Wednesday, February 28, 2018

सीरिया का गृहयुद्ध

सीरिया में अबतक लगभग 3 लाख लोगों को बशर अल असद सरकार द्वारा मारा जा चुका है। किसी देश की सरकार का अपने ही नागरिकों की बड़े पैमाने पर हत्या का यह एक और उदाहरण है। मज़ेदार बात यह है कि इतने बड़े नरसंहार के बावजूद पूरी दुनिया , संयुक्त राष्ट्र , मानवअधिकार जैसी पोपट संस्थाएं और यहाँ तक कि इस्लामिक राष्ट्र भी चुप हैं। दरअसल , अमेरिका के नेतृत्व में पश्चीमी देशों ने एशिया और विशेषकर मिडिल ईस्ट को बर्बाद करने के लिए जो साजिश रची उसकी चपेट में एक एक करके सब आ रहे हैं। ईराक और सद्दाम हुसैन को लेकर तब के तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की माँगी गयी माफी इस अमेरिकी साजिश को सिद्ध करती है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने दुनिया के अन्य तमाम देशों को बर्बाद करने के लिए एक ऐसे अचूक अस्त्र का निर्माण किया है जिससे कोई बचने नहीं वाला। वह अस्त्र है "आतंकवाद" , और इस आतंकवाद के दो तीन खौफनाक चेहरे , ओसामा बिन लादेन , और फिर "बगदादी"। अपने प्रचार तंत्र से चाहे जिसे इन आतंकवादी संगठनों का समर्थक बता दो , खुद कहीं बम ब्लास्ट या हमला करा दो और उसे इन छद्म आतंकी संगठनों का कारनामा बता कर किसी इस्लामिक देश के मासूम नागरिकों पर बम गिराओ , कभी खुद पर तो कभी किसी पर हमला करा कर ऐसे छद्म आतंकी संगठनों की उपस्थिति को विश्वसनीय बनाओ और फिर किसी मुस्लिम देश के किसी क्षेत्र में इन छद्म संगठनों और आतंकवादियों की मौजूदगी के नाम पर नीरिह जनता को बम गिरा कर छलनी छलनी कर दो। भारत में इस छद्म आतंकवाद के नाम पर ऐसे ही मुसलमानों को भी प्रताड़ित किया जाता रहा है। अमेरिका द्वारा आतंकवाद पैदा ही मुस्लिम देशों और मुसलमानों को बर्बाद करने के लिए किया गया है। आतंकवाद और कुछ नहीं बल्कि अमेरिका का पैदा किया गया एक ऐसा भस्मासुर है जो धीरे धीरे सबको खा जाएगा , जहाँ अमेरिकी हित खतरे में आया वहाँ आतंकवाद पैदा हो जाएगा और वह देश आतंकवाद का समर्थक। पाकिस्तान उदाहरण है। जबतक वह अमेरिका के साथ था तब तक वह उसका लाडला था , जैसे ही वह अमेरिकी खेल समझ कर चीन की तरफ हुआ तब से वह आतंकवाद की आंड़ में अमेरिकी आक्रमण के केन्द्र में है। अमेरिका के नेतृत्व में तेल के लिए यह खेल पिछले कई दशकों से चल रहा है और एक एक करके सब इसकी जद में आएंगे। ईराक , अफगानिस्तान , सीरिया , पाकिस्तान , यमन , लीबिया के बाद अगला नंबर और अन्य देशों का आएगा जो अमेरिका के इशारे पर नहीं चलेंगे , जो आज तमाशबीन हैं वह ठीक वैसे ही कल जद में आएंगे जैसे।
ईराक , लीबिया , सीरिया , अफगानिस्तान में सबसे पहले वहाँ के लोगों ने आपस में लड़ना शुरू किया। ईराक में सुन्नी और खुर्द आपस में लड़े तो सीरिया में शिया और सुन्नी , अफगानिस्तान में कट्टरपंथी और लिबरल लोग आपस में लड़े। फिर इन अशांत देशों में बाहरी देशों ने हस्तक्षेप करना शुरू किया। आज यह देश तबाह और बर्बाद हो गये। ईराक , सीरिया , लीबिया और अफगानिस्तान के ठीक उन शुरुआती दिनों जैसी स्थिति आज भारत की है। यहाँ भी हिन्दू-मुस्लिम-दलित आपस में लड़ मर रहे हैं , कोई किसी को भीड़ बनकर मार रहा है तो कोई जला रहा है। एक वर्ग का दूसरे वर्ग पर आक्रमण लगातार हो रहा है। गिद्ध हथियारों का जखीरा बनाए नज़र लगाए बैठे हैं। हमें अपने भारत की चिंता है. सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ 6 साल पहले शुरू हुई शांतिपूर्ण बगावत पूरी तरह से गृहयुद्ध में तब्दील हो चुकी है. इसमें अब तक 3 लाख लोग मारे जा चुके हैं. इस गृहयुद्ध में पूरा देश तबाह हो गया है और दुनिया के ताक़तवर देश भी आपस में उलझ गए हैं. संघर्ष शुरू होने से पहले ज़्यादातर सीरियाई नागरिकों के बीच भारी बेरोज़गारी, व्यापक भ्रष्टाचार, राजनीतिक स्वतंत्रता का अभाव और राष्ट्रपति बशर अल-असद के दमन के ख़िलाफ़ निराशा थी. बशर अल-असद ने 2000 में अपने पिता हाफेज़ अल असद की जगह ली थी. अरब के कई देशों में सत्ता के ख़िलाफ़ शुरू हुई बगावत से प्रेरित होकर मार्च 2011 में सीरिया के दक्षिणी शहर दाराआ में भी लोकतंत्र के समर्थन में आंदोलन शुरू हुआ था.
सीरिया की असद सरकार को यह असहमति रास नहीं आई और उसने आंदोलन को कुचलने के लिए क्रूरता दिखाई. सरकार के बल प्रयोग के ख़िलाफ़ सीरिया में राष्ट्रीय स्तर पर विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गया और लोगों ने बशर अल-असद से इस्तीफे की मांग शुरू कर दी. वक़्त के साथ आंदोलन लगातार तेज होता गया. विरोधियों ने हथियार उठा लिए. विरोधियों ने इन हथियारों से पहले अपनी रक्षा की और बाद में अपने इलाक़ों से सरकारी सुरक्षाबलों को निकालना शुरू किया. असद ने इस विद्रोह को 'विदेश समर्थित आतंकवाद' करार दिया और इसे कुचलने का संकल्प लिया. उन्होंने फिर से देश में अपना नियंत्रण कायम करने की कवायद शुरू की. दूसरी तरफ विद्रोहियों का ग़ुस्सा थमा नहीं था. वे भी आरपार की लड़ाई लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार रहे. इस वजह से दोनों पक्षों के बीच हिंसा लगातार बढ़ती गई. 2012 आते आते सीरिया बुरी तरह से गृहयुद्ध में प्रवेश कर चुका था. सैकड़ों विद्रोही गुटों ने एक समानांतर व्यवस्था स्थापित कर ली ताकि सीरिया पर उनका नियंत्रण कायम हो सके. इसका नतीजा यह हुआ कि यह लड़ाई असद और उनके विरोधियों से आगे निकल गई. सीरिया की लड़ाई में क्षेत्रीय और दुनिया की ताक़तों की एंट्री हुई. इसमें ईरान, रूस, सऊदी अरब और अमरीकी का सीधा हस्तक्षेप सामने आया. इन देशों ने असद और उनके विरोधियों को सैन्य, वित्तीय और राजनीतिक समर्थन देना शुरू किया. सीरिया में कई देशों की एंट्री से युद्ध की स्थिति और गंभीर हो गई. सीरिया दुनिया का एक छद्म युद्ध मैदान बन गया. बाहरी देशों पर सीरिया में सांप्रदायिक दरार पैदा करने का भी आरोप लगा. सुन्नी बहुल सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद शिया हैं. इसी संघर्ष में शिया बनाम सुन्नी की भी स्थिति पैदा हुई. शिया बनाम सुन्नी की दरार के कारण अत्याचार और बढ़ा. इस मतभेद से न केवल लोग मारे जा गए बल्कि सभी समुदायों में राजनीतिक तब्दीली की उम्मीदों पर भी पानी फिर गया. जिहादी ग्रुपों को शिया-सुन्नी का विभाजन रास आया और उन्हें भी यहां पसरने का मौक़ा मिला. इस युद्ध में जिहादियों के आने से पूरी तस्वीर ही बदल गई. हयात ताहिर अल-शम ने अल क़ायदा से जुड़े संगठन अल-नुसरा फ्रंट से गंठबंधन किया. इसके बाद इसने सीरिया के उत्तरी-पश्चिमी राज्य इदलिब पर नियंत्रण कायम किया. दूसरी तरफ़ कथित इस्लामिक स्टेट का उत्तरी और पूर्वी सीरिया के व्यापक हिस्सों पर क़ब्ज़ा हो गया. यहां सरकारी बलों, विद्रोही गुटों, कुर्दिश चरमंथियों, रूसी हवाई हमलों के साथ अमरीकी नेतृत्व वाले गठबंधन देशों के बीच संघर्ष शुरू हुआ. ईरान, लेबनान, इराक़, अफ़गानिस्तान और यमन से हज़ारों की संख्या में शिया लड़ाके सीरियाई आर्मी की तरफ़ से लड़ने के लिए पहुंचे ताकि उनके पवित्र जगह की रक्षा की जा सके. असद के लिए सीरिया में स्थिति मुश्किल होती जा रही थी. असद ने अपना नियंत्रण हासिल करने के लिए विद्रोहियों के कब्ज़े वाले इलाकों में सितंबर 2015 में हवाई हमले शुरू किए. रूस का कहना है कि हवाई हमले में केवल आतंकवादियों को निशाना बनाया जा रहा है. हालांकि ऐक्टिविस्टों का कहना था कि हमला पश्चिमी देशों के समर्थन वाले विद्रोही ग्रुपों पर किया गया. 6 महीने बाद पुतिन ने सीरिया से अपने सैन्य बलों की वापसी का ऐलान किया. उन्होंने कहा कि सीरिया में उनका मिशन पूरा हो गया है. हालांकि रूसी मदद के कारण ही विद्रोहियों के क़ब्जे वाले एलप्पो में असद को फिर से नियंत्रण कायम करने में मदद मिली।

