसूस करते हैं. लोगों को लगता है कि इतनी बड़ी सियासी हस्ती होने और सत्ता के इतने क़रीब होने के बावजूद, बाइडन ने वो दर्द भी अपनी ज़िंदगी में झेले हैं, जिनसे किसी आम इंसान का वास्ता पड़ता है.
लेकिन, बाइडन के परिवार के एक हिस्से की कहानी बिल्कुल अलग है. ख़ास तौर से उनके दूसरे बेटे हंटर की.
सत्ता, भ्रष्टाचार और झूठ?
जो बाइडन के दूसरे बेटे हंटर ने वकालत की पढ़ाई पूरी करके लॉबिइंग का काम शुरू किया था. इसके बाद उनकी ज़िंदगी बेलगाम हो गई. हंटर की पहली पत्नी ने उन पर शराब और ड्ग्स की लत के साथ-साथ, नियमित रूप से स्ट्रिप क्लब जाने का हवाला देते हुए तलाक़ के काग़ज़ात अदालत में दाख़िल किए थे. कोकीन के सेवन का दोषी पाए जाने के बाद हंटर को अमरीकी नौसेना ने नौकरी से निकाल दिया था.
एक बार हंटर ने न्यूयॉर्कर पत्रिका के साथ बातचीत में माना था कि एक चीनी ऊर्जा कारोबारी ने उन्हें तोहफ़े में हीरा दिया था. बाद में चीन की सरकार ने इस कारोबारी के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच की थी.
अपनी निजी ज़िंदगी का हंटर ने जैसा तमाशा बनाया उससे बाइडन को काफ़ी सियासी झटके झेलने पड़े हैं. अभी पिछले ही साल हंटर ने दूसरी शादी एक ऐसी लड़की से की थी, जिससे वो महज़ एक हफ़्ते पहले मिले थे. इसके अलावा हंटर की भारी कमाई को लेकर भी बाइडन पर निशाना साधा जाता रहा है.
हंटर का नशे का आदी होना एक ऐसी बात है, जिससे बहुत से अमरीकी लोगों को हमदर्दी हो सकती है. लेकिन, जिस तरह हंटर ने अक्सर मोटी तनख़्वाहों वाली नौकरियों पर हाथ साफ़ किया है. उससे ये बात भी उजागर होती है कि अगर कोई जो बाइडन जैसे किसी बड़े सियासी नेता की औलाद है, तो नशेड़ी होने के बावजूद उन्हें मोटी तनख़्वाहों वाली नौकरियां आसानी से मिल जाती हैं. उनकी ज़िंदगी नशे के शिकार किसी आम अमरीकी नागरिक की तरह मुश्किल भरी नहीं होती.
महाभियोग का भय
हंटर ने मोटी सैलेरी वाली जो नौकरियां कीं, उनमें से एक यूक्रेन में भी थी. बाइडन के बेटे की इसी नौकरी के चलते अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति पर इस बात का दबाव बनाया था कि हंटर के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच करें.
यूक्रेन के राष्ट्रपति को की गई इसी फ़ोन कॉल के कारण हाल ही में ट्रंप के ख़िलाफ़ महाभियोग की शुरुआत हुई थी. हालांकि, ये सियासी मुहिम ट्रंप को राष्ट्रपति पद से हटाने में नाकाम रही थी. हालांकि, ये एक ऐसा सियासी दलदल था, जिसे लेकर शायद बाइडन ये सोच रखते हों कि काश वो इस झंझट में न पड़े होते.
कूटनीति का लंभाव अनुभव, जो बाइडन की बड़ी सियासी ताक़त है. ऐसे में विदेश से जुड़ा हुआ कोई भी सियासी स्कैंडल उन्हें ख़ास तौर से सियासी नुक़सान पहुंचाने वाला हो सकता है. जो बाइडन, पहले सीनेट की विदेशी मामलों की समिति के अध्यक्ष रह चुके हैं. और वो ये दावा बढ़ चढ़कर करते रहे हैं कि-'मैं पिछले 45 बरस में कम-ओ-बेश दुनिया के हर बड़े राजनेता से मिल चुका हूं.' भले ही, अमरीकी मतदाताओं को बाइडन के इस दावे से तसल्ली होती हो कि उनके पास राष्ट्रपति बनने का पर्याप्त अनुभव है. लेकिन, ये कहना मुश्किल है कि उनके इस अनुभव के आधार पर कितने लोग बाइडन को राष्ट्रपति पद के लिए चुनना चाहेंगे.
उनके लंबे सियासी अनुभव की तरह ही इस मामले में भी यही कहा जा सकता है कि इस मामले में उनका मिला जुला अनुभव ही रहेगा.
जो बाइडन ने 1991 के खाड़ी युद्ध के ख़िलाफ़ वोट दिया था. लेकिन, 2003 में उन्होंने इराक़ पर हमले के समर्थन में वोट दिया था. हालांकि, बाद में वो इराक़ में अमरीकी दख़ल के मुखर आलोचक भी बन गए थे.
ऐसे मामलों में बाइडन अक्सर संभलकर चलते हैं. अमरीकी कमांडो के जिस हमले में पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन को मार गिराया गया था, बाइडन ने ओबामा को ये हमला न करने की सलाह दी थी.
