सभी
के ओपिनियन पोल्स आकर चले गए। सभी आनुमान लगा रहे हैं, सबका आपना-अपना
हिसाब है। मेरे भी बहुत दोस्त भविष्यवाणी करने को कह रहे थे। मैनें बहुत
माना किया लेकिन वो बोले अगर राजनीति को जानते हो तो कुछ तो बोलना ही
पड़ेगा। इस लिए मैने भी कुछ अनुमान लगा दिए हैं. ये कितने सही होंगे मैं
नहीं कह सकता, लेकिन अगर गलत हुए तो मुझे अपने ज्ञान और अनुमान पर कुछ और
विचार करने का मौका मिलेगा।
1. राजस्थान: 25/22
2. मध्य प्रदेश: 29/24
3. गुजरात: 26/25
4. दिल्ली: 07/03
5. हिमाचल प्रदेश: 04/03
6. पंजाब: 13/08 (+)
7. हरियाणा: 10/04 (+)
8. उत्तराखंड: 05/04
9. जम्मू-कश्मीर: 06/02
10.गोवा: 02/02
11. अंडमान: 01/01
12. उत्तर प्रदेश: 80/30
13. बिहार: 40/15 (+)
14. झारखण्ड: 14/05
15. प. बंगाल: 42/01
16. महाराष्ट्र: 48/28 (+)
17. तमिलनाडु: 39/02 (+)
18. कर्णाटक: 28/12
19. सीमांध्र: 25/10 (+)
20. तेलंगाना: 17/03 (+)
21. उड़ीसा: 21/03
22. असम: 14/05 (+)
23. छत्तीसगढ़: 11/06
24. दमन और दीव:01/01
(नोट: (+) का अर्थ है, जिन राज्यों में भाजपा का गठबंधन है। उन राज्यों
को शामिल नहीं किया गया है जहाँ पर भाजपा को कोई भी सीट नहीं मिल रही है।)
Monday, April 28, 2014
Sunday, April 27, 2014
मोदी बनाम राहुल+प्रियंका+सोनिया
देश के राजनीतिक गलियारों में बहुत दिन से इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या प्रियंका गाँधी वाड्रा राजनीति में आएंगी। बहुत बार कांग्रेस के कुछ नेताओं और मीडिया ने कुछ अटकलें लगाईं कि प्रियंका गाँधी को पूरे देश में प्रचार करना चाहिए। लेकिन फिर कांग्रेस पार्टी ने ही इस मुद्दे को दबाकर कह दिया कि प्रियंका सक्रिय राजनीति में नहीं आ रही हैं. इस बार 2014 के चुनाव में पहले तो वो किसी रोल में नही दिखीं। लेकिन पिछले एक हफ्ते से प्रियंका वाड्रा ने लोक सभा चुनाव में अमेठी और रायबरेली के प्रचार का ज़िम्मा संभाल लिया है। मीडिया की सुर्खियों में सोनिया
गांधी-राहुल गांधी पीछे चले गए हैं। जबकि प्रियंका नरेंद्र मोदी से दो-दो
हाथ करती दिख रही हैं। मोदी पर प्रियंका के
हमलों में राहुल की तुलना में ज़्यादा पैनापन है और उनके हमले नरेंद्र मोदी
और बीजेपी को ज़्यादा चुभ रहे हैं। नरेंद्र मोदी ने प्रियंका के हमलों
का अपने अंदाज़ में जवाब दिया है। तो वहीं बीजेपी ने उनके पति रॉबर्ट
वाड्रा के कथित ज़मीन घोटालों को लेकर पहली बार औपचारिक रूप से प्रेस
कांफ्रेंस कर हमला किया है। अभी तक कांग्रेस और बीजेपी में एक तरह का अघोषित
समझौता रहा है जिसमें नेताओं के व्यक्तिगत मामलों और परिवार के सदस्यों पर व्यक्तिगत टिप्पड़ियां नहीं की जाती है। सबसे पहले जब रॉबर्ट वाड्रा के ज़मीन सौदों और
उन्हें DLF से मिले फायदे के बारे में खबरें आईं तो इन्हें संसद में
उठाने को लेकर बीजेपी में एक राय नहीं बन सकी। पार्टी के बड़े नेताओं में
इसे लेकर मतभेद थे। ये दलील दी गई कि कांग्रेस वाजपेयी के दत्तक दामाद रंजन
भट्टाचार्य का मुद्दा उठा सकती है। एक बड़े नेता जो इस मामले को संसद में
उठाना चाहते थे. तब उन्हें रोका गया था. इसके बावजूद कांग्रेस ने कभी भी
किसी भाजपा नेता के व्यक्तिगत जीवन पर टिप्पणी नहीं की। इस समय वाड्रा
मुद्दे को भाजपा ने तो आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल की नकल करके
उठाया है. अगर ऐसा नहीं है तो इसके पहले भाजपा ने इसपर कुछ नही बोला।
राजस्थान में भाजपा की सरकार बने 4-5 महीने हो गए लेकिन आजतक कोई कार्यवाही
क्यों नही की गई है। लेकिन अब ये चुप्पी टूट गई है। इसके पीछे बड़ी वजह
कांग्रेसी नेताओं द्वारा नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत मामलों को चुनाव में
उछालना हो सकता है। खुद राहुल गांधी ने मोदी की वैवाहिक स्थिति का सवाल
चुनाव में उठाया है। कानून मंत्री कपिल सिब्बल इसे लेकर चुनाव आयोग भी
पहुंच गए। राहुल और प्रियंका बार-बार अपनी चुनावी सभाओं में कथित महिला
जासूसी कांड को उठा कर महिला सुरक्षा के बारे में मोदी के दावों पर सवाल
उठाते हैं। इसके जवाब में चुनाव प्रचार में
नरेंद्र मोदी लगातार ‘जीजाजी’ की बात कह कर वाड्रा पर निशाना साधते रहे
हैं। बीजेपी का कहना है कि ये व्यक्तिगत हमले नहीं हैं बल्कि भ्रष्टाचार के
मुद्दे हैं। इसीलिए
प्रियंका वाड्रा का पलटवार बेहद दिलचस्पी से देखा जा रहा है।प्रियंका ने हर मुद्दे पर मोदी को बखूबी जवाब दिया है। उन्होंने हर जवाब में इमोशनल होकर बात की। प्रियंका ने वाड्रा मुद्दे पर जवाब में केवल यह कहकर टाल दिया कि भाजपा के नेता मेरे पति और परिवार की बेइज्जती करते हैं। इस समय मीडिया में प्रियंका के सामने राहुल और सोनिया कहीं नहीं ठहर रहे हैं. इस बात से निश्चित रूप से राहुल गाँधी को घाटा हो रहा है। यह बात सोनिया गाँधी भी जानती हैं, तभी तो उन्होने प्रियंका को राजनीति में सक्रिय होने से हमेशा रोककर रखा है। कांग्रेस के बड़े नेताओं और आम कार्यकर्ताओं का एक बड़ा तबका है जो राहुल से बेहतर प्रियंका को मानता रहा है। लेकिन प्रियंका या उनके परिवार ने हमेशा ही इस बात का खण्डन किया है। हालांकि इसके पहले प्रियंका कई बार राहुल और सोनिया के लोकसभा क्षेत्र में जाकर चुनाव प्रचार का जिम्मा खुद लेती रही हैं।
हमने सुना है कि जब बेल्लारी में सोनिया सुषमा स्वराज से पिछड़ी चल रही
थी, तब प्रियंका ने मात्र एक रोड शो करके वह लड़ाई सोनिया के पक्ष में कर
दी थी। कुछ लोग प्रियंका गाधी में इंदिरा गाँधी जैसी करिश्माई छवि देखते हैं। हालांकि मैने इंदिरा गाँधी के ज्यादा भाषण तो नहीं सुने लेकिन प्रियंका के भाषण राहुल और सोनिया की तुलना में ज्यादा अच्छे लगते हैं. कुछ बड़े पत्रकारों का तो यहाँ तक मानना है कि अगर प्रियंका राजनीति में आ गईं, तो राहुल का राजनीतिक भविष्य मुस्किल में पड सकता है। हो सकता है कि सोनिया गाँधी इसी अंदेशे से प्रियंका को राजनीति में लाने से रोकती रही हैं। सही बात तो यह है कि राहुल को हाल ही कि कुछ घटनाओं से बहूत नुकसान हुआ है। इस चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद कांग्रेस का ही तथाकथित तबका राहुल की जगह प्रियंका को कमान सौंपने की वकालत कर सकता है. यह तो उनके परिवार के अंदर का मसला है। लेकिन इस जवाबी बयानबाजी में राजनीतिक मजा जरूर आ रहा है। हमें आने वाले दिनों मे और इन्तेजार करना चाहिए, क्योंकि यह जुबानी युध्द अभी रुकने वाला नहीं है। प्रियंका के साथ भाई और माँ का भी साथ है।