Sunday, February 25, 2018

क्यों पीएनबी स्कैम पर कांग्रेस हमलावर नहीं हो रही है?

पंजाब नेशनल बैंक घोटाला व नीरव मोदी का विदेश भाग जाना कांग्रेस को मोदी और एनडीए सरकार को परेशान करने का पर्याप्त मसाला देता है लेकिन राहुल गांधी पूर्ण रूप से इसका फ़ायदा लेते हुए नहीं दिख रहे हैं. परदे के पीछे कांग्रेस के रणनीतिकार अपना पिछला हिसाब किताब देखने और बचाने में लगे हैं और विपक्ष की एकता की आड़ में धरना प्रदर्शन व संयुक्त संसदीय समिति की मांग से बच रहे हैं. ताज्जुब की बात है कि डॉ मनमोहन सिंह जो स्वयं एक निपुण अर्थशास्त्री हैं, अभी तक खुल कर सामने नहीं आए हैं. तक़रीबन यही हाल प्रणब मुख़र्जी का है जो यूपीए के समय वित्त मंत्री व संकटमोचन का काम करते रहे थे. यदि राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी के विरुद्ध अपने तेवर तेज़ कर जनता के बीच साख़ जमानी है तो उन्हें अपनों को बचाने के प्रयासों और रणनीतियों से बचना होगा. याद रहे मोदी बार बार "न खाऊंगा न खाने दूंगा" का बखान करते रहते हैं. अब जब सरकार के पास नीरव मोदी के विदेश भाग जाने का कोई संतोषजनक जवाब नहीं है, राहुल को जनता के बीच भ्रष्टाचार के प्रति 'जीरो टोलेरेंस 'दिखाना चाहिए. यदि मोदी सरकार किसी कांग्रेसी के ख़िलाफ़ पुख्ता मामला लाती है तो राहुल को ऐसे कांग्रेसी के प्रति कोई सहानुभूति या हमदर्दी नहीं दिखानी चाहिए. दरअसल कांग्रेस की समस्या अंदरूनी विरोधाभास और निर्णय न लेने की क्षमता है. रफ़ाल सौदे व अन्य भ्रष्ट्राचार से जुड़े मुद्दों पर कांग्रेस चाह कर भी आक्रमक नहीं हो पाती है. वकीलों व अर्थशास्त्रियों की भरमार राहुल को कठोर राजनैतिक निर्णय लेने से रोकती है और भ्रम व अनिर्णय का माहौल बनाती है. राहुल को अपने आप को सोनिया गांधी की कांग्रेस से भिन्न दिखाना चाहिए जो वह पंजाब नेशनल बैंक घोटाले में अब तक नहीं कर पाए हैं. कांग्रेस में पैंतरेबाज़ों की कमी नहीं है. जब से पंजाब नेशनल बैंक घोटाला सामने आया है , बैंकों का राष्ट्रीयकरण, सरकारी बैंकों के कर्मचारियों , बैंकों के निजीकरण के मुद्दों पर अलग से बहस शरू हो गई है जबकि पंजाब नेशनल बैंक घोटाले का बैंकों के सरकारी या प्राइवेट होने से कोई संबंध ही नहीं है. अगर चूक हुई है तो सरकार दोषी है. यदि भूतकाल की ग़लतियां हैं तो दोषियों पर न्यायसंगत कर्रवाई होनी चाहिए. अब समय आ गया है की राहुल अपनी पॉलिटिकल इंस्टिंक्टस या राजनैतिक विवेक से फ़ैसले लें न की अपने हाल में बने विश्वासपात्रों पर भरोसा करें. यदि कांग्रेस को भ्रष्ट्राचार से लड़ने के लिए किसी प्रकार की क़ुरबानी देनी हो तो राहुल को झिझकना नहीं चाहिए. शायद मोदी सरकार को राहुल व कांग्रेस के अन्तर्विवाद व अनिर्णय पर भरोसा है. राहुल गांधी को उनको ग़लत साबित करना होगा. कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव में पंजाब नेशनल बैंक घोटाला कांग्रेस के लिए एक संजीवनी का काम कर सकता है.