मज़े की बात ये है कि अल-क़ायदा के नेता ओसामा बिन लादेन को जो बाइडन की कोई ख़ास परवाह नहीं थी. सीआईए द्वारा ज़ब्त किए गए जो दस्तावेज़ जारी किए गए हैं, उनके मुताबिक़, ओसामा बिन लादेन ने अपने लड़ाकों को निर्देश दिया था कि वो राष्ट्रपति बराक ओबामा को निशाना बनाएं. लेकिन, लादेन ने बाइडन की हत्या का कोई फ़रमान नहीं जारी किया था.
जबकि उस वक़्त बाइडन, अमरीका के उप-राष्ट्रपति थे. ओसामा बिन लादेन को लगता था कि, ओबामा की हत्या के बाद बाइडन को ही अमरीका की कमान मिलेगी. मगर लादेन के मुताबिक़, 'बाइडन राष्ट्रपति पद की ज़िम्मेदारियां उठाने के लिए क़त्तई तैयार नहीं थे. और अगर वो राष्ट्रपति बनते हैं तो अमरीका में सियासी संकट पैदा हो जाएगा.'
कई मामलों में जो बाइडन के ख़यालात ऐसे हैं, जो डेमोक्रेटिक पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं से मेल नहीं खाते. डेमोक्रेटिक पार्टी के इन युवा समर्थकों को बर्नी सैंडर्स या एलिज़ाबेथ वॉरेन जैसे नेताओं के कट्टर युद्ध विरोधी विचार अधिक पसंद आते हैं. मगर, बहुत से अमरीकी नागरिकों को ये भी लगता है कि जो बाइडन कुछ ज़्यादा ही शांति दूत बनते हैं.
ये वही अमरीकी नागरिक हैं, जिन्होंने इस साल जनवरी में एक ड्रोन हमले में, ईरान के जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या करने का आदेश देने पर राष्ट्रपति ट्रंप का खुल कर समर्थन किया था.
विदेश नीति से जुड़े ज़्यादातर मामलों में बाइडन का रवैया मध्यमार्गी रहा है. इससे हो सकता है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के बहुत से कार्यकर्ताओं में जोश न भरे. लेकिन, बाइडन को लगता है कि बीच का ये रवैया अपना कर वो उन मतदाताओं को अपनी ओर खींच सकते हैं, जो अभी ये फ़ैसला नहीं कर पाए हैं कि ट्रंप और उनके बीच, वो किसे चुनें.
और नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान, उन्हें पसंद करने वालों को बहुत ज़ोर शोर से उनका साथ देने की ज़रूरत नहीं होगी. उन्हें बस बाइडन के हक़ में बिना कोई शोर गुल किए हुए, वोट डालना होगा.
चुनाव से पहले के तमाम सर्वे, व्हाइट हाउस की इस होड़ में जो बाइडन को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से पाँच से दस अंक आगे बताते रहे हैं. लेकिन, नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव अभी भी कई महीने दूर हैं. और तय है कि अभी आगे बाइडन के लिए कई सख़्त इम्तिहान बाक़ी हैं. दोनों ही पार्टियों के प्रत्याशी पहले ही काले लोगों के ख़िलाफ़ पुलिस की हिंसा के विरोध में अमरीका में हो रहे विरोध प्रदर्शन को लेकर टकरा चुके हैं. इसके अलावा जिस तरह से अमरीकी सरकार ने कोरोना वायरस के संकट से निपटने की कोशिश की है, उसे लेकर भी ट्रंप और बाइडन में भिड़ंत हो चुकी है.
यहां तक कि फ़ेस मास्क भी ट्रंप और बाइडन के बीच सियासी झड़प का कारण बन चुके हैं. ऐसा लगता है कि जो बाइडन कई बार सार्वजनिक रूप से मास्क पहन कर दिखने के लिए ज़रूरत से ज़्यादा प्रयास करते हैं, वहीं, राष्ट्रपति ट्रंप, मास्क पहनने से बार-बार परहेज़ करते आए हैं.
लेकिन, कई बार इमेज चमकाने की इन छोटी मोटी कोशिशों से इतर राजनीतिक चुनाव प्रचार के प्रबंधन में कई बड़ी चीज़ें दांव पर लगी होती हैं.
अगर, जो बाइडन राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतते हैं, तो वो अपने लंबे और उतार चढ़ाव भरे राजनीतिक करियर के शिखर पर पहुंच जाएंगे. लेकिन, अगर वो चुनाव नहीं जीत पाते हैं, तो इससे वो व्यक्ति चार और वर्षों के लिए अमरीका का राष्ट्रपति बन जाएगा, जिसके बारे में बाइडन का कहना है कि, 'उसमें अमरीका का राष्ट्रपति बनने की बिल्कुल भी क़ाबिलियत नहीं है. वो एक ऐसा इंसान है, जिस पर क़त्तई भरोसा नहीं किया जा सकता है.'
आज से चार साल पहले, 2016 में जब जो बाइडन इस बात की दुविधा में थे कि राष्ट्रपति चुनाव की रेस में दाख़िल हों या नहीं, तब उन्होंने कहा था कि, 'मैं इस बात की तसल्ली लेकर ख़ुशी से मर सकता हूं कि मैं राष्ट्रपति नहीं बन सका.'