Saturday, April 26, 2014
मैच अभी पूरा नहीं हुआ है
पिछले कई महीनों से मीडिया और एक सिविल सोसाईटी में बहस चल रही है कि मोदी सरकार बन रही है। एक दो बार मैने दिल्ली भाजपा के नेता हर्षवर्धन को बोलते सुना कि मोदी को भगवान भी नहीं हरा सकते। कई भाजपा नेता कहते हैं कि जनता ने मोदी को पी. एम. तो बना दिया है, केवल 16 मई को फैसला आना बाकी है। मोदी भी कई रैलियों में अपने को भविष्य का प्रधान मंत्री घोषित कर चुके हैं। उन्हें लगने लगा है कि दिल्ली की कुर्सी तो पक्की है। लेकिन आजकल क्रिकेट के माहोंल में यह अनुमान लगाना भी मुस्किल होता है कि मैच जीतेगा कौन? कल साम के मैच में ही कोलकाता नाईट राइडर्स की जीत पक्की लग रही थी, लेकिन हैदराबाद के एक ओवर ने मैच पलट के रख दिया। वह मैच मुझे कई ऐसे मैचों की याद दिलाता है जब इस तरह के करिश्में हुए। क्रिकेट में एक कहावत है क़ि मैच की आखिरी गेंद के पहले भविष्यवाणी करना बहुत गलत होता है। यही बात हम कुछ हदतक राजनीति में भी मान सकते हैं। इसी भाजपा को 1998-99 की बाजपेई जी की 11 दिन वाली सरकार भी याद होगी। जब केवल एक वोटसे सरकार गिर गई थी। तब से गंगा जमुना में बहुत पानी बह चुका है। लेकिन एक बार फिर से हमें यह लगने लगा है क़ि यह चुनाव विकास के मुद्दे पर कम धर्म और जाति के मुद्दे पर ज्यादा हो रहा है। भाजपा टीवी पर होने वाले सभी ओपिनियन पोल्स के नतीजों को लेकर बहुत क्या अति-उत्साहित है। उसे लग रहा है कि एन. डी. टी. वी. और हंसा रिसर्च सर्वे के अनुसार हमें तो वैसे भी 275 सीटें मिल रही हैं। अब यह ओपिनियन पोल कितने सही साबित होंगे यह तो आप इस 10 वर्ष पहले की मैंगजीन के कवर फोटो से समझ सकते हैं। मैं यह भी कह रहा हूँ कि कांग्रेस हार रही है, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मोदी जी जीत रहे हैं। हाँ यह है कि भाजपा या एनडीए कुछ बढत जरूर हासिल किए हुए है। अब यह बढत कितनी होगी यह अनुमान लगाना बहुत मुस्किल है। हो सकता है यह जनादेश 180-200 सीटों तक पहुंच जाए, या 210 से सवा दो सौ भी पार कर ले, तब तो सभी तथा कथित सेकुलर दल भी मोदी को रामविलास की तरह सेकुलर बताने में जुट जाएंगे। लेकिन क्या भाजपा मिशन 272+ तक जाएगी?
फिलहाल अगर हम मीडिया की मोदी लहर से बाहर निकलकर जमीनी हकीकत पर नजर डालें तो स्थिति थोड़ी सी अलग नजर आती है। पूरे देश में लहर तो है लेकिन मोदी के नाम की कम कांग्रेस के कुसासन के खिलाफ ज्यादा। ऐसे में भाजपा फायदे में तो है लेकिन उतनी मजबूती से चुनाव नहीं लड पा रही है। अगर हम राज्यवार सीटों पर भाजपा की स्थिति को समझने की कोशिस करें, तो तस्वीर इस प्रकार है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात में भाजपा बहुत मजबूत है और इन 74 सीटों में 60 से अधिक जितने की स्थिति में है। महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन 30 सीटें जितने की स्थिति में है। उपर से राज ठाकरे की मनसे ने मोदी के समर्थन का एलान कर दिया है। झारखण्ड में लड़ाई बहुत कांटे की है लेकिन भाजपा की लहर जैसी चीज नहीं है। हाँ इस राज्य में आधी सीटों पर भाजपा की स्थिति ठीक-ठाक है। पूर्वोत्तर में किसी भी राज्य में भाजपा किसी लड़ाई में नहीं है। वहाँ लेफ्ट और कांग्रेस के बीच टक्कर है। प.बंगाल में ममता बनाम लेफ्ट और कांग्रेस की लड़ाई है। उड़ीसा में भी भी भाजपा की कोई मजबूत जमीन नहीं है। पूर्वोत्तर में भाजपा ने कुछ स्थानीय फिल्मी सितारों को मैदान में उतारा तो है लेकिन इसी से उसकी स्थिति भी समझ में आती है। अगर बात दक्षिण भारत की करें तो एक आध राज्य को छोड़ कर भाजपा की हालत पतली है। तमिलनाडु से जय ललिता का समर्थन एन. डी. ए. को मिल सकता है (अगर एन. डी. ए. 220 से अधिक सीटें जीते तो) अन्यथा रजनीकांत जैसे सुपरस्टार के साथ के बाद भी यहाँ से मोदी को मायूसी ही मिलेगी। आंध्र प्रदेश में भाजपा का गठबंधन अच्छा है, लेकिन उसकी बहुत दिक्कते भी हैं। विधानसभा चुनाव को देखते हुए टी. डी. पी. यह गठबन्धन खत्म करना चाहती है। क्योकि तेलंगाना में तो उसकी जमीन कमजोर है। वहां कांग्रेस और टी. आर. एस. का जोर है। सीमान्ध्र में जगन मोहन रेड्डी भाजपा पर राज्य के बंटवारे के समर्थन का मुद्दा लेकर नायडू को भी घेर रहे हैं।
अब मैं देश के तीन और राज्यों का जिक्र करना चाहूंगा, कर्नाटक, पंजाब और छत्तीसगढ़। यहाँ पहले तो भाजपा मजबूत थी, लेकिन वर्तमान समय में कांग्रेस की स्थानीय टीमों ने पूरा जोश और जोर लगा दिया है। अगर यही जोश राहुल एंड कंपनी ने लगाया होता तो मोदी की यह तथाकथित लहर नहीं होती. इन राज्यों में कांग्रेस ने भी जातीय समीकरणो के हिसाब से अपने पत्ते सेट किए हैं। कहीं-कहीं उसे दिक्कते हैं, जैसे कर्नाटक में मुस्लिम वोट अगर जेडीएस को ना बंटे, और छत्तीसगढ़ में सतनामी दलित वोट स्थानीय नई-नवेली पार्टी को ना जाएँ, तो कांग्रेस भाजपा से बीस साबित होगी। उत्तराखंड, दिल्ली और हिमांचल प्रदेश में भाजपा की स्थिति कुछ ठीक है। यहाँ कांग्रेस बहुत कमजोर है. दिल्ली में हो सकता है कि आम आदमी पार्टी कुछ सीटें भाजपा से छीन ले जाए। उत्तराखंड में भाजपा की टक्कर कांटे की है। कांग्रेस यहाँ भीतरघाट का शिकार हो रही है आब हम बात करते हैं देश के दो सबसे बड़े राज्यों यूपी और बिहार। राजनीति के दिल माने जाते हैं। पूरे मीडिया और नेताओं का पूरा ध्यान यहीं पर लगा रहता है। इन राज्यों में भाजपा विकास कम सॉफ्ट-हिन्दुत्व के मुद्दे पर चुनाव लड रही है। यहाँ जातीय समीकरणों की भी बहुत अहमियत होती है। बिहार में नीतीश और यूपी में मायावती नें अपनी बेजोड़ सोसलइंजीनियरिंग के दम पर अपने पत्ते फेके हैं। अगर इन दोनों के दांव सही चल गए तो हो सकता है कि मोदी का सपना भी चूर-चूर हो जाए। फिलहाल इन राज्यों में कुछ और बढत रामविलास पासवान, कुशवाहा और अनुप्रिया पटेल के दम पर हासिल की है। लेकिन एक और फैक्टर यहाँ पर काम करने वाला है इस बार मुस्लिम किसी एक पार्टी को वोट ना देकर उसे वोट करसकते हैं जो मोदी को हराने में सक्षम होगा। इस बात को कई बातों से महसूस भी किया जा सकता है। जिन जगहों पर बसपा और जेडीयू की स्थिति कमजोर थी वहां पर इन दलों ने अपने कमजोर प्रत्याशी खड़े किए, नीतीश के तो कुछ प्रत्याशियों ने मुस्लिम वोट बांटने के डर से अपनी उम्मीदवारी भी वापस ले ली। कई जगह नीतीश और मुलायम सिंह की पार्टियाँ कांग्रेस या राजद के लिए प्रचार