बैंकिंग घोटाले और भी आएँगे अभी

क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बताया कि सार्वजनकि क्षेत्र के बैंकों को साल 2012 से 2016 के बीच धोखा देकर 22,743 करोड़ रुपये का चूना लगाया गया. भारतीय बैंकिंग की स्थिति पर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट, बेंगलुरु ने भी एक स्टडी रिपोर्ट तैयार की थी और ये रविशंकर प्रसाद के दिए आंकड़ों से मेल खाती है. शुक्रवार को मंत्री जब प्रश्न काल के दौरान बहस में हिस्सा ले रहे थे, उस वक्त भी उन्होंने आईआईएम बेंगलुरु की इस रिपोर्ट का ज़िक्र किया. रिपोर्ट के अनुसार साल 2017 के पहले नौ महीने में आईसीआईसीआई बैंक में धोखाधड़ी के करीब 455, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया में 429, स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक में 244 और एचडीएफ़सी बैंक में 237 मामले पकड़े गए. ये सभी मामले एक लाख रुपये या इससे ज़्यादा के थे. रिपोर्ट कहती है कि धोखाधड़ी के ज़्यादातर मामलों में बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत थी. आंकड़े बताते हैं कि स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के 60 से ज्यादा स्टाफ़, एचडीएफसी बैंक के 49, एक्सिस बैंक के 35 कर्मचारियों का इस गोरखधंधे में रोल पाया गया. नीरव मोदी कांड के बाद पंजाब नेशनल बैंक ने भी 11,400 करोड़ रुपये के घोटाले के सिलसिले में अपने 20 कर्मचारियों को निलंबित किया है. साल 2011 में केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) ने बताया कि कुछ बैंक अफसरों ने 10 हज़ार संदिग्ध बैंक खाते खोले और उनमें लोन के 1500 करोड़ रुपये ट्रांसफर कर लिए. ये अधिकारी बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र, ओरिएंटल बैंक ऑफ़ कॉमर्स और आईडीबीआई जैसे बैंकों के थे. इसके ठीक तीन साल बाद मुंबई पुलिस ने सार्वजनिक बैंकों के कुछ अधिकारियों के ख़िलाफ़ नौ एफ़आरआर दर्ज किए. उन पर 700 करोड़ रुपये के फ़िक्स्ड डिपॉज़िट का घपला करने का आरोप था. इसी साल कोलकाता के उद्योगपति बिपिन बोहरा पर कथित तौर पर फ़र्ज़ी दस्तावेज़ों के सहारे सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया से 1400 करोड़ रुपये लोन लेने का आरोप लगा. 2014 में ही सिंडिकेट बैंक के एक्स चेयरमैन और प्रबंध निदेशक एसके जैन पर कथित रूप से रिश्वत लेकर 8000 करोड़ रुपये का लोन मंज़ूर करने का आरोप सामने आया. इसी साल यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया ने विजय माल्या को विलफ़ुल डिफॉल्टर घोषित कर दिया. इसके बाद एसबीआई और पीएनबी ने भी यूबीआई की राह अपनाई.  ने मिलकर सिंडिकेट बैंक के खातों से 1000 करोड़ रुपये उड़ा लिए. इसके लिए 380 फर्जी बैंक खाते बनाए गए और जाली लेनदेन को अंजाम दिया गया. इसे अंजाम देने में फर्जी चेकबुक, लेटर ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग और जीवन बीमा निगम की पॉलिसीज का इस्तेमाल किया गया. सीबीआई ने बैंकों के डूबे हुए 9500 करोड़ रुपये की कर्ज की वसूली के लिए माल्या के ख़िलाफ़ चार्जशीट फ़ाइल की. और माल्या ने भारत छोड़ दिया. फिलहाल वे ब्रिटेन में रह रहे हैं और भारत उनके प्रत्यर्पण के लिए क़ानूनी लड़ाई लड़ रहा है. कुछ ही महीने बीते थे कि 7000 करोड़ रुपये के एक घोटाले का मामला विनसम डायमंड्स के ख़िलाफ़ सामने आया. सीबीआई ने इस सिलसिले में छह एफआईआर दर्ज किए. जतिन मेहता की विनसम डायमंड्स का मामला नीरव मोदी की धोखाधड़ी की तर्ज पर ही था. इसी साल कोलकाता के कारोबारी नीलेश पारेख का मामला भी सुर्खियों में रहा. सीबीआई ने 2017 में नीलेश को मुंबई एयरपोर्ट पर गिरफ्तार कर लिया. उन पर कम से कम 20 बैंकों को 2,223 करोड़ रुपये का चूना लगाने का आरोप था. पारेख ने कथित रूप से ये पैसा शेल कंपनियों के ज़रिए हांगकांग, सिंगापुर और संयुक्त अरब अमीरात ट्रांसफ़र कर दिया था. इस मामले में सीबीआई ने बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र के एक ज़ोनल मैनेजर और सूरत की एक प्राइवेट कंपनी के डायरेक्टर के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया. फिर रोटोमाइक कंपनी का 3000 करोड़ का अलग अलग बैंकों से घपला और कल ही दिल्ली के एक और व्यपारी का 300 करोड़ से अधिक का ओरिएंटल बैंक ऑफ कामर्स के साथ हेराफेरी का मामला सामने आया.
(नोट: आकड़े बीबीसी में छपी रिपोर्ट के अनुसार....)

