Sunday, October 30, 2016

भगत सिंह:(समाज शास्त्रिक विशलेषण)

भगतसिंह जिज्ञासु विचारक थे, क्लासिकल नहीं. 23 साल की उम्र का एक नौजवान स्थापनाएं करके चला जाये-ऐसी संभावना भी नहीं हो सकती. भगतसिंह तो विकासशील थे. बन रहे थे. उभर रहे थे. अपने अंतत: तक नहीं पहुंचे थे. हिन्दुस्तान के इतिहास में भगतसिंह एक बहुत बड़ी घटना थे. भगतसिंह को इतिहास और भूगोल के खांचे से निकलकर अगर हम मूल्यांकन करें और भगतसिंह को इतिहास और भूगोल के संदर्भ में रखकर अगर हम विवेचित करें, तो दो अलग अलग निर्णय निकलते हैं. भगतसिंह 1907 में पैदा हुए और 1931 में हमारे बीच से चले गये. ऐसे भगतसिंह का मूल्यांकन कैसा होना चाहिए? लोग गांधीजी को अहिंसा का पुतला कहते हैं और भगतसिंह को हिंसक कह देते हैं. भगतसिंह हिंसक नहीं थे. जो आदमी खुद किताबें पढ़ता था, उसको समझने के लिए अफवाहें गढ़ने की जरूरत नहीं है. उसको समझने के लिए अतिशयोक्ति, अन्योक्ति, स्तुति और निंदा की जरूरत नहीं है. भगतंसिंह ने 'मैं नास्तिक क्यों हूं' लेख लिखा है. भगतंसिंह ने नौजवान सभा का घोषणा पत्र लिखा जो कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के समानांतर है. भगतसिंह ने अपनी जेल डायरी लिखी है, जो आधी अधूरी हमारे पास आई है. भगतसिंह ने हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी एसोसिएशन का घोषणा पत्र, उसका संविधान बनाया. पहली बार भगतसिंह ने कुछ ऐसे बुनियादी मौलिक प्रयोग हिन्दुस्तान की राजनीतिक प्रयोगशाला में किए हैं जिसकी जानकारी तक लोगों को नहीं है. भगतंसिंहके मित्र कॉमरेड सोहन सिंह जो उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी में ले जाना चाहते थे, लेकिन भगतंसिंह ने मना कर दिया. जो आदमी कट्टर मार्क्सवादी था, जो रूस के तमाम विद्वानों की पुस्तकों को चाटता था. फांसी के फंदे पर चढ़ने का फरमान पहुंचने के बाद जब जल्लाद उनके पास आया तब बिना सिर उठाए भगतसिंह ने उससे कहा 'ठहरो भाई, मैं लेनिन की जीवनी पढ़ रहा हूं. एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है.थोड़ा रुको.' 
आप कल्पना करेंगे कि जिस आदमी को कुछ हफ्ता पहले, कुछ दिनों पहले, यह मालूम पड़े कि उसको फांसी होने वाली है. उसके बाद भी रोज किताबें पढ़ रहा है?
कम से कम दुनिया के 35 ऐसे बड़े लेखक थे जिनको भगतसिंह ने ठीक से पढ़ रखा था. बेहद सचेत दिमाग के 23 साल के नौजवान के प्रति मेरा सिर श्रद्धा से इसलिए भी झुकता है कि समाजवाद के रास्ते पर हिन्दुस्तान के जो और लोग उनके साथ सोच रहे थे, भगतसिंह ने उनके समानांतर एक लकीर खींची लेकिन प्रयोजन से भटककर उनसे विवाद उत्पन्न नहीं किया जिससे अंगरेजी सल्तनत को फायदा हो. मुझे लगता है कि हिन्दुस्तान की राजनीति में कुछ लोगों को मिलकर काम करना चाहिए था. मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि महात्मा गांधी और विवेकानंद मिलकर हिन्दुस्तान की राजनीतिक दिशा पर बात क्यों नहीं कर पाये. गांधीजी उनसे मिलने बेलूर मठ गए थे लेकिन विवेकानंद की बीमारी की वजह से सिस्टर निवेदिता ने उनसे मिलने नहीं दिया था. भगतसिंह समाजवाद और धर्म को अलग अलग समझते थे. विवेकानंद समाजवाद और धर्म को सम्पृक्त करते थे. विवेकानंद समझते थे कि हिन्दुस्तान की धार्मिक जनता को धर्म के आधार पर समाजवाद की घुट्टी अगर पिलायी जाए तो शायद ठीक से समझ में बात आएगी. गांधीजी भी लगभग इसी रास्ते पर चलनेकी कोशिश करते थे.
यह तार्किक विचारशीलता भगतसिंह की है. उस नए हिन्दुस्तान में वे 1931 के पहले कह रहे थे जिसमें हिन्दुस्तान के गरीब आदमी, इंकलाब और आर्थिक बराबरी के लिए, समाजवाद को पाने के लिए, देश और चरित्र को बनाने के लिए, दुनिया में हिन्दुस्तान का झंडा बुलंद करने के लिए धर्म जैसी चीज की हमको जरूरत नहीं होनी चाहिए. आज हम उसी में फंसे हुए हैं. क्या सबूत है कि अयोध्या में मस्जिद थी? क्या सबूत है कि मंदिर बन जाने पर रामचंद्र जी वहां आकर विराजेंगे? 
एक बिंदु की तरफ अक्सर ध्यान खींचा जाता है अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए कि महात्मा गांधी और भगतसिंह को एक दूसरे का दुश्मन बता दिया जाए. भगतसिंह को गांधी जी का धीरे धीरे चलने वाला रास्ता पसंद नहीं था. लेकिन भगतसिंह हिंसा के रास्ते पर नहीं थे. उन्होंने जो बयान दिया है उस मुकदमे में जिसमें उनको फांसी की सजा मिली है, उतना बेहतर बयान आज तक किसी भी राजनीतिक कैदी ने वैधानिक इतिहास में नहीं दिया.
हमारे यहाँ संविधान तो किताब मात्र बनकर रह गया है, जब हम गीता, कुरान शरीफ, बाइबिल और गुरु ग्रंथ साहब की आयातों और श्लोकों पर बहस कर सकते हैं कि इनके सच्चे अर्थ क्या होने चाहिए? तो हमको हिन्दुस्तान की उस पोथी (संविधान) की जिसकी वजह से सारा देश चल रहा है, को पढ़ने, समझने और उसके मर्म को बहस के केन्द्र में डालने का भी अधिकार मिलना चाहिए. यही भगतसिंह का रास्ता है. भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि किसी की बात को तर्क के बिना मानो. खुद उनसे भी. जब मैं भगतसिंह से तर्क करता हूं. बहस करता हूं. तब मैं पाता हूं कि भगतसिंह के तर्क में भावुकता है और भावना में तर्क है.
अंत में अभी सोचा हुआ एक सवाल आपके लिए छोडकर जा रहा हूं, मान लें भगतसिंह 1980 में पैदा हुए होते और 20 वर्ष में बीसवीं सदी चली जाती. उसके बाद 2003 में उनकी हत्या कर दी गई होती. उन्हें शहादत मिल गई होती. तो भगतसिंह का कैसा मूल्यांकन होता? सोचकर देखिए?