Saturday, May 30, 2020

WHO और ग्लोबल पाॅलिटिक्स

WHO से अमेरिका ने सारे संबंध तोड़ लिए है अमेरिका का यह कदम बिल्कुल ठीक है यह सच है कि कोरोना के मामले चीन पाकसाफ नही है ...........लेकिन जिस तरह से WHO व्यहवार कर रहा था यह साफ दिख रहा था कि वह चीन को लेकर अब भी सॉफ्ट कार्नर रख रहा है कल की खबर मीडिया खूब दिखा रहा है लेकिन 28 मई को ही WHO ने अप्रत्यक्ष रूप साफ कर दिया था कि उसे अमेरिका के फंड की कोई जरूरत भी नहीं है....दरअसल 1948 में स्थापित WHO को दो तरह से फंडिंग मिलती है। 

पहला, संगठन का हिस्सा बनने के लिए हर सदस्य को एक खास राशि चुकानी पड़ती है जिसे असेस्ड कन्ट्रीब्यूशन कहते हैं। यह राशि सदस्य देश की आबादी और विकास दर पर निर्भर करती है। अभी 148 देश इसके सदस्य है

दूसरा तरीका होता है वॉलंटरी कन्ट्रीब्यूशन यानि कि चंदे की राशि का। यह राशि सरकारें और चैरिटी संस्थान दोनों दो सकते हैं।

70 के दशक तक डब्ल्यूएचओ को  उसके बजट की करीब आधी रकम सदस्य देशों से असेस्ड कन्ट्रीब्यूशन के तौर पर मिलती थी, लेकिन अब यह राशि केवल 20 प्रतिशत ही रह गई है। अब संगठन को वॉलंटरी कन्ट्रीब्यूशन से ज्यादा धनराशि मिल रही है। इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन उन संस्थानों और देशों पर ज्यादा निर्भर होने लगा है जो ज्यादा योगदान करते हैं। 

पिछले सालों में चीन का योगदान 52 फीसदी तक बढ़ गया है। चीन अब 8.6 करोड़ डॉलर दे रहा है। चीन की आबादी ज्यादा होने से असेस्ड कन्ट्रीब्यूशन भी ज्यादा है, लेकिन इसी के साथ चीन ने वॉलंटरी कन्ट्रीब्यूशन भी बढ़ाया है।

यह जानकारी हमे अब हमारा मीडिया दे रहा है पर वह आज भी हमे नही बता रहा है कि उसे सबसे अधिक वॉलंटरी कन्ट्रीब्यूशन देने वाला सिर्फ एक ही व्यक्ति है ओर उसी के बैकअप के कारण WHO ट्रम्प से पंगा लेने को तैयार हो गया है और उस व्यक्ति का नाम है बिल गेट्स, 
गेट्स की फाउंडेशन ओर उसके द्वारा फंडेड संस्थाएं WHO की इतनी फंडिंग करती है जितनी अमेरिका जैसा देश भी नही करता बिल गेट्स ने पिछले महीने ट्रंप द्वारा WHO के फंड रोके जाने पर कहा था, 'ये जितना सुनने में लगता है उतना ही खतरनाक है'. इतना ही नहीं बिल गेट्स ने हाल ही में एक ओपिनियन आर्टिकल में कोरोना वायरस को लेकर अमेरिकी ऐडमिनिस्ट्रेशन की आलोचना की थी

अब चीन के बारे में समझते हैं 2010 के दशक के आरंभ से ही संयुक्त राष्ट्र के कई संस्थानों में चीन के लोगों का प्रभाव बढ़ा है। इनमें से कई संस्थाओं के हेड चीन के हैं या फिर चीन के समर्थन से है

अंतरराष्ट्रीय संगठनों में चीन का बढ़ता दबदबा, विश्व राजनीति में संघर्ष के नए नए मोर्चे खोल रहा है. और इस संघर्ष में विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले मोर्चे पर ही शिकार बन गया है. याद कीजिए कि विश्व स्वास्थ्य संगठन, उन पहले अंतरराष्ट्रीय संगठनों में से एक था, जिसने चीन के साथ सहमति पत्र पर दस्तख़त किए थे. जिनके अंतर्गत विवादित बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव के दायरे में स्वास्थ्य की प्राथमिकताओं को बढ़ावा देना था.

यानी WHO को यह दिन तो एक दिन देखना ही था अब wHO ने अपनी फंडिंग के लिए अलग व्यवस्था की है उसने डब्ल्यूएचओ फाउंडेशन के नाम से 27 मई को ही एक नयी संस्था का निर्माण किया है डब्ल्यूएचओ फाउंडेशन, विश्व स्वास्थ्य संगठन (who) से अलग संस्था है जो स्विट्जरलैंड में पंजीकृत है। यहीं जिनेवा में डब्ल्यूएचओ का मुख्यालय भी है। वह डब्ल्यूएचओ के कामकाज के लिए गैर-पारंपरिक स्रोतों से पैसे (fund) जुटायेगा। ये पैसे आम लोगों और बड़े दानदाताओं से जुटाये जाएंगे। सहमति पत्र के जरिये दोनों संगठन एक-दूसरे से संबद्ध होंगे।

साफ है कि WHO तो सर्वाइव कर जाएगा बड़ा प्रश्न यह है कि भारत क्या WHO के मामले में ट्रम्प का साथ देगा?...मेरे ख्याल से नही!.......लेकिन हा यदि बिल गेट्स का बैकअप नही होता तो जरूर भारत ट्रम्प के निर्णय के साथ होता ........इसीलिए बिल गेट्स को संसार का सबसे बड़ा डॉक्टर कहा जाता है।