2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा खोखला

2016-17 के बजट में पहली बार यह बात केंद्र सरकार की ओर से आई थी कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी कर दी जाएगी. इसके बाद 2017-18 के बजट में भी इस बात का जिक्र किया गया. बीते एक फरवरी को पेश 2018-19 के आम बजट में भी केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यह कहा कि केंद्र सरकार 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुना करने के लिए प्रतिबद्ध है. लेकिन कई जानकार मानते हैं कि मोदी सरकार के लिए अब ऐसा कर पाना संभव नहीं हैं. आइये उन पांच तथ्यों और वजहों को जानने की कोशिश करते हैं जिनके चलते कई कृषि विशेषज्ञों को डर है कि 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का मोदी सरकार का वादा सिर्फ एक जुमला भर बनकर न रह जाए.
पहली बार किसानों की आय दोगुना करने की घोषणा हुए दो साल का वक्त हो गया है. पहली बार यह घोषणा 28 फरवरी, 2016 को वित्त वर्ष 2016-17 का बजट पेश करते हुए की गई थी. यानी कि 2016 से 2022 तक सरकार के पास किसानों की आय दोगुना करने के लिए छह साल का वक्त था. इस हिसाब से किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी पहले दो सालों में भी होनी चाहिए थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सच्चाई तो यह है लगातार बढ़ रही कृषि लागत की वजह से किसानों की आमदनी उल्टी कम हो रही है. अच्छे उत्पादन के बावजूद नोटबंदी की वजह से भी किसानों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा. अगर इस दौरान सरकार के स्तर पर कुछ ठोस काम हुआ होता तो पिछले एक साल में कई किसान आंदोलन नहीं होते और किसानों की कर्ज माफी की मांग भी जोर नहीं पकड़ती.
2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के लिए सुझाव देने के मकसद से केंद्र सरकार ने अशोक दलवई समिति बनाई थी. इस समिति ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है. इसमें यह कहा गया है कि अगर सरकार किसानों की आय दुगुनी करने का लक्ष्य अगर 2022 तक हासिल करना चाहती है तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि कृषि की सालाना विकास दर 12 फीसदी या इससे अधिक रहे. केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने से अब तक सालाना कृषि विकास दर औसतन 1.9 फीसदी रही है. जाहिर है कि ऐसे में अगले चार साल में किसानों की आमदनी दोगुनी करना असंभव सा ही लगता है. अशोक दलवई समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अगर सरकार वाकई 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुना करना चाहती है तो उसे 2022 तक कृषि क्षेत्र में छह लाख करोड़ रुपये का निवेश करना होगा. समिति के मुताबिक ऐसा किए बगैर किसानों की आय 2022 तक दोगुना करना मुश्किल होगा. लेकिन इस मोर्चे पर मोदी सरकार कुछ खास करती नजर नहीं आ रही है. पिछले साल के मुकाबले इस साल के कृषि बजट में सिर्फ 14 फीसदी की बढ़ोतरी की घोषणा की गई है. इसका मतलब यह हुआ कि दलवई समिति जिस अनुपात में कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाने की बात कह रही है, उस अनुपात में सरकार निवेश नहीं बढ़ा रही है. केंद्रीय वित्त मंत्री ने बजट भाषण में कहा कि किसानों को कुछ फसलों की लागत के मुकाबले डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जा रहा है. बचे हुए फसलों को भी इस दायरे में लाने की घोषणा उन्होंने की. कृषि के विषयों को समझने वाले इस दावे पर दो तरह से सवाल उठा रहे हैं. एक, इन विशेषज्ञों को लगता है कि कृषि लागत का अनुमान लगाने वाला सरकारी फार्मूला गड़बड़ है और इससे कृषि उत्पादों की सही लागत का अंदाजा नहीं लगता. इसका मतलब यह हुआ कि अगर सरकार 50 फीसदी अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य देती भी है तो वह किसानों की वास्तविक लागत का डेढ़ गुना नहीं होगा. इन लोगों का दूसरा सवाल यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी की सरकारी व्यवस्था ठीक नहीं है. कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं कि सिर्फ छह फीसदी किसानों को ही न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल पा रहा है और बचे 94 फीसदी को अपने उत्पाद इससे कम कीमत पर बाजार में बेचने को बाध्य होना पड़ रहा है. इस हिसाब से 2022 तक ज्यादातर किसानों की आय का दोगुना होना बेहद मुश्किल दिख रहा है. सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने को कह तो रही है लेकिन यह स्पष्ट नहीं कर रही है कि इसके लिए आधार वर्ष क्या होगा. इस योजना की घोषणा 2016-17 का बजट पेश करते हुए की गई थी. तो क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि किसानों की जो आमदनी 2016-17 में थी, सरकार 2022 तक उसे दोगुना कर देगी? आधार वर्ष को लेकर सरकार ने अब तक स्पष्ट तौर पर कोई बात नहीं कही है. कुछ लोग इसी आधार पर किसानों की आमदनी दोगुना करने के सरकार के वादे की गंभीरता पर सवाल उठा रहे हैं. इसके अलावा सरकार ने अब तक यह भी स्पष्ट नहीं किया है कि किसानों की आमदनी में बढ़त को नापते वक्त क्या महंगाई के प्रभाव को भी इसमें शामिल किया जाएगा? क्योंकि अगर कोई किसान 2016 में 1,000 रुपये कमा रहा था तो 2022 में उसके 2000 रुपये कमाने को उसकी आमदनी का दोगुना होना इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि इन छह सालों में महंगाई भी बढ़ेगी. इसे भी अब तक सरकार ने स्पष्ट नहीं किया है.

Wednesday, February 21, 2018

कहाँ भ्रष्टाचार ख़त्म हो गया?