भी नाम मात्र कर रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो मोदी को बनारस से हार का मुंह देखना पड सकता है। अब तक एक बात और गौर करने वाली है कि जब आधे से अधिक सीटों पर चुनाव हो चुके हैं तो कांग्रेस ने अपनी रणनीति बदलकर आक्रामक कर दी है। अब राहुल मोदी पर नाम लेकर हमला करने लगे हैं। उधर सोनिया, और प्रियंका भी मोदी पर निशाना साध रही हैं। जब कुछ मुस्लिम बहुल सीटों पर वोटिंग होनी बाकी है, तब कांग्रेस ने 4.5 % मुस्लिम आरक्षण की बात करके एक बड़ा दांव चल दिया है। हो सकता है यह दांव जाट आरक्षण और 2012 के यूपी विधानसभा चुनाव की तरह फेल भी हो जाए या हो सकता है कि इसी के दम पर कांग्रेस 125 सीटों को पार करके कुछ नया पैंतरा चल जाए। अगर मोदी इसका पुरजोर विरोध कर दें तो कांग्रेस को घाटा और हिन्दू वोटों का ध्रवीकरण होकर भाजपा को फायदा हो सकता है। सूत्र यह भी बता रहे हैं कि कांग्रेस तीसरे मोर्चे का समर्थन कर सकती है। अगर भाजपा की सीटें 200 तक रहीं तो मोदी को दिक्कत हो सकती है। ममता, नवीन पटनायक और जयललिता से समर्थन की उम्मीद कर रहे मोदी को एक बड़ा झटका भी लग सकता है।
अभी चुनाव में बहुत समय बाकी है। हर नेता अपने-अपने दांव और पैंतरे के साथ फील्डिंग सजा रहा है। मोदी अभी से अपने को मैंन ऑफ द मैच और अगला कप्तान तथा भाजपा को विजेता मान चुके हैं। लेकिन मेरे हिसाब से यह सब भविष्यवाणी करना बहुत जल्दबाजी होगी। क्योंकि क्रिकेट में अंतिम गेंद फेके जाने तक कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। यहाँ तो अभी पूरे स्लॉग ओवर खेलने को बाकी हैं।
Friday, April 18, 2014
बिठूर का इतिहास
हमारे
देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही तात्या टोपे को 18 अप्रैल को
ही फांसी दी गई थी। उनका परिवार हमारे बिठूर में आज भी रहता है। उनके
परिवार की हालत बहुत खराब थी। 3-4 साल पहले सरकार ने उनके परिवार की दो
लड़कियों को नौकरी देने का ऐलान किया था। मैं भी कई साल से बिठूर ढंग से
गया नही हूँ। उनकी तो छोडो और भी कई स्वतंत्रता सेनानी बदलू जमादार सरीखों
के परिवार तो रामजानकी स्कूल के पीछे झोपड़पट्टियों
में रहेते हैं। बिठूर पर राज एक सूबेदार परिवार करता है, जो नाना साहब के
नौकर थे, और अंग्रजों के आक्रमण के समय नाना साहब के साथ गद्दारी की थी। फिर सूबेदार साहब के एक कुछ चमचे हुआ करते थे, जो अधिकतर ब्राम्हण थे, वो
हर गाँव के किसानों और खेतों पर नियंत्रण करते थे। जब सूबेदार साहब मरे
तबसे आज तक ग्रामीण क्षेत्रों की जमीनें उन्हीं लोगों के परिवार और
नज़दीकियों के पास रह गईं। आप उनके लिए पहले जमीन की कीमत का अंदाजा इसी से
लगा सकते हैं, कि मेरे गाँव के सबसे बड़े खेतिहर पहले उनके यहाँ नौकर थे,
और उन्हें इनाम में 30-40 बीघा जमीन दे दी थी। आज इतिहास को ना याद रखते
हुए वो सब जमींदार बनते हैं और अब वही जमीन बेंच-बेंच कर रंगबाजी कर रहे
हैं।
यह बिठूर के पास ध्रुव टीला है। लोक में प्रचलित है कि यहीं पर राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव ने तपस्या की थी। गंगा का पाट यहां इतना विशाल है कि ओर छोर तलाशना मुश्किल है। पानी भी साल के बारहों महीने यहां रहता है। मैं जब भी कानपुर जाता हूं बिठूर के इस ध्रुव टीला पर जरूर जाता हूं। बचपन में तो यहां जंगल था पर अब भूमाफियाओं ने यहां भी कब्जा करना शुरू कर दिया है। संभव है कुछ दिनों बाद यहां गंगा गंदे नाले में तब्दील हो जाए जैसी कि जाजमऊ में है। ध्रुवटीला में एक मंदिर है जिसकी गद्दी वर्षों से मराठों के पास है। कानपुर में मराठा मंदिर देखकर एकाएक आप 18 वीं सदी में पहुुंच जाएंगे। फिलहाल मधुकर मोघे यहां के गद्दीनशीं हैं। मोघे का परिवार बड़ा है इतना बड़ा कि इंटक के नेता रामजी त्रिपाठी तो कहते रहते हैं कि यहां जिस झाड़ी में देखो मोघे का एक न एक बच्चा दिख जाएगा। खैर दो पत्नियों के साथ मधुकर मोघे यहां शान से रहते हैं। यह अलग बात है कि उनके पास धन नहीं है पर इससे उनकी शान और अतिथि सत्कार में कोई फर्क नहीं पड़ता। यह धु्रव टीला गंगा की सतह से काफी ऊँचाई पर है। गंगा में चाहे जितना पानी आ जाए इस ध्रुव टीले पर कोई आंच नहीं आती। एक बार आईआईटी के एक छात्र ने यहाँ से कूदकर गंगा में छलांग लगा ली थी तब से प्रशासन ने यहां कटीले तार लगवा दिए हैं। यहां पर भूमाफियाओं की नजर से कुछ वृक्ष जरूर बचे हुए हैं। लेकिन यहाँ की नगर पंचायत अध्यक्ष कब तक इस पर नजर टेढ़ी नहीं करेंगे कुछ कहा नहीं जा सकता। खैर अगर बिठूर जाएं तो ध्रुव टीला अवश्य जाएं।
(दूसरे पैराग्राफ की लाइने शंभुनाथ शुक्ला जी के फ़ेसबुक वाल से साभार ली गई हैं।)
यह बिठूर के पास ध्रुव टीला है। लोक में प्रचलित है कि यहीं पर राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव ने तपस्या की थी। गंगा का पाट यहां इतना विशाल है कि ओर छोर तलाशना मुश्किल है। पानी भी साल के बारहों महीने यहां रहता है। मैं जब भी कानपुर जाता हूं बिठूर के इस ध्रुव टीला पर जरूर जाता हूं। बचपन में तो यहां जंगल था पर अब भूमाफियाओं ने यहां भी कब्जा करना शुरू कर दिया है। संभव है कुछ दिनों बाद यहां गंगा गंदे नाले में तब्दील हो जाए जैसी कि जाजमऊ में है। ध्रुवटीला में एक मंदिर है जिसकी गद्दी वर्षों से मराठों के पास है। कानपुर में मराठा मंदिर देखकर एकाएक आप 18 वीं सदी में पहुुंच जाएंगे। फिलहाल मधुकर मोघे यहां के गद्दीनशीं हैं। मोघे का परिवार बड़ा है इतना बड़ा कि इंटक के नेता रामजी त्रिपाठी तो कहते रहते हैं कि यहां जिस झाड़ी में देखो मोघे का एक न एक बच्चा दिख जाएगा। खैर दो पत्नियों के साथ मधुकर मोघे यहां शान से रहते हैं। यह अलग बात है कि उनके पास धन नहीं है पर इससे उनकी शान और अतिथि सत्कार में कोई फर्क नहीं पड़ता। यह धु्रव टीला गंगा की सतह से काफी ऊँचाई पर है। गंगा में चाहे जितना पानी आ जाए इस ध्रुव टीले पर कोई आंच नहीं आती। एक बार आईआईटी के एक छात्र ने यहाँ से कूदकर गंगा में छलांग लगा ली थी तब से प्रशासन ने यहां कटीले तार लगवा दिए हैं। यहां पर भूमाफियाओं की नजर से कुछ वृक्ष जरूर बचे हुए हैं। लेकिन यहाँ की नगर पंचायत अध्यक्ष कब तक इस पर नजर टेढ़ी नहीं करेंगे कुछ कहा नहीं जा सकता। खैर अगर बिठूर जाएं तो ध्रुव टीला अवश्य जाएं।
(दूसरे पैराग्राफ की लाइने शंभुनाथ शुक्ला जी के फ़ेसबुक वाल से साभार ली गई हैं।)
Tuesday, April 8, 2014
कौन है असली हिन्दू?