अमेरिका में अश्वेत असमानता

मैंने पिछले दिनों वेस्टर्न देशों ब्लैक कम्युनिटी पर होने वाली हिंसा पर दस से अधिक फ़िल्में या डॉक्यूमेंट्री देखी हैं. असल कहानी पर बानी एक फिल्म blackkklansman का सीन मैंने आप सबको लिखकर समझाया था.
वो सीन एक बार फिर से असल में दोहराया गया है. "एक आदमी का नाम था जॉर्ज फ्लॉयड, ये अफ्रीकन समुदाय का आदमी अमेरिका के Michigan में बाउंसर की नौकरी करता था. किसी ने पुलिस को उसकी शिकायत कर दी कि उसपर जालसाजी करने का "शक" है. पुलिस ने जॉर्ज को पकड़ा, और गाडी के पिछले टायर के पास पटक दिया, और गर्दन पर घुटना रखकर दबा दिया. वो चिल्लाता रहा, " मैं मर रहा हूँ, मुझे छोड़ दो, मुझे पानी दे दो, मैंने कुछ नहीं किया है, सब आरोप झूठे हैं, मुझे मत मारो. और अंत में उसकी आवाज धीमी पड़ गई, वो केवल तीन शब्द ही बोल सका, " I CAN'T BREATH"
इस सबके लिए जिम्मेदार है एक मानसिकता जो खुद को काले लोगों से सुपीरियर समझती है. अब इस घटना ने अमेरिका में हंगामा खड़ा कर दिया है, लोग जुलूस निकाल रहे हैं, पुलिस से भिड़ रहे हैं और नारे लगा रहे हैं. पुलिस प्रदर्शनकारियों का दमन भी कर रही है लेकिन लोग हैं कि पीछे हटने को तैयार नहीं. लोगों ने पुलिस स्टेशन को भी फूंक दिया है.इस सबमें पुलिस के साथ साथ प्रेजिडेंट ट्रम्प की भी आलोचना हो रही है, उनकी ट्विटर से चल रही झड़प इसी सबके बीच हो रही है. वहां पत्रकार से लेकर सेलिब्रिटी सब अपने नागरिक अधिकारों और कर्तव्यों को जानते हैं इसलिए फुटबॉल प्लेयर्स से लेकर हॉलीवुड के एक्टर्स भी लगातार इसके खिलाफ आवाज उठा रहे. दूसरी तरफ ट्रम्प प्रदर्शन कर रहे लोगों को धमकी दे रहे हैं गोली मरने की.
आइए अब आपको ले चलते हैं इतिहास में. 2019 में न्यूयार्क टाइम्स के गुलामी प्रथा के 400 साल पूरे होने पर एक रिपोर्ट छापी। जिसका नाम था, प्रोजेक्ट 1619. इसको पुलित्जर एवार्ड भी मिला था. इसके शुरुआती शब्द थे........., 
"साल 1619, अगस्त का महीना, जगह थी.... वर्जीनिया बंदरगाह के पास जगह प्वाइंट कम्फर्ट। यहाँ एक जहाज में 20 से अधिक अफ़्रीकी लोग थे, जिनको गुलाम बनाकर अमेरिकी जमीन पर लाया गया था. इस धरती पर आगे चलकर जो देश बना, बसा, या विकसित हुआ उसका कोई भी पहलू इस गुलामी प्रथा से अछूता नहीं रहा. वो प्रथा जो आगे आने वाले कई दशकों तक यहाँ काबिज रही, इस दिन के 400 साल पूरे होने पर अब समय है कि ये कहानी सबको सुना ही देनी चाहिए."
 इस कहानी में जिन 20 लोगों का जिक्र है इन्ही लोगों से अमेरिका में लम्बी गुलामी प्रथा की शुरुआत हुई थी. इन लोगों को अमेरिका के जेम्स टाउन के साम्राज्यवादियों ने समुद्री लुटेरों से ख़रीदा था. ये लुटेरे इन अफ्रीकियों को पुर्तगाल के एक जहाज से लूट कर लाये थे. ये 20 लोग अमेरिका में रह रहे सभी अफ़्रीकी लोगों के वंशज थे. जिन्हें उनके घरों से लूटकर, जहाज में भरकर, और जानवरों की तरह बेंचा जाना था. ताकि वो अपनी मेहनत सेे खेतों में फसल पैदा कर सकें. गुलामों ने अमेरिका में कारखानों में मजदूरी से लेकर खेतों में कपास उगाने और उसे रंगने वाले नील बनाने, चाय से लेकर उसमें पड़ने वाली शक्कर तक बनाने का काम किया.
फिर 1662 में वर्जीनिया लॉ ने गुलामी को Hereditary कर दिया. मतलब गुलाम माँ का बच्चा भी गुलाम माना जायेगा। इस कानून की एक लाइन थी, "इस देश में पैदा हुआ हर बच्चा, उसकी माँ के स्टेटस से तय होगा."
फिर सवाल ये कि दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र होने का दावा करने वाले देश अमेरिका के क़ानून ने इनको कोई मदद की? जवाब है नहीं.
"Deceleration of Independence" जो 1773 में आया. जिसमें लिखा है कि दुनिया का  हर मनुष्य बराबर है, उन्हें बनाने वाले ईश्वर ने कुछ ऐसे अधिकार दिए हैं जिनको छीना नहीं जा सकता। इसमें जीवन और आजादी का
अधिकार सबसे ऊपर है. लेकिन ये शब्द जिसपर ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़कर आजादी  हासिल करने वाले देश की नींव रखी गई, उसकी इस गारंटी से कुछ लोगों को बाहर रखा गया था, और ये वही गुलाम लोग थे. फिर लगभग 110 साल बाद संविधान में 13th amendment आया, इसे "Evolution of Slavery" कहते हैं. मलतब गुलामी की प्रथा का खात्मा. 
क्या इसके बाद सब बराबर हो गए? जवाब है नहीं. उनके बच्चो के स्कूल से लेकर बस्तियां तक अलग हो थी. फिर 2008 में इसी समुदाय के बराक ओबामा सबसे बड़े पद पर पहुंचे. मतलब बदलाव तो आया है लेकिन अभी भी एक धड़े में गोरे लोगों के श्रेष्ठ होने की मानसिकता घुसी हुई है. आज भी पुलिस अश्वेत लोगों को आसानी से अपराधी समझ लेती है. उनपर हिंसा होती है.
मैंने ऊपर जिस जॉर्ज की कहानी बताई उसी इलाके में कुछ दिन पहले कुछ लोग हाथ में मशीन गन लेकर लोकडाउन ख़तम करने की मांग करते हुए पुलिस स्टेशन पहुँच गए थे लेकिन पुलिस ने उनको समझा कर वापस भेज दिया। उनको मारा पीटा नहीं, क्योंकि वो गोरे थे. लेकिन इस आंदोलन में शामिल लोगों पर रबर बुलेट चलाई जा रहीं, जेल में डाला जा रहा. लेकिन इसके बीच सबसे बड़ी उम्मीद की किरण ये है कि ब्लैक लोगों के साथ अमेरिका के गोरे लोगों का एक बड़ा धड़ा है, जो इस मानसिकता का विरोध करता है.अब जब अमेरिका की बात हो चुकी तो हमारे देश में भी क्या अभी भी किसी की जाति के नाम पर, किसी के धर्म के नाम पर, किसी के रंग के नाम पर, किसी के कद के नाम पर, किसी की भाषा या किसी के प्रदेश के नाम पर भेदभाव होता है? क्या हमने भी ये किया है? ईमानदारी से पूछिए खुद से और जवाब दीजिये.