Thursday, October 27, 2016

सहानुभूति की लहर पर सवार अखिलेश

एक समाजवादी मित्र ने एक वीडियो भेजा है, अखिलेश कहते हैं ”हर दिन मैं खुद से उत्‍तर प्रदेश का भविष्‍य बनाने का वादा करता हूं।” इसके बाद ब्रेकफास्ट टेबल पर अखिलेश, उनकी पत्‍नी डिंपल और बच्‍चे नजर आते हैं। वीडियो में परिवार, जनता और विकास की थीम नजर आती है। आखिर में संदेश दिया गया है कि ‘उत्‍तर प्रदेश, भारत…मेरा परिवार” 
कल से चार वीडियो व्हाट्सएप पर मिल चुके हैं, जिसमें दो अखिलेश और दो शिवपाल ग्रुप से मिले हैं. 
2. इसके जवाब में शिवपाल सिंह यादव पूरे हुए वादे अब हैं नए इरादे टाइप एक जोरदार वीडियो में अनुभव की बात करते हुए किसानों को लुभाते नज़र आते हैं.
3. इस वीडियो में अखिलेश का एक गाना है, यूपी अपनी माँ है, इसकी ज़िम्मेदारी है,........अखिलेश यादव बोल रहा हूँ,....... इसमें खास बात है कि युवाओं से संवाद करने की कोशिश है.
4. अखिलेश के जवाब में इस वीडियो में सीधे मुलायम सिंह के समाजवादी और लोहियावादी विचारों को खड़ा किया गया है. 
देखते हैं ये लड़ाई अभी और कहाँ तक जाएगी. 
खास बात यह है इस वीडियो की जिसमे से पूरा यादव परिवार गायब है. कम से कम 40-50 लोगों से फोन और व्हाट्सएप पर 400-500 लोगों से बात कर चुका हूं सबकी सहानुभूति अखिलेश के साथ उस माइक छीनने के बाद वाले इमोशनल भाषण के बाद है। आज के 4 महीने पहले और आज के अखिलेश में फर्क है, लोग पहले भी कहते थे भइया ने काम किया है लेकिन यादव परिवार गुंडागर्दी करता है। मुलायम समर्थक लोगों को शायद उनके साथ हुए व्यवहार से दुख हुआ है। तभी वो रणनीति बदलकर पार्टी में रहकर ही खुद के दम पर चुनाव लडना चाहते हैं, शायद दो महीने में अकेले सब खडा करना आसान नहीं होगा। इसलिए वे खुद सहानुभूति के नाम पर चुनाव लडकर खुद ही हीरो बनना चाहते हैं। उनको पता है कि बहुमत आएगा नही तो अगर 130-150 सीटें भी आ जाती है तो गठबंधन की सरकार उनके नाम पर ही बनेगी। बाकी सब तो साइड में होगे। कल की पीसी में मुलायम की बात "शिवपाल की वापसी अखिलेश का अधिकार है" कहते ही शिवपाल के चेहरे पर खामोशी छा गई थी। शायद बेटे का कनेक्शन हो? वैसे मंत्री पद 15 दिन का बचा है इसके बाद कुछ होगा नहीं आचार संहिता लागू होने के कारण। लेकिन अखिलेश ने खडा होने और अकेले फैसला लेने का साहस दिखाया है, अब विरोधी उनपर जितना ज्यादा हमला करेगे वो मजबूत होगे। 