कल साम को मेरे दोस्त के पास उसके दोस्त का फोन आया, उसने कहा कि वो मुझसे
भी बात करना चाहता है। मैने बात की, तो बोला सुना है आप मोदी के विरोधी हैं। (मेरे दोस्त ने उसको यह बता रखा था कि कमलेश मोदी का विरोध करता है। )
मैंने कहा हाँ लेकिन मोदी का नहीं मोदी की नीतियों का विरोधी हूँ। बोला आप
हिन्दू हैं? मैने कहा हाँ। वो बोला आप राम की पूजा करते हैं? मैने कहा हाँ।
वो बोला आप पाकिस्तान से नफरत करते हैं? मैने कहा नहीं। बोला बस आपसे बात
नहीं करनी है, आप असली हिन्दू नहीं हैं। फोन काट दिया। ऐसा ही दो-तीन
महीने पहले हुआ था, जब गाँव के मेरे एक
ब्राम्हण मित्र ने कह दिया था कि जो भाजपा के साथ नहीं हैं, वो हिन्दू नहीं
हैं। मैने बहुत करारा जवाब दिया था, असल में वो शराब और मांस खाते-पीते
थे, बस मैने उन्हें घेरा और दो-तीन लोगों के सामने माफी तक मंगवा ली थी। तब
से मैने सिर मुँडवा कर अपनी एक बड़ी सी चोटी भी रखी हुई है। बचपन से मांस
खाता था, लेकिन 2011 में छोड़ दिया था। असल में जिसने मांस कभी नहीं खाया
होगा, उसे तो कोई दिक़्कत नहीं है। लेकिन जो खाता रहा है और उसका स्वाद
जानता है, उसके लिए बहुत कठिन कार्य है। फिर इतिहास तो हर संत का होता है,
वाल्मीकि का भी था। और नसे के नाम पर तो जिंदगी में कोई चीज नहीं छुई होगी।
रामायण, रामचरित मानस, भगवत गीता, एक-दो पुराणों के कुछ हिस्से, उपनिषदों
के कुछ भागों का अध्ययन भी किया है। हर मंगलवार को तेल नहीं लगता हूँ, और
मंदिर भी जाता हूँ। फिर भी मुझपर टैग लग गया कि मैं हिन्दू नहीं हूँ।
किसी व्यक्ति विशेष का समर्थन ना करने से ही लोग किसी को गैर-हिन्दू और पाकिस्तानी घोषित कर दे रहे हैं। आज व्हाट्स एप पर मोदी के पक्ष और विरोधियों के विपक्ष में इतनी शर्मनाक बातें चलाई जा रही हैं, कि आपको लिखकर बता नहीं सकता। बहुत गन्दे और अस्लील वीडियो और फोटो बनाकर भेजे जा रहे हैं। पूरा का पूरा प्रचार हार्ड हिन्दुत्व और साम्प्रदायिकता पर चल रहा है। मोदी और उनके बड़े नेता या बीजेपी का ओफ़िसियल पेज भले ही फ़ेसबुक और ट्विटर साम्प्रदायिकता ना फैलाए, लेकिन उनकी टीम और समर्थक पूरी तरह से नफरत की राजनीति करना चाहते हैं। पूरा का पूरा प्रचार पाकिस्तान के खिलाफ किया जा रहा है। मतलब जो मोदी के पक्ष में वो हिन्दू और हिन्दुस्तानी, जो विरोधी वो पाकिस्तानी और मुस्लिम? भाजपा समर्थक व्हाट्स एप पर लगातार मुजफ़्फ़र नगर दंगों को भुना रहे हैं। कहते हैं यह हमारा जवाब था लव जिहाद को (यह बात तो अशोक सिंहल भी कह चुके हैं, जिनकी खुद की बेटी ने मुस्लिम से शादी की है।) हर जगह यह स्वीकार हो रहा है कि अमित शाह ने यह काम किया था। असल में यूपी के जिन दो साल के 150 दंगों की बात की जा रही है। उनमें बरेली और लखनउ का दंगा छोड़ कर हर जगह अमित शाह ने इनडायरेक्ट रूप से भूमिका अदा की है। जब से अमित शाह यूपी प्रभारी बने हैं, तब से बजरंग दल और संघ का कैडर इस तरह की हरकतों के लिए तैयार हो गया था। हर जगह मुस्लिमों को हिंदुस्तान विरोधी बताया गया। यूपी जैसे बड़े राज्य में होने वाले अपराधों में भी अगर एक पक्ष हिन्दू-मुस्लिम है तो उसे भी साम्प्रदायिकता का रंग दिया गया है.इस तरह से मैं यूपी का युवा होने के नाते यह कह सकता हूँ क़ि अगर मोदी जी प्रधानमंत्री बने तो 2014 के अंत तक यूपी में फिर से कोई बड़ा दंगा हो सकता है। जो देश के लिए बहुत घातक होगा. वैसे यह बात किसी बड़े नेता ने भी कही थी कि अगर देश का अल्पसंख्यक, सम्प्र्यादयिक होता है, जो कुछ हद तक लोगों के बहकावे में आ जाते हैं तो वह अपना ही नुकसान करेगा। लेकिन जिस दिन इस देश का बहुसंख्यक जो सेकुलर है, सम्प्रदायिक हो गया तो देश के लिए बहुत घटक होगा।
देश का दुर्भाग्य ही है कि आज एक व्यक्ति विशेष का समर्थक और विरोधी होने पर हिन्दू और हिन्दुस्तानी होने का सर्टिफिकेट मिल रहा है। देखना है यह मार्केटिंग कब तक छ्लेगी. क्योंकि सवाल है कि अगर देश को नफरत की राजनीति पसंद है तो क्यों नोट(जिसके सब मारामार मची है।) के गाँधी की तस्वीर है, उन्हें मारने वाले हिन्दुत्ववादी गोडसे की नहीं।
देश का दुर्भाग्य ही है कि आज एक व्यक्ति विशेष का समर्थक और विरोधी होने पर हिन्दू और हिन्दुस्तानी होने का सर्टिफिकेट मिल रहा है। देखना है यह मार्केटिंग कब तक छ्लेगी. क्योंकि सवाल है कि अगर देश को नफरत की राजनीति पसंद है तो क्यों नोट(जिसके सब मारामार मची है।) के गाँधी की तस्वीर है, उन्हें मारने वाले हिन्दुत्ववादी गोडसे की नहीं।
घोषणा पत्र 2014
पिछले कई दिनो से राजनैतिक पार्टियों के घोषणापत्र पर कुछ लिखने की सोंच रहा था, लेकिन सभी ने इसे जनता के सामने रखने में बहुत देर कर दी। इतने कम समय में तो यह आम जनता तक पहुंच भी नहीं पाएगा। सबसे पहले कांग्रेस, फिर सपा, आप, जेडीयू, लेफ्ट और अन्य दलों ने बारी-बारी से इसे 2-3 अप्रैल तक सामने रख दिया। लेकिन चर्चा के अनुसार जिस पार्टी (भाजपा) की सरकार बननी है, वो तो इसपर बिल्कुल भी गंभीर नहीं दिखाई दी। जिस दिन पूर्वोत्तर में वोटिंग हो रही थी, उसी दिन भाजपा माफ करिए.... मोदी जी का घोषणापत्र आया। अब उस जनता के साथ इससे बड़ा और क्या धोखा हो सकता है, जिससे यह वादा किया था कि पूरे भारत में क्षेत्रीय अंतर मिटाने का कार्य करेंगे। अब अगर जनता के अहम मुद्दों की बात करें जो इसबार घोषणापत्र में रखे गए हैं, तो उनकों बिन्दुवार निम्नवत देखना होगा।
1). भ्रष्टाचार: यह वो मुद्दा है जो यूपीए सरकार के लिए घातक रहा और इसी के विरोध मे अन्ना आन्दोलन और फिर आम आदमी पार्टी का उदय हुआ। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में इसे रोकने के लिए लोकपाल कानून बनाया है और आगे भी ऐसे ही कानून बनाने के वादे कर रही है। लेकिन जितना अच्छे से वह भ्रष्टाचार करती रही है, वह भी किसी से छिपा नहीं है। भाजपा ने इस मुद्दे पर आम आदमी पार्टी की कॉपी कर ई-गर्वर्नेंस का उपाय तो बताया है लेकिन येदुरप्पा, बोखारिया, गडकरी और श्रीरामलु जैसे नेताओं के साथ वो भ्रष्टाचार से कैसे लड़ेगी? यह सवाल जनता जरूर पूंछेगी। बाकी सभी दलों ने भी इसपर अपनी राय रखने का काम किया है। महज़ औपचारिकता स्वरूप।