Friday, May 1, 2020

इजरायल में कोरोना के पीछे नेतन्याहू सरकार

इजरायल में एक साल के भीतर तीन चुनाव (अप्रैल 2019, सितम्बर 2019 और मार्च 2020) हो चुके हैं। जिसमें 120 सीटों वाली संसद में अबतक किसी को बहुमत (61 सीटें) नहीं मिला है। पार्टियों में कभी गठबंधन का फैसला हो नहीं पाया। पिछले चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को 36 और विपक्षी पार्टी ब्लू एंड व्हाइट को 33 सीटें मिलीं। नेतन्याहू ने कोशिश की सभी दक्षिणपंथी और धार्मिक पार्टियों से गठबंधन की लेकिन आकडा 58 ही पहुंच पाया। ब्लू एंड व्हाइट, लेबर पार्टी और विपक्षी दलों के पास मिलाकर 55 सीटें ही पहुंच पाईं। बाकी कुछ सीटें स्वतंत्रत लोगों के पास थीं।
अब नेतन्याहू ने विपक्षी दल के नेता बेनी गैंट के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बना ली है संविधान के इमरजेन्सी नियमों के आधार पर, क्योंकि वो एक साल से कार्यकारी प्रधानमंत्री थे। अब इस सरकार में पहले 18 महीने नेतन्याहू पीएम और बेनी रक्षामंत्री रहेंगे और अगले 18 महीने इसका उल्टा मतलब बेनी पीएम बनेंगे लेकिन नेतन्याहू के लिए एक अल्टरनेटिव पीएम का पद बनाया जाएगा। हलांकि दबाव में आकर सरकार बनाने की मंजूरी देने वाले विपक्षी नेता बेनी गैंट के सहयोगी उनका साथ छोड चुके हैं। नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। उनपर अपराध तय हो चुके थे, 17 मार्च से मुकदमा भी शुरू होना था, लेकिन उसके कुछ दिन पहले ही इजरायल के पूरे कोर्ट सिस्टम पर ही रोक लगा दी गई। अब ट्रायल की अगली तारीख 24 मई है। अब नेतन्याहू पूरी तरह से प्रंट फुट पर हैं। पूरे लीगल सिस्टम की आलोचना कर रहे हैं कि वो उनको काम नहीं करने दे रहा। वो इजरायल की जनता की भावनाओं को जानते हैं कि लोग आतंकवाद से कितना नफरत करते हैं इसलिए कोरोना को एक सुसाईड बमर की तरह बता रहे, जिसे केवल मैं ही हरा सकता हूँ। अब कोरोना इमरजेन्सी के बाद यहाँ बहुत कुछ दिलचस्प होगा। क्योंकि मुकदमा चलना है और अटार्नी जरनल भी नेतन्याहू की पसंद का होगा। लोगों का ये भी मानना है कि 18 महीने बाद वो बेनी के साथ डील तोड भी सकते हैं। लेकिन जनता अब भी लाॅकडाउन के नियमों का पालन करके विरोध प्रदर्शन करने लगी है कि तीन चुनाव हार चुका भ्रष्ट नेता फिर से देश कैसे चला सकता है?