Wednesday, October 26, 2016

चाइना के सामान पर देशभक्ति का पाठ

चीन के एक्सपोर्टर्स की लिस्ट में हम 15वें स्थान पर हैं, भारत का हिस्सा उसके टोटल एक्सपोर्ट में से 1.5% ही है. क्योंकि हमारे यहाँ जो छोटी छोटी चीज़ें हैं वही चाइना से आती हैं, अगर आप स्वदेशी के नाम पर उसका समान रोकना चाहते हैं, तो सभी विदेशी समान को रोकिए. चाइना का सब प्रोडक्ट्स का इम्पोर्ट किसी और सेक्टर के एक प्रोडक्ट से भी कम होता होगा. अगर पाकिस्तान या आतंकवादियों का साथ देने के कारण उसका समान रोका जा रहा है तो बहुत सारी बाते हैं, उसके सभी संबंधों को रोकना चाहिए. और पाकिस्तान के एकटर्स के साथ साथ सभी बिजनेस बंद करना चाहिए. ग्लोबलाइजेशन के दौर में हम किसी से मुकाबला नहीं कर पाएँगे. अगर इंटरनेशन मार्केट में भारत को कुछ जगह बनानी है तो मेक इन इंडिया को बढ़ावा देकर पहले भारत में चीन के प्रोडक्ट्स को हराकर वापस भेजना होगा उसके बाद इंटरनेशनल मार्केट में यही करना होगा. ऐसा नहीं है क़ि यह असंभव है. मेरा सवाल केवल सरकार और उसके समर्थित लोगों के डबल स्टॅंडर्ड से है. 
मतलब हम उसके माल को रोककर कितना असर डाल लेंगे या अपने आर्थिक आधार को कितना मजबूत कर रहे हैं. जबकि कहीं ना कहीं से वो चल वैसा ही रहा है. चीन के एक्सपोर्टर्स की लिस्ट में हम 15वें स्थान पर हैं, भारत का हिस्सा उसके टोटल एक्सपोर्ट में से 1.5% ही है. क्योंकि हमारे यहाँ जो छोटी छोटी चीज़ें हैं वही चाइना से आती हैं,  अगर आप स्वदेशी के नाम पर उसका समान रोकना चाहते हैं, तो सभी विदेशी समान को रोकिए. चाइना का सब प्रोडक्ट्स का इम्पोर्ट किसी और सेक्टर के एक प्रोडक्ट से भी कम होता होगा. अगर पाकिस्तान या आतंकवादियों का साथ देने के कारण उसका समान रोका जा रहा है तो बहुत सारी बाते हैं, उसके सभी संबंधों को रोकना चाहिए. मतलब हम उसके माल को रोककर कितना असर डाल लेंगे या अपने आर्थिक आधार को कितना मजबूत कर रहे हैं. जबकि कहीं ना कहीं से वो चल वैसा ही रहा है. 
और पाकिस्तान के एकटर्स के साथ साथ सभी बिजनेस बंद करना चाहिए. ग्लोबलाइजेशन के दौर में हम किसी से मुकाबला नहीं कर पाएँगे. अगर इंटरनेशन मार्केट में भारत को कुछ जगह बनानी है तो मेक इन इंडिया को बढ़ावा देकर पहले भारत में चीन के प्रोडक्ट्स को हराकर वापस भेजना होगा उसके बाद इंटरनेशनल मार्केट में यही करना होगा. ऐसा नहीं है क़ि यह असंभव है. मेरा सवाल केवल सरकार और उसके समर्थित लोगों के डबल स्टॅंडर्ड से है. आप स्मॉल स्केल इंडस्ट्रीस को बढ़ाने के लिए देश में क्या कर रहे हो? आप कौन सी योजनाएँ लाए हो, दूर की छोड़ो बनारस (पीएम का संसदीय क्षेत्र) के बुनकर अपने बिजनेस के लिए जूझ रहे हैं वहाँ क्या हुआ? कूई आर्थिक या टेक्निकल मदद की? स्मॉल स्केलस को डिजिटल इंडिया के वो जाल में फँसा दिया है क़ि पहले से अधिक भ्रष्टाचार होता है, कोई बनवा के दिखाए ऐसे फूड लाइसेंस? कुछ तो सरकार को भी करके दिखाने की ज़रूरत है? बातों और नारों से देश नहीं बदलेगा. 