2). कालाधन: इस मुद्दे को भाजपा के सहयोगी बाबा रामदेव पिछले 3-4 सालों से उठाते रहे हैं, और मोदी जी को कालाधन लाने में सक्षम एकमात्र नेता भी बताते रहे हैं। लेकिन पिछले दिनों जब केजरीवाल ने अंबानी के स्विसबैंक के अक़ाउंट बताए तो उन्होंने कोई आस्वशन नहीं दिया। कांग्रेस तो इस मुद्दे पर बिल्कुल भीगंभीर नहीं है। एक मात्र आम आदमी पार्टी इस मुद्दे पर अपना स्टैंड फिलहाल तो साफ दिखा रही है। लेकिन उसे भी उद्योगपतियों से लडकर ही यह काम करना होगा। जिस तरह से इस देश में राजनीति में उद्योगपति अपना दखल देने लगे हैं, उससे तो केजरीवाल को भी बहुत बच कर काम करना होगा। मोदीजी का स्पेशल टास्क फोर्स उन उद्योगपतियों का क़ालाधन कैसे देश में लाएगा, जो इस समय उनके प्रचार पर लाखों रुपए खर्च कर रहे हैं।
3). गरीबी और मँहगाई: देश का दुर्भाग्य ही है कि आज भी देश की लगभग 50 से अधिक आबादी अपना पेट भरने के लिए संघर्ष कर रही है। यही कारण है कि सरकार को खाद्य सुरक्षा कानून लाना पड़ा है। राहुल गाँधी देश की 70 करोड़ आबादी को मिडल क्लास में लाने की बात तो करते हैं, लेकिन यह तो इंदिरा गाँधी के जमाने का वादा था। वहीं मँहगाई कम करने की बात पर कांग्रेस इसे विकास दर बढ़ाकर रोंकेगी। भाजपा भी इसपर अपना स्टैंड क्लियर नहीं किया है। भाजपा इसके लिए केवल 6 महीने का समय मांग रही है। अब हमें यह भी समझना होगा कि आखिर यह मंहगाई कम कैसे होगी? 2012 के गुजरात विधानसभा में मोदी का गरीबों को घर देने का वादा भी जैसे का तैसे पड़ा है। आम आदमी पार्टी ने इसपर अपनी कुछ स्कीम और सब्सिडी जैसी योजनाएँ दिल्ली में अपनाई हैं, जिनका फिर से देश को भरोसा दिलाया है।
4). रोजगार और शिक्षा: ये दोनों मुद्दे एक-दूसरे से मिलते हुए हैं। कांग्रेस ने शिक्षा का कानून तो ला दिया लेकिन जमीन पर यह कानून खोखला ही साबित हुआ है। देश में नए आई. आई. टी., आई. आई. एम. और यूनिवर्सिटी बनाने की बात तो दोनो दल कर रहे हैं। लेकिन कांग्रेस के साथ-साथ गुजरात में शिक्षा के निजीकरण पर पूरे देश ने मोदी का भी स्टैंड देखा है। इसपर नीतीश कुमार और अरविन्द केजरीवाल ने अपना रुख सही ढंग से साफ किया है. केजरीवाल की सरकार में मनीष सिषोदिया जैसी शिक्षा मंत्री का कार्य जनता ने देखा है। ये दोनों नेता सरकारी स्कूलों की हालात ठीक करने की बात कर रहे हैं, इनका कहना है कि अगर देश का हर गरीब आदमी अपने बच्चे को सही शिक्षा दे पाएगा तब आई. आई. टी. और यूनिवर्सिटी काम आएंगे।
हर आदमी को अच्छी शिक्षा मिलेगी तब वह जातीय, धार्मिक और क्षेत्रीय अंतर को दूर कर सकता है। उनको ऐसी शिक्षा दी जाए जो उनके रोजगार के काम आए। वहीं रोजगार के लिए सब पर हावी नरेन्द्र मोदी दिखते हैं। यह बात भी है कि उन्होंने गुजरात में रोजगार दिया भी है। लेकिन पूरे देश में यह केवल गुजरात जैसी प्राइवेटाइजेशन की स्कीम पर चलना मुस्किल होगा। नीतीश कुमार ने तो निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की बात करके सबको चौंका दिया है। वहीं अखिलेश और अन्य नेताओं ने केवल वादे किए हैं। कांग्रेस तो इसपर अपना मुंह दिखाने लायक भी नहीं बची है। पिछले 10 सालों में लोगों ने देश में बेरोजगारी की समस्या को देखा है।
हर आदमी को अच्छी शिक्षा मिलेगी तब वह जातीय, धार्मिक और क्षेत्रीय अंतर को दूर कर सकता है। उनको ऐसी शिक्षा दी जाए जो उनके रोजगार के काम आए। वहीं रोजगार के लिए सब पर हावी नरेन्द्र मोदी दिखते हैं। यह बात भी है कि उन्होंने गुजरात में रोजगार दिया भी है। लेकिन पूरे देश में यह केवल गुजरात जैसी प्राइवेटाइजेशन की स्कीम पर चलना मुस्किल होगा। नीतीश कुमार ने तो निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की बात करके सबको चौंका दिया है। वहीं अखिलेश और अन्य नेताओं ने केवल वादे किए हैं। कांग्रेस तो इसपर अपना मुंह दिखाने लायक भी नहीं बची है। पिछले 10 सालों में लोगों ने देश में बेरोजगारी की समस्या को देखा है।
5). महिलाओं और देश की आंतरिक की सुरक्षा: यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिसमें कांग्रेस महिला सुरक्षा पर पूरी तरह से फेल हुई है। आंतरिक सुरक्षा की बात की जाए तो इस सरकार ने इसपर कुछ हद तक कामयाबी पाई है। वहीं राहुल गाँधी द्वारा पुलिस में 25% महिलाओं की बात करके कुछ सही तो किया है। उनका पूरा ध्यान महिलाओं के शशक्तीकरण पर रहा है। भाजपा ने भी इसे मुद्दा बनाकर कुछ लाभ लिया और कुछ वादे भी किए लेकिन कोई जिक्र करने लायक प्वाइंट नहीं है। आम आदमी पार्टी ने महिला सुरक्षा कमांडो बनाने का अपना वादा दोहराया है, जो अच्छा है। आंतरिक सुरक्षा पर भाजपा नहीं मोदी पर मुझे कुछ भरोषा है, अगर वो साम्प्रदायिकता संभाल लें तो? बाकी आप सपा जैसी पार्टियों का इस मुद्दे पर स्टैंड मुलायम सिंह के हालिया बयान से समझ सकते हैं।
6). विदेशनीति: विदेश नीति पर अगर बात की जाए तो भाजपा का स्टैंड इसपर आक्रमक लगता है, जैसा मोदी कहते हैं पाकिस्तान से युध्द करो, चीन पर चड़ बैठो, अमेरिका से रिस्ते अहम होंगे। मोदी ने इसपर बांग्लादेशी घुसपैठियों पर रोंक के लिए बात की है, लेकिन यह भी वादा कर दिया है कि जिस भी देश में हिन्दुओं पर जुर्म हो रहा है वो भारत आ जाएँ. बिना यह सोंचे कि अगर देश में अल्पसंख्यकों को कष्ट हुआ तो वो किसी दूसरे मुल्क में भी जा सकते हैं। यह विचारधारा तो पूरी तरह से जिन्ना की थी। आम आदमी पार्टी ने अपनी उम्र और चुनाव में सरकार न बनाने की उम्मीदों के अनुसार इसपर ज्यादा विस्तारित बात नहीं की है। हाँ लेकिन देश को सम्मान के साथ सबको सात लेकर चलने की बात की है. अगर कांग्रेस की बात करें तो पिछले दस सालों में आपको कई उतार-चड़ाव देखने को मिल सकते हैं। आगे भी उसने यही कार्यक्रम जारी रखने का वादा किया है।
7). बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य और शहरीकरण: यह मुद्दे आज देश के लिए आवश्यक हैं, कांगेस ने इसपर काम तो किया है, लेकिन पूरे देश में यह विकास कमजोर रहा है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में इसतरह के कार्य ना के बराबर हुए हैं। भाजपा ने इसपर अपना वादा किया है, गुजरात के इसी विकास के नाम पर जो हवा बनी है, वह देखना देश भर में कैसे जाता है। सभी पार्टियों ने इसपर अपने-अपने वादे किए हैं। भाजपा और कांग्रेस ने 100-100 नए मॉर्डन शहर बनाने का भी वादा किया है। बिजली और पानी पर आप ने दिल्ली जैसा वादा और भाजपा ने गुजरात जैसा वादा किया है। सभी दलों ने स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने की बात कही है, जिसमें हर राज्य में एक-एक एम्स खोलने का वादा भी सामिल है।