Thursday, April 2, 2020

कोरोना के नाम पर लोकतंत्र का खात्मा

आजकल कोरोना वायरस का कहर चीन के बाद सबसे ज्यादा अमेरिका और यूरोपीय देशों में चल रहा है। ऐसे समय में यूरोप के ही एक देश से लोकतंत्र पसंद लोगों को नाराज करने वाली खबर आई है। इस देश का नाम है हंगरी, जहाँ कोरोना से बचाव के नाम पर लोकतंत्र को खत्म कर दिया गया है। इस देश की शुरुआती कहानी ये  है कि हंगरी में 2003 में एक जनमत संग्रह हुआ कि उसे यूरोपीय यूनियन में मिलना चाहिए या नहीं? वही यूरोपीय यूनियन जिससे हाल ही में ब्रिटेन बाहर निकला है। इसमें शामिल होने की पहली शर्त है सदस्य देश को अपने यहाँ लिबरल डेमोक्रेसी रखनी पडेगी। पब्लिक ने हाँ कर दी और हंगरी ईयू में मिल गया। और अभी दो दिन पहले ही हंगरी की संसद में लोकतंत्र खत्म करने का प्रस्ताव पास हो गया, प्रधानमंत्री को अनिश्चित काल के लिए पीएम घोषित कर दिया गया है। और साथ ही उसे अपने मनमाने कानून बनाने का अधिकार भी दे दिया। इसके अलावा भी अथाह शक्तियां दी गई हैं। और ये सब हुआ है कोरोना महामारी के बहाने। असल में यहाँ ऐसा फेर बदल पहली बार नहीं हुआ है। साल 1988 तक यहाँ कम्युनिस्ट शासन था। एक 25 साल के एक रिसर्च स्टूडेंट की चिट्ठी जार्ज सोरोस नाम के, लोगों की मदद करने वाले एक सेठ के पास आर्थिक मदद के लिए पहुंची, उसी चिट्ठी में उस लडके ने ये भी कहा था कि जल्द ही यहाँ कम्युनिज्म खत्म होने वाला है। आगे चलकर उस लडके की बात सच हुई और यहाँ संसदीय लोकतंत्र आ गया। असल में कहानी का रोमांचक मोड तब आया जब 1998 में वही चिट्ठी लिखकर भविष्यवाणी करने वाला लडका विक्टर ओरवन प्रधानमंत्री बन गया। इसके पीछे उनका 1989 में दिया गया साढे छः मिनट लंबा भाषण है जिससे वो बहुत मशहूर हुआ। इस भाषण में उन्होंने ढाई लाख लोगों को संबोधित करते हुए कहा था कि सोवियत यूनियन की सेना जल्द ही यहाँ से चली जाए।  इसके बाद ओरवन राजनीति में आए और 1990 में सांसद बन गये, 1993 में Fidesz Party के अध्यक्ष बन गये। 1994 में चुनाव हुए तो पार्टी की सीटें कम हो गईं, अब ओरवन बदलने लगे और दक्षिणपंथियों की तरह भाषण देने लगे। हर कट्टरपंथी नेता की तरह नस्लभेदी टिप्पणियाँ और हंगरी को फिर से महान बनाने जैसी बातें करने लगे। वो हंगरी के कट्टरपंथी विचारधारा के वोट बटोरने की हर कोशिश करने लगे। बता दूं कि उनकी शादी 1986 में कोर्ट में हुई थी, लेकिन उन्होंने दोबारा धार्मिक रीति रिवाज से अपनी पत्नी से दोबारा शादी की। लोगों को ये सब पसंद आया और 1998 में सोशलिस्ट सरकार चली गयी, और कंजरवेटिव गठबंधन की तरफ से ओरवन प्रधानमंत्री बने। 2004 और 2006 में ओरवन की पार्टी चुनाव हार गई और वो विपक्ष में बैठे। इसके बाद ओरवन ने अपने अंदर और अधिक कट्टरता लानी शुरू कर दी। कहते हैं कि सत्ता नेता को बिगाड़ देती है जबकि यहाँ सत्ता चली गयी तो नेता बिगडने लगा। वो 2006 में हारने के बाद मीडिया को कारण बताते रहे। कहते थे कि ये लोकतंत्र किसी काम का नहीं जो जिसमें मीडिया पब्लिक को भड़काकर आपकी सत्ता छीन लेती है, इसपर नकेल कसनी चाहिए। 2008 में वैश्विक मंदी आई तो ओरवन ने इसका फायदा उठाया, कहा कि मैं ऐसा देश बनाऊंगा जिसपर विश्व की अर्थव्यवस्था का कोई फर्क ही न पड़े। ओरवन सत्ता में लौटे और 2011 में नया संविधान लेकर आए। ओरवन तब से अबतक सत्ता में बैठे हैं और अब तो ऐसा प्रावधान कर लिया कि जबतक चाहे सत्ता में रह सकते हैं। जो युवा अपनी जवानी में हंगरी से कम्युनिस्ट तानाशाही खत्म होने की मांग कर रहा था वो अब खुद तानाशाह बन गया, कभी लिबरल रहा नेता आज कट्टरपंथी राजनीति का चेहरा बन चुका है। कहते हैं कि आजतक ओरवन ने इसके लिए हिंसा का सहारा नहीं लिया। कुछ लोगों का मानना है कि वहाँ तानाशाही तो 2011 में नये संविधान के साथ ही आ चुकी थी, बस नाम का लोकतंत्र था, विपक्ष था जिसकी आवाज के कोई मायने नहीं, चुनाव होता था जिसमें ओरवन का जीतना तय था। इसे राजनीति शास्त्र में "साॅफ्ट ऑटोपैसी" कहते हैं, मतलब असली लोकतंत्र न होते हुए भी उसका नाटक करना, तानाशाही को चुपके से ऐसे लागू कर देना जिससे जनता को भनक तक न लगे। नतीजतन अब हंगरी वन पार्टी सिस्टम बन चुका है। मीडिया को सरकार ने पूरी तरह नियंत्रण में ले लिया है। अप्रैल 2018 में अटलांटिक की एक रिपोर्ट में ओरवन को यूरोपियन यूनियन का सबसे खतरनाक आदमी माना गया था, अब उसकी आशंका सच हो रही है। हलांकि सरकार कह रही है कि ये सब केवल कोरोना खतरे से निपटने के लिए है लेकिन ये पूरा सच नहीं है। यूरोपियन यूनियन ने आलोचना भी ऊपर ऊपर ही कर दी, उसने एक बार भी हंगरी का नाम लिए बिना कहा कि, "ईयू की बुनियाद में आजादी, लोकतंत्र और मानवाधिकार की रक्षा करना। सभी सदस्यों को इसका पालन करना चाहिए।"