Monday, October 24, 2016

समाजवादी पार्टी का महाभारत

मुलायम घराने के सियासी ड्रामे से मुझे कुछ नहीं लेकिन अखिलेश यादव को मायूस देखकर एक राजनीतिक छात्र होने के नाते थोड़ा सा खराब ज़रूर लगा. एक ऐसा समय जब देश में राजनीतिक विरासतों का दौर है, यूपी में मुलायम, राष्ट्रीय लोकदल के अजीत सिंह, अपना दल की अनुप्रिया पटेल, बिहार में पासवान और लालू, पंजाब में बादल, तमिलनाडु में करुणानिधि, महाराष्ट्र में ठाकरे और सबसे पुरानी और पूर्व में सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस में गाँधी परिवार ने कार्यकर्ताओं की मेहनत से खड़ी पार्टियों पर परिवार के लोगों को जबरजस्ती थोपा है तो अखिलेश के रूप में यह बग़ावत कुछ ना कुछ संकेत है. अगर अखिलेश इसमें सफल हो जाते तो अन्य दलों में भी हो रही परिवारिक मनमर्ज़ी को चैलेंज मिलता था. मैं मानता हूँ कि वो चार साल तक हिम्मत नहीं कर सके, लेकिन अंतिम समय में कुछ करने की ठान ली जब उनको लगा क़ि अब हारना तय है. ऐसा होता तो बीजू जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, जयललिता की पार्टी में भी एक बग़ावत के संकेत दिखते. 
हालाँकि मुझे इस मामले में अखिलेश के अलावा राहुल गाँधी में वो माद्दा दिखता है, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं दिखाई. उनको कई मौके मिले लेकिन नहीं कर पाए. एक तो वो दगी नेताओं को बचाने का बिल फाड़ने वाला एपीसोड याद होगा. इसमें वो कभी कोशिश करते नहीं दिखे शायद कार्यकर्ताओं की जगह हवाई चॅमचे टाइप नेताओं से घिरे थे, अखिलेश और नीतीश इसी में उनसे आगे निकल गए. नीतीश कुमार ने यह हिम्मत 2013 में भाजपा से गठबंधन के समय दिखाई थी, फिर मोदी से हारे और मांझी को सब देकर निकल पड़े नई रणनीति पर फिर सब वापस मिल गया. मोदी भी भाजपा में बहुत बड़ी लड़ाई जीतकर आए हैं. ऐसा नहीं है क़ि उनको संघ का पूरा समर्थन था. संघ उनके गुजरात के कार्यकाल में अपने खुद के अविकसित होने के डर से वाकिफ़ था, लेकिन मोदी ने 2 साल पहले से जो लहर बनाई थी, वो पहले भाजपा में उनको विजयी करती है. फिर देश में.
समाजवादी पार्टी का अब हारना तय है, मुश्किल से 80 सीटें आएँगी, अब उनका मुस्लिम वोट बीएसपी और यादव वोट भाजपा के साथ जाएगा. मुस्लिम को लगता है जो भाजपा को हाराए उसे वोट दो, तो अब बीएसपी ही उसे टक्कर देगी. दूसरी तरफ यादवों को लगता है क़ि अगर मायावती जीत गईं तो यादवों पर एससी एस टी के झूठे केश पूर्व की तरह लगाएँगी, तो वो उसके साथ जाएँगे जो बीएसपी को हराएगा।
अखिलेश यादव की टीम में लगातार काम कर रहे लोग बता रहे थे क़ि अखिलेश जी का राजनीतिक गुरुओं के आधार पर अनुमान और रणनीति है क़ि अगर समाजवादी पार्टी से अलग दल बनाकर वो मैदान में उतरेंगे तो फिर वो सबसे बड़े दल (150-170 सीट) बनकर उभर सकते हैं. ऐसा होगा जनता के बीच इमोशनल कार्ड खेलकर. उत्तर प्रदेश में जनता अखिलेश के बहुत करीब है ये तो मैं जानता हूँ. ख़ासकर ओबीसी. आप देखेंगे क़ि युवा उनको भईया और डिंपल को भाभी, बुजुर्ग डिंपल को बहू कहते हैं. लोग जो विरोधी हैं वो भी कहते हैं वो लड़का तो ठीक है लेकिन शिवपाल के गुंडे प्रदेश को लूट रहे हैं. काम भी हुआ है, जिसको कोई नकार नहीं सकता है, मीडिया और इंडस्ट्रलीस्ट के बीच में उनकी छवि अच्छी है. लेकिन सब उनके परिवार और दबंग यादवों से डरते हैं. ऐसे में अगर अखिलेश ये कहकर क़ि ये धर्म युद्ध है, घर में बाप और चाचा ही साथ नहीं हैं, जनता के बीच जाएँगे तो लोगों की हमदर्दी होगी उनके साथ. क्योंकि पार्टी के बँटवारे में लगभग गुंडे तो शिवपाल चाचा के साथ चले जाएँगे. दूसरी तरफ अखिलेश को कांग्रेस का समर्थन मिल सकता है. कांग्रेस ने भले ही शीला दीक्षित को उम्मीदवार बना दिया है लेकिन अगर उनको हटाकर अभी भी अखिलेश से गठबंधन हो जाए तो कोई दिक्कत  नहीं होगी. ऐसे में उत्तर प्रदेश में 100 ऐसी सीटें तो हैं ही जहाँ पर कांगेस को 20000 वोट से अधिक मिलता है. जो अखिलेश के साथ जुड़ने से जीत में तब्दील हो सकता है. और अखिलेश के पास अकेले 60-70 सीटों पर जीतने के दम तो बिना मुलायम सिंह के है. फिर इस स्थिति में उनका MY (मुस्लिम-यादव) वोट नहीं बिखरेगा, क्योंकि उनको जीत दिखेगी. मुझे लगता है क़ि अब अखिलेश यादव पर मुलायम सिंह यादव ने इमोशनल कार्ड खेलकर सब गेम बेकार कर दिया है. अब जो टकराव हो चुके हैं वो साथ आने से मिट नहीं सकते हैं, बल्कि अभी और भी चालें चली जाएँगी जिससे नुकसान होगा.