8). कृषि: आज भी देश की लगभग 70 आबादी गावों में खेती पर निर्भर है। और कृषि हमारे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। आज देश में किसान आत्म हत्या कर रहे हैं। कोई भी किसान अपने बच्चों को किसान नहीं बनाता चाहता है। किसान की हालत बद से बदतर होती गई और देश की केन्द्र और राज्य सरकारें तमाशा देखती गईं। कांग्रेस ने जितना पिछले 10 सालों में किसानों को लुटा शायद ही किसी और ने ऐसा किया होगा? अब राहुल गाँधी ने यह रिस्ता फिर से बनाने की कोशिश की और किसानों से मिलकर उनकी समयस्याएं इसमें डाली हैं। उन्होंने आदिवासी किसानों और मछुआरों के लिए अलग मंत्रालय खोलने का वादा है। जब किसान शब्द आता है तो भाजपा कोई भी बड़ा और अच्छा वादा नहीं कर पाती है। गुजरात के हिसाब से तो मोदी जो 100 नए शहर बनाने वाले हैं वो तो गावों को उजाड़कर ही बनेंगे। एक-आध वादे अच्छे हैं जो मोदी के गुजरात में ही फेल हो गए हैं। सपा और जेडीयू ने अपने-अपने राज्य के किसानों के लिए अच्छे वादे किए हैं। सबने किसानों को लोन, फसल बीमा, सिंचाई और बिजली देने की बात की है। लेकिन किसी ने भी किसान के असली दर्द उनकी जमीन छीनने के मुद्दे को समझने की कोशिश नहीं की है।
9). प्रवासी मजदूरों की समस्याएँ: प्रवासी मजदूर सबसे ज्यादा बिहार और उत्तरप्रदेश से ही बाहर जाते हैं। और दिल्ली में इन राज्यों की अच्छी खासी उपस्थिति के बावजूद इनकी समस्याओं के लिए कोई भी कदम नहीं उठाया जाता है। कांग्रेस ने तो इस क्षेत्र में 60 साल में कुछ नहीं किया है, अगर दिल्ली के एक-दो काम छोड़ दें तो। वहीं भाजपा ने इस मुद्दे पर अपने घोषणा पत्र में कुछ भी नहीं लिखा है। आम आदमी पार्टी ने प्रवासी मजदूरों के मुद्दों को सामिल किया है, जिसमें उनका रेग्युलर होना, ठेकेदारी प्रथा हटाना, उनके स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना, उनके लिए कालोनियों का वितरण जैसी बुनियादी समस्याएं हैं। वहीं सबसे अच्छा वादा बिहार के मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ने किया है। नीतीश कुमार ने प्रवासी मजदूरों की दिल्ली, मुम्बई, चण्डीगढ़ जैसे शहरों में सुरक्षा के लिए विशेष कानून बनाने का वादा किया है। वैसे मैने भी "प्रवासी होने के अधिकार" पर राहुल गाँधी को पत्र लिखा था, लेकिन उन्होंने कोई वादा नहीं किया।
10). चुनावप्राणाली: इसी क्रम में मैं भाजपा का एक और वादा याद दिलाना चाहता हूँ। वह है कि अगर उनकी सरकार बनी तो वो लोकसभा और विधान सभा के चुनाव साथ-साथ कराएंगे। आखिर क्या इतने राज्यों वाले विविधता पूर्ण और संसदीय राजनीति वाले देश में ऐसा करना उचित होगा? मुझे लगता है कि भाजपा देश की संसदीय प्रणाली को नहीं पसंद करती है और अमेरिका के जैसी व्यक्ति केन्द्रित व्यवस्था चाहती है। भाजपा हर बार एक लहर लेकर चलती है, जो केन्द्रिय राजनीति में कुछ सफल होती है लेकिन राज्यों के चुनाव में इसे कोई भी पसंद नहीं करता है। भाजपा एक तीर से दो निशाने साधने के मूड में है। और सभी पार्टियाँ चुनावों को ईमानदारी से कराने की बात तो कर रही हैं, लेकिन किसी ने भी यह आस्वासन नहीं दिया है कि वो चुनाव में कालाधन नहीं लगाएंगे या चुनाव आयोग की आचार संहिता का पालन करेंगे। सभी वोट के लिए चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को कमजोर करना चाहते हैं।
10). चुनावप्राणाली: इसी क्रम में मैं भाजपा का एक और वादा याद दिलाना चाहता हूँ। वह है कि अगर उनकी सरकार बनी तो वो लोकसभा और विधान सभा के चुनाव साथ-साथ कराएंगे। आखिर क्या इतने राज्यों वाले विविधता पूर्ण और संसदीय राजनीति वाले देश में ऐसा करना उचित होगा? मुझे लगता है कि भाजपा देश की संसदीय प्रणाली को नहीं पसंद करती है और अमेरिका के जैसी व्यक्ति केन्द्रित व्यवस्था चाहती है। भाजपा हर बार एक लहर लेकर चलती है, जो केन्द्रिय राजनीति में कुछ सफल होती है लेकिन राज्यों के चुनाव में इसे कोई भी पसंद नहीं करता है। भाजपा एक तीर से दो निशाने साधने के मूड में है। और सभी पार्टियाँ चुनावों को ईमानदारी से कराने की बात तो कर रही हैं, लेकिन किसी ने भी यह आस्वासन नहीं दिया है कि वो चुनाव में कालाधन नहीं लगाएंगे या चुनाव आयोग की आचार संहिता का पालन करेंगे। सभी वोट के लिए चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को कमजोर करना चाहते हैं।
साम्प्रदायिकता, आरक्षण, अल्पसंख्यक, जातिवाद और भी कई मुद्दे हैं, जिनपर हमारे राजनैतिक दल वादा तो करते हैं लेकिन सही से लागू नहीं कर पाते हैं। भाजपा जैसी पार्टियाँ तो राम मंदिर को अपने घोषणापत्र में सामिल करती हैं लेकिन इन बुनियादी मुद्दों से दूरी रखते हैं। कुछ गैर जरूरी और घातक वादे भी किए गए हैं जिनमें राम मंदिर, कॉमन सिविल कोड और धारा 370 सामिल हैं। देश में मुद्दों की कमी नहीं है, लेकिन इन बुनियादी मुद्दों पर ही राजनैतिक
दलों ने अपना वादा किया है। अब देखना है कि जिस दल की सरकार बनेगी वो इसे
पूरा करेंगे या नहीं। कुछ लोग घोषणा पत्र को गंभीरता से नहीं लेते हैं लेकिन मेरा कहना है कि सबके घोषणा पत्र पढ़ना चाहिए और अगले चुनाव में वादे ना पूरे करने पर उनसे सवाल भी पूंछने चाहिए।
Friday, April 4, 2014
नेताजी की "गंदी बात"
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें सबको बोलने का अधिकार प्राप्त है। लेकिन हमारे देश में जैसे-जैसे चुनाव पास आते जा रहे हैं, वैसे-वैसे नेताओं के बोलने का अधिकार कुछ ज्यादा ही बढ़ता जा रहा है। नेताओं को लगता है कि वो कुछ भी बोल सकते हैं। भारत में चुनाव आयोग को जिस तरह काम करना चाहिए उस तरह हो नहीं पाता है। अगर हम देश के राजनैतिक इतिहास में जाएँ तो सत्तर के दशक तक यह मर्यादा पूरी तरह से कायम थी। 60 के दशक में एक बार के चुनाव में जवाहर लाल नेहरू ने अम्बेडकर साहब की लोक सभा में कहा था कि अगर आपको लगता है कि कांग्रेस पार्टी की नीतियाँ अच्छी हैं, तो हमे वोट करें लेकिन मैं यह नहीं कह सकता कि आप अम्बेडकर साहब को वोट ना करें। डा. राम मनोहर लोहिया जी हमेशा ही कांग्रेस की नीतियों के विरोधी रहे लेकिन कभी भी उसके नेताओं पर पर्सनल टिप्पणी नहीं की। एक बार इंदिरा गाँधीजी ने समाजवादी नेता मोहन सिंह के खिलाफ प्रचार करने से मना कर दिया था। इसी तरह से जयप्रकाश नारायण हमेशा ही व्यक्तिगत तौर पर इंदिरा गाँधी की बहुत इज्जत करते थे। अटल बिहारी बाजपाई ने भी कभी इंदिरा को दुर्गा का रूप बताया था.