अब सवाल ये भी है कि ईयू पहले से ओरवन के खिलाफ क्यों नहीं बोलता रहा जब वो 2011 से ही लोकतंत्र खत्म करने की राह पर चल रहे थे? जब शरणार्थी समस्या पूरे विश्व में बहुत बडी हो रही थी तो ईयू हमेशा ही इसके लिए लिबरल होने की कवायद करता रहा। वो बर्लिन की दीवार टूटने को आज भी इसीलिए सेलिब्रेट करता है। लेकिन हंगरी ने शरणार्थियों को रोकने के लिए अपने बार्डर पर कंटीले तारों की दीवार बनवा दी, तब ईयू क्यों नहीं बोला? ईयू के लोग ही हंगरी को सबसे कम लोकतांत्रिक देश और ओरवन की पार्टी को अपने आप में एक स्टेट कहा, लेकिन ईयू चुप रहा। कुछ लोग इसकी वजह बताते हैं कि ओरवन हर काम कानून बनाकर करते हैं। अगर कोई इन मुद्दों पर उनको घेरेगा तो कह सकते हैं कि ये तो जनमत है, जनता की चुनी संसद में पास कानून।

अजीब है कि ओरवन खुद को इतना गरीब बताते हैं कि उनको 15 साल में पहली बार नहाने के लिए गर्म पानी और बंद दरवाजे का बाथरुम मिला था। लेकिन अब वो हंगरी के सबसे अमीर आदमी हैं।
अंत में सौरभ द्विवेदी की सुनाई एक कहानी सुनाता हूँ कि दादा ने पोती से पूछा कि लोकतंत्र की अहमियत क्या है?
पोती ने जवाब दिया," खाने में नमक की तरह।"
मतलब रोज रोज खाना खाने में नमक को कोई याद नहीं करता लेकिन जिस दिन नमक न हो, पूरा खाना ही अधूरा लगता है। वैसे ही ऐसे तो किसी को लोकतंत्र की परवाह नहीं, लेकिन जिस दिन खत्म हो जाए, आजादी के मायने उस दिन समझ आते हैं।


