Wednesday, October 19, 2016

मुस्लिम पर्सनल लॉ बनाम स्त्री अधिकार

हैदराबाद लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर मुस्तफ़ा हैदर की एक किताब में सरला मुदगल का एक महत्वपूर्ण केश पढ़ने का मौका मिला. उसमें उन सभी महिलाओं के मामले थे जिनके पति ने दूसरी शादी करने के लिए इस्लाम अपना लिया था. ऐसा धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी के केश में भी हो चुका है. मतलब लोग धर्म और पर्सनल लॉ की आड़ में दूसरी शादी करते हैं. 
दूसरी बात उसमें सबसे क्लियर पता चली क़ि 1937 के शरियत एक्ट का क़ुरान या इस्लामिल लॉ से बहुत ज़्यादा मतलब नहीं है. बहुत छोटा सा शरीयत एक्ट है जिसमें 6 धाराएँ हैं उसमें कहीं भी तीन तलाक़ या पॉलिगेमी का ज़िक्र तक नहीं है. कुछ लोग बड़ी चालाकी से मेरे साथ बहस में भी पर्सनल लॉ को शरीयत, क़ुरान या इस्लाम के साथ जोड़कर बहस को धार्मिक या भावनात्मक करके हमारी आवाज़ों को कम्युनल घोषित करने में लगे थे. तो मैंने आज मुस्तफ़ा साहब की ही किताब में पढ़ा क़ि भारत में लगने वाला मुस्लिम पर्सनल लॉ कुरानिक या इस्लामिक नहीं है. ये एक फिक है. फिक का अर्थ होता है ह्यूमन एलिमेंट. ये हनफी विद्वानों द्वारा लिखा गया क़ानून है, इसलिए इसे हनफी लॉ भी कहा जाता है. अर्थात क़ुरान से मात्र 20-25% चीज़ें ही ली गई हैं, कस्टम्स ज़्यादा हैं. आज भी मुस्लिमों में ख्वाजा या मेमन लोग हैं जो हिंदुओं के 1955 के रिफ़ॉर्म हो चुके क़ानून के पुराने वर्ज़न से चल रहे हैं. ह्यूमन एलिमेंट के आधार पर ना जाने कितने सुप्रीम कोर्ट और प्रिवी कौंसिल के फ़ैसले हैं. ऐसे में कोई ट्रिपल तलाक़ या 4 शादी जैसे महिला विरोधी कार्यों को कैसे समर्थन कर सकते हैं.  
अभी की बात करें तो जो ट्रिपल तलाक़ का मामला है उसका सरकार से अभी तक  तो कोई लेना देना नहीं है. अभी तक वो लड़ाई मुस्लिम महिलाएँ ही सुप्रीम कोर्ट में लड़ रही हैं. लेकिन सरकार इसी दौर में एक साथ कॉमन सिविल कोड पर भी चर्चा करना चाहती है. जबकि मुझे नहीं लगता है क़ि बहुसंख्यक समाज भी अभी कॉमन सिविल कोड के लिए राज़ी होगा. सबसे बड़ी बात है इसमें लोगों को इनकम टैक्स में मिलने वाला हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली के अंडर मिलने वाला लाभ. इसके बाद हिंदुओं में भी हिंदू मैरिज एक्ट पूरी तरह से लागू नहीं हो पाता है, गोवा में एक अलग स्पेशल मैरिज एक्ट है, फिर पॉंडिचेरी में तो फ्रेंच लॉ लगता है. ऐसे में अगर सरकार या सुप्रीम कोर्ट एक रणनीति के तहत छोटे छोटे रिफ़ोर्मस या एमएण्डमेंट करके पर्सनल लॉ को कमजोर करे तो काफ़ी अच्छा होगा. उदाहरण के तौर पर सबसे पहले ट्रिपल तलाक़ में ही महिला और पुरुष दोनों को तलाक़ का अधिकार होना चाहिए. तलाक़ 3 बार में हो या एक बार में ये महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण ये है क़ि बिना किसी गुंजाइश या कोशिश के किसी शादी का ना टूटना. कम से कम एक समय मिलना चाहिए दोनों को सोचने के लिए, और अगर औरत चाहे तो वो भी तलाक़ दे सकती है. दूसरी बात क़ि तलाक़ के बाद महिला के अधिकार क्या होंगे? उसके अधिकारों को पूरी तरह से सुरक्षित कर दिया जाए, मेनटीनेंस, भरण पोषण और बच्चों के भविष्य को लेकर एक एग्रीमेंट के तहत अदालतें फ़ैसला करेंगी? इसमें काजी अदालतें जो पहले से गैर क़ानूनी हैं उनको समाप्त करने की ज़रूरत है. और महिला पक्ष को सरकार की तरफ से फ्री में सरकारी वकील मिलना चाहिए. 
अब इसका दूसरा पहलू ये हो सकता है दो-तीन या चार शादी वाली. तो पहली बात ये होनी चाहिए क़ि जबतक पहली बीवी की मर्ज़ी क़ानूनी रूप से लिखित ना मिले तबतक कोई दूसरी शादी नहीं कर सकता है. क़ुरान कहता है क़ि आप दो औरतों के साथ जस्टिस नहीं कर सकते हैं चाहे कितनी भी कोशिश क्यों ना कर लें. इसलिए पहली बीवी के अधिकार सुरक्षित कर दिए जाने चाहिए. उसके बच्चों का प्रॉपर्टी में हिस्सा, भविष्य का भरण पोषण आदि. 
इससे जो पर्सनल लॉ के मिस्यूज होते हैं उनके आधे हाथ तो काट जाएँगे. फिर जब सरकार को समय या इच्छाशक्ति हो तो कॉमन सिविल कोड लागू कर दें. अब मेरे हिसाब से यहाँ पर युनिफ़ॉर्म सिविल कोड काफ़ी टफ चीज़ होने वाली है सरकार के लिए, टेक्निकल एंड पॉलिटिकल भी. फिर जब मैं फेडरलिज़्म पर पढ़ रहा था तो पता चला क़ि देश में संविधान से पहले का कोई भी क़ानून जो मूल अधिकारों के हनन करता है वो ऑटोमैटिक नल एंड वाइड हो जाता है. और शरीयत एक्ट संविधान के अनुच्छेद 13 (i) (जेंडर इक्वालिटी) मौलिक अधिकार के खिलाफ है. संविधान के अनुसार बहुत सी जगहों पर राज्य और केंद्र की सरकारों के टकराव मुझे अभी से राजनीतिक माहौल को देखकर नज़र आती है. केंद्र के पास 66-67 विषय और राज्य के पास 44 मतलब कम से कम 100 विषयों पर राज्य और केंद्र अलग अलग अधिकार रखते हैं क़ानून बनाने के. हिंदू मैरिज एक्ट के अनुसार जो शादी के प्रावधान हैं कन्यादान या वरमाल ये ब्रम्‍हनाइज़ेशन ऑफ मैरिज है आदिवासियों और दलितों के सिस्टम अलग हैं. हिंदू मैरिज एक्ट में लड़का और लड़की आपस में बाप की तरफ से 7 और माँ की तरफ से 5 पीढ़ी तक रिश्तेदार नहीं होने चाहिए लेकिन महाराष्ट्र में मराठी लोगों में मैने कजिन्स या मामा के साथ शादी होते देखा है. ऐसे बहुत से विषय हैं जिन्हें देखकर शायद सरकार कॉमन सिविल कोड पर आगे नहीं बढ़ेगी. इसलिए हमें मुस्लिम पर्सनल लॉ में रिफ़ॉर्म के लिए लड़ना चाहिए. सबसे पहले तो ट्रिपल तलाक़ का ख़ात्मा, तलाक में महिला की हिस्सेदारी, तलाक़ के बाद महिला का मेनटीनेंस और पहली बीवी की बिना लिखित क़ानूनी इजाज़त और सुरक्षित अधिकारों के एग्रीमेंट के दूसरी शादी न करना.

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