अगर अब देखा जाए तो हर नेता एक-दूसरे पर व्यक्तिगत टिप्पणी करने में लगा है। इसकी शुरुआत सबसे पहले मोदीजी ने की की थी. उन्होंने राहुल गाँधी को सहजादा कहना शुरु किया, मनमोहन को मौनमोहन, और सोसल मीडिया पर कांग्रेसी नेताओं खासकर गाँधी परिवार पर व्यक्तिगत आपत्तिजनक और गैरलोकतांन्त्रिक भाषा का प्रयोग करते या समर्थकों से करवाते रहे हैं। अगर कांग्रेस के बड़े नेताओं की तरफ देखें तो किसी ने भी व्यक्तिगत तौर पर कोई टिप्पणी ना करके अपने छोटे नेताओं को इस युद्ध में कूदने दिया। राहुल गाँधी ने स्वयं को गाँधी और मोदी को हिटलर की तरह पेश करते हुए बचना ही अच्छा समझा। मोदी इस युद्ध में आगे निकलते जा रहे थे कि अचानक एक दिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नें उन्हें जवाब देते हुए रोका ही नहीं बल्कि इतिहास ज्ञान भी करा दिया। कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने लगातार उनपर हमले किए, इसी लिस्ट में सबसे आगे खड़े थे बेनी प्रसाद वर्मा जिन्होंने मोदी, केजरीवाल और अपने पुराने मित्र मुलायम सिंह पर भी बहुत हमले किए। क्षेत्रीय दलों में मुलायम सिंह ने अगुवाई करते हुए पहले लालू की मिमिक्री की फिर उनके नेताओं ने मोदी और मायावती पर अभद्र गालीदार भाषा शुरु कर दी जो अब तक चालू है। आपको याद दिला दूं कि मोदी की बोटी-बोटी काटने की बात करने वाले कांग्रेस उम्मीदवार राशिद तब सपा में ही थे। मायावती की निजी जिंदगी और चरित्र पर भी सपा के विधायक स्तर के नेताबहुत पहले से करते रहे हैं। इसमें बसपा के भी नेता किसी से पीछे ना रहते हुए सामिल हो गए। हाँ बसपा सुप्रीमो ने इससे परहेज किया है। नई नवेली आम आदमी पार्टी ने भी कई बार इस तरह के बयान दिए हैं। चाहें कुमार विश्वाश का बार-बार राहुल और सोनिया गाँधी पर की गई टिप्पणी और उनके समर्थकों के द्वारा ही क्यों न हों. इस बात पर मैं केजरीवाल से सहमत हूँ कि भ्रष्टाचार के मामले में किसी पर भी हमले किए जा सकते हैं। कम्युनिस्टों ने अपने इतिहास के हिसाब से अपनी गरिमाएँ कायम रखी। उनके एक नेता ने ममता बनर्जी पर कुछ बोला था तो प्रकाश करात ने स्वयं उसे माफी मांगने और आगे ऐसा ना करने की सलाह दी। दक्षिण भारत में दक्षिणपंथियों के अलावा सब इससे दूर हैं। महाराष्ट्र तो इसका उदाहरण ही रहा है। अपने को यहाँ का शेर कहने वाले बाल ठाकरे के पुत्र उद्धव और भतीजे राज ठाकरे में इस समय जुबानी जंग बहुत जोरों पर है, दोनो भाई एक दूसरे को बदनाम करने में जूटे हैं। राज ठाकरे ने यहाँ तक कह दिया कि बाला साहब ठाकरे को अंतिम समय से उद्धव सही से खाना भी नहीं देते थे। उन्हें वड़ा पाव खकर रहना पड़ता था। मैने (राज) खुद उन्हें कई बार खाने के लिए बिरियानी और चिकन सूप भेजा है, खाने के लिए. इसी का जवाब देते हुए उद्धव दे पुत्र आदित्य ठाकरे ने राज को दिमागी बीमार बता डाला। कोई सोंच भी नहीं सकता कि हमारे देश के नेताओं की मानसिकता यहाँ तक जा सकती है। पिछली पंक्तियाँ लिखे दो दिन ही हुए थे कि फिर से राजनैतिक दलों के नेताओं ने अपनी भाषा की पहचान करानी शुरु कर दी। इसमें अमित शाह का नाम सबसे पहले आता है, उन्होंने मायावती के खिलाफ बदले की भावना वाला बयान दिया, साथ ही साथ मुल्ला मुलायम सिंह जैसा अभद्र और भड़काऊ बयान दिया। उधर राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने भी कांग्रेस के नेता को बोटी-बोटी काटने के जवाब देते हुए कहा कि चुनाव के बाद पता चलेगा कि कौन कटेगा? इसी क्रम में एक सपा नेता ने मायावती को भैंस और आजम ख़ान ने मोदी को कुत्ते के पिल्ले का बड़ा भाई कह दिया। आजम ख़ान की बात तो कहीं तक ठीक भी है। मोदी ने खुद 2002 में मरने वाले किसानों की तुलना कुत्ते के पिल्ले से की थी, अगर हिन्दू-मुस्लिम भाई हैं, तो पिल्ले का भाई तो उसका बड़ा भाई ही होगा।
इस क्रम में कुछ बड़े नेता अरविन्द केजरीवाल, राहुल गाँधी, अखिलेश यादव, नीतीश कुमार हैं, जो किसी पर भी पर्सनल टिप्पणी नहीं कर रहे हैं। इनमें केजरीवाल को छोड़कर मोदी का तो कोई नाम ही नहीं लेता है। भारत की संसदीय प्रणाली में यह एक महत्वपूर्ण कदम है कि किसी पर भी व्यक्तिगत प्रहार न किए जाएँ लेकिन मोदी इसे मानने को बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं। उन्होंने हर नेता पर पाकिस्तानी, गद्दार, भ्रष्ट और ना जाने क्या-क्या आरोप लगाए हैं। उन्होंने सोनिया गाँधी की बीमारी तक का मजाक बना डाला। जब राहुल का नाम प्रधान मंत्री पद के लिए घोषित नहीं हुआ तो मोदी ने यह तक कह दिया कि एक माँ अपने बेटे की बलि नहीं देना चाहती है। लेकिन इसके उलट मोदी पर कोई छोटा सा भी राजनैतिक हमला करे तो वो और उनके समर्थक बौखला जाते हैं। आज़मी साहब का के नया विवादास्पद बयान... हालांकि मुलायम के बयान से इनका कुछ ठीक था लेकिन मीडिया ने इसे गलत ढंग से पेश किया। अबू आज़मी ने कहा कि जो रेप करे उसके लिए इस्लाम में पत्थर से मारने की सजा है। और अगर कोई शादीशुदा औरत अपने पति के अलावा किसी के साथ सेक्स करे तो उसे भी फांसी की सजा है। फिर भी आज के जमाने में जहाँ लोकतंत्र और समाज के खुलेपन को लेकर एक बहस चल रही है, वैसे में यह बयान उनकी तालिबानी विचारधारा को दर्शाता है। चुनाव खत्म होने को है लेकिन नेताओं की भाषा लगातार गिरती ही जा रही है। कुछ नेताओं को छोड़ दिया जाए तो बेनिप्रसाद, दिग्विजय, गिरिराज सिंह, आजम ख़ान और अमित शाह अपना काम चालू किए हुए हैं। इनको देश की जनता और चुनाव आयोग से कुछ भी मतलब नहीं है। अगर इस क्रम में गिरिराज सिंह के बयान की निन्दा ना की जाए तो शायद नाइंसाफी होगी। बिहार भाजपा के बड़े नेता गिरिराज सिंह ने अपने एक बयान में कहा कि जो लोग मोदी को पी.एम. बनाने से रोकना चाहते हैं, आने वाले दिनों में उनकी जगह हिन्दुस्तान में नहीं पाकिस्तान में होगी। हालांकि भाजपा ने अपनी राय इसपर स्पष्ट की और कहा कि यह भाजपा की लाइन नहीं है। एक और मोदी समर्थक प्रवीण तोगडिया ने गुजरात में बयान दिया कि चुनाव के बाद हम मुसलमानों के घरों पर कब्जा कर लेंगे और उन्हें देश से निकाल देंगे। शिवसेना के नेता कदम का बयान मुम्बई की एक जनसभा में मोदी की मौजूदगी में हुआ। जब उन्होंने कहा क़ि अगर हमारी सरकार बनी तो 6 महीने में पाकिस्तान खत्म कर देंगे। इन सभी बयानों पर भाजपा ने अपनी सहमति नहीं जताई लेकिन यह भाजपा के ही लोग हैं। विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, संघ और भाजपा के रिस्ते कौन नहीं जानता है? ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भाजपा यह हार्ड हिन्दुत्व का एजेंडा स्वयं ना उठाकर दूसरों से उठवा रही है?