Thursday, October 20, 2016

घटती नौकरियों के आकड़े हमें चिंतित क्यों नहीं करते?

पिछले चार साल से हर दिन 550 नौकरियां ग़ायब होती चली जा रही हैं.
किसान,छोटे खुदरा वेंडर, दिहाड़ी मज़दूर और इमारती मज़दूरों के सामने जीनव का संकट खड़ा होता जा रहा है.
इस हिसाब से 2050 तक भारत में 70 लाख नौकरियों की कमी हो जाएगी.
बहरहाल प्रहार ने अपने सर्वे में लेबर ब्यूरो के एक आंकड़ों का बारीक अध्ययन करने का दावा किया है, जिसके अनुसार...
2015 में सिर्फ 1 लाख 35 हज़ार नौकरियों का ही सृजन किया गया.
2013 में 4 लाख 19 हज़ार नौकरियां पैदा हुई थीं.
2013 से 2015 के बीच भारी गिरावट आई है.
अप्रैल 2015 में केयर रेटिंग्स के चीफ इकोनोमिस्ट मदन सबनविस और अनुजा शाह ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. कंपनियां अपनी बैलेंस शीट में नौकरियां का जो आंकड़ा पेश करती हैं, इन दोनों ने पिछले चार साल में 1072 कंपनियों का अध्ययन कर बताया कि...
2014 में 11 लाख 88 हज़ार से अधिक नौकरियां जोड़ी गई हैं.
2015 में सिर्फ 12,760 नई नौकरियां ही जोड़ी गई हैं.
1000 से अधिक कंपनियों में नौकरियों में इतनी तेज़ी से गिरावट से किसी को फिक्र नहीं है और लोग इस बात में उलझे हैं कि मंदिर के सामने से ताजिये का जुलूस कैसे निकलेगा और मस्जिद के सामने से प्रतिमा विसर्जन का जुलूस. मदन सबनविस और अनुजा शाह की रिपोर्ट में सेक्टर के हिसाब से नौकरियां का विश्लेषण है...
2015 के साल में कंस्ट्रक्शन सेक्टर में -43.7 फीसदी नौकरियां घटी हैं.
2015 के साल में केबल में -20.6 फीसदी.
डायमंड और जुलरी में -28.4 फीसदी.
इंजीनियरिंग में -26.4 फीसदी नौकरियों में गिरावट आई है.
अस्‍पताल और हेल्थकेयर सेवाओं में -20.5 फीसदी.
बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, आई टी सेक्टर में पिछले साल के मुकाबले इस साल कैंपस की नौकरियों में 20 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है. आईटी सेक्टर में पिछले छह साल से बेसिक ऑफर 3 से साढ़े तीन लाख प्रति वर्ष ही बना हुआ है.
मिड लेवल के इंजीनियरिंग कालेजों में इसी सैलरी पर ज़्यादातर को नौकरी मिलती है.
इस हिसाब से देखें तो सैलरी में निगेटिव ग्रोथ हो जाती है.
एक कारण यह भी है कि बाज़ार में बहुत बड़ी तादाद में इंजीनियर हो गए हैं. इसलिए भी उनकी शुरुआती सैलरी में पिछले छह साल में कोई वृद्धि नहीं है. यानी छह साल पहले कोई इंजीनियर तीन लाख पर नौकरी पाता है, छह साल बाद का बैच भी इसी वेतन पर ज्वाइन करता है, जबकि इन छह सालों में कॉलेजों की फीस और पढ़ाई का ख़र्चा कितना गुना बढ़ गया होगा. बिजनेस स्टैंडर्ड ने कई कॉलेजों के प्लेसमेंट सेल से बात कर लिखा है कि कैंपस आने वाली कंपनियों की संख्या में तो कमी नहीं है, मगर नौकरियों की संख्या कम रहने के अनुमान हैं. 
पहले कंपनियां चार लोगों को नौकरी पर रखती थीं, तो अब दो लोगों को रख रही हैं.
90 प्रतिशत कंपनियां पिछले साल की ही सैलरी दे रही हैं.
बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट में हेड हंटर इंडिया के चेयरमैन क्रिस लक्ष्मीकांत का बयान छपा है कि इंफोसिस, विप्रो और टीसीएस जैसी चोटी की तीन कंपनियां हर साल दो लाख नए इंजीनियरों को नौकरी पर रखती थीं, लेकिन अब यह संख्या घटकर 70 से 80 हज़ार हो गई है. इसका कारण यह भी है कि बैंकिंग, फाइनांस सेक्टर और बीमा क्षेत्र में ठहराव आया है. वहां से इन आईटी कंपनियों को बिजनेस नहीं मिल रहा है, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में नौकरियां बढ़ सकती हैं. अगर आप केयर रेटिंग्स के आंकड़े देखेंगे तो...
2015 में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नौकरियों में वृद्धि दर -5.2 प्रतिशत दर्ज हुई है.
बैंकिंग सेक्टर में पिछले साल मात्र 2.1 फीसदी रही है.
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नौकरियों में वृद्धि की किसी भी संख्या को हमें -5.2 प्रतिशत के अनुपात में ही देखना होगा. एक और बात का ध्यान रखियेगा कि ये सारे आंकड़े सरकारी नहीं हैं. अलग-अलग रिसर्च एजेंसियों के हैं. अच्छा होता है कि इस तरह के आंकड़े सरकार जारी करती, लेकिन लेबर ब्यूरो के आंकड़े को क्या सरकार भी स्वीकार करेगी कि 2015 में एक लाख पैंतीस हज़ार से ज्यादा नौकरियां नहीं बढ़ी हैं.
15 साल से अधिक उम्र के लोगों में बेरोज़गारी पिछले पांच साल में सबसे अधिक है.
काम कर सकने वाली आबादी का एक तिहाई बेकार है.
68 फीसदी कामगार परिवारों की मासिक कमाई 10,000 से अधिक नहीं है.
अप्रैल से लेकर दिसंबर 2015 के बीच एक लाख साठ हज़ार परिवारों में सात लाख अस्सी हज़ार से अधिक लोगों को शामिल किया है.
भारत में 15 साल से अधिक उम्र के कामगारों की आबादी 45 करोड़ के करीब बैठती है.
इस 45 करोड़ में से दो करोड़ तीस लाख लोग बेरोज़गार हैं.
जिन्हें काम मिल रहा है, उन्हें साल भर काम नहीं मिलता है.
इसे अंडर एम्लॉयपेंट की कैटगरी में रखा गया है, इसकी संख्या 16 करोड़ है.
16 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन्हें पूरे साल काम नहीं मिलता है. क्या वाकई इतनी गंभीर स्थिति है. क्या आज का नौजवान जिसे नौकरी चाहिए वो इन आश्वासनों पर घर बैठ सकता है कि 2025 या 30 तक नौकरियां बढ़ने लगेंगी.