पिछले 4 साल से मोदी सरकार और उनके समर्थकों द्वारा खूब प्रचारित किया जा रहा था क़ि भ्रष्टाचार ख़त्म हो गया है. एक भी स्कैम नहीं हुआ. बस सब जगह अच्छे दिन आ गये हैं. असल में लोगों का नज़रिया भ्रष्टाचार को लेकर केवल टूजी, कोयला घोटाला और कॉमनवेल्थ स्कैम जैसे घोटालों को लेकर बन गया है. अब ऐसे घोटाले तो न दो महीनें में हो जाते हैं और न ही तुरंत बाहर आ जाते हैं. 2005- 06 के घोटाले यूपीए के अंतिम समय में आए थे बाहर. इसलिए इस सरकार के भी आगे चलकर आ सकते हैं. दूसरी बात ये क़ि सरकार घोटाले बाहर आने के लिए जो एजेन्सिज को कितना फ्री रखती है. ईडी, सीबीआई, और इनकमटैक्स विभाग कितना फ्री हैं दुनियाँ जानती है. अब तो सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोत्तम अदालत के जज भी बाहर आकर प्रेस कांफ्रेस करके शिकायत करने लगे. जस्टिस लोया का क्या हुआ? आरटीआई जैसे क़ानून दबाए जा रहे हैं. व्हिसल ब्लोअर एक्ट बनाया नहीं गया, तो कौन शिकायत करेगा जान जोखिम में डालकर? व्यापम में न जाने कितने सैकड़ों गवाहों की हत्या हो गई. लोकपाल क़ानून जो कांग्रेस सरकार ने बनाया भी था वो 4 साल में नियुक्त नहीं किया गया. और बीजेपी शासित राज्यों में तो कितने घोटाले चल ही रहे हैं. एमपी में व्यापम से लेकर छत्तीसगण में चावल, नमक, सिचाई, और बिहार में शौचालय घोटाला तक फैले पड़े हैं. कहाँ कहाँ कार्यवाही हुई? और फिर आप भ्रष्टाचार को केवल घोटाले शब्द की परिभाषा में क्यों देखते हैं? क्या पुलिस ने 100-200 रुपए लेने बंद कर दिए? क्या राशन कार्ड से लेकर आपका सरकारी दफ़्तरों में काम फ्री में होने लगा? और नेताओं की ही बात करो तो कौन सा नेता अपनी कमाई से हेलीकॉपटर से उड़ता है? किसके बाप ने पैसा कमा कर रखा था कोई चाय बेचता था तो कोई पकौड़े बनाता था फिर ये हेलिकोपर कहाँ से आए. ये किसके पैसे से हो रहा है? मैं किसी एक दल विशेष की बात नहीं कर रहा हूँ. सब के सब नेता वही कर रहे हैं. इतनी मंहगी राजनीति में आप किसी से कैसे उम्मीद कर सकते हैं बिना भ्रष्टाचार के ये सब ठाट-बाट? अभी 2जी स्कैम को अदालत ने ये कहकर ख़तम कर दिया क़ि सीबीआई ने कोई भी सबूत पेश नहीं किया. अब या तो कांग्रेस बिल्कुल पाक साफ है या फिर घोटाला हुआ था लेकिन छुपाया गया? क्या इतने बड़े घोटाले को दबा देना भी एक घोटाला नहीं है?
अब पीएनबी घोटाले ने ही पूरे देश को सकते में डाल दिया. इस कांड से अब तक सरकार  और उसके समर्थक लोग मीडिया तक सदमे में है. हो सकता है कि सरकार कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही है कि भ्रष्टाचार को लेकर देश में निराशा और हताशा न फैले, लेकिन इस घोटाले ने देश के विश्वास की नींव तक मार कर दी है. अब तक हमें यही पता था कि बैंक अपने दिए कर्ज़ों के वापस न आने से परेशान हैं. लगभग सारे सरकारी बैंक इतने ज़्यादा परेशान हैं कि आम लोगों की जमा रकम से उनका काम नहीं चल पा रहा है. इस संकट से निपटने के लिए सरकार को यह ऐलान करना पड़ा था कि इन बैंकों में सरकार की तरफ से रकम डाली जाएगी. बैंको के सामने एमरजेंसी जैसे हालात में इसके अलावा और कोई चारा था भी नहीं, लेकिन अचानक इस बैंक घोटाले ने बैंकों की हालत और भी ज़्यादा सनसनीखेज बना दी है.  अब सरकार को नए सिरे से हिसाब लगाना पड़ेगा कि बैंकों को सरकार की तरफ से पैसा पहुंचाने पर देश के आम लोग क्या धारणा बनाएंगे. पीएनबी बैंक घोटाला किसी कर्ज़ की वापसी का नहीं है, बल्कि फर्जी तरीके से बैंक से गारंटी का कागज़ हथियाकर दूसरे बैंकों से पैसा निकाल लेने का है. पैसा निकाला जा चुका है. दो दिन पहले बताया गया था कि 11,000 करोड़ रुपये की लूट हो गई. अब पता चला है कि लूट या ठगी का यह आंकड़ा 21,000 करोड़ का है. शेयर बाज़ारों में 'घपले में फंसे सरकारी बैंक' के शेयर खरीदने वाले लाखों लोगों की 10,000 करोड़ से ज़्यादा की रकम डूब चुकी है. इतना ही नहीं, दूसरे सरकारी बैंकों के शेयर भी बुरी हालत में हैं. उन्हें कितनी चोट पहुंची, इसका हिसाब अभी नहीं लगा है, लेकिन इतना तय है कि यह भी 10-20,000 करोड़ से ज़्यादा ही बैठेगी. नवीनतम आकलन के मुताबिक रकम 60,000 करोड़ का आंकड़ा पार करने को है. व्यवस्था पर यकीन करने वाले देश के छोटे-मझोले निवेशकों का यकीन हिल गया. जिन लोगों का पैसा बैंकों में जमा है, उसकी सुरक्षा को लेकर लोगों के मन में डर अलग है. यानी इस घोटाले ने दूर-दूर तक हालत बिगाड़ दी है. सरकार सबसे पहले यह कहने में लगी कि यह घोटाला पुरानी सरकार के वक्त का है. इसके लिए ज़रूरी था कि घोटाले को कम से कम पांच साल पुराना बताया जाए, क्योंकि लगभग चार साल से वह खुद ही सरकार में है. दूसरा काम सरकार ने यह किया कि इसे सिर्फ बैंक का घोटाला बताया जाए, लेकिन दिक्कत यह आई कि यह बैंक देश का दूसरा सबसे बड़ा सरकारी बैंक है. तीसरा काम सरकार यह कर रही है कि किसी तरह यह संदेश जाए कि पुरानी सरकार का घोटाला मौजूदा सरकार ने पकड़ा, लेकिन इसमें झोल यह है कि बड़े फर्जीवाड़े की लगभग सारी तारीखें पिछले एक साल की निकलकर आ रही हैं. पुराने कुछ मामले अगर निकलकर आए भी तो सरकार इस सवाल का जवाब कहां से ला पाएगी कि उसकी सरकार बनने के बाद चार साल से हो क्या रहा था. भ्रष्टाचार ही तो वह मुददा था, जिसके सहारे मौजूदा सरकार सत्ता में आई थी. इसीलिए इस घोटाले ने मौजूदा सरकार के भ्रष्टाचारमुक्त शासन के नारे को तहस-नहस कर दिया. जनता को इस बात से क्या मतलब कि घोटाला सीधे सरकार ने किया या सरकार के अफसरों ने किया. उसे यह सुनना भी अच्छा नहीं लगेगा कि ऐसे घोटाले पहले से चल रहे थे, क्योंकि इस बात को तो चार साल पहले सुनाया गया था और जनता ने यकीन किया था कि सरकार बदलने से भ्रष्टाचार के हालात बदल जाएंगे, जो नहीं बदले.
यह घोटाला अपने आकार के कारण दुनिया में सनसनी फैलाने के लिए काफी था, लेकिन इस घोटाले के आरोपी का कारोबार इतने सारे देशों में है कि घोटाला उजागर होते ही हर देश का मीडिया इस खबर को रात-दिन बजा रहा है. आसानी से माना जा सकता है कि इस कांड को विदेशी निवेशक भी गौर से जान-सुन रहे होंगे. विदेशों में बसा भारतीय समुदाय इस कांड को सुनकर भौंचक रह गया होगा. सबसे ज़्यादा गौर उस अंतरराष्ट्रीय संस्था ने किया होगा, जो दुनिया के तमाम देशों में भ्रष्टाचार की स्थिति का आकलन करती है. 'ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल' नाम की यह संस्था हर साल तमाम देशों में भ्रष्टाचार का आकलन करके उन्हें एक क्रम में लगाती है. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल' की इस सूची में कम भ्रष्ट देश से शुरू करने के बाद सबसे भ्रष्ट देश को क्रमवार लगाया जाता है. यह आकलन एक प्रकार से हर देश का भ्रष्टाचार सूचकांक होता है. पिछले दो-तीन साल से हम लोग यह ऐतराज़ कर रहे थे कि हमें ज़्यादा भ्रष्ट देशों की श्रेणी में क्यों डाला जाता है. हमें पता है कि 'ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल' के सर्वेक्षण में नागरिकों से ही पूछा जाता है कि वे घूस देने के लिए कितने बाध्य हैं. इसी से इस बात का आकलन होता है कि किसी देश में घूस लेने की तत्परता का क्या स्तर है. भ्रष्टाचार के मामले में हमें बहुत खराब हालत में बताए जाने से अब तक हमें टीआई के इस सर्वेक्षण पर शक होता था, लेकिन पनब घोटाले ने हमारा भ्रम दूर कर दिया. बहरहाल, इस सनसनीखेज़ घोटाले के उजागर होने के बाद हमारे भ्रष्टाचार सूचकांक का ज़्यादा कबाड़ा होने के आसार बढ़ गए हैं. बेशक अब हमें घरेलू राजनीति के अलावा अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि के प्रबंधन के काम पर भी ज़ोर-शोर से लगना पड़ेगा, बहरहाल, भ्रष्टाचार के मामले में हम और गहरे गड्ढे में पहुंचे दिख रहे हैं.

Tuesday, February 20, 2018

कनेडियन पीएम का स्वागत फीका क्यो?

