Tuesday, April 8, 2014

घोषणा पत्र 2014

पिछले कई दिनो से राजनैतिक पार्टियों के घोषणापत्र पर कुछ लिखने की सोंच रहा था, लेकिन सभी ने इसे जनता के सामने रखने में बहुत देर कर दी। इतने कम समय में तो यह आम जनता तक पहुंच भी नहीं पाएगा। सबसे पहले कांग्रेस, फिर सपा, आप, जेडीयू, लेफ्ट और अन्य दलों ने बारी-बारी से इसे 2-3 अप्रैल तक सामने रख दिया। लेकिन चर्चा के अनुसार जिस पार्टी (भाजपा) की सरकार बननी है,  वो तो इसपर बिल्कुल भी गंभीर नहीं दिखाई दी। जिस दिन पूर्वोत्तर में वोटिंग हो रही थी, उसी दिन भाजपा माफ करिए.... मोदी जी का घोषणापत्र आया। अब उस जनता के साथ इससे बड़ा और क्या धोखा हो सकता है, जिससे यह वादा किया था कि पूरे भारत में क्षेत्रीय अंतर मिटाने का कार्य करेंगे। अब अगर जनता के अहम मुद्दों की बात करें जो इसबार घोषणापत्र में रखे गए हैं, तो उनकों बिन्दुवार निम्नवत देखना होगा।
1). भ्रष्टाचार: यह वो मुद्दा है जो यूपीए सरकार के लिए घातक रहा और इसी के विरोध मे अन्ना आन्दोलन और फिर आम आदमी पार्टी का उदय हुआ। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में इसे रोकने के लिए लोकपाल कानून बनाया है और आगे भी ऐसे ही कानून बनाने के वादे कर रही है। लेकिन जितना अच्छे से वह भ्रष्टाचार करती रही है, वह भी किसी से छिपा नहीं है। भाजपा ने इस मुद्दे पर आम आदमी पार्टी की कॉपी कर ई-गर्वर्नेंस का उपाय तो बताया है लेकिन येदुरप्पा, बोखारिया, गडकरी और श्रीरामलु जैसे नेताओं के साथ वो भ्रष्टाचार से कैसे लड़ेगी? यह सवाल जनता जरूर पूंछेगी। बाकी सभी दलों ने भी इसपर अपनी राय रखने का काम किया है। महज़ औपचारिकता स्वरूप।
2). कालाधन: इस मुद्दे को भाजपा के सहयोगी बाबा रामदेव पिछले 3-4 सालों से उठाते रहे हैं, और मोदी जी को कालाधन लाने में सक्षम एकमात्र नेता भी बताते रहे हैं। लेकिन पिछले दिनों जब केजरीवाल ने अंबानी के स्विसबैंक के अक़ाउंट बताए तो उन्होंने कोई आस्वशन नहीं दिया। कांग्रेस तो इस मुद्दे पर बिल्कुल भीगंभीर नहीं है। एक मात्र आम आदमी पार्टी इस मुद्दे पर अपना स्टैंड फिलहाल तो साफ दिखा रही है। लेकिन उसे भी उद्योगपतियों से लडकर ही यह काम करना होगा। जिस तरह से इस देश में राजनीति में उद्योगपति अपना दखल देने लगे हैं, उससे तो केजरीवाल को भी बहुत बच कर काम करना होगा। मोदीजी का स्पेशल टास्क फोर्स उन उद्योगपतियों का क़ालाधन कैसे देश में लाएगा, जो इस समय उनके प्रचार पर लाखों रुपए खर्च कर रहे हैं।
3). गरीबी और मँहगाई: देश का दुर्भाग्य ही है कि आज भी देश की लगभग 50 से अधिक आबादी अपना पेट भरने के लिए संघर्ष कर रही है। यही कारण है कि सरकार को खाद्य सुरक्षा कानून लाना पड़ा है। राहुल गाँधी देश की 70 करोड़ आबादी को मिडल क्लास में लाने की बात तो करते हैं, लेकिन यह तो इंदिरा गाँधी के जमाने का वादा था। वहीं मँहगाई कम करने की बात पर कांग्रेस इसे विकास दर बढ़ाकर रोंकेगी। भाजपा भी इसपर अपना स्टैंड क्लियर नहीं किया है। भाजपा इसके लिए केवल 6 महीने का समय मांग रही है। अब हमें यह भी समझना होगा कि आखिर यह मंहगाई कम कैसे होगी? 2012 के गुजरात विधानसभा में मोदी का गरीबों को घर देने का वादा भी जैसे का तैसे पड़ा है। आम आदमी पार्टी ने इसपर अपनी कुछ स्कीम और सब्सिडी जैसी योजनाएँ दिल्ली में अपनाई हैं, जिनका फिर से देश को भरोसा दिलाया है।