सांप्रदायिकता की आग में जलता उत्तर प्रदेश

कल के हिन्दुस्तान टाइम्स में एक रिपोर्ट पढ़ी मैने. जिसमें कुछ  आकड़े सामने आएँ जो बहुत चौकाने वाले थे. 
यूपी में जनवरी 2010 से 2016 के बीच सांप्रदायिक हिंसा की 12,000 घटनाएं हुई हैं.
साल के हिसाब से हर साल 2,000 सांप्रदायिक घटनाएं.
दिन के हिसाब से हर दिन पांच से अधिक सांप्रदायिक घटनाएं.
सिर्फ एक दिन कोई सांप्रदायिक हिंसा दर्ज नहीं हुई है और वो है 25 दिसंबर 2014.
साल 2016 में जनवरी से अप्रैल के बीच 1,262 सांप्रदायिक घटनाएं दर्ज हुई हैं.
2015 में 3,708 मामले दर्ज हुए हैं और 2014 में 2,884.
बीफ या गोहत्या को लेकर होने वाली सांप्रदायिक घटनाओं की संख्या कैसे बढ़ रही है..
2010 में इन कारणों से सिर्फ 130 मामले दर्ज होते हैं, जो 2014 में 458 हो जाते हैं.
2015 में दर्ज 3,708 घटनाओं में से 696 घटनाएं बीफ या गोहत्या को लेकर होती हैं.
उसी तरह से क़ब्रिस्तान को लेकर झगड़ा, मंदिर-मस्जिद और धार्मिक आयोजनों की भी भूमिका रही है. अप्पू ने इस सबको धार्मिक असहिष्णुता के मद में जोड़ दिया है.
2010 में धार्मिक असहिष्णुता के कारण 592 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में से 98 घटनाएं होती हैं.
2014 में 2,884 में से 715 घटनाएं धार्मिक असहिष्णुता के कारण होती हैं.
2015 में 3,708 घटनाओं में से 905 घटनाएं धार्मिक असहिष्णुता के कारण होती हैं.