इस समय कैनाडीयन प्रधानमंत्री जस्टिन टुडो अपने 7 दिवसीय भारत दौरे पर आए हुए हैं, जबकि उनकी इस यात्रा को कोई भी अधिक भाव नहीं दे रहा है. मोदी सरकार के एक जूनियर कृषि राज्यमंत्री शेखावत ने उनका स्वागत किया. जबकि इसके पहले चीन, जापान, अमेरिका, अरब के राजकुमार, इजरायल के राष्ट्राध्यक्षों को खुद मोदी जी प्रोटोकॉल तोड़कर दौड़े दौड़े अगवानी करके पूरा देश घूमते थे. यहाँ तक क़ि सरकार का कोई बड़ा मंत्री भी नहीं जा रहा है. यूपी में वो ताजमहल देखने गए तो यूपी के सीएम या कोई मंत्री भी नहीं पहुँचे. वो कल गुजरात गये लेकिन मोदी जी हमेशा की तरह दौड़े दौड़े गाँधीनगर नहीं पहुँचे. जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति की बेटी इवांका ट्रम्प (जिनकी कोई सरकारी हैसियत नहीं है,) के सामने पूरी सरकार बिछी पड़ी थी. सच पूछो तो भारतीय मीडिया भी उन्हें केवल इसलिए ही थोड़ा बहुत कवरेज दे रहा है क्योंकि वो दिखने में बहुत चार्मिंग या हैंडसम हैं. उनकी बीवी और बच्चे भी दिखने में बहुत खूबसूरत हैं शायद इसलिए तोड़ा बहुत तवज्जो मिल रहा है. इसके पीछे एक बड़ा कारण है दरअसल कनाडा में सिखों की एक बड़ी जनसंख्या रहती है. खुद जस्टिन टुडो की कनाडाई सरकार में 4 बड़े सिख मंत्री हैं. उनके रक्षा मंत्री हरजीत सज्जन अभी कुछ महीने पहले भारत आए थे, तो उन्होंने पंजाब के मंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से मिलने की इच्छा जताई थी, तब कैप्टन ने ये कहकर साफ मना कर दिया था क़ि वो खालिस्तान समर्थक हैं. पूर्व में भी ये देखा जाता रहा है क़ि खालिस्तान आंदोलन में फंडिंग भी कनाडा में रहने वाले सिखों से होती रही है. हालाँकि कनाडा सरकार का ये स्टैंड है कि हम अटूट भारत का समर्थन और उसकी संप्रभुता का सम्मान करते हैं लेकिन अगर कोई यहाँ खालिस्तान की माँग करता है तो हम उसको रोकेंगे नहीं, क्योंकि ये उसकी अभिव्यक्ति की आज़ादी है. यही कारण है क़ि पश्चिमी देश का बड़ा नेता भारत आए और उसकी अनदेखी कर दी जाए, अगर इसमें मोदी सरकार बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती तो शायद कांग्रेस को एक मौका मिल जाता उसपर हमलावर होने का. असल में इन दोंनो नेताओं (मोदी और जस्टिन टुडो) की विचारधारा में भी काफ़ी फ़र्क है. मोदी जी रॉबिन हुड टाइप हैं, बिल्कुल ट्रम्प जैसे. इनकी छवि मुस्लिम विरोधी और दक्षिणपंथी है. वहीं टुडो बिल्कुल राहुल गाँधी की तरह हैं. लेकिन जिस दौर से राहुल गाँधी गुजर रहे हैं, वो टुडो 2013 में छोड़ आए हैं. एक तो वो खुद एक राजनीतिक परिवार से आते हैं, जिनके पिता 4 बार प्रधानमंत्री रहे हैं.  2006-07 के आसपास उनकी रिपब्लिकन पार्टी नंबर एक से सीधे हाशिए पर पहुँच गई. उनके आगे कंज़र्वेटिव और न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी को हराना बड़ी चुनौती थी. और टुडो हमेशा से ही राहुल गाँधी की तरह वहाँ मज़ाक और हल्के में लिए जाते थे. वो कभी इंजीनियरिंग पढ़ने लगे, तो कभी इनवायरमेंटल स्टडी तो कभी बाउन्सर की जॉब करने लगे. फिर फ्रेंच पढ़ाने लगे. और कुछ भी पूरा नहीं करके अधूरा ही छोड़ देते थे. तभी कुछ लोगों की नज़र उनपर गई कि शायद इसके लुक और युवा होने की वजह से जनता इसे पसंद करने लगे. वो राजनीति में आने की सोच ही रहे थे क़ि विपक्ष ने उनपर जमकर हमले शुरू कर दिए. कोई भी उनको सीरियस नहीं लेता था. उसी दौरान उन्होने कंज़र्वेटिव पार्टी के नेता Patrick Brazeua को बॉक्सिंग मैच की चुनौती दे डाली. देश में सनसनी फैल गई. वैसे तो टुडो की फिटनेस बढ़िया थी, वो स्पोर्ट्स में काफ़ी एक्टिव थे, लेकिन उनकी सिगरेट पीने की आदत की वजह से उनका स्टेमिना काफ़ी कम हो गया था. फिर मैच हुआ, और टुडो उसे जीत गये. फिर वो राजनीति में आए और 2013 में प्रधानमंत्री बन गए. वो राजनीतिक तौर पर काफ़ी करेक्ट या परफ़ेक्ट माने जाते हैं. वो बहुत ज़्यादा लिबरल हैं, कभी थर्ड जेंडर के अधिकारों के लिए सड़क पर आकर डांस करने लगते हैं, तो कभी महिलाओं के आंदोलन में हिस्सा लेते हैं. अपने पीएम ओफिस में भी अपने बच्चे को लेकर चले जाते हैं. हमेशा कट्टर ताकतों के खिलाफ रहते हैं, और किसी से दुश्मनी भी मोल नहीं लेते हैं. ऐसा भी नहीं वो काफ़ी मजबूत प्रधानमंत्री हैं, जैसा कि मैने बताया क़ि वो खुद काफ़ी लिबरल और सेकुलर हैं, इसलिए उनकी कैबिनेट में भी 4 सिख मंत्री हैं, कनाडा में माइगरेट्स और अल्पसंख्यकों के लिए काफ़ी सुविधाएँ हैं. कह सकते हैं अगर सभी देशों के राष्ट्राध्यकों की लोकप्रियता का मुकाबला हो तो वो आसानी से जीत सकते हैं. उनकी आलोचना भी होती है, क्योंकि वो एनवायमेंट को लेकर यूएन में हुए एक समझौते को तोड़ते नज़र आते हैं. जिसमें कहा गया था क़ि ऐसे ही चलता रहा तो ग्लोबल वार्मिंग की वजह से आने वाले 70-80 सालों में दुनियाँ से जीवन ख़तम हो जाएगा, इसलिए सबकी ज़िम्मेदारी है इसे बचाने की. कनाडा में प्राकृतिक संसाधन काफ़ी मात्रा में हैं और जनसंख्या उसके मुक़ाबले कम. शायद विश्व की 0.1-0.2% लेकिन जितना वो तेल और गैस निकालते हैं उससे होने वाला प्रदूषण विश्व के प्रदूषण का काफ़ी बड़ा हिस्सा है. इसलिए उनकी आलोचना भी काफ़ी होती है. जस्टिस टूडो के बारे में एक बात बताना भूल गया कि वो कनाडा की एक बडी ऐतिहासिक गलती के लिए ऑफिशियली माफी मांग चुके हैं। शायद 1914 की बात है जब एशिया से कुछ प्रवासी समुद्र के रास्ते कनाडा जा रहे थे, उसमें भारतीय भी बडी संख्या में थे। जिनको तत्कालीन कनाडा सरकार ने वापस कर दिया था.  इस गलती के लिए सरकार की तरफ से माफी मांग चुके हैं। इसलिए भी इनका काफी सम्मान किया जाता है।