4). रोजगार और शिक्षा: ये दोनों मुद्दे एक-दूसरे से मिलते हुए हैं। कांग्रेस ने शिक्षा का कानून तो ला दिया लेकिन जमीन पर यह कानून खोखला ही साबित हुआ है। देश में नए आई. आई. टी., आई. आई. एम. और यूनिवर्सिटी बनाने की बात तो दोनो दल कर रहे हैं। लेकिन कांग्रेस के साथ-साथ गुजरात में शिक्षा के निजीकरण पर पूरे देश ने मोदी का भी स्टैंड देखा है। इसपर नीतीश कुमार और अरविन्द केजरीवाल ने अपना रुख सही ढंग से साफ किया है. केजरीवाल की सरकार में मनीष सिषोदिया जैसी शिक्षा मंत्री का कार्य जनता ने देखा है। ये दोनों नेता सरकारी स्कूलों की हालात ठीक करने की बात कर रहे हैं, इनका कहना है कि अगर देश का हर गरीब आदमी अपने बच्चे को सही शिक्षा दे पाएगा तब आई. आई. टी. और यूनिवर्सिटी काम आएंगे।
हर आदमी को अच्छी शिक्षा मिलेगी तब वह जातीय, धार्मिक और क्षेत्रीय अंतर को दूर कर सकता है। उनको ऐसी शिक्षा दी जाए जो उनके रोजगार के काम आए। वहीं रोजगार के लिए सब पर हावी नरेन्द्र मोदी दिखते हैं। यह बात भी है कि उन्होंने गुजरात में रोजगार दिया भी है। लेकिन पूरे देश में यह केवल गुजरात जैसी प्राइवेटाइजेशन की स्कीम पर चलना मुस्किल होगा। नीतीश कुमार ने तो निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की बात करके सबको चौंका दिया है। वहीं अखिलेश और अन्य नेताओं ने केवल वादे किए हैं। कांग्रेस तो इसपर अपना मुंह दिखाने लायक भी नहीं बची है। पिछले 10 सालों में लोगों ने देश में बेरोजगारी की समस्या को देखा है।
5). महिलाओं और देश की आंतरिक की सुरक्षा: यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिसमें कांग्रेस महिला सुरक्षा पर पूरी तरह से फेल हुई है। आंतरिक सुरक्षा की बात की जाए तो इस सरकार ने इसपर कुछ हद तक कामयाबी पाई है। वहीं राहुल गाँधी द्वारा पुलिस में 25% महिलाओं की बात करके कुछ सही तो किया है। उनका पूरा ध्यान महिलाओं के शशक्तीकरण पर रहा है। भाजपा ने भी इसे मुद्दा बनाकर कुछ लाभ लिया और कुछ वादे भी किए लेकिन कोई जिक्र करने लायक प्वाइंट नहीं है। आम आदमी पार्टी ने महिला सुरक्षा कमांडो बनाने का अपना वादा दोहराया है, जो अच्छा है। आंतरिक सुरक्षा पर भाजपा नहीं मोदी पर मुझे कुछ भरोषा है, अगर वो साम्प्रदायिकता संभाल लें तो? बाकी आप सपा जैसी पार्टियों का इस मुद्दे पर स्टैंड मुलायम सिंह के हालिया बयान से समझ सकते हैं।