कल से सभी टीवी चैनल और राजनैतिक दल शाजिया इल्मी के बयान के पीछे पड़े हैं। उन्होने कहा क्या केवल यही कहा क़ि मुसलमानों को अपने लोगों को वोट देना चाहिए। आजतक कांग्रेस ने आपको क्या दिया है। अरविन्द केजरीवाल आपके अपने है। अब अर्नब गोस्वामी ही यह बता दें कि इसमें क्या गलत था?
इसी लिस्ट में शामिल हुए बाबा रामदेव भी बहुत बचकाना बयान दे गए। उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी दलितों के घर पर हनीमून मनाने जाते हैं। इतने गलत बयान पर सारे देश में बाबा की बहुत निन्दा हुई लेकिन भाजपा के प्रवक्ता हनीमून शब्द का अर्थ बताने में जूते रहे। अबू आसिम आज़मी ने एक और गंदा बयान देते हुए कहा कि जो मुस्लिम सपा को वोट ना दे, उसका डी. एन. ए. चेक कराना चाहिए। यह बहुत गंदा बयान था, लेकिन अगर हम यूपी में देखें, तो सपा को सबसे ज्यादा हानि तो सेकुलरिज्म के चक्कर में ही हुई है। फिर भी सपा अभी तक पूरी तरह से अपनी विचारधारा पर टिकी हुई है। मुजफ़्फ़र नगर के दंगे अलग बात हैं, यहाँ पर सरकार से कुछ गलतियाँ हुईं, लेकिन उसके बाद सरकार से जो हो सकता था किया। जिसका दंगो में हाथ था वो तो सबसे फायदे में दिख रहे हैं। चलो अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं, गिरिराज के बयान के जवाब में फारूख अब्दुल्ला ने कहा कि जो मोदी को वोट देंगे, उन्हें समंदर में डूब जाना चाहिए। यह बयान भी बहुत खराब और निन्दनीय था।
इस क्रम में कुछ बड़े नेता अरविन्द केजरीवाल, राहुल गाँधी, अखिलेश यादव, नीतीश कुमार हैं, जो किसी पर भी पर्सनल टिप्पणी नहीं कर रहे हैं। इनमें केजरीवाल को छोड़कर मोदी का तो कोई नाम ही नहीं लेता है। भारत की संसदीय प्रणाली में यह एक महत्वपूर्ण कदम है कि किसी पर भी व्यक्तिगत प्रहार न किए जाएँ लेकिन मोदी इसे मानने को बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं। उन्होंने हर नेता पर पाकिस्तानी, गद्दार, भ्रष्ट और ना जाने क्या-क्या आरोप लगाए हैं। उन्होंने सोनिया गाँधी की बीमारी तक का मजाक बना डाला। जब राहुल का नाम प्रधान मंत्री पद के लिए घोषित नहीं हुआ तो मोदी ने यह तक कह दिया कि एक माँ अपने बेटे की बलि नहीं देना चाहती है। लेकिन इसके उलट मोदी पर कोई छोटा सा भी राजनैतिक हमला करे तो वो और उनके समर्थक बौखला जाते हैं। आज़मी साहब का के नया विवादास्पद बयान... हालांकि मुलायम के बयान से इनका कुछ ठीक था लेकिन मीडिया ने इसे गलत ढंग से पेश किया। अबू आज़मी ने कहा कि जो रेप करे उसके लिए इस्लाम में पत्थर से मारने की सजा है। और अगर कोई शादीशुदा औरत अपने पति के अलावा किसी के साथ सेक्स करे तो उसे भी फांसी की सजा है। फिर भी आज के जमाने में जहाँ लोकतंत्र और समाज के खुलेपन को लेकर एक बहस चल रही है, वैसे में यह बयान उनकी तालिबानी विचारधारा को दर्शाता है। चुनाव खत्म होने को है लेकिन नेताओं की भाषा लगातार गिरती ही जा रही है। कुछ नेताओं को छोड़ दिया जाए तो बेनिप्रसाद, दिग्विजय, गिरिराज सिंह, आजम ख़ान और अमित शाह अपना काम चालू किए हुए हैं। इनको देश की जनता और चुनाव आयोग से कुछ भी मतलब नहीं है। अगर इस क्रम में गिरिराज सिंह के बयान की निन्दा ना की जाए तो शायद नाइंसाफी होगी। बिहार भाजपा के बड़े नेता गिरिराज सिंह ने अपने एक बयान में कहा कि जो लोग मोदी को पी.एम. बनाने से रोकना चाहते हैं, आने वाले दिनों में उनकी जगह हिन्दुस्तान में नहीं पाकिस्तान में होगी। हालांकि भाजपा ने अपनी राय इसपर स्पष्ट की और कहा कि यह भाजपा की लाइन नहीं है। एक और मोदी समर्थक प्रवीण तोगडिया ने गुजरात में बयान दिया कि चुनाव के बाद हम मुसलमानों के घरों पर कब्जा कर लेंगे और उन्हें देश से निकाल देंगे। शिवसेना के नेता कदम का बयान मुम्बई की एक जनसभा में मोदी की मौजूदगी में हुआ। जब उन्होंने कहा क़ि अगर हमारी सरकार बनी तो 6 महीने में पाकिस्तान खत्म कर देंगे। इन सभी बयानों पर भाजपा ने अपनी सहमति नहीं जताई लेकिन यह भाजपा के ही लोग हैं। विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, संघ और भाजपा के रिस्ते कौन नहीं जानता है? ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भाजपा यह हार्ड हिन्दुत्व का एजेंडा स्वयं ना उठाकर दूसरों से उठवा रही है?
कल से सभी टीवी चैनल और राजनैतिक दल शाजिया इल्मी के बयान के पीछे पड़े हैं। उन्होने कहा क्या केवल यही कहा क़ि मुसलमानों को अपने लोगों को वोट देना चाहिए। आजतक कांग्रेस ने आपको क्या दिया है। अरविन्द केजरीवाल आपके अपने है। अब अर्नब गोस्वामी ही यह बता दें कि इसमें क्या गलत था?
इसी लिस्ट में शामिल हुए बाबा रामदेव भी बहुत बचकाना बयान दे गए। उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी दलितों के घर पर हनीमून मनाने जाते हैं। इतने गलत बयान पर सारे देश में बाबा की बहुत निन्दा हुई लेकिन भाजपा के प्रवक्ता हनीमून शब्द का अर्थ बताने में जूते रहे। अबू आसिम आज़मी ने एक और गंदा बयान देते हुए कहा कि जो मुस्लिम सपा को वोट ना दे, उसका डी. एन. ए. चेक कराना चाहिए। यह बहुत गंदा बयान था, लेकिन अगर हम यूपी में देखें, तो सपा को सबसे ज्यादा हानि तो सेकुलरिज्म के चक्कर में ही हुई है। फिर भी सपा अभी तक पूरी तरह से अपनी विचारधारा पर टिकी हुई है। मुजफ़्फ़र नगर के दंगे अलग बात हैं, यहाँ पर सरकार से कुछ गलतियाँ हुईं, लेकिन उसके बाद सरकार से जो हो सकता था किया। जिसका दंगो में हाथ था वो तो सबसे फायदे में दिख रहे हैं। चलो अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं, गिरिराज के बयान के जवाब में फारूख अब्दुल्ला ने कहा कि जो मोदी को वोट देंगे, उन्हें समंदर में डूब जाना चाहिए। यह बयान भी बहुत खराब और निन्दनीय था।
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राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट
*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...
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*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...
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कुछ ही दिन पहले पूर्व फिल्म अभिनेत्री तनुश्री दत्ता और अब कंगना रनौट द्वारा साथी कलाकारों व फिल्म निर्देशकों पर लगाए गए यौन उत्पीड़न के ...
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इस समय पाकिस्तान में बड़ा ही अच्छा एक सीरियल आ रहा है, " बागी........." जो पाकिस्तान के प्रोग्रेसिव तबके और भारत में भी बहुत प...