गोंडा में दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन के दौरान पथराव का आरोप लगा. तनाव बढ़ा तो ताज़िया कमेटी ने ताज़िया नहीं निकाला.
मऊ में भी प्रतिमा विसर्जन और ताज़िया तोड़े जाने को लेकर तनाव हुआ.
अलीगढ़ में कब्रिस्तान की ज़मीन पर रावण जलाने को लेकर तनाव फैला.
मुरादाबाद में बिलारी इलाके में मुहर्रम के दौरान एक जुलूस निकालने को लेकर तनाव हो गया.
13, 14 और 15 अक्तूबर को गोंडा के मोतीगंज, बहराइच के फख़रपुर में तनाव हुआ. बहराइच में कई जगहों पर ऐसी घटनाएं हुई हैं. नासिर ने लिखा है कि महाराजगंज, कुशीनगर, बलिया, बलरामपुर, बरेली, सीतापुर और रायबरेली में भी जुलूस के रास्ते को लेकर तनाव हुआ है. बिहार में तो चुनाव भी नहीं होने वाले हैं, लेकिन वहां ये तनाव क्यों हो रहे हैं.
बिहार के पूर्वी चंपारण के तुरकौलिया में भी सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया.
यहीं के सुगौली में भी इसी तरह का मामला हुआ.
पश्चिम चंपारण के बेतिया के एक मोहल्ले में भी तनाव हो गया.
गया, मधेपुरा, भोजपुर, पीरो, गोपालगंज, सीतामढ़ी से भी ऐसी ख़बरें आईं हैं.