6). विदेशनीति: विदेश नीति पर अगर बात की जाए तो भाजपा का स्टैंड इसपर आक्रमक लगता है, जैसा मोदी कहते हैं पाकिस्तान से युध्द करो, चीन पर चड़ बैठो, अमेरिका से रिस्ते अहम होंगे। मोदी ने इसपर बांग्लादेशी घुसपैठियों पर रोंक के लिए बात की है, लेकिन यह भी वादा कर दिया है कि जिस भी देश में हिन्दुओं पर जुर्म हो रहा है वो भारत आ जाएँ. बिना यह सोंचे कि अगर देश में अल्पसंख्यकों को कष्ट हुआ तो वो किसी दूसरे मुल्क में भी जा सकते हैं। यह विचारधारा तो पूरी तरह से जिन्ना की थी। आम आदमी पार्टी ने अपनी उम्र और चुनाव में सरकार न बनाने की उम्मीदों के अनुसार इसपर ज्यादा विस्तारित बात नहीं की है। हाँ लेकिन देश को सम्मान के साथ सबको सात लेकर चलने की बात की है. अगर कांग्रेस की बात करें तो पिछले दस सालों में आपको कई उतार-चड़ाव देखने को मिल सकते हैं। आगे भी उसने यही कार्यक्रम जारी रखने का वादा किया है।
7). बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य और शहरीकरण: यह मुद्दे आज देश के लिए आवश्यक हैं, कांगेस ने इसपर काम तो किया है, लेकिन पूरे देश में यह विकास कमजोर रहा है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में इसतरह के कार्य ना के बराबर हुए हैं। भाजपा ने इसपर अपना वादा किया है, गुजरात के इसी विकास के नाम पर जो हवा बनी है, वह देखना देश भर में कैसे जाता है। सभी पार्टियों ने इसपर अपने-अपने वादे किए हैं। भाजपा और कांग्रेस ने 100-100 नए मॉर्डन शहर बनाने का भी वादा किया है। बिजली और पानी पर आप ने दिल्ली जैसा वादा और भाजपा ने गुजरात जैसा वादा किया है। सभी दलों ने स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने की बात कही है, जिसमें हर राज्य में एक-एक एम्स खोलने का वादा भी सामिल है।
8). कृषि: आज भी देश की लगभग 70 आबादी गावों में खेती पर निर्भर है। और कृषि हमारे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। आज देश में किसान आत्म हत्या कर रहे हैं। कोई भी किसान अपने बच्चों को किसान नहीं बनाता चाहता है। किसान की हालत बद से बदतर होती गई और देश की केन्द्र और राज्य सरकारें तमाशा देखती गईं। कांग्रेस ने जितना पिछले 10 सालों में किसानों को लुटा शायद ही किसी और ने ऐसा किया होगा? अब राहुल गाँधी ने यह रिस्ता फिर से बनाने की कोशिश की और किसानों से मिलकर उनकी समयस्याएं इसमें डाली हैं। उन्होंने आदिवासी किसानों और मछुआरों के लिए अलग मंत्रालय खोलने का वादा है। जब किसान शब्द आता है तो भाजपा कोई भी बड़ा और अच्छा वादा नहीं कर पाती है। गुजरात के हिसाब से तो मोदी जो 100 नए शहर बनाने वाले हैं वो तो गावों को उजाड़कर ही बनेंगे। एक-आध वादे अच्छे हैं जो मोदी के गुजरात में ही फेल हो गए हैं। सपा और जेडीयू ने अपने-अपने राज्य के किसानों के लिए अच्छे वादे किए हैं। सबने किसानों को लोन, फसल बीमा, सिंचाई और बिजली देने की बात की है। लेकिन किसी ने भी किसान के असली दर्द उनकी जमीन छीनने के मुद्दे को  समझने की कोशिश नहीं की है।