Saturday, February 17, 2018

पीएनबी घोटाला

भारत के सबसे अच्छे दिनों के दावे के बीच सबसे बड़ा बैंकिंग स्कैम (पीएनबी स्कैम) हो गया है, जिसका घोटाले बाज नीरव मोदी नाम का हीरा व्यापारी बताया जा रहा है. ये वही पंजाब नेशनल बैंक है जो 2016 में 5 हज़ार करोड़ से भी अधिक का लॉस दिखा रही थी. ये घाटा भारतीय बैंकिंग सेक्टर के इतिहास का सबसे बड़ा घाटा था. अब घोटाला भी बैंक ने ही पकड़ा है. पहले तो लोगों ने मोदी नाम से ही पीएम पर हमला बोलना शुरू कर दिया लेकिन वो सही नहीं था. उसकी हक़ीकत कुछ और ही है. असल में नीरव मोदी पिछली बार प्रधानमंत्री मोदी के साथ में डावोस में दिखाई दिया था. क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने प्रेसकांफ्रेस में कहा क़ि वो पीएम मोदी के साथ नहीं गया था बल्कि कंफिडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) के लोग लेकर गए थे. रवीश कुमार ने प्राइमटाइम में बताया क़ि असल में वो आदमी 2016 में भी अरुण जेटली के साथ डावोस गया था जिसका एडवरटाइज़मेंट फाइनेंसियल एक्सप्रेस में छापा था, जिसमें नीरव मोदी सहित कई लोगों के नाम थे. और नीरव मोदी को 2016 में ही  48 करोड़ की पेनाल्टी देनी पड़ी थी क्योंकि दिसंबर 2014 में 1000 करोड़ का हीरा दिखा कर स्मगलिंग कर रहे थे. डायरेक्टरोट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस, डीआरआई में दो साल केस चला, फिर 48 करोड़ का जुर्माना भरना पड़ा. सवाल यह है कि इतनी बड़ी चोरी के बाद क्या डीआरआई ने आगे की जांच की या सिर्फ इसी मामले तक खुद को सीमित रखा. स्मगलिंग का मामला चलता रहा फिर भी कैसे यह शख्स वित्त मंत्री के साथ 2016 में दावोस गया. सीबीआई जांच शुरू करने जा रही थी फिर यह नीरव मोदी प्रधानमंत्री मोदी के साथ फोटो फ्रेम में मौजूद है.
इसके बाद ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स विभाग ने उसके कई जगह छापे मारे जिसके बाद महान भारतीय मीडिया ने ने तुरंत खबर लिखना शुरू कर दिया कि 5000 करोड़ बरामद हो गए. इसी गेम को आपको समझना है. माल ज़ब्त हुआ है, कीमत तय होने में कई महीने से लेकर साल लग जाते हैं. आप किसी भी आयकर अधिकारी से पूछ सकते हैं. लेकिन यह भी पता चल रहा है कि छापे की टीम में जवाहरात के एक्सपर्ट भी हैं जो साथ का साथ दाम भी बता दे रहे हैं. जो भी है, छापा तो भारत की दुकानों पर पड़ा है लेकिन नीरव मोदी जिस होटल में है उसी के पास न्यूयार्क में उनका एक और स्टोर है, दुनिया के कई देशों में दुकान है, क्या वहां भी छापे पड़ रहे हैं. क्या आपको इसकी सूचना है. मीडिया ने लिख दिया कि पैसा बरामद हो गया. क्या वो कागज भी बरामद हुआ, क्या उन लोगों के नाम भी बरामद हो गए जिनके साथ मिलकर ये खेल खेला गया है. भारत के छह शहरों में 20 ठिकानों पर छापे पड़े हैं. आयकर विभाग ने नीरव मोदी की कंपनी के 21 खाते सील कर दिए हैं. नीरव मोदी का पासपोर्ट रद्द हो गया है. हंगामा हुआ तब रद्द हुआ. इस सवाल का जवाब नहीं मिला कि 1 जनवरी को कैसे अपने परिवार के साथ फरार हुआ. क्या 1 जनवरी तक जांच एजेंसी को बिल्कुल पता नहीं था कि नीरव मोदी के यहां छापे मारने की तैयारी है. 31 जनवरी की एफआईआर के पेज नंबर आठ पर साफ साफ लिखा है और ये एफआईआर के ही शब्द हैं जिसमें कहा गया है कि हम आपसे आग्रह करते हैं कि ऊपर दिए गए नामों के खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी किया जाए ताकि वो देश छोड़ कर जा नहीं सके और कानून अपना काम नहीं कर पाए. तब 30 जनवरी को ही पासपोर्ट क्यों नहीं रद्द हुआ. इतने दिनों की छूट के बाद नीरव मोदी ने क्या-क्या हेराफेरी की, किस तरह से दस्तावेज गायब कर लिए होंगे यह सब अब कभी पता नहीं चलेगा.  एफआईआर में सात लोगों के नाम हैं. नीरव मोदी, अमी नीरव मोदी, निशाल मोदी, मेहुल चीनुभाई चौकसी, गोकुलनाथ शेट्टी, मनोज हनुमंत खराट, डेपुटी मैनेजर पीएनबी और अन्य अज्ञात लोग, बैंक अधिकारी, पीएनबी. आरोप है कि फर्जी तरीके से लेटर ऑफ अंडरटेकिंग जारी की गई जिसके पार्टनर नीरव मोदी, श्री निशाल मोदी, श्री अमी नीरव मोदी और श्री मेहुल चीनुभाई चौकसी हैं. 2011 से शुरू होने की बात कही जा रही है मगर एफआईआर में ही लिखा है कि 9.02.2017 को 44 लाख डॉलर और 43 लाख डॉलर से ज़्यादा की रकम की एलओयू जारी हुई. 10.2.2017 को 59 लाख डॉलर और 60 लाख डॉलर से ज़्यादा की रकम की एलओयू जारी हुई. 14.2.2017 को 58 लाख डॉलर से अधिक की रकम के दो एलओयू जारी हुए.
जब यह बता ही रहे हैं कि 2011 से शुरू हुआ तो यह भी बताना चाहिए कि 2017 तक चलता रहा बल्कि 16 जनवरी 2018 तक चलाने की कोशिश हुई मगर भांडा फूट गया। इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि 2011 से 2017 के बीच डेढ़ सौ लेटर आफ अंडरटेकिंग जारी हुई है। यह सवाल महत्वपूर्ण हो सकता है कि घोटाला किसके राज में शुरू हुआ, क्या यह महत्वपूर्ण नहीं है कि उस पैसे का हिस्सा किस किस के पास गया. इनके कौन कौन करीबी हैं. इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि 17 बैंक इस घोटाले की चपेट में हैं. 11,300 करोड़ के अलावा 3000 करोड़ का घोटाला हुआ है. रविशंकर प्रसाद मेहुल चौकसी को कहते हैं ...... " अरे वही आदमी जिसका क्या नाम है? हाँ, मेहुल चौकसी......"