Wednesday, April 1, 2020

ब्राजील में कोरोना बनाम राष्ट्रपति

जब पूरे विश्व में कोरोना वायरस से हाहाकार मचा है तो वहीं, लैटिन अमेरिका में बसा एक देश ऐसा है जिसके राष्ट्रपति इसके खतरे को सिरे से नकार रहे हैं। ये देश है अपने समुद्रीय तटों और फुटबॉल के लिए प्रसिद्ध ब्राजील। जो पिछले दिनों अमेज़न जंगलों में लगी आग की वजह से चर्चा में आया था। यहाँ के राष्ट्रपति हैं दक्षिणपंथी नेता जायर बोलसेनेरो। आप लोगों को एक रोते हुए नेता की तस्वीर याद होगी जिसे इटली का प्राइम मिनिस्टर बताकर  वायरल किया जा रहा था, असल में वो इटली के पीएम नहीं बल्कि यही बोलसेनेरो का पुराना फोटो था। बोलसेनेरो अल्पसंख्यकों और समलैंगिकों पर अपनी नफरत भरी टिप्पणियों के लिए भी अक्सर चर्चा में रहते हैं। याद रहे कि पहले ट्रम्प भी कोरोना के खतरे को नकारते रहे और अमेरिका अब कीमत चुका रहा है।
ब्राजील में जनता के भी दो धडे हो गये हैं एक तरफ हैं बोलसेनेरो के समर्थक जो उनकी तरह एकदम निश्चिंत हैं, और दूसरी तरफ उनके विरोधी जो मानते हैं कि वहाँ भविष्य खतरे में है। यहाँ कोरोना के केस 4500 से अधिक हो गये हैं और मरने वालों की संख्या 200 के आसपास। लेकिन बोलसेनेरो तो कोरोना को मीडिया का बनाया हुआ "हिस्टीरिया" (एक तरह का काल्पनिक डर) बताते हैं। उनके अनुसार कोरोना साधारण जुकाम और बुखार है। इससे डरने की जरूरत नहीं है। लोगों के मरने पर बोले कि सबको एक दिन मरना है। उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वो तर्क देते हैं कि एक एक्सीडेंट होने पर क्या हम कार बनाना बंद कर देंगे? 
यहाँ तक कि उनका अपना स्वास्थ्य विभाग लगातार लोगों को संक्रमण से बचने को कहता रहा लेकिन खुद राष्ट्रपति तो रैलियों में जाते रहे। राजधानी ब्राजीलिया सहित कुल 27 सूबे हैं, जिनके सभी गवर्नरों ने उनको गिडगिडाने की शक्ल में पत्र लिखकर गुज़ारिश की लेकिन कोई फर्क नहीं पडा। इसके बावजूद रियो डी जेनैरो और साओ पाउलो जैसे राज्यों के गवर्नर ने लाॅकडाउन किया है, लेकिन बोलसेनेरो इसके खिलाफ रैलियां कर रहे। एक स्थानीय चैनल के पोल में 67% लोग लाॅकडाउन के समर्थन और 33% लोग बोलसेनेरो के साथ हैं। अब दोनों पक्ष सोसल मीडिया के हैसटैग से लेकर विरोध प्रदर्शन तक में एक दूसरे के खिलाफ लड रहे हैं। राष्ट्रपति के समर्थन में लोग गाडियो पर झंडे लगाकर निकल रहे हैं, पार्टी कर रहे, अपने अपने काम पर जा रहे हैं। तो दूसरी तरफ उनके विरोध में लोग अपने घरों से बोलसेनेरो के खिलाफ जबरदस्त नारेबाजी कर रहे। बर्तन पीट रहे, गलियां Go back बोलसेनेरो के नारों से गूंज रहीं। 
पूरी मानव सभ्यता के लिए आज ये खतरे का समय है जब लोग एकजुट हैं, तब ब्राजील में ध्रुवीकरण हो गया है। राजनीतिक गणित ये भी कहता है कि 2015 की मंदी से अबतक ब्राजील उबरा नहीं था कि अमेज़न के जंगल में आग लग गई, फिर कोरोना आ गया। तो राष्ट्रपति ठीक से समझते हैं कि इससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था बिगडेगी, तो ब्राजील में भी पर्यटन कम होने की वजह से ऐसा होगा। फिर 2022 में ब्राजील के राष्ट्रपति के चुनाव हैं, जिसमें वो इस नाकामी का ठीकरा गवर्नरों पर फोडेंगे। उनको अंदाजा है कि रियो डि जेनेरो के गवर्नर विल्सन विटजेल और साओ पाउलो के गवर्नर जोआओ डोरिया उनके खिलाफ चुनाव लड सकते हैं, जिनपर वो अभी से सबसे अधिक हमले कर रहे। फिर चुनाव के समय भी बोलसेनेरो यही करके चुनाव जीतना चाहते हैं। 
लेकिन दूसरी तरफ खबर आई है कि आइसोलेशन के विरोधी बोलसोनारो को ही आइसोलेट कर दिया गया है. 
जायर बोलसोनारो को उनकी ही सरकार के मंत्रियों ने किनारे कर दिया है. दो दिन पहले ख़बर आयी थी कि मंत्रिमंडल की बैठक में वरिष्ठ मंत्रियों ने कोरोना संकट पर राष्ट्रपति के बेहद लापरवाह रवैए पर नाख़ुशी जतायी थी. और अब कहानी बदल गयी है. सूत्र बता रहे हैं कि उनकी मिलिटरी और सीनियर सहयोगियों ने बोलसोनारो से अपने हाथ में कमान ले ली है. उन्हें बैठा दिया गया है यानी अब वे नाम के राष्ट्रपति हैं. कहा तो यह भी जा रहा है कि मंत्री और मिलिटरी जरनल वाल्टर ब्रेगा नेत्तो ने 'ऑपरेटिंग प्रेज़िडेंट' के रूप में सारे अधिकार बोलसोनारो से ले लिया है. देखते हैं, इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि कब होती है.
फिलहाल जैसे हालत बन रहे उससे संदेह है कि इस संकट के बाद 2022 चुनाव के पहले ही उनका तख्ता पलट भी हो सकता है। ये बात आप याद रखिएगा कि अमेरिका से लेकर यूरोप तक में बहुत से देशों में ऐसा सत्ता पलटने का खेल देखने को मिल सकता है। हंगरी में ऐसा हो ही गया है और अमेरिका में भी बर्नी सैंडर्स ने अपना नाॅमिनेशन वापस ले लिया है, मतलब अब मुकाबला जो बाइडन और प्रेसीडेंट ट्रम्प के बीच कड़ा होगा। यहाँ तक कि खतरा चीन के राष्ट्रपति सी जिनपिंग की कुर्सी पर भी है।
मुझे खुशी है कि भारत में भी इतनी असहमति रखने वाले इतने दल, राज्य और सरकारें सबने मिलकर बढिया काम किया है। इतनी एकजुटता बहुत सुखद है। इसे किसी इस्लाम या हिंदुत्व में न बांटिए खासकर इस मुश्किल दौर में।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

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