Wednesday, October 19, 2016

मुस्लिम पर्सनल लॉ बनाम स्त्री अधिकार

हैदराबाद लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर मुस्तफ़ा हैदर की एक किताब में सरला मुदगल का एक महत्वपूर्ण केश पढ़ने का मौका मिला. उसमें उन सभी महिलाओं के मामले थे जिनके पति ने दूसरी शादी करने के लिए इस्लाम अपना लिया था. ऐसा धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी के केश में भी हो चुका है. मतलब लोग धर्म और पर्सनल लॉ की आड़ में दूसरी शादी करते हैं. 
दूसरी बात उसमें सबसे क्लियर पता चली क़ि 1937 के शरियत एक्ट का क़ुरान या इस्लामिल लॉ से बहुत ज़्यादा मतलब नहीं है. बहुत छोटा सा शरीयत एक्ट है जिसमें 6 धाराएँ हैं उसमें कहीं भी तीन तलाक़ या पॉलिगेमी का ज़िक्र तक नहीं है. कुछ लोग बड़ी चालाकी से मेरे साथ बहस में भी पर्सनल लॉ को शरीयत, क़ुरान या इस्लाम के साथ जोड़कर बहस को धार्मिक या भावनात्मक करके हमारी आवाज़ों को कम्युनल घोषित करने में लगे थे. तो मैंने आज मुस्तफ़ा साहब की ही किताब में पढ़ा क़ि भारत में लगने वाला मुस्लिम पर्सनल लॉ कुरानिक या इस्लामिक नहीं है. ये एक फिक है. फिक का अर्थ होता है ह्यूमन एलिमेंट. ये हनफी विद्वानों द्वारा लिखा गया क़ानून है, इसलिए इसे हनफी लॉ भी कहा जाता है. अर्थात क़ुरान से मात्र 20-25% चीज़ें ही ली गई हैं, कस्टम्स ज़्यादा हैं. आज भी मुस्लिमों में ख्वाजा या मेमन लोग हैं जो हिंदुओं के 1955 के रिफ़ॉर्म हो चुके क़ानून के पुराने वर्ज़न से चल रहे हैं. ह्यूमन एलिमेंट के आधार पर ना जाने कितने सुप्रीम कोर्ट और प्रिवी कौंसिल के फ़ैसले हैं. ऐसे में कोई ट्रिपल तलाक़ या 4 शादी जैसे महिला विरोधी कार्यों को कैसे समर्थन कर सकते हैं.  
अभी की बात करें तो जो ट्रिपल तलाक़ का मामला है उसका सरकार से अभी तक  तो कोई लेना देना नहीं है. अभी तक वो लड़ाई मुस्लिम महिलाएँ ही सुप्रीम कोर्ट में लड़ रही हैं. लेकिन सरकार इसी दौर में एक साथ कॉमन सिविल कोड पर भी चर्चा करना चाहती है. जबकि मुझे नहीं लगता है क़ि बहुसंख्यक समाज भी अभी कॉमन सिविल कोड के लिए राज़ी होगा. सबसे बड़ी बात है इसमें लोगों को इनकम टैक्स में मिलने वाला हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली के अंडर मिलने वाला लाभ. इसके बाद हिंदुओं में भी हिंदू मैरिज एक्ट पूरी तरह से लागू नहीं हो पाता है, गोवा में एक अलग स्पेशल मैरिज एक्ट है, फिर पॉंडिचेरी में तो फ्रेंच लॉ लगता है. ऐसे में अगर सरकार या सुप्रीम कोर्ट एक रणनीति के तहत छोटे छोटे रिफ़ोर्मस या एमएण्डमेंट करके पर्सनल लॉ को कमजोर करे तो काफ़ी अच्छा होगा. उदाहरण के तौर पर सबसे पहले ट्रिपल तलाक़ में ही महिला और पुरुष दोनों को तलाक़ का अधिकार होना चाहिए. तलाक़ 3 बार में हो या एक बार में ये महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण ये है क़ि बिना किसी गुंजाइश या कोशिश के किसी शादी का ना टूटना. कम से कम एक समय मिलना चाहिए दोनों को सोचने के लिए, और अगर औरत चाहे तो वो भी तलाक़ दे सकती है. दूसरी बात क़ि तलाक़ के बाद महिला के अधिकार क्या होंगे? उसके अधिकारों को पूरी तरह से सुरक्षित कर दिया जाए, मेनटीनेंस, भरण पोषण और बच्चों के भविष्य को लेकर एक एग्रीमेंट के तहत अदालतें फ़ैसला करेंगी? इसमें काजी अदालतें जो पहले से गैर क़ानूनी हैं उनको समाप्त करने की ज़रूरत है. और महिला पक्ष को सरकार की तरफ से फ्री में सरकारी वकील मिलना चाहिए. 
अब इसका दूसरा पहलू ये हो सकता है दो-तीन या चार शादी वाली. तो पहली बात ये होनी चाहिए क़ि जबतक पहली बीवी की मर्ज़ी क़ानूनी रूप से लिखित ना मिले तबतक कोई दूसरी शादी नहीं कर सकता है. क़ुरान कहता है क़ि आप दो औरतों के साथ जस्टिस नहीं कर सकते हैं चाहे कितनी भी कोशिश क्यों ना कर लें. इसलिए पहली बीवी के अधिकार सुरक्षित कर दिए जाने चाहिए. उसके बच्चों का प्रॉपर्टी में हिस्सा, भविष्य का भरण पोषण आदि. 
इससे जो पर्सनल लॉ के मिस्यूज होते हैं उनके आधे हाथ तो काट जाएँगे. फिर जब सरकार को समय या इच्छाशक्ति हो तो कॉमन सिविल कोड लागू कर दें. अब मेरे हिसाब से यहाँ पर युनिफ़ॉर्म सिविल कोड काफ़ी टफ चीज़ होने वाली है सरकार के लिए, टेक्निकल एंड पॉलिटिकल भी. फिर जब मैं फेडरलिज़्म पर पढ़ रहा था तो पता चला क़ि देश में संविधान से पहले का कोई भी क़ानून जो मूल अधिकारों के हनन करता है वो ऑटोमैटिक नल एंड वाइड हो जाता है. और शरीयत एक्ट संविधान के अनुच्छेद 13 (i) (जेंडर इक्वालिटी) मौलिक अधिकार के खिलाफ है. संविधान के अनुसार बहुत सी जगहों पर राज्य और केंद्र की सरकारों के टकराव मुझे अभी से राजनीतिक माहौल को देखकर नज़र आती है. केंद्र के पास 66-67 विषय और राज्य के पास 44 मतलब कम से कम 100 विषयों पर राज्य और केंद्र अलग अलग अधिकार रखते हैं क़ानून बनाने के. हिंदू मैरिज एक्ट के अनुसार जो शादी के प्रावधान हैं कन्यादान या वरमाल ये ब्रम्‍हनाइज़ेशन ऑफ मैरिज है आदिवासियों और दलितों के सिस्टम अलग हैं. हिंदू मैरिज एक्ट में लड़का और लड़की आपस में बाप की तरफ से 7 और माँ की तरफ से 5 पीढ़ी तक रिश्तेदार नहीं होने चाहिए लेकिन महाराष्ट्र में मराठी लोगों में मैने कजिन्स या मामा के साथ शादी होते देखा है. ऐसे बहुत से विषय हैं जिन्हें देखकर शायद सरकार कॉमन सिविल कोड पर आगे नहीं बढ़ेगी. इसलिए हमें मुस्लिम पर्सनल लॉ में रिफ़ॉर्म के लिए लड़ना चाहिए. सबसे पहले तो ट्रिपल तलाक़ का ख़ात्मा, तलाक में महिला की हिस्सेदारी, तलाक़ के बाद महिला का मेनटीनेंस और पहली बीवी की बिना लिखित क़ानूनी इजाज़त और सुरक्षित अधिकारों के एग्रीमेंट के दूसरी शादी न करना.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

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