9). प्रवासी मजदूरों की समस्याएँ: प्रवासी मजदूर सबसे ज्यादा बिहार और उत्तरप्रदेश से ही बाहर जाते हैं। और दिल्ली में इन राज्यों की अच्छी खासी उपस्थिति के बावजूद इनकी समस्याओं के लिए कोई भी कदम नहीं उठाया जाता है। कांग्रेस ने तो इस क्षेत्र में 60 साल में कुछ नहीं किया है, अगर दिल्ली के एक-दो काम छोड़ दें तो। वहीं भाजपा ने इस मुद्दे पर अपने घोषणा पत्र में कुछ भी नहीं लिखा है। आम आदमी पार्टी ने प्रवासी मजदूरों के मुद्दों को सामिल किया है, जिसमें उनका रेग्युलर होना, ठेकेदारी प्रथा हटाना, उनके स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना, उनके लिए कालोनियों का वितरण जैसी बुनियादी समस्याएं हैं। वहीं सबसे अच्छा वादा बिहार के मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ने किया है। नीतीश कुमार ने प्रवासी मजदूरों की दिल्ली, मुम्बई, चण्‍डीगढ़ जैसे शहरों में सुरक्षा के लिए विशेष कानून बनाने का वादा किया है। वैसे मैने भी "प्रवासी होने के अधिकार" पर राहुल गाँधी को पत्र लिखा था, लेकिन उन्होंने कोई वादा नहीं किया।
10). चुनावप्राणाली: इसी क्रम में मैं भाजपा का एक और वादा याद दिलाना चाहता हूँ। वह है कि अगर उनकी सरकार बनी तो वो लोकसभा और विधान सभा के चुनाव साथ-साथ कराएंगे। आखिर क्या इतने राज्यों वाले विविधता पूर्ण और संसदीय राजनीति वाले देश में ऐसा करना उचित होगा? मुझे लगता है कि भाजपा देश की संसदीय प्रणाली को नहीं पसंद करती है और अमेरिका के जैसी व्यक्ति केन्द्रित व्यवस्था चाहती है। भाजपा हर बार एक लहर लेकर चलती है, जो केन्द्रिय राजनीति में कुछ सफल होती है लेकिन राज्यों के चुनाव में इसे कोई भी पसंद नहीं करता है। भाजपा एक तीर से दो निशाने साधने के मूड में है। और सभी पार्टियाँ चुनावों को ईमानदारी से कराने की बात तो कर रही हैं, लेकिन किसी ने भी यह आस्वासन नहीं दिया है कि वो चुनाव में कालाधन नहीं लगाएंगे या चुनाव आयोग की आचार संहिता का पालन करेंगे। सभी वोट के लिए चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को कमजोर करना चाहते हैं।
साम्प्रदायिकता, आरक्षण, अल्पसंख्यक, जातिवाद और भी कई मुद्दे हैं, जिनपर हमारे राजनैतिक दल वादा तो करते हैं लेकिन सही से लागू नहीं कर पाते हैं। भाजपा जैसी पार्टियाँ तो राम मंदिर को अपने घोषणापत्र में सामिल करती हैं लेकिन इन बुनियादी मुद्दों से दूरी रखते हैं। कुछ गैर जरूरी और घातक वादे भी किए गए हैं जिनमें राम मंदिर, कॉमन सिविल कोड और धारा 370 सामिल हैं।  देश में मुद्दों की कमी नहीं है, लेकिन इन बुनियादी मुद्दों पर ही राजनैतिक दलों ने अपना वादा किया है। अब देखना है कि जिस दल की सरकार बनेगी वो इसे पूरा करेंगे या नहीं। कुछ लोग घोषणा पत्र को गंभीरता से नहीं लेते हैं लेकिन मेरा कहना है कि सबके घोषणा पत्र पढ़ना चाहिए और अगले चुनाव में वादे ना पूरे करने पर उनसे सवाल भी पूंछने चाहिए।

No comments:

Post a Comment

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...