जिसका नाम क़ानून मंत्री को ठीक से पता नहीं उसका नाम मोदी जी एक समारोह में बड़े दोस्ताना अंदाज में ले रहे हैं... कहते हैं," आदमी बड़े से बड़े मॉल से सोना खरीद कर लाएगा और अपने सोनार को ज़रूर दिखाएगा. यहाँ हमारे मेहुल भाई बैठे हैं." इतना दोस्ताना अंदाज प्रधानमंत्री किसी ऐरे गैरे के लिए तो नहीं बोल देगा? ये वही मेहुल भाई हैं जो नीरव मोदी के पार्टनर हैं. इन दोनों के खिलाफ मुंबई पुलिस कमिश्नर से लेकर बंगुलुरु पुलिस कमिश्नर से लेकर वित्त मंत्रालय की सभी एजेंसियों के पास कई बार शिकायत भेजी जा चुकी थी. यह शिकायत 2013 से की जा रही थी. फिर भी यह शख्स 2015 में प्रधानमंत्री के सरकारी कार्यक्रम में उन्हीं के सामने मौजूद है. पांच लोगों ने अगर जान जोखिम में डालकर इस मामले की शिकायत न की होती तो आज इस घोटाले का इतिहास आसानी से दबा दिया जाता. ये पांच लोग वो हैं जो हर एजेंसी को लिख रहे थे, धमकियां सुन रहे थे, जिंदगी दांव पर लगाकर शिकायत कर रहे थे. अगर तब सुन लिया गया होता तो पंजाब नेशनल बैंक को 11,300 करोड़ का नुकसान न उठाना पड़ता. शिखर जैन, वैभव खुरानिया. हरि प्रसाद, दिग्विजय सिंह जडेजा और संतोश श्रीवास्तव. इन लोगों ने खूब पत्र लिखे मगर हर जगह से निराशा हाथ लगी. बाद में खुद भी हताश होने लगे कि अब कुछ नहीं होगा. पंजाब नेशनल बैंक ने 16 जनवरी को नहीं पकड़ा होता तो यह पता ही नहीं चलता कि कुछ लोग गीतांजली कंपनी से इस्तीफा देकर इसकी लड़ाई लड़ रहे हैं. इस मामले में पहला पत्र 4 मई 2015 को दिल्ली स्थित सिफ़ॉ यानी सीरीयस फ्रॉड इंवेस्टिगेशन आर्गेनाइशेन को लिखा गया. 6 मई को मुंबई पुलिस कमिश्नर और सारे ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर को लिखा गया. इसकी कॉपी वित्त मंत्रालय, कॉरपोरेट मंत्रालय, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), सीबीआई और आर्थिक अपराध शाखा दिल्ली को भी भेजी गई. 26 जुलाई 2016 को पहली बार प्रधानमंत्री कार्यालय को शिकायत की कॉपी भेजी गई. पीएमओ ने तुरंत ही इस कॉपी को रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी को पत्र भेज दिया. रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी कोरपोरेट मामले के मंत्रालय के तहत आता है. 29 जुलाई 2016 को इन लोगों ने रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी को फिर पत्र लिखा. दो महीने बाद रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी का जवाब आता है कि मामला बंद हो गया है. बिना किसी शिकायतकर्ता से बात किए रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी ने मामले को कैसे बंद कर दिया. अगर ईमानदारी से जांच हुई होती तो पंजाब नेशनल बैंक को इतने बड़े घोटाले का सामना नहीं करना पड़ता.
अब बीजेपी की तरफ से आरोप लगाया जा रहा है क़ि कांग्रेस के समय से ये घोटाला चालू हुआ और पकड़े भाजपा सरकार में जा रहे हैं. और मेहुल चौकसी की एक प्रदर्शनी में राहुल गाँधी एक बार घूमने गये थे. अभिषेक मनु सिंघवी की पत्नी ने उसकी दुकान से जेवर खरीदे थे इसलिए कांग्रेस ज़िम्मेदार है. घोटाला कब शुरू हुआ यह महत्वपूर्ण है तो यह भी महत्वपूर्ण होना चाहिए कि कब तक चलता रहा. आखिर फरवरी 2017 में आठ जाली लेटर ऑफ अंडरटेकिंग कैसे मिल गया नीरव मोदी को. प्रदर्शनी में राहुल का जाना महत्वपूर्ण है तो नीरव मोदी का प्रधानमंत्री मोदी के साथ तस्वीर खिंचाना भी महत्वपूर्ण होना चाहिए.
क्या यह बात सही नहीं है कि हर साल लेटर ऑफ अंडरस्टैंडिंग को रिन्यू किया जाता है और यह चेयरमैन के स्तर से होता है, जिसे शाखा प्रमुख जारी करता है. 7 साल तक रिन्यू होता रहा मगर किसी की नज़र न पड़ी. ये बात पक्की है कि इतनी बड़ी राशि का लेटर ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग किसी चेयरमैन या इग्ज़ेक्यूटिव डायरेक्टर के ही स्तर पर होता है और इसे ब्रांच हेड ही जारी करता है. तो क्या इस मामले में कभी किसी चेयरमैन की जवाबदेही तय होगी. बैंकों का हर महीने ऑडिट होता है. तिमाही पर ऑडिट होता है और साल बीतने पर होता है. तब भी नहीं पकड़ आया. अब मेरे कुछ सवाल हैं, पहला सवाल क़ि जब एफआईआर में बैंक ने कहा है कि नीरव मोदी और मेहुल चौकसी के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया जाए ताकि वे देश छोड़ कर नहीं भागे. क्या लुकआउट नोटिस जारी हो चुकी है? दूसरा सवाल, फर्जी लेटर ऑफ अंडरस्टैंडिंग के आधार पर नीरव मोदी और मेहुल चौकसी इस देश के बैंकिंग सिस्टम के साथ कैसे खेल रहे थे ? इस देश के सत्तर साल के सबसे बड़े बैंक के लूट के लिए जो मोदी सरकार के नाक के नीचे हुआ इसके लिए कौन जिम्मेदार है ? तीसरा सवाल, प्रधानमंत्री जी को इसकी जानकारी 2016 को दे दी गई थी. प्रधानमंत्री कार्यालय ने इसका संज्ञान लिया, इसके बावजूद भी है प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर फाइनेंस मिनिस्ट्री से लेकर फाइनेंसियल इंटैलिजेंस यूनिट से लेकर सभी ऑथरिटीज और मोदी सरकार सोई पड़ी थी और क्यों? चौथा सवाल, क़ि 29 जनवरी 2018 को पंजान नेशनल बैंक के ज्वाईंट जेएम ने पत्र लिखकर कहा कि देश छोड़कर भाग जाने वाले है इसके लिए कार्यवाई कीजिए, इसका बावजूद नीरव मोदी जी देश का पैसा लूटकर देश छोड़कर क्यों भाग गए, इसके लिए कौन जिम्मेदार है? रविशंकर प्रसाद ने कहा कि अगर वे विदेश में है तो विदेश में भी कार्रवाई हुई है. एफआईआर यहां हुई है तो वहां क्या कार्रावई हो रही है. क्या एफआईआर के बाद शो रूम का उदघाटन भी कार्रवाई है? उन्हें बताना चाहिए था कि क्या नीरव मोदी के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी हुआ है? पंजाब नेशनल बैंक का शेयर 11 फीसदी गिर चुका है. इसके निवेशकों को 3000 करोड़ का नुकसान हो चुका है. यह सब वापस तो नहीं आएगा मगर बैंकिंग सेक्टर और हीरा व्यापार के इस कारनामे को आप तस्वीरों पर मत जाइये. किसकी तस्वीर किसके साथ है. कौन किसका किरायेदार है, ये सब हल्के सवाल हैं, सवाल एक ही है कि 11,300 करोड़ का घोटाला फ्रॉड कैसे हो गया? बैंकिंग सेक्टर पर नज़र रखिए, जिसकी हालत पहले से ख़